kabir das biography in Hindi | कबीर दास की अलौकिक जीवनी

कबीर दास (kabir das) जी ज्ञानमार्ग शाखा के बहुत ही प्रसिद्ध कवी माने जाते है | ज्ञान मार्गी शाखा में वो कवी आते है जो इस बात में विश्वास रखते है की ज्ञान के जरिये हे आप इश्वर को या मोक्ष को प्राप्त कर सकते है |

कबीर हिंदी साहित्य के भक्ति काल के एकलौते ऐसे कवि है, जो आजीवन समाज और लोगों के बीच व्याप्त आडम्बरों पर कुठारा घात करते रहे |

इनके कहे गए साखी((काव्य प्रकार)) से उस समय के सामाजिक और धार्मिक जीवन की बहुत सारी रूढ़िवादी परंपराओं का जिक्र होता है और वो इसका भरपूर खंडन करते है |

वे कबीर दास (kabir das), कबीर साहब और संत कबीर नामों से प्रसिद्द थे |


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वैसे देखा जाये तो आज कबीर से जूडी घटनाओंका प्रमाण तो नहीं मिलता लेकिन जन श्रुतियों में वो हमेशा मौजूद रहे है और हमारे बोलचाल में भी |

kabir das
Kabir Das

कबीर दास((kabir das) जी की जन्म कहानी

कबीर दास जी का जन्म 1398 ई. में काशी में हुआ | काशी एक प्रसिद्द तीर्थ स्थल है |

कहा जाता है की संत कबीर दासजी का जन्म विधवा ब्रह्मणी के गर्भ से हुआ था | विधवा ब्रह्माणी ने लोक लाज के डर से इन्हें जन्म के बाद उत्तरप्रदेश के वाराणसी जिल्हे में काशी शहर के अन्दर एक लहर तारा तालाब है, उस तालाब के सिडीयों पर इन्हें छोड़ गयी थी |

एक लोक वन्दता यह भी है की संत कबीर दास इस लहरें तालाब के एक कमल पुष्प पर बालक के रूप में अवतरीत हुए थे |

 ➡  काशी का नीरू नाम का जुलाहा अपनी नई नवेली दुल्हन नीमा का गौना कराकर ससुराल से वापस आ रहा था | मार्ग में तालाब देखकर दोनों कुछ देर तक विश्राम के लिए रुक गये, तभी उन्हें नवजात बालक की किलकारियाँ सुनाई दी |

जब वे आवाज की और गए, तो तो वहां के दृश्य को देखकर आचम्भित हो गए | उन्होंने देखा एक सुकोमल शिशु किलोल कर रहा था | नीमा अपने ह्रदय में उठ रहे स्नेह को रोक न सकी और आगे बढ़कर उसने बालक को उठाकर अपने ह्रदय से लगा लिया |

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Kabir Das

चारों तरफ कोइ भी नजर नहीं आ रहा था इसिलए उन्होंने बालक को अपने पास रख लिया | जुलाहा दम्पती ने इस बच्चे का नाम ‘कबीर’ रख दिया | जुलाहा दम्पती मुसलमान धर्मीय थे |

 

संत कबीर दास जी की पौराणीक जन्म कथा 

सवंत 1455 जेष्ठ पूर्णिमा दिन सोमवार के मांगलिक ब्रह्म मुहूर्त की बेला थी | लहर तालाब तट पर स्वामी रामानन्द जी के शिष्य अष्टानंदजी ध्यान में बैठे थे | अचानक उनकी आँखे खुल गई | गगन मंडल से एक दिव्य प्रकाश पुंज तालाब में  पूर्ण विकसीत पुष्प कमल पर उतरा |

क्षण मात्र में वह प्रकाश पुंज बालक के रूप में परावर्तीत हो गया | स्वामी अष्टानंदजी इस अलौकीक बात को समझ न सके | इस घटना का अर्थ जानने वे अपने गुरु रामानन्दजी के पास चले गए |

गगन मंडल से उतरे, सद्गुरु सत्य कबीर | जलज माहीं पौढन किये, सब पिरन के पीर ||

लहर तालाब के निकट से गुजरने वाले नीरू और नीमा नाम के जुलाहे दम्पती को कमलपुष्प पे इस बालक के दर्शन हो गए | उन्होंने चारों तरफ देखा बालक के साथ कोइ भी नहीं दिखा | वे सोच में पड गए यह तेजस्वी बालक किसका है | तब बाल स्वरुप सद्गुरु स्वयं बोल उठे :

हम अविगत से चली आये, कोइ भेद भरम ना पाए ; न हम जन्मे गर्भ बसेरा, बालक होय दिखलाये |            काशी शहर जलज बीच डेरा, तहाँ जुलाहा पाये ; अगले जनम हम कौल किये थे, तब नीरू घर आये || 

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वचन सुनकर दोनों बालक को घर ले गये | इन्हें अपनाकर कर पालन पोषण किया | आगे चलकर के वही छोटा बालक भारतवर्ष में  कबीरदास नाम से प्रसिद्ध हुआ |

भले ही कबीर जी का जन्म एक हिन्दू परिवार में हूआ हो  परन्तु इनका पालन पोषण एक मुस्लिम परिवार ने किया | तो इस तरह से वे एक हिन्दू भी थे और मुसलमान भी |

कबीर दास (kabir das) से जूडी तमाम बहस अपने जगह मौजूद है | कहीं कहीं इस बात का जिक्र आता है कबीर जी का जन्मस्थान काशी नहीं बल्की बस्ती जिल्हे का मगहर और कहीं आजमगढ़ जिल्हे का बेलहरा गाव है |

 

परिवार

इनके परिवार के बारे में स्थिती स्पष्ट नहीं है | कोइ नहीं जानता उनका परिवार कहाँ से सम्बन्ध रखता था या उनके असली माता पीता कौन थे ?

कहां जाता है  की संत कबीर जी के पत्नी का नाम लोई था |

इनके पुत्र का नाम कमाल तथा पुत्री का नाम कमाली था | 

कहते है कबीर पेशे से बूनकर थे और वह उपजीविका के लिए कपडा बुनने का काम करते थे |

कहा जाता है कबीरजी ने लम्बी-लम्बी यात्रायें की: आईने अकबरी किताब के अनुसार कबीर देश भर में खूब घूमे | कुछ दिन वो जग्गनाथ पूरी में भी रहे |

कबीर को दिल्ली के सुलतान सिकंदर लोधी के काल का माना जाता है |

 

कबीर के गुरु कौन थे ?

काशी में जिस समय कबीर जी के दोहों ने उथल पुथल मचाई थी उस समय वहां स्वामी रामानंद का बड़ा मान था |

स्वामी रामंनद के बारह शिष्य बताये जाते है | जिनमे कबीर दास जी एक थे | कबीर ने एक जगह अपने दोहे में कहा हैं | काशी में हम प्रकट भये रामानंद चेताये |” 

आमतौर पर स्वामी रामंनद जी को ही कबीर का गुरु माना जाता है |

 ➡  कबीर के गुरु कौन थे इसको लेकर इतिहासकारों में थोडा संदेह है | एक बड़ा तबका है जो स्वामी  रामानन्द को कबीर का गुरु मानता है | 

कई लोग ऐसा मानते है की कबीर ‘निगुरा’ थे मतलब बिना गुरु के | कबीर जी ने एक दोहे में कहा है “आप ही गुरु आप ही चेला ” मतलब आप स्वयंम अपने आपके शिष्य भी हो और गुरु भी हो | 

तो कई लोग ऐसा मानते है की उन्होंने वैष्णव पीताम्बर पीर को अपना गुरु माना था | तो और एक परंपरा के अनुसार शैख़ ताकी को कबीर का गुरु माना गया है |

 

जाती प्रथा के विरोधी संत कबीर दास (कथा) 

कबीर जी धार्मिक भेद-भाव और जातपात के घनघोर विरोधी थे | उनके बारें में एक दंतकथा प्रचलीत है | 

   दक्षिण भारतीय तोताद्री मठ के निमंत्रण पर रामानन्दजी वहां पहुँच गए | कबीर भी एक भैंसे पर झोली आदी लाद अपने सभी वर्णों (भिन्न जाती और धर्मों के लोग) के संत भक्तो के साथ थे |  

तोताद्री मठ में जाती प्रथा थी | मठ के आचार्य चिंता में पड गए की सबको साथ में कैसे बीठाया जाय ? तब निर्णय लिया गया की जो वेद मन्त्रों का सस्वर उच्चारण करेंगे वही संत भक्तो पंडितों के साथ प्रथम पंक्ती में भोजन करने बैठेंगे |

तब कबीर बोले “वेद मन्त्र तो हमारा भैंसा भी पढ लेता है” | उन्होंने भैंसे के पीठ पर जैसे ही हाँथ रखा भैंसा सस्वर अर्थ सहीत वेद मंत्र का उच्चारण करने लगा | 

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Saint Kabir Das

आचार्य पंडीत अपनी जातिवादी, भेद भाव वाली सोच पे लज्जित हो गए, उन्होंने संत कबीर से क्षमा माँग ली और सभी ने एक साथ मिलकर भोजन किया |

 

सर्व ज्ञानी कबीर 

कबीर दास (kabir das) अनपढ़ थे | वे कभी भी किसी विद्यालय नहीं गए और नाहीं इन्होने कभी किसी गुरुसे कोई शिक्षा ली |

इन्होने अपने आसपास के जीवन से जो कुछ भी सिखा वो साखी(काव्य प्रकार) के रूप में या दोहों के रूप में प्रस्तुत किया जो की उनके शिष्यों द्वारा बाद में लेखांकीत किया गया |

कबीर जी की सारी रचनाएँ कबीर ग्रंथावली में संकलित है | ये क्रांतदर्शी के कवि थे जिनके कविता से गहरी सामाजिक चेतना प्रकट होती है |

यह कीताबी ज्ञान से ज्यादा अनुभव के द्वारा प्राप्त कीये ज्ञान को ज्यादा महत्व देते है | क्यों की कबीर जगह जगह घूमकर प्रत्यक्ष ज्ञान प्राप्त करते थे

साखी यह कबीर द्वारा लिखे गये कविताओंका संग्रह है | साखी का अर्थ है प्रत्यक्ष ज्ञान | इन् दोहों में कई बोलियाँ जैसे राजस्थानी, भोजपुरी, पंजाबी , अवधि, फारसी, अरबी आदी का मिश्रण है | उनकी भाष को सधुकड्डी या पंचमेल खिचडी भी कहा जाता है |

साखी शब्द का अर्थ होता है साक्षी अर्थात गवाह |

कबीर दासजी के हर एक दोहे में एक अद्भुत ज्ञान मिलता है |उनके द्वारा जो कुछ भी कहां गया उन कथनों को, उनकी सारी कविताओंको बीजक नाम के ग्रंथ में लिखा गया जिसके तीन हिस्से है | साखी, सबद और रमैनी |

 

कबीर दास के साहित्य 

कबीरदास जी की शिक्षा के बारे में इतिहासकारो का यह मत है कि आपने किसी भी विद्यालय से शिक्षा ग्रहण नहीं की थी और आप अनपढ़ थे| कबीर स्वयं अपने दोहे में कहते है ➡ 

“मसि कागद छूऔं नहीं, कलम गहौं नहि हाथ |चारों जुग कै महातम कबिरा मुखहिं जनाई बात ||”

आपने अपनी रचनाओं को स्वयं लिपिबद्ध नहीं किया था | आपकी रचनाओं को ‘धर्मदास’ जी ने संग्रहित किया था और इस संग्रहण को ‘बीजक’ कहा जाता है

कबीर के रचनाओंके संकलन में, ‘बीजक’ इनका एक बहुत ही महत्त्व पूर्ण संकलन है |  

 ➡  बीजक के तीन भाग हैं,जोकि अग्रलिखित हैं-

 ➡ साखी शब्द संस्कृत के शब्द “साक्षी” का रूप है| साखी दोहा छंद में लिखा गया है | साखी एक तरह से कहे तो एक दोहा छंद है | जिनमे तेरह और बारह माँत्राओंके के आधार पर गनणा की जाती है |

 ➡  सबद में कबीर दास जी के गेय पद संग्रहित किए गए हैं | सबद में पूरी संगीतात्मकता विद्यमान है| इन्हें गाया भी जा सकता है |

रमैनी चौपाई एवं दोहा छंद में रचित है, इसमें संत कबीर के रहस्यवादी एवं दार्शनिक विचारों को प्रकट किया गया है|

 

कबीर दास की साहित्यिक विशेषताएं

कबीर दास जी ने अपने काव्य में रहस्यवादी भावना का समावेश किया है | उनके काव्य खंड में बहुत तरह के उस समय के सामाजीक और धार्मिक परंपराओंका रहस्य छीपा हमें नजर आता है | 

कबीर के काव्य का विषय समाज में चली आ रही बुरी रितियों के प्रती लोगों में जागृती करना एवम धार्मिक और सामाजीक बुराईयोंका खंडन करना था | 

इनके जितने भी दोहे और साखियाँ  हम पढ़ते है उनमे उस वक्त समाज में पाए जाने वाले आडम्बरो, जातपात और कुरीतियों पर इनके द्वारा कडा प्रहार किया गया है | 

कबीर किसी भी तरह के जात-पात और भेद-भाव में विश्वास नहीं रखते थे | उनके अनेक दोहों में हमें इसकी साक्ष मिलती है | जैसे  “जाति पाती पूछे नहि कोई, हरिको भजे सो हरि को होई |”

 

लोकप्रिय संत और कवी

सामान्य जन मानस में संत कबीर दास कवी के रूप में काफी लोकप्रिय थे | इसकी वजह थी उनकी भाषा शैली | उनके भाषा शैलीने उस वक्त सामान्य जन को प्रभावित किया था और आज ईतने सालों के बाद भी उनकी काव्य की भाषा शैली लोगों को प्रभावित कर रही है |

कबीर की काव्य भाषा आसपास के माहोल से मिली जुली भाषा है जिसे सामान्य लोग रोज की बोली भाषा में प्रयोग किया करते थे | साहित्यकार इस भाषा को ‘सधुक्कड़ी’ कहते है |

सधुक्कड़ी पंचमेल मतलब लगभग पांच भाषाओंका मिश्रण है | इस भाषा में अवधी, राजस्थानी, पंजाबी, पूर्वी हिंदी और ब्रज आदी भाषाओंका मिश्रण है |

इनकी कवितायेँ लोगोंको जीवन जीने की कला सिखाती है | इन्होने अपनी कविताओं द्वारा धार्मिक अवडम्बरों पर और समाज के कुरीतियों पर चोट की है |

 

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धर्मनिरपेक्ष संत 

कबीर जी हिन्दू मुसलमान का भेद नही मानते थे |

कबिर को बचपन से ही हिन्दू एवं मुस्लिम दोनों सम्प्रदायोंके संस्कार विद्यमान थे इसीके कारण वे दोनों धर्मों के लोगों में लोकप्रिय थे, दोनों धर्मों के लोगों के बीच उनका विशेष स्थान था |

कबीर जाती बंधन को तोड़ने की बात आज से ६०० साल पहले करते थे | न हिन्दू ना मुस्लमान की घोषणा करने वाले कबीर भारत वर्ष के पहले कवी थे जिन्होंने धर्म निरपक्ष  समाज की मांग अपेक्षा की थी |

वैसे कबीर को इस बात से कोइ फर्क नहीं पड़ता की उनके पालन पोषण करने वाले कौन थे, वो मुसलमान थे या हिन्दू, तुर्क थे या सनातनी ये सवाल कबीर के लिए महत्व नहीं रखता था | पर समाज के क्या चल रहा था और क्या चलता आ रहा था इसको लेकर कबीर किसको छोड़ने वाले नहीं थे |

जब कबीर जी का देहांत हुआ तब हिन्दू कहते थे कबीर साहब हमारे है और मुस्लमान कहते रहे वो हमारे है |

पर जबकी असलीयत यह है की कबीर ने जीवन भर दोनों धर्मो के आडम्बरों पर तीखा प्रहार किया था | और उन्होंने अपने दोहे में इस बात का जिक्र भी क्या था |

हिंदु कहूँ तो मैं नहीं मुसलमान भी नाहि |
पंच तत्व का पूतला गैबी खेले माहि ||

मैं न तो हिन्दु हू अथवा नहीं मुसलमान। इस पाच तत्व के शरीर में बसने वाली आत्मा न तो हिन्दु है और न हीं मुसलमान | 

 

कबीर दास की मृत्यु 

कबीर जी को १२० वर्षोंकी लम्बी आयु प्राप्त हुयी | उनकी मृत्यु 1518 इसवी में महनगर हुई |

ऐसा माना जाता है कि जीवन के अंतिम समय में आप काशी से मगहर चले गए थे, क्योंकि उस समय लोगों में यह धारणा प्रचलित की जिस व्यक्ती की मृत्यु काशी में होती है उसे स्वर्ग की प्राप्ति होती है और जिसकी मृत्यु मगहर में होती है उसे नरक की प्राप्ति होती है|

कबीरजी का कहना था अगर आपके कर्म अच्छे हो तो आपकी मृत्यु भले ही मगहर में हो आप को स्वर्ग प्राप्ती जरूर होगी | अगर आपके कर्म बूरे हैं और आप काशी जैसे पवित्र क्षेत्र में मरते हैं तो भी आपको नरक में ही जाना होगा | 

एक मत (वन्दता) यह भी है की काशी के काजी, कोतवाल, पंडित उनसे नाराज थे इसलिए वह उनको परेशान किया करते थे | इसीसे त्रस्त होकर उन्होंने अपने अंतिम समय में काशी छोड़ने का फैसला किया और मगहर चले गए |

जिस प्रकार कबीर के जन्म के संबंध में अनेक मत हैं उसी प्रकार उनके मृत्यु के संबंध में भी अनेक मत प्रचलित हैं, अनंतदास जी के अनुसार आपकी मृत्यु सन 1518 ईस्वी में हुई थी और आपका जीवन काल 120 वर्षों का था|

 

संत कबीर की मजार और समाधी 

उत्तरप्रदेश  के संत कबीर नगर का  ‘मगहर’ एक क़स्बा है जहा कबीर की मजार भी है और समाधी स्थल भी है |

यहाँ हर साल माघ शुक्ल दशमी से माघ पूर्णिमा तक मेला एवम संत समागम समारोह आयोजीत किया जाता है |इसमें देश विदेशसे लाखों की संख्या में श्रद्धालु यहाँ आते है |

कबीर के माता पीता नीरूऔर नीमा की समाधी उत्तरप्रदेश के ‘वाराणसी’ में है |

 

कबीर जयंती

आज 600 साल बाद भी कबीर की विरासत जीवित है और कबीर पंथ (“कबीर का पथ”) के माध्यम से जारी है, एक धार्मिक समुदाय जो उसे अपने संस्थापक के रूप में पहचानता है और संत मत पंथों में से एक है। इसके सदस्यों को ‘कबीर पंथी’ के नाम से जाना जाता है |

ऐसा माना जाता है कि महान कवि संत कबीर दास का जन्म ज्येष्ठ के महीने में पूर्णिमा के दिन में हुआ था |इसीलिए संत कबीर दास जयंती या जन्मदिन हर साल पूर्णिमा में उनके अनुयायि और प्रेमि बड़े उत्साह के साथ मनाते है |

Kabir Ke Dohe (Best 200) | कबीरदास जी के अद्भूत 200 दोहे अर्थ सहित (Part-1)

KABIR KE DOHE कबीरदास ज्ञानमार्गी शाखा के प्रतिनीधी कवि माने जाते है |  कबीर का जन्म 1399 ई. में काशी में हुआ | कहां जाता है कि इनका जन्म एक विधवा ब्राह्मणी के गर्भ से हुआ था और वह लोक-लाज के डर से कबीर को लहरतारा नामक तालाब के निकट छोड़ आई थी |

कबीर को नीमा और नीरू जुलाहा दम्पंती ने स्वीकारा और इनका पालन पोषण किया | इसीलिए हिन्दू-मुसलमान दोनों के संस्कार इनके जीवन में विद्यमान है |

कहां जाता है इनके पत्नी का नाम लोइ था जिससे उनको कमाल और कमाली दो संताने थी |

कबीरजी के गुरु रामानंद थे | कबीर जी की मृत्यु 1495 ई. में महनगर में हुई |

कबीर अनपढ़ थे | उनके शिष्यों ने उनके दोहों को लिखित स्वरुप में संग्रहीत करके रखा था |


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कबीरदासजी की जानकारी  [ Kabir Das information ]
जन्म १३९८ वाराणसी (काशी)
मृत्यु १५१८ मगहर (उत्तर प्रदेश)
माता पीता  अज्ञात, नीमा तथा नीरू द्वारा पालन-पोषण 
गुरु  रामानंद 
पत्नी लोई 
पुत्र  कमाल 
पुत्री  कमाली 
भाषा सधुक्कड़ी(पंचमेल) अवधी, मगधी, भोजपुरी आदी तरह की भाषओंका मेल  
कार्य (रचनाएँ)  साखी, सबद,रमैनी 

 

Kabir ke dohe
Kabir Das

संत कबीर हिंदी साहित्य काल के इकलौते ऐसे कवी है जिन्होंने जीवन भर समाज में पाए जाने वाले अवडम्बरों के खिलाफ अपनी आवाज उठाई थी और समाज में पाए जाने वाले कुप्रथाओं पर अपने दोहों के माध्यम से कड़ा प्रहार किया था |  

 KABIR KE DOHE 

पहला दोहा

धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय |
माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय ||

[शब्द का अर्थ- माली-बागवान, सींचे-पानी देना ]

भावार्थ-  किसी भी ध्येय को प्राप्त करने के लिए हमे सब्र की जरूरत होती है | हमने किसी चीज़ की कामना की तो वह कभी भी तुरंत प्राप्त नहीं होती है | उसे प्राप्त करने के लिए हमें कड़े मेहनत, धीरज और परिश्रम की जरूरत होती है |

जिस तरह से किसी बाग़ का माली अगर पेड़ को एक साथ सौ घड़ा पानी अर्पण करता है तो भी उस पेड़ को फल ॠतु आने पर ही लगते है | कितने भी घड़े पानी से पेड़ को सींचे, जिस तरह से उसे ॠतु आने से पहले फल नही लग सकते कबीर कहते है उसी तरह से कोइ भी कार्य धीरे धीरे ही सफल होता है |



 

दुसरा दोहा

धर्म किए धन ना घटे, नदी न घटे नीर |
अपनी आंखन देख लो, कह गये दास कबीर || 

[शब्द का अर्थ:- घटे-कम होना, नीर–जल,पाणी, आंखन-आँख]

भावार्थ- कबीर जी कहते है, जो व्यक्ती धर्म के लिए, समाज के परोपकार के लिए अपने धन को खर्च करता है उसका धन, उसकी प्रसिद्धी, लोकप्रियता कभी भी कम नहीं होती, उल्टा उसके धन, उसकी प्रसिद्धी, लोकप्रियता में निरंतर वृद्धी ही होती है | जिस तरह से नदी अपने जल से अगणीत लोगो की प्यास बुझाकर भी उसके जल का भंडार में कमी नहीं होती |  

अर्थात अच्छे कर्म हमेशा मनुष्य के उन्नती में सहायक होते है | अच्छे कर्मोंका फल हमेशा अच्छा ही होता है |



KABIR KE DOHE

तिसरा दोहा

रात गंवाई सोय के, दिवस गंवाया खाय |
हीरा जन्म अमोल सा, कोड़ी बदले जाय ||

[शब्द का अर्थ:- सोय-सोना, नींद, खाय-भोजन करना]

भावार्थ- हमे हिरे जैसा अनमोल जीवन मिला है इसे अगर हम रात भर सोने में और दिनभर सिर्फ खाते हुए गुजार देंगे तो यह जीवन व्यर्थ हो जायेंगा | हमें इस हीरे जैसे अनमोल जीवन का आदर करते हुए इसे सार्थक कर देना चाहिए, प्रभु की भक्ती करनी चाहिए, परोपकार करना चाहिए अन्यथा हमारा जीवन कवडीमोल हो जायेगा |

अर्थात इश्वर द्वारा हमें जो ये जो जीवन दिया गया है, यह सिर्फ आराम करने के लिए नहीं दिया है | परिश्रम करके जींवन को हीरे जैसा अनमोल बनाने के लिए दिया है |



 

चौथा दोहा

माया मरी न मन मरा, मर-मर गए शरीर |
आशा तृष्णा न मरी, कह गए दास कबीर ||

[शब्द का अर्थ- माया-इच्छा, मरी-मृत्यु, तृष्णा-प्यास]      

भावार्थ- कबीर जी कहते है, मनुष्य की भले ही संपती नष्ट हो जाये, ऐश्वर्य नष्ट हो जाये, किर्ती नष्ट हो जाये या उसका अनमोल शरीर भी नष्ट हो जाये परन्तु उसकी भोग भोगने की आसक्ती, मोह, लोभ, आशा कभी भी नहीं मरती है |

मनुष्य भोग भोगने में इतना अधीर होता है, रममान होता है के उसे अपने नष्ट होने का भी डर नहीं लगता है | भोग भोगना ही उसे जीवन का उद्देश रह जाता है जो उसको विनाश की तरफ ले जाता है |



KABIR KE DOHE

पांचवा दोहा

बडा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर |
पंथी को छाया नही, फल लागे अति दूर ||

[शब्द का अर्थ- पंथी-राहगीर, मुसाफीर]

भावार्थ- समाज का प्रतिष्टित, धनवान व्यक्ती अगर लोगोंके सुख दुःख में काम नहीं आता है तो यह व्यक्ती खजूर के उस पेड जैसा ही है जो कद में बड़ा जरूर होता है, पर वह राह चलते मुसाफीर को न तो छाया प्रदान करता है और फल ऊँचाई पर होने के कारण न तो उसकी भूख मिटा सकता है |

ऐसे बड़े कद का कोइ उपयोग नही अगर वह किसीके काम न आ सके |



 

छठा दोहा

दुःख में सुमिरन सब करै, सुख में करै न कोय |
जो सुख में सुमिरन करै, तो दुख काहे होय ||

[शब्द का अर्थ- सुमिरन-याद करना, कोय-कोई, होय-होना ]

भावार्थ- जब मनुष्य के जीवन में सुख होता है, समाधान होता है ऐसे वक्त में वह प्रभु का, इश्वर का नामस्मरण करना भूल जाता है | पर जैसे ही जीवन में दुःख का प्रवेश होता है उसे इश्वर की याद आती है वह उसकी पूजा करने लगता है, नामस्मरण करता है |

र्अथात अगर सुख के दिनों में ही इश्वर का स्मरण किया जाये तो जीवन में दुःख आएगा ही नही |



 

सातवा दोहा

जैसा भोजन खाइये, तैसा ही मन होय |
जैसा पानी पीजिये, तैसी बानी होय ||

[शब्द का अर्थ- बानी-वाणी]

भावार्थ- मनुष्य अपने जीवन में जिस तरह के भोजन, पाणी आदी का समावेश करता है, उसका मन और वाणी उसी तरह की हो जाती है | अगर मनुष्य सात्विक भोजन करता है तो उसका मन और वाणी सात्विक हो जाती है | अगर अपने आहार में वह तामसी भोजन का समावेश करता है तो तामसी प्रवृती का हो जाता है | 

अर्थात जीवन में अगर आप सत्य मार्ग पर चलोगे तो सज्जन कहलाओंगे और बुराई के पथ पर चलोगे तो दुर्जन कहलओंगे |



KABIR KE DOHE

आठवा दोहा

मसि कागद छुयौ नहीं, कलम गही ना हाथ |
चारों जुग कै महातम कबिरा मुखहिं जनाई बात ||

[शब्द का अर्थ-मसी-मैंने, कागद- कागज ]

भावार्थ- कबीरजी स्वयं के बारे में कहते है के में एक फकीर हूँ जिसने औपचारिक तौर पर किसी भी तरह शिक्षा नही ली है और कभी कागज और कलम को छुआ ही नही l पर मुझे जो कुछ भी ज्ञान प्राप्त है वह सब साधू संगती का परिणाम है | मैं चारो युगों के महात्मय की बात मुहजबानी बताता हूँ |

कबीरजी ने स्वयं ग्रन्थ नहीं लिखे उनके मूँह से जो अनमोल वचन निकले उसे उनके शिष्योने लिख लिया |



 

नववा  दोहा

पाहन पूजे हरि मिले, तो मैं पूजूं पहार |
याते चाकी भली जो, पीस खाए संसार ||

[शब्द का अर्थ:- पाहन-पत्थर, हरी-इश्वर, पहार-पहाड़, चाकी-अनाज पिसने वाली चक्की]

भावार्थ- अगर पत्थर पूजने से इश्वर की प्राप्ती होती है तो में बड़े से पहाड़ को ही क्यों न पूजू इससे मुझे जल्दी से इश्वर मिल जायेगा l दरअसल कबीर यह व्यंग में कह रहे है और लोगों के कर्मकांडो पर प्रहार कर रहे है | उनका कहना है की अगर सच में पत्थर पुजके भगवान मिल जाते है तो में उस अनाज पिसने वाले चक्की के पत्थर को पुजूंगा जिससे मिलने वाले अन्न को ग्रहण करके समस्त मानव जाती का कल्याण हो जाता है |



KABIR KE DOHE 

दसवा दोहा

बुरा जो देखन मैं चला, बुरा ना मिलिया कोय |
जो दिल खोजा आपनो, मुझ सा बुरा न कोय ||

[शब्द का अर्थ:- देखन-देखने, आपनो-अपना ]

भावार्थ- में जगत में बुराई ढूँढने निकल पड़ा और मैंने सब प्रकार की बुराइयां देखी | जब मैंने अपने दिल के भीतर झाँका तो मुझे पता चला की मैंने अब तो जो भी बुराइयां देखी उससे ज्यादा बुराइयां तो मेरे अन्दर समाई हुयी है, मतलब मुझसे ज्यादा बुरा तो जगत में दुसरा कोइ नही |

तात्पर्य यह है की अगर हर मनुष्यने सबसे पहले अपने अन्दर की बुराइयां समाप्त की तो यह दुनिया अपने आप ही सुन्दर बन जायेगी |



 

ग्यारहवा दोहा

पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय |
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होयl ||

[शब्द का अर्थ :– पोथी– धार्मिक किताबे, मुआ–मृत्यु, पंडित–विद्वान, भया-हुआ, आखर–अक्षर ]

भावार्थ-  कबीर कहते है बड़ी बड़ी किताबे और ग्रन्थ जीवन में पढ़ते पढ़ते कई लोगों की मृत्यु हो गयी पर वह विद्वान अरथात पंडित बन न सके | पर अगर किसी ने सबसे प्यार करना सिख लिया तो साधारणसा व्यक्ती भी पंडीत कहलाता है |

कहने का तात्पर्य यह है की आप कितनी भी किताबे पढ़ लीजिये अगर आपके मन में प्रेम नहीं है, स्वभाव में विनम्रता नही है तब तक आपके किताबी ज्ञान का कोइ मूल्य नही | प्रेम ही आपके स्वाभाव को विनम्र बनाता है| प्रेम से ही मानव जाती का कल्याण और इश्वर प्राप्ती की जा सकती है |



 

बारहवा दोहा

एकही बार परखिये, ना वा बारम्बार |
बालू तो हू किरकिरी, जो छानै सौ बार ||

[शब्द का अर्थ :– परखिये-जांच करना, छानै- छानना, बालू-रेत ]

भावार्थ- किसी भी व्यक्ती के साथ दोस्ती करनी हो, रिश्ता बढ़ाना हो या किसी भी प्रकार का व्यवहार करना हो तो उस व्यक्ती को पहली मुलाकात में ही अच्छे तरहसे परख लेना चाहिए | उसके गुण, अवगुण, अच्छाई, बुराइयाँ को समझ लेना चाहिए |

जिस प्रकार यदि रेत को अगर सौ बार भी छाना जाए तो भी उसकी किरकिराहट दूर नहीं होती, इसी प्रकार दुर्जन व्यक्ती को बार बार भी परखो तब भी वह हमें दुष्टता से भरा हुआ ही मिलेगा | जबकि सज्जन व्यक्ती की परख एक बार में ही हो जाती है ।



KABIR KE DOHE

तेरहवा दोहा

जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान |
मोल करो तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान ||

[शब्द का अर्थ :– मोल-कीमत, तरवार-तलवार]

भावार्थ- जगत में ज्ञान महत्व रखता है न किसी व्यक्ति की जाति | किसी भी व्यक्ती की जाती से हम उसके ज्ञान का अनुमान नहीं लगा सकते और न ही किसी सज्जन की सज्नता का अनुमान | इसलिए किसी से उसकी जाति पूछना व्यर्थ है उसका ज्ञान और व्यवहार ही अनमोल होता है |

जिस तरह तलवार और म्यान में तलवार का अधिक महत्व है, क्यों की म्यान महज़ उसका उपरी आवरण होता है | उसी तरह से जाति मनुष्य का केवल एक शाब्दिक नाम है उसका ज्ञान और सज्जनता से कोइ लेनादेना नही |



 

चौदहवा दोहा

गारी ही से उपजै, कलह कष्ट औ मीच ।
हारि चले सो सन्त है, लागि मरै सो नीच ।।

[शब्द का अर्थ :– गारी-अपशब्द, गाली, उपजै-उत्पन्न होना, कलह-लड़ाई, झगडा  ]

भावार्थ- लड़ाई झगड़े, दुःख एवम् हत्या के क्रूर विचार व्यक्ति के दिलो-दिमाग में केवल किसी के कहे गए गाली-गलौच और अपशब्द के कारण ही उत्पन्न होते है | जो व्यक्ती इन सबसे हार मानकर अपना मार्ग बदलता है वही सच्चा संत हो जाता है और जो इसी दलदल में रहकर अपना जीवन व्यतित करता है, वह नीच होता है |

अर्थात मनुष्य को अगर अच्छा जीवन जीना है तो उसे लढाई झगड़े का मार्ग छोड़कर प्रभु के शरण में जाना चाहिए |



KABIR KE DOHE

पंधरहवा दोहा

ऊँचे कुल का जनमिया, करनी ऊँची न होय |
सुवर्ण कलश सुरा भरा, साधू निंदा होय ||

[शब्द का अर्थ :– जनमिया–जनम लेना, करनी-कर्म, सुरा- मद्य ]

भावार्थ- सिर्फ ऊँचे कूल में पैदा होने से कोइ ऊँचा नही कहलाता, उसके लिए कर्म भी ऊँचे होने चाहिए | जिस तरह से सुवर्ण कलश में अगर मद्य या जहर भरा होगा तो उस सुवर्ण कलश की चारों ओर निंदा ही होती है | ऐसे ही अगर ऊँचे कूल में जन्मे हुए किसी व्यक्ती के कर्म अगर अच्छे नही होते है तो वह भी समाज में निंदा का पात्र होता है |



 

सोलहवा दोहा

कबीर घास न निंदिए, जो पाऊ तली होई |
उडी पडे जब आँख में , खरी दुहेली होई ||

[शब्द का अर्थ :– निंदिए–किसीकी निंदा करना, पाऊ -पाँव, तली- नीचे, दुहेली-दर्द होना]

भावार्थ- कबीर जी कहते है के उस घास की निंदा कभी भी नहीं करनी चाहिए जो हमारे पाँव में निचे होती है | क्योंकी इसी घास का तिनका जब हवा में उडकर हमारे आँख में चला जाता है तो असहनीय दर्द होता है |

अर्थात कबीरजी का कहना है की हमें छोटी चीजों को महत्त्वहीन नहीं समझना चाहिए| जिस तरह छोटासा घास का टुकड़ा हमें दर्द दे सकता है वैसे ही हमें महत्वहीन लगने वाले लोग हमें बड़ी परेशानी में दाल सकते है |

इस दोहे में माध्यम से कबीरजी समाज में समानता का सन्देश देना चाहते है |



 

सतरहवा दोहा

जग में बैरी कोइ नहीं, जो मन सीतल होय |
या आपा को डारी दे, दया करे सब कोय ||

[शब्द का अर्थ :– मन –दिल, होय–होता है, आपा- अहंकार,घमंड, डारी दे-त्याग देना, डाल देता है, निचे कर देता है, गीरा देता है]

भावार्थ- उस मनुष्य का दुनिया में कोइ भी शत्रु या बैरी नहीं होता है जिसका मन शांत होता है, शीतल होता है | जो अपने अहंकार को त्याग देता है और हो सभी पर दया करता है |

अर्थात वही मनुष्य बिना शत्रु के होता है जिसके मन में अहंकार नही होता है | अहंकार मनुष्य को नष्ट करता है |



KABIR KE DOHE

अठरहवा दोहा

माला तो कर में फिरे, जीभि फिरे मुख माही |
मनुवा तो चहूँ दिसि फिरै, यह तो सुमिरन नाही ||

[शब्द का अर्थ :– माला-जप माला, कर-हाथ, जीभि-जीभ, जुबान, मनुवा-मन, दहूँ-दस, दिसि-दिशा, सुमिरन-स्मरण]

भावार्थ- कबीरजी कहते है की जपमाला हाथ में घूमाई जा रही है और मुख से प्रभु का नाम लिया जा रहां है | पर मन किसी और ही विचारों में डूबा हुआ है यह इश्वर का सच्चा स्मरण नही है | सिर्फ दिखावे के लिए भगवान का स्मरण नही करना चाहिए | इससे कुछ भी लाभ नहीं होता है | 

अर्थात मनुष्य जो भी काम कर रहां है वह उसे मन लगाकर करना चाहिए अन्यथा ऐसा काम का बिगड़ने की बहुत ज्यादा संभावना रहती है |



 

उन्नीसवा दोहा

काल करै सौ आज कर, आज करै सौ अब | 
पल में परलै होयगो, बहुरि करैगो कब ||

[शब्द का अर्थ :– काल-कल, परलै-प्रलय, पल-क्षण, बहुरि-शुरुआत]

भावार्थ- जो काम हमें कल करना है उसकी शुरुआत हम आज से कर सकते है | जो काम हमें आजसे करना है उसकी शुरुआत हम अभी से कर सकते है | कौन जनता है किसी भी क्षण प्रलय हो सकता है, तुम काम के शुरुआत कब करोगे |

अर्थात हमें काम को टालना नहीं चाहिए | जो काम हमें करना है उसकी शुरुआत हमें जल्द से जल्द करनी चाहिए इसीमे हमारी भलाई होती है |



KABIR KE DOHE 

बिसवा दोहा

माटी कहे कुम्हार को, तू क्या रोंदे मोहे |
एक दिन ऐसा आवेगा, मैं रोंदुंगी तोहे ||

[शब्द का अर्थ :– माटी-मिटटी, मोहे-मुझे, आवेगा-आयेगा, तोहे-तुझे]

भावार्थ- कबीरजी ने इस दोहे में जीवन का शाश्वत सत्य बताया है जो हर एक मनुष्य को मालूम होता है पर वह उसे मानने के लिए तैयार नहीं होता है | उन्होंने कुम्हार और माटी का उदाहरन लेके इस बात को समझाया है |

माटी कुम्हार को कहती है तू आज मुझे जरूर रौंद रहा है पर याद रखना इक दीन ऐसा आएगा के में तुझे रौंद दूंगी | अर्थात हे मनुष्य एक दीन तेरी मृत्यु अवश्य होने वाली है और तू मिटटी में मिल जाने वाला है इसीलिए ज्यादा अहंकार मत कर |



 

इक्कीसवा दोहा

आए हैं सो जायेंगे, राजा रंक फकीर |
एक सिंहासन चढ़ चले, एक बंधें जंजीर ||

[शब्द का अर्थ :– रंक-गरीब व्यक्ती]

भावार्थ- इस दुनिया में जो भी व्यक्ती जनम लेता है वो राजा हो, फकीर हो, अमीर हो या गरीब हो हर एक की मृत्यु निश्चित है | मृत्यु के सामने सब समान है, पर मृत्यु के पश्चात वही सिहासन पर सवार हो के जाएगा जिसने अपने जीवन में अच्छे कर्म किये है | जिनके कर्म अच्छे नहीं है उनको जंजीर में बाँध के ले जाया जायेगा|

मृत्य के पश्चात सिर्फ आपके कर्मों का हिसाब होता है आपकी दौलत, शौहरत या रुतबे का नही |



 

बाईसवा दोहा

अति का भला न बोलना, अति की भली न चूप |
अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप ||

[शब्द का अर्थ :– अति-जरूरत से ज्यादा]

भावार्थ- जरूरत से ज्यादा बोलना भी अच्छा नहीं होता और ना ही ज्यादा चुप रहना भी अच्छा होता है |  जिस तरह से ज्यादा बारिश अच्छी नहीं होती उसी तरह से ज्यादा धूप भी अच्छी नहीं होती | जीवन में हर एक क्रिया में संतुलन होना आवश्यक है तभी जीवन सुखमय गुजरता है |



KABIR KE DOHE

तेईसवा दोहा

दुर्लभ मानुष जन्म है, देह न बारम्बार |
तरुवर ज्यों पत्ता झड़े, बहुरि न लागे डार ||

[शब्द का अर्थ :– दुर्लभ-मूल्यवान, असाधारण, मानुष-मनुष्य, तरुवर-पेड़, डार-डाल, बारम्बार-बारबार ]

भावार्थ- मनुष्य का जन्म बहुत मूल्यवान है, असाधारणसा है | यह मनुष्य शरीर किसी भी व्यक्ती को बारबार नही मिलता | जिस तरह किसी वृक्ष से कोइ पत्ता झड जाता है, टूट के गिर जाता है तो वह फिर से उस डाल से जुड़ नहीं सकता | उसी प्रकार से एक बार मनुष्य के शरीर त्याग देने पर उसे मानव शरीर दुबारा नही मिलता है | 

इस संसार में मनुष्य का जन्म मुश्किल से मिलता है । यह मानव शरीर उसी तरह बार-बार नहीं मिलता जैसे वृक्ष से पत्ता  झड़ जाए तो दोबारा डाल पर नहीं लगता |



 

चौबिसवा दोहा

हाड़ जलै ज्यूं लाकड़ी, केस जलै ज्यूं घास |
सब तन जलता देखि करि, भया कबीर उदास ||

[शब्द का अर्थ :हाड़-हड्डी, जलै-जलना, ज्यूं-जैसे, तन-शरीर]

भावार्थ- मनुष्य के मृत्यु के पश्चात जब अन्त्यविधि करके उसके शरीर को जलाया जाता है l तब मनुष्य के नश्वर देह को अग्नी जलाने लगती है | उसकी हड्डियाँ किसी लकड़ी की तरह जल उठती है तो उसके बाल किसी सूखे घास की तरह जलते है | अंत समय में मानव के निचेत पड़े सम्पूर्ण शरीर को इस तरह जलता देख, कबीर का मन उदासी से भर जाता है |

अर्थात मनुष्य देह नश्वर है, इसका कोइ भरोसा नही है, यह आज है कल नहीं है |  



KABIR KE DOHE

पच्चीसवा दोहा

करता था तो क्यूं रहया, जब करि क्यूं पछिताय |
बोये पेड़ बबूल का, अम्ब कहाँ ते खाय ||

[शब्द का अर्थ :– करता-कर्म करने वाला, पछिताय-पछताना, अम्ब-आम ]

भावार्थ- संत कबीर कहते है की मनुष्य किसी काम को करने से पहले नही सोचता है | परन्तु जब वह काम गलत हो जाता है तो बाद में पछताता है | जिस प्रकार से बबुलका पेड  लगाकर आम नहीं खा जाया सकते, वैसे ही किसी काम को करने के बाद पछताना नहीं चाहिए और उसे करने से पहले उसके विषय में गंभीरता से सोच लेना चाहिए |

अर्थात कोइ भी काम करने से पहले उसके परिणामोंका विचार करना चाहिए | 



 

छब्बीसवा दोहा

जिन खोजा तिन पाइया, गहरे पानी पैठ |
मैं बपुरा बूडन डरा, रहा किनारे बैठ ||

[शब्द का अर्थ :– खोजा-ढूढना, पाईया-मिलना, बपुरा-बेचारा]

भावार्थ- जीवन में जो परिश्रम करते है, मेहनत करते है, कर्म करते है वो अनेक कठिनाइओंका सामना करके भी अपने मंजिलोको, लक्ष्यको जरूर प्राप्त कर लेते है | जैसे कोइ गोताखोर गहरे पानी की पर्वा न करते हुए पानी में गोता लगाता है और पाणी में से जरूर कुछ न कुछ लेके आता है | लेकिन कुछ बेचारे लोग ऐसे भी होते है जो पानी में डूबने के भय से किनारे पे ही बैठे रहते है और जीवन में कुछ भी नहीं प्राप्त करते है |

अर्थात जीवन में जो लोग संकटों से बिना डरे अपना कर्म करते है वो जरूर सफल होते है |



 

सत्ताईसवा दोहा

चाह गई, चिंता मिटी, मनवा बेपरवाह |
जिसको कुछ नहीं चाहिए, वह शहनशा ||

[शब्द का अर्थ :– चाह-इच्छा, ख़्वाहिश,  मनवा-मन]

भावार्थ- जिस मनुष्य के मन से, दिल से इच्छा, ख्वाहीशे समाप्त हो जाती है, उस मनुष्य के जीवन से अपने आप ही चिंता मिट जाती है और मन मस्त मौला, आनंदी हो जाता है | क्योंकी इच्छा ही सब दुखों का मूल है और जब वही समाप्त हो जाती है तो कबीर कहते है उस व्यक्ती का जीवन किसी राजा या शेनशाह के सामान होता है |



KABIR KE DOHE

अट्ठाईसवा दोहा

ऐसी बाँणी बोलिये, मन का आपा खोई |
अपना तन सीतल करै, औरन कौ सुख होई ||

[शब्द का अर्थ :– बाँणी- बोली, आपा-अहंकार, खोई-त्याग करना, सीतल-शीतल, औरन कौ-दूसरों को ]

भावार्थ- हमे अपने मन का अहंकार त्याग कर ऐसी भाषा, बोली का प्रयोग करना चाहिए | जिससे हमारा अपना तनमन भी स्वस्थ रहे और दूसरों को भी कोई कष्ट न हो मतलब दूसरों को भी सुख प्राप्त हो | इन्सान को विनम्रता से बोलना चाहिए ताकी सुनने वाले के मन को भी अच्छा लगे और आपका मन भी प्रसन्न हो |



 

उनतीसवा दोहा

कस्तूरी कुंडली बसै, मृग ढूंढे बन माँही |
ऐसे घटी-घटी राम है, दुनिया देखै नाहिं || 

[शब्द का अर्थ :कस्तूरी-एक सुगन्धित पदार्थ, कुंडली-नाभि, मृग-हीरण, घटीघटी-कण-कण, बन-जंगल]

भावार्थ- हीरण कस्तुरी के सुगंध को ढूंढते हुए पुरे जंगले में भटक रहा है | पर वह इस बात से अनजान है की कस्तुरी स्वयम उसके नाभि में ही बसी हुयी है| उसी तरह से दुनिया के जो लोग हे उन्हें राम नही दिख रहे है, इश्वर नहीं दिख रहे है, वो उन्हें मंदिर, तीर्थस्थान, देवालायोंमे ढूंढते है जब की इश्वर दुनिया के हर एक कण-कण में बसा है | इश्वर स्वयंम उनके मन में ही बसा है और वो उसे जगह जगह कस्तुरी मृग की तरह ढूंढते फिर रह है |



KABIR KE DOHE 

तीसवा दोहा

जब मैं था तब हरी नहीं, अब हरी हैं मैं नाहि |
सब अँधियारा मिटी गया, जब दीपक देख्या माहि ||

[शब्द का अर्थ :मैंअहंकार, हरी-इश्वर, अँधियारा-अंधकार ]

भावार्थ- जब तक मुझमे अहंकार था तब तक मुझे भगवान के दर्शन प्राप्त नहीं हो सके| पर जैसे ही मेरा अहंकार समाप्त हो गया मुझे भगवान के सीवाय, उस परम पीता के बगैर कुछ भी दिखाई नही पड़ रहा है| 

कबीर दास कहते है यह ठीक वैसे ही हुआ जिस प्रकार से दीप प्रज्वल्लीत होते ही समस्त अँधियारा समाप्त हो जाता है | ऐसे ही हमारे अंतर्मन में जो अहंकार था वह जैसे ही समाप्त हो गया तो संपूर्ण जगत दृश्यमान हो जाता है इसी तरह से मुझे संपूर्ण दिशाओमें इश्वर के दर्शन हो गए |



 

एकतिसवा दोहा

गुरु गोबिंद दोऊँ खड़े, काके लांगू पाँय |
बलिहारी गुरु आपने, गोविन्द दियो मिलाय ||

[शब्द का अर्थ :गोविन्द-भगवान, इश्वर, दोऊँ-दोनो, काके-किसके, पाँय-पाँव, बलिहारी-धन्य हो ]

भावार्थ- अगर गुरु और इश्वर दोनों एक साथ खड़े है तो पहले किसके चरण स्पर्श करने चाहिए | कबिरदासजी कहते है, में पहले गुरु को ही प्रणाम करूँगा क्यों की गुरु ही है जिन्होंने मुझे इश्वर तक पहुचने का मार्ग बताया है | बिना गुरु के तो मैं कभी भी इश्वर को मील नहीं सकता था | भले ही इश्वर तीनो लोक के स्वामी है, पर उनसे मुझे गुरु ने मिलवाया इसीलिये मैं पहले गुरु के चरण स्पर्श करूंगा |

अर्थात कबीरजी इस दोहे द्वारा कह रहे है की जो शिक्षा और ज्ञान देने वाला गुरू हैं वो इश्वर से भी बड़ा है |



 

बत्तीसवा दोहा

साईं इतना दीजिये, जा में कुटुम समाय |
मैं भी भूखा न रहूँ, साधू भी ना भूखा जाय ||

[शब्द का अर्थ :साई-इश्वर, भगवान, कुटुम-कुटुंब ]

भावार्थ- कबीरदास जी कहते है की हे प्रभू तुम मुझे केवल इतना ही धन धान्य देना जितने में, मैं और मेरे परिवार का गुजारा चल जाए | में खुद भी कभी भूखा ना रहूँ और मेरे घर में जो अतीथी आये उन्हें कभी भी भूखा वापस न जाना पड़े |

कबीरजी कहते है की मानव को कोइ लोभ नहीं करना चाहिए जो कुछ उसके पास है वो सब उस इश्वर का दीया है उसमे ही संतोष करना चाहिए ज्यादा इच्छाएं नहीं बढ़ानी चाहिए | क्यों की इच्छाएं जब बढ़ती है तो मुसीबतें भी बढ़ती है |



KABIR KE DOHE

तेहतीसवा दोहा

निन्दक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय |
बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय ||

[शब्द का अर्थ :निन्दक-निंदा करनेवाला, नियरे- करीब, सुभाय-स्वभाव ]

भावार्थ- कबीरदासजी कहते है, जो व्यक्ती हमारी निंदा करता है, जो हमारा निंदक है ऐसे व्यक्ती को हमेशा अपने करीब ही रखना चाहिए | क्यों की उसके द्वारा हमें हमारे कमियों के बारे में पता चलता रहता है | हमें हमारे शरीर को साफ़ करने के लिए पानी और साबुन की जरूरत होती है | पर अगर हमारी निंदा करने वाला अगर हमारे पड़ोसी होगा तो हमें हमारे कमियों के बारे में पता चलता रहेगा और हम अपने आप में सुधार ला सकेंगे, और बिना पानी साबुन के ही हम हमारे स्वभाव को साफ़ रख सकते है |



 

चौंतीसवा दोहा

पानी कर बुदबुदा, अस मानुष की जात |
एक दीना छीप जायेगा, ज्यों तारा परभात ||

[शब्द का अर्थ :बुदबुदा- बुलबुला, मानुष-मनुष्य, दीना-दिन, परभात-सुबह, प्रभात]

भावार्थ- जिस तरह पानी का बुलबुला कुछ ही क्षण में पाणी के सतह पर आकर समाप्त हो जाता है वैसे ही मनुष्य का देह भी क्षणभंगुर है | इस मनुष्य शरीर की कोइ शाश्वती नहीं है और यह एक दीन समाप्त होने वाला है | जिस तरह से रात को आसमान में दीखने वाले तारे सुबह होते ही छीप जाते है वैसे ही यह शरीर भी एक दीन नष्ट हो जायेगा |



KABIR KE DOHE

पैंतीसवा दोहा

यह तन काचा कुम्भ है, लिया फिरे था साथ |
ढबका लगा फूटीगा, कछु न आया हाथ ||

[शब्द का अर्थ : कुम्भ-मटका, काचा-कच्चा, ढबका-चोट, फूटीगा-टूटना ]

भावार्थ- कबीर कहते है जिस शरीर को तूने जिन्दगी भर सजाया, सवारा जिसकी देखभाल की, जिससे बेहद प्यार किया और जिसे जिन्दगी भर साथ लिए घूमता रहा दरअसल यह एक कच्चा घड़ा है | जरा सी चोट लगने पर यह फूट गया और तेरे हाथ में कुछ भी न आया |

अर्थात मनुष्य जिस देह से अपार प्रेम करता है और जिसे सजाये-सवारे, संभाले फिरता है यह एक नश्वर देह है जो एक दिन त्याग देना है | इसीलिए मनुष्य ने अपने जीवन में अच्छे कर्म करने चाहिए वही उसकी असली पूंजी है|



 

छतीसवा दोहा

यह तन विष की बेलरी, गुरु अमृत की खान |
सीस दिये जो गुरु मिले, तो भी सस्ता जान ||

[शब्द का अर्थ :तन-शरीर, बेलरी-बेल, खान-खजाना, सीस -शीर, मस्तक ]

भावार्थ- कबीरजी कहते है की यह शरीर विष की लता (बेल) है और इसमें विष के फल अर्थात काम, क्रोध, लोभ, मद यही फलेंगे | हमारे जीवन में गुरु किसी अमृत के खजाने समान है जो हमें अच्छाई का मार्ग बतातें है और हमारा उद्धार करते है | अपना शीर चढ़ा देने पर भी अगर ऐसे सद्गुरु से हमारी भेट हो जाये तो हमें यह सस्ता सौदा ही समझना चाहिए |

इस दोहे में कबीरजी ने मनुष्य के जीवन में गुरु के महत्व का वर्णन किया है |



 

सैंतीसवा दोहा

माला फेरत जुग गया, मिटा न मन का फेर |
करका मन का डारि के, मन का मनका फेर ||

[शब्द का अर्थ : माला-जपमाला, फेरत-घूमाते हुए, जुग-युग, मिटा-समाप्त, मन का फेर-मन की अशांतता, करका-हाथ का, डारी के-छोड देना ]

भावार्थ- कोइ व्यक्ती -अगर लम्बे समय तक हाथ में मोती की जप माला लेकर घूमाता है, इश्वर का स्मरण करता है और फिर भी इससे उसके मन का भाव नहीं बदलता और उसके मन की हलचल भी शांत नहीं होती | कबीर ऐसे व्यक्ती को कहते है की हाथैसे माला को फेरने का पाखण्ड छोड़कर अपने मन में शुद्ध विचारों को भरना चाहिए तथा सच्चे मन से सब का भला करना चाहिए |

अर्थात माला फेरते फेरते युग बिता दिए लेकिन अब तक मन शांत नही हुआ| हाथ की माला छोड़ दे और मन की माला फेरना शुरू कर | हमें हाथ की माला का फेरना छोड़कर अच्छे कर्म करने चाहिए जिससे हमसे हमारे भगवान प्रसन्ना हो |



KABIR KE DOHE

अड़तीसवा दोहा

प्रेम न बाडी ऊपजै, प्रेम न हाट बिकाय |
राजा परजा जेही रुचै, सीस देह लेइ जाय ||

[शब्द का अर्थ :-बाडी- खेत, ऊपजै-उपजना, हाट-बाजार, बिकाय-बिकता हैं, परजा-प्रजा, सीस-शीर ]

भावार्थ- प्रेम किसी खेत में नहीं उपजता, और नहीं प्रेम कोइ बाजार में खरीदने बेचने वाली वस्तु है | अगर कोइ प्रेम पाना चाहता हे वह राजा हो या कोइ सामान्य आदमी, प्रेम पाने के लिए उसे त्याग और बलीदान देना ही पड़ता है | त्याग और बलिदान के बिना प्यार को पाया नही जा सकता|

कबीर जी कहते है प्रेम यह एक गहरी भावना है जो खरीदी या बेची नहीं जा सकती |



 

उनतालीसवा दोहा

बृच्छ कबहूँ नहीं फल भखै, नदी न संचै नीर |
परमारथ के कारने, साधून धरा सरीर ||

[शब्द का अर्थ :बृच्छ-वृक्ष, पेड़, भखै-भक्षण करना, नीर-पानी, जल, परमारथ-परमार्थ, सरीर-शरीर ]

भावार्थ- पेड़ कभी अपना फल नहीं खाते ,नदियां कभी अपना पानी स्वयं नहीं पीती, यह तो परहित अर्थात दूसरों के लिए सब कुछ न्योछावर कर देते हैं | उसी प्रकार से साधू-संत का जीवन भी दूसरों के परोपकार और कल्याण के लिए ही होता है | हमें भी अपने जीवन को आदर्शवादी बनाते हुए परोपकारी बनना चाहिए |

इस दोहे में हमें परोपकारी बनने सदाचारी बनने का उपदेश दिया है|



KABIR KE DOHE

चालीसवा दोहा

दुर्बल को न सताइए, जाकी लम्बी हाय |
मुई खाल के स्वांस सों, लोह भसम हैं जाय ||

[शब्द का अर्थ :मुई खाल- मरे हुए पशु का चमडा, हाय-बद्दुवा, लोह-लोहा, भसम-ख़त्म हो जाना ]

भावार्थ- शक्तिशाली व्यक्ती को अपने बल का उपयोग करकर किसी कमजोर व्यक्ती पर अत्याचार नहीं करना चाहिए, क्यों की दुखी व्यक्ती के ह्रदय की बद्दुवा बहुत ही हानिकारक होती है | जैसे मरे हुए पशु के चमड़े से लोहा तक जल के राख हो जाता है वैसे ही दुखी व्यक्ती की बद्दुवाओंसे समस्त कूल का नाश हो जाता है |

अर्थात दुर्बलों पर अन्याय करने से अन्याय करने वाले का सर्वनाश हो जाता है |



 

इकतालिसवा दोहा

जाको राखे साईयाँ, मारि सके ना कोय |
बाल न बाँका करी सकै, जो जग बैरी होय ||

[शब्द का अर्थ :– साईयाँ-इश्वर, बैरी-दुश्मन, मारि-मार देना, कोय-कोई ]

भावार्थ- कबीर जी कहते है जिस मनुष्य पर इश्वर की कृपा होती है उसे कोइ भी नुकसान पहुंचा नहीं सकता | ऐसे मनुष्य का कोइ बाल भी बाका नहीं कर सकता चाहे सारा संसार ही उसका दुश्मन ही क्यों न हो जाये जिसपर इश्वर की कृपा होती है |

अर्थात जो मनुष्य इश्वर की शरण में जाता है, इश्वर उसका सदैव रक्षण करता है |



 

बयालीसवा दोहा

मन के हारे हार है, मन के जिते जीत |
कहे कबीर हरी पाइए, मन ही के परतीत ||

[शब्द का अर्थ :हरी –इश्वर]

भावार्थ- जीवन में जय और पराजय केवल मन ही पर निर्भर करती है | यदी मनुष्य मन से हार गया तो पराजय निश्चीत है और यदी उसने मन को जीत लिया तो जीत निश्चित है | इश्वर को भी आप मन के विश्वास से ही प्राप्त कर सकते है, यदी मन में विश्वास है तो वोह जरूर मिलेगा और मन में विश्वास नहीं है तो कभी नहीं मिलेगा |



KABIR KE DOHE

तैंतालीसवा दोहा

कबीर तन पंछी भया, जहाँ मन तहां उडी जाई |
जो जैसी संगती कर, सो वैसा ही फल पाई ||

[शब्द का अर्थ :- तन-शरीर, पंछी-पक्षी, पाई-मिलना, प्राप्त होना]

भावार्थ- कबीर कहते है के संसार के माहौल में रहने वाले व्यक्ती का शरीर पंछी जैसा बन गया है और जहाँ उसका मन जाता है उसका शरीर भी उड़कर वही पहुँच जाता है | जो जैसे लोगों के साथ रहता है वो वैसे ही बन जाता है और वैसे ही फल पाता है |

अर्थात आपको हमेशा अच्छे लोगों के संगत में ही रहना चाहिए |



 

चौवालीसवा दोहा

गुरु कुम्हार सीष कुंभ है, गढ़ी-गढ़ी काढे खोट |
अंतर हाथ सहार दै, बाहर बाहै चोट ||

[शब्द का अर्थ :- कुंभ-घडा, सीष-शिष्य, गढ़ी-गढ़ी- घड़ी घड़ी, बाहै-करे, सहार-सहारा ]

भावार्थ- गुरु कुम्हार के सामान है और शिष्य घड़े के समान है| गुरु शिष्य के अन्दर जो कमियां होती है उन्हें घड़ी घड़ी निकालता रहता है | कबीर कहते है की गुरु शिष्य को घड़े के सामान गढ़ता है और ठोक–ठोक कर उसके दोषों को दूर करता है | जिस प्रकारसे कुम्हार मिटटी के कच्चे घड़े में हाथ डालकर उसे सहारा देता है और उसे बाहर से चोट मारता है उसी प्रकार गुरु बाहर से तो डांट फटकार करता है पर अन्दर से शिष्य के साथ प्रेममय व्यवहार करता है |

अर्थात गुरु शिष्य को कठोर अनुशासन में रखकर अंतर से प्रेम भावना रखते हुए शिष्य की बुराईयोंको दूर करके संसार में सन्माननीय बनता है |



KABIR KE DOHE

पैंतालीसवा दोहा

सब धरती कागद करूँ, लेखनी सब बनराय |
सात समुंद की मसि करूं, गुरु गून लिखा न जाय ||

[शब्द का अर्थ :- कागद-कागज, बनराय- जंगल, समुंद- समुद्र, समुन्दर, मसि-स्याही, गुन-गुण ]

भावार्थ- कबीर कहते है गुरु के गुणों का बखान करना उनके सामर्थ्य के बाहर है | सारे धरती को मैं कागज बना दूं और जंगले की सारी लकड़ियों को लेखनी कर दूं और सातों समुन्दर के जल को मैं स्याही कर दूं उसके बाद भी हम गुरु के गूण को नहीं लिख सकते अर्थात गुरु के गुण अनंत है |

अर्थात गुरु के गुणों के वर्णन करने के लिए तीनो लोको में कोइ भी समर्थ नहीं है |



 

छियालीसवा दोहा

जब गुण को गाहक मिले, तब गुण लाख बिकाई |
जब गुण को गाहक नहीं, तब कौड़ी बदले जाई ||

[शब्द का अर्थ :गाहक-ग्राहक, खरीदने वाला, बिकाई-बेचना, कौड़ी-बिना मोल के-कीमत के ]

भावार्थ- जब गुण को परखने वाला ग्राहक मिल जाता है तो उस गुण की कीमत बहुत ज्यादा हो जाती है और जब गुण को कोइ ग्राहक नहीं मिलता अर्थात परखने वाला नहीं मिलता है तो गुण कौड़ी के भाव चला जाता है | इसीलिए अपने गुणोकों लोगों को पहचानने दो इनमेसे ऐसा तो कोइ होगा जो आपके गुणों को पहचान के आपको सही राह दिखाएगा और आपकी किस्मत खुल जायेगी |



 

सैंतालीसवा दोहा

कबीर कहा गरबियो, काल गहे कर केस |
ना जाने कहाँ मारिसी, कै घर कै परदेस ||

[शब्द का अर्थ :गरबियो-गर्व, मारिसी- मार देगा, प्राण लेगा ]

भावार्थ- हे मानव तू क्या घमंड करता है काल अपने हाथों में तेरे केश पकडे हुए है | तू चाहे घर में हो या परदेस में तेरा मरना तय है | इसीलिए अपनी किसी भी चीज़ पर कभी भी घमंड नहीं करना चाहिए क्यों की एक न एक दीन सबको मरना है, यहाँ किसीको नहीं रहना हैं तो क्यूँ न सबके दिल में जगह बनाकर जाया जाए |

अर्थात धनवान हो या गरीब, राजा हो या रंक सबकी मृत्यु निश्चित है तो व्यर्थ हा अहंकार क्यों करना |



KABIR KE DOHE

अड़तालीसवा दोहा

दोस पराए देखि करि, चला हसन्त हसन्त |
अपने याद न आवई, जिनका आदि न अंत ||

[शब्द का अर्थ :दोस-दोष, पराए-दूसरों के, हसन्त-हसते हुए ] 

भावार्थ- कबीर जी कहते है की, यह मनुष्य का स्वभाव है के जब उसके सामने किसी की बुराई हो रही होती है तो वह बहुत खुश होकर उसे सून रहां होता है| वह यह भूल जाता हैं की उसके अन्दर भी ऐसी लाखों बुराइयाँ है जिनकी न तो कई शुरुवात दिखाई देती है और न ही उसका कही अंत दिखाई देता है |

अर्थात किसी के दोषों पर और कमियों पर हमें हसना नहीं चाहियें | हमें यह नहीं भुलाना चाहिए की संसार में कोइ भी व्यक्ती बिना दोषों का नही है वह स्वयं भी |



 

उनचासवा दोहा

मौको कहाँ ढूंढे बन्दे, मैं तो तेरे पास में |
न मैं देवल, ना मैं मस्जीद ना काबे कैलाश में ||

[शब्द का अर्थ :मौको-मुझे, देवल-मंदिर, बन्दे-मनुष्य ]

भावार्थ- इन्सान भगवान को ढूंढने के लिए मंदीर, मस्जीद, पहाड़ों और तीर्थक्षेत्र में घूमता है | मन की शांती के लिए माला फेरता है, व्रत करता है | कबीरजी कहते है के इश्वर हमारे मन में वास करता है, यदी हमारा मन अच्छा हैं तो समझ लीजिये इश्वर हमारे साथ है | इश्वर को ढूंढने के लिए हमें ना तो मंदिर, मस्जीद, काबुल और ना तो कैलाश मैं जाने की जरूरत है, इश्वर हमारे साथही होता हैं हमे बस उसे पहचानना होता है |



KABIR KE DOHE 

पचासवा दोहा

प्रेमभाव एक चहिए, भेष अनेक बनाए |
भावी घर में वास करें, भावै वन में जाए ||

[शब्द का अर्थ :- भेष-रूप ]

भावार्थ- ह्रदय में हमेशा इश्वर के प्रती एक प्रेमभाव होना चाहिए | चाहे कौनसा भी रूप धारण करो या कोनसा भी वेष बना लो | चाहे संसारिक बन्धनों में बंधकर गृहस्थ जीवन बिता रहे हो या फिर वन के एकांत वातावरण में वैराग्यपूर्ण जीवन बिता रहे हो | जीवन का कोनसा भी स्वरुप हो वहा प्रेमभाव सदा बना रहना चाहिए | ऐसा प्रेमभाव जो हर स्थिती, हर रूप, हर उम्र में एकसमान बना रहे, वो सिर्फ परम पिता परमात्मा से ही स्थापित हो सकता है |



 

इक्यावनवा दोहा 

जा घट प्रेम न संचरे, सो घट जानू मसान |
जैसे खाल लुहार की, साँस लेतु बिन प्राण ||

[शब्द का अर्थ :- घट-मन, ह्रदय, संचरे-संचार करना, मसान-शमशान, खाल लुहार की- लुहार का आग को हवा देनेवाला अवजार (धौकनी), साँस-श्वास ]   ]

भावार्थ- जिस मनुष्यके ह्रदय में, मन में प्रेमभाव का संचार नहीं होता उसे शमशान के भांती समझना चाहिए | जैसे मृत जानवर के खाल से बनी लोहार की धौकनी भी यूं तो साँस लेती है किन्तु उसमे प्राण नहीं होते | इसी तरह जिस मनुष्य के ह्रदय में इश्वर के प्रती सच्चे प्रेम का भाव नहीं है वह सांस तो ले रहा है पर प्राण विहीन है |

अर्थात जिस मनुष्य के मन में इश्वर के प्रती प्रेम भाव नहीं है उस का जीवन व्यर्थ है |



 

बावनवा दोहा

लूट सके तो लूट ले, राम नाम की लूट |
पाछे फिर पछताओगे, प्राण जाहि जब छूट ||

[शब्द का अर्थ :- पाछे-बाद में, जाहि-जाएंगे ]

भावार्थ- कबीरजी कहते हैं की हमारे जीवन में सुख शांती, समृद्धी और जीवन का उद्धार करने के लिए एक राम का नाम ही काफी है | तो क्यूँ न हम जब तक जीवीत है हर समय राम नाम का जाप करके खुद का उद्धार कर ले |  अन्यथा अपने जीवन के अंतिम क्षण में हम खेद महसूस करेंगे की मैंने जीवन भर राम का नाम नही लिया और मेरा सारा जीवन व्यर्थ गया |

अर्थात वक्त रहते ही हमें प्रभु की भक्ती करनी चाहिए वरना अंतिम समय में पछताने से कुछ लाभ नहीं होगा |



KABIR KE DOHE

तिरेपनवा दोहा 

आठ पहर चौसंठ घड़ी, लगे रहे अनुराग |
ह्रदय पलक ना बिसरे, तब साँचा वैराग ||

[शब्द का अर्थ :- आठ पहर चौसंठ घड़ी-दिन के चौबीस घंटे, अनुराग- भक्ति, निष्ठा, लगन, प्रेम, प्यार ]

भावार्थ- हर पल, हर श्वांस, हर घड़ी जब उस बनाने वाले इश्वर के प्रती ह्रदय में भक्ती बनी रहे तब समझो की हमें उससे सच्चा प्रेम है | हर क्षण ऐसे समर्पण से प्रेम करने वाला ही, सद्गुरु और ह्रदय में बसे इश्वर से असीम प्रेम का पात्र बन सकता है |



 

चौवनवा दोहा 

जो आवे तो जाये नहीं, जाये तो आवे नाही |
अकथ कहानी प्रेम की, समझलेहूँ मन माहि ||

[शब्द का अर्थ :- अकथ-अकथनीय, आवे- आएगा ]

भावार्थ- सच्चे प्रेम की कहानी अकथनीय है | इसलिए परम पिता परमेश्वर का सच्चा अनुग्रह प्राप्त करने वाले प्रेमियों को प्रेम के इस गुण के बारें में अपने मन को भली भांती समझा लेना चाहिए | क्यों की उस बनानेवाले (इश्वर) का सच्चा प्रेम जिसको भी प्राप्त हो जाता है तो सदैव उसपर परमेश्वर की कृपा बनी रहती है | किन्तु जब परमेश्वर द्वारा श्वांस के रूप में मिला हूवा प्रेम प्रसाद चला जाता है तो फिर कभी वापिस नहीं आता | इसीलिए परमेश्वर के इस प्रेम को ह्रदय से स्वीकार करना चाहिए |



KABIR KE DOHE

पचपनवा दोहा 

पिय का मार्ग सुगम है, तेरा चलन अनेड |
नाच न जाने बापुरी, कहे आंगना टेढ़ ||

[शब्द का अर्थ :- सुगम-आसान, चलन-आचरण, अनेड-उचित, टेढ़-टेढ़ा, आंगना-आंगण ]

भावार्थ- इश्वर से मिलन का मार्ग एकदम आसान है जो सच्चे प्रेम और ह्रदय से होकर गुजरता है | जो इसे कठिन बताते है उनका स्वयंम का आचरण ही उचित नहीं है | वो स्वयं ही उल्टा मार्ग चुनते है और कहते है परमेश्वर की प्राप्ती कठिन है | यह तो वही वाली बात हुयी नाच स्वयंम नहीं जानते और आँगन टेढ़ा बताकर अपनी गलती का दोष आँगन को दे देते है |



  

छप्पनवा दोहा 

नाम ना रटा तो क्या हुआ, जो अंतर है हेत |
पतिव्रता पति को भजै, मुखसे नाम ना लेत ||

[शब्द का अर्थ :- रटा-उच्चारण, भजै-पूजा करना ]

भावार्थ- अगर ह्रदय में इश्वर के लिए सच्ची लगन, भक्ती है तो ऐसा मनुष्य मुख से इश्वर का नाम भी ना ले तो उससे क्या फर्क पडता है | यह ठीक वैसे ही जैसे कोइ पतिव्रता स्त्री कभी भी अपने मुख से अपने पती का नाम उच्चारण नहीं करती किन्तु मन ही मन अपने पती का नित्य स्मरण ही करती है | उसी प्रकार से मुख से परमेश्वर का नाम लेने का दिखावा इतना महत्वपूर्ण नहीं है जितना की उस परमेश्वर का ह्रदय से स्मरण करना |



 

सत्तावनवा दोहा 

मेरा मुझमे कुछ नही, जो कुछ है सो तेरा |
तेरा तुझको सौपता, क्या लागे हैं मेरा ||

[शब्द का अर्थ :- सौपता-अर्पण करना, लौटा देना  ]

भावार्थ- कबीर जी कहते है, हे परमेश्वर मेरे पास जो भी है वो सब कुछ तेरा दिया हुआ है, इसपर मेरा कुछ भी अधिकार नहीं है | यहाँतक के मेरी सांसो से लेकर मेरे जीवन पर भी तेरा ही अधिकार है | हे परमेश्वर अगर तूने दिया हुआ सबकुछ मैं तुझको लौटा देता हूँ तो मेरे पास कुछ भी नहीं रहेगा क्यों की यह सब कुछ तेरा है और इसपर तेरा ही अधिकार है मैं तो नाममात्र हूँ |



KABIR KE DOHE

अट्ठावनवा दोहा 

माखी गुड में गाडी रहे, पंख रहे लिपटाये |
हाथ मले और सिर धुले, लालच बुरी बलाय ||

[शब्द का अर्थ :-माखी-मक्खी, गाडी रहे-लिपटे रेहना, बलाय-बला, लालच-लोभ ]

भावार्थ- पहले तो मक्खी गुड में लिपटी रहती है, अपने सारे पंख और सर गुड में चिपका लेती हैं | लेकिन जब उड़ने का प्रयास करती है तो उड़ नहीं पाती है और तब उसे अपने लोभी स्वाभाव पर अफ़सोस होता है | ठीक उसी तरह से इन्सान भी अपने सांसारिक सुखों में सर से पाँव तक लिपटा रहता है और जब अंत समय नजदीक आता है तो उसे अपने आचरण पर अफ़सोस होता है लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होती हैं |



 

उनसठवा दोहा 

नहाये धोये क्या हुआ, जो मन मैल न जाय |
मीन सदा जल में रहे, धोये बास न जाय ||

 [शब्द का अर्थ :- मीन-मछली, बास-दुर्गन्ध, मैल-गंदगी ]

भावार्थ- कबीरजी कहते है आप कीतना भी नहा धो लीजिये, लेकिन अगर आपका मन साफ़ नहीं हुआ तो उस नहाने का क्या फायदा | जैसे मछली हमेशा पानी में रहती है फिर भी वो साफ़ नहीं होती और उससे बदबू आती रहती है |

अर्थात उपरी साफ सफाई से ज्यादा आंतरिक साफ सफाई महत्वपूर्ण है | मन का साफ़ होना, निर्मल होना बहुत जरूरी है बजाय के बाहरी सौन्दर्यता | मनुष्य शरीर की कितनी भी स्वछता करले पर अगर उसका मन कुलशीत है, पापी है तो बाहरी साफ़ सफाई अर्थहीन है| 



KABIR KE DOHE 

साठवा दोहा

कामी, क्रोधी, लालची, इनसे भक्ती ना होय |
भक्ति करै कोई सूरमा, जाति बरन कुल खोय ||

[शब्द का अर्थ :- सूरमा-शूरवीर, खोय-त्याग करना ]

भावार्थ- कबीर कहते है, कामी मनुष्य विषय वासनाओमें लिप्त रहता है, क्रोधी मनुष्य दूसरों का द्वेष करता है और लालची मनुष्य निरंतर संग्रह करने में व्यस्त रहता है, इन लोगोंसे भक्ती नही हो सकती | भक्ती तो कोई शूरवीर और पुरुषार्थी कर सकता है, जो जाती, वर्ण, कूल और अहंकार का त्याग कर सकता है |

अर्थात परमेश्वर की भक्ती गुणवान और त्यागी मनुष्य ही कर सकता है, दुर्जन मनुष्य नही |



 

इकसठवा दोहा

भक्ति जु सीढ़ी मुक्ति की, चढ़े भक्त की हरषाय |
और न कोई चढ़ी सकै, नीज मन समझो आय ||

[शब्द का अर्थ :-  हरषाय-खुशी होना ]

भावार्थ- भक्ति मुक्ति की वह सीढी है, जिसपर चढ़कर भक्त को अपार खुशी मिलती है |  दूसरा कोई भी मनुष्य जो सच्ची भक्ति नहीं कर सकता इस पर नहीं चढ़ सकता है यह समझ लेना चाहिए |

अर्थात भक्ति की सीढी को सच्चा भक्त ही चढ़ सकता है क्योंकि यह मुक्ति का द्वार दिखाने वाली होती है, यह मन में निश्चित कर लो की भक्त के अलावा अन्य कोई यह सीढ़ी नहीं चढ़ सकता है। भक्ति मार्ग पर बढ़ने के लिए अभिमान का त्याग करना पड़ता है इसलिए यह कोई आसान कार्य भी नहीं है।



 

बासठवा दोहा

भक्ति बिन नहिं निस्तरे, लाख करे जो कोय |
शब्द सनेही होय रहे, घर को पहुँचे सोय ||

[शब्द का अर्थ :- बिन-बगैर, कोय-कोई ]

भावार्थ- किसी भी मनुष्य के लिए भक्ति के बिना मुक्ति संभव नही हैं, चाहे वह लाख कोशिश कर ले | पर जो मनुष्य सद्गुरुके वचनों को अर्थात शब्दोको ध्यान से सुनता है और उनके बताये मार्ग पर चलता है, वे ही अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है |



KABIR KE DOHE

तिरेसठवा दोहा 

काह भरोसा देह का, बिनसी जाय छिन मांहि |
सांस, सांस सुमिरन करो, और जतन कछु नाहिं ||

[शब्द का अर्थ :- काह-क्या, देह-शरीर, सुमिरन-स्मरण, सांस-साँस, श्वास ]

भावार्थ- कबीर कहते है, इस शरीर का क्या भरोसा है, किसी भी क्षण यह नश्वर शरीर हमसे छिन सकता है | इसलिए हर साँस में, हर पल में उस परम पीता परमेश्वर को याद करो, वही है जो तुम्हे मुक्ती दिला सकता है | इसके आलावा मुक्ती का कोइ दूसरा मार्ग नहीं है |



 

चौंसठवा दोहा 

हिन्दू कहे मोहि राम पियारा, तुर्क कहे रहमाना |
आपस में दोउ लड़ी लड़ी मुए, मरम न जाना कोए ||

[शब्द का अर्थ :-मोहि-मुझे, पियारा-प्यारा, तुर्क-मुसलमान, रहमाना-अल्ला, दोउ-दोनों, मुए-मर गए, मरम-मर्म]

भावार्थ- कबीरजी कहते है, हिन्दू कहते है की उसे राम प्यारा है और मुसलमान कहता है के उसे रहमान (अल्ला) प्यारा है | इसी विषय पर बहस कर करकर दोनो आपस में लड लड़कर मर जाते है | पर दोनों मे से  सच्चाई कोइ नहीं जान पाता है की इश्वर एक है |

अर्थात इश्वर एक ही है उसकी तुम किसी भी रूप में भक्ती करो |



KABIR KE DOHE

पैंसठवा दोहा 

साधू ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय |
सार-सार को गही रहै, थोथा देई उडाए ||

[शब्द का अर्थ :- सुभाय-स्वभाव, सार-सार्थ,अच्छा, थोथा-कचरा, निरर्थक  ]

भावार्थ- सज्जन व्यक्ती को इस प्रकार होना चाहिए जैसे अनाज साफ करने वाला सूप होता है | वोह सार वस्तु को ग्रहण कर लेता है और थोथा वस्तु अर्थात सारहीन वस्तु को उडा देता है, बाहर कर देता है | इसी प्रकार हमें भी ज्ञानवाली चीज़े, ज्ञानवाले विचार अपने पास रख लेने चाहिए और बेकार की बातों से अपने आपको दूर ही रखना चाहिए |



 

छियासठवा दोहा 

जबही नाम हिरदे धरा, भया पाप का नाश |
मनो चिगीं आग की, पारी पुरानी घास ||

 [शब्द का अर्थ :- हिरदे-ह्रदय, चिगीं-चिंगारी, भया-हो गया ]

भावार्थ- कबीरजी कहते है, जबसे हमने भगवान का नाम ह्रदय में धरा है, भगवान के भक्ती में लीन हो गए है तबसे हमारे सारे पापों का नाश हो गया है| जैसे किसी पुरानी सुखी घास पर आग की चिंगारी पड जाने पर वह जल कर राख हो जाती है, वैसे ही उस परमपिता परमेश्वर का नाम अपने ह्रदय में धरने से मेरे सारे पापों का नाश हो गया है |



 

सड़सठवा दोहा

जहाँ दया तहँ धर्म है, जहाँ लोभ तहँ पाप |
जहाँ क्रोध तहँ काल है, जहाँ छिमा तहँ आप ||

[शब्द का अर्थ :- तहँ-वहां, लोभ-लालच, छिमा-क्षमा ]

भावार्थ- जहाँ लोगों के मन में दया-भाव होता है वहांपर धर्म निवास करता है और जहाँ लोगों के मन में लालच होता है वहां पाप निवास करता है | जिन व्यक्तीयों के मन में हमेशा क्रोध रहता है वह काल के समान होता है, उनका काल हमेशा उनके इर्द-गिर्द घूमता रहता है |और जहाँ क्षमा वास करती है, जहाँ दूसरोंके गलतियोंको क्षमा किया जाता है वहां इश्वर स्वयंम निवास करते है |



KABIR KE DOHE

अड़सठवा दोहा 

हस्ती चढिए ज्ञान कौ, सहज दुलीचा डारी |
स्वान रूप संसार है, भूकन दे झक मारी ||

[शब्द का अर्थ :- हस्ती-हाथी, स्वान-कुत्ता, भूकन दे-भोंकने दो ]

भावार्थ- कबीरजी कहते है, ऐसे उच्च ज्ञान को प्राप्त कीजिये जिससे तुम्हारी अंतरात्मा सहज जो जाए | क्यों की यह संसार तो एक श्वान (कुत्ता) के समान है यह आप ऊँचाई को प्राप्त कर लोंगे तो भी बोलेगा और नहीं प्राप्त कर सके तब भी बोलेगा | इसलिए उन्हें भोकने दो, बोलने दो उसपर अपनी कोइ भी प्रतिक्रिया व्यक्त न करो, आप हमेशा अपनी उन्नती पर ध्यान दो |

अर्थात इस दोहे में कबीरजी कहना चाहते है, साधक मस्ती से ज्ञानरुपी हाथी पर चढ़े हुए जा रहे है और संसार भर के कुत्ते भोंक भोंककर शांत हो रहे है परन्तु वह हाथी का कुछ बिगाड़ नहीं पा रहे हैं | यह दोहा निन्दको पर व्यंग है और साधकोंके लिए प्रेरणा | 



 

उनहत्तरवा दोहा 

प्रेमी ढूँढत मैं फिरों, प्रेमी मिले न कोइ |
प्रेमी को प्रेमी मिले, सब विष अमृत होई ||

[शब्द का अर्थ :- प्रेमी-इश्वर(रूपकात्मक), फिरों-भटकना ]

भावार्थ- मैं परमात्मा का वास्तवीक ज्ञान अर्थात परमात्मा को ढूढंता फिरता रहा पर मुझे उसकी प्राप्ती ही नही हुई | मैंने उसे पाने के लिए पूजा- पाठ,  कर्म- काण्ड सब कुछ किया पर मुझे उसके दर्शन नहीं हुए | पर मुझे वास्तविक इश्वर की प्राप्ती तब हुई जब मेरे लिए सब समान हो गए, मेरे मन में उंच-नीच, छोटा बड़ा ऐसा कोइ  भेद भाव ही नहीं रहा | मेरे लिए विष और अमृत दोनों एक सामान हो गए |

अर्थात कबीर जी इस दोहे में अपने प्रेमी रुपी इश्वर की खोज में हैं जो उन्हें कही मिल नही रहा | वे कहते है अपने प्रेमी अर्थात इश्वर से मिलने पर इस प्रेमी भक्त के मन का सारा दुःख रुपी विष, सुख के अमृत में बदल जायेगा |



KABIR KE DOHE 

सत्तरवा दोहा 

पखापखी के कारने, सब जग रहा भूलान |
निरपख होई के हरि भजै, सोई संत सुजान ||

[शब्द का अर्थ :-पखापखी-पक्ष-विपक्ष, भूलान-भूल गयी है, निरपख-निरपेक्ष, हरि-इश्वर, सोई-वही, सुजान-ज्ञानी] 

भावार्थ- पक्ष-विपक्ष, समर्थन-विरोध, सही-गलत के कारन हम सब जग को, सारे संसार को भुला बैठे है |      पक्ष-विपक्ष के चक्कर में इस दुनिया के लोग आपस में लढ रहे है, वे अपने झगड़े में इश्वर को भूल गए है | ज्यो व्यक्ती बिना किसी भेद भाव के, निरपेक्ष होकर जो इश्वर का भजन करता है, चिंतन करता है तो उसी मनुष्य को अच्छा व्यक्ती, संत व्यक्ती, सज्जन व्यक्ती कहां जाता है | वही मनुष्य मोक्ष को प्राप्त करने वाला होता है |



 

इकहत्तरवा दोहा

मानसरोवर सुभग जल, हंसा केलि कराहि |
मुकताफल मुकता चुगै, अब उड़ी अनत न जाही ||

[शब्द का अर्थ:-सुभग-पूरी तरह भरा हुआ, केलि-क्रीडा, मुकताफल-मोती, चुगै-चूनकर खाना, अनत-कही और]

भावार्थ- कबीरदास जी कहते है की हंस मानसरोवर नामक झील के जल में क्रिडा करते हुए आनंदीत हो कर मोती चुग रहे है और वह इसे छोड़कर कही और जाना नहीं चाहते है | ठीक इसी प्रकारसे मन रूपी सरोवर में जीवात्मा प्रभु भक्ती के आनंद रुपी जल में विहार करती है और वह अन्य किसी स्थान पर जाना नहीं चाहती | 

अर्थात मनुष्य एक बार जब उस परमपिता परमेश्वर के भक्ती में उसका कृपाप्रसाद ग्रहण कर लेता है, तो उसका मन प्रभु के भक्ती के बिना जीवन में कुछ और नहीं चाहता है |



 

बहत्तरवा दोहा 

मन हीं मनोरथ छांडी दे, तेरा किया न होई |
पानी में घिव निकसे, तो रुखा खाए न कोई ||

[शब्द का अर्थ :- मनोरथ-इच्छा, छांडी दे-त्यागना, छोड देना, घिव-घी, निकसे-निकलना, रुखा-सुखा हुआ ]

भावार्थ- मनुष्य मात्र को समझाते हुए कबीर कहते है कि मन की इच्छाएं छोड़ दो, उन्हें तुम अपने बूते पर हासिल नहीं कर सकते | मन की इच्छाओं का कोई अंत नहीं यह कभी भी ख़त्म नही होती है, इनके पीछे भागना बेवकूफी है| यदी पानी से घी निकल आए, तो रुखी रोटी कोई नही खाएगा |

अर्थात मन के इच्छाओं की कोई सीमा नहीं एक पूरी हो गयी तो दुसरी सामने आती है | 



KABIR KE DOHE

तिहत्तरवा दोहा

आधी औ रुखी भली, सारी सोग संताप |
जो चाहेगा चूपड़ी, बहुत करेगा पाप ||

[शब्द का अर्थ :-भली-अच्छी ]

भावार्थ- अपनी मेहनत की कमाई से जो भी कुछ मिले, वह आधी और सुखी रोटी ही बहुत अच्छी है | यदि तू  घी चुपड़ी रोटी चाहेगा तो सम्भव है तुम्हे पाप करना पड़े |

कबीर जी का कहना है कि बुनियादी आवश्यकताओं से परे आवश्यकताओं को बढ़ाना ठीक नहीं है। इससे समाज में विषमता की सृष्टि होती है |



 

चौहत्तरवा दोहा 

कुछ कहि नीच न छेडीये, भलो न वाको संग |
पत्थर डारे कीच में, उछलि बिगाड़े अंग ||

[शब्द का अर्थ :-संग-संगत, डारे-डाले, वाको-उसका, कीच-कीचड़, बिगाड़े-ख़राब करना ]

भावार्थ- किसी दुर्जन या दृष्ट व्यक्ति को कुछ भी कहकर कभी मत छेडीयें वह उसके दृष्ट स्वाभाव के अनुसार हमें हानी पहुंचा सकता है, और उसकी संगती में भी हमारी कोई भलाई नहीं होती है | जिस प्रकारसे कीचड़ में पत्थर डालने से पत्थर फेकने वाले का ही छींटे उछलने से शरीर गन्दा होता है, उसी प्रकार दुर्जन व्यक्ति से व्यवहार रखने पर व्यवहार रखने वाले का ही बुरा होता है।



KABIR KE DOHE

पचहत्तरवा दोहा 

तिनका कबहुँ ना निन्दिये, जो पाँवन तर होय |
कबहुँ उड़ी आँखिन पड़े, तो पीर घनेरी होय ||

[शब्द का अर्थ :-तिनका-सूखे घास का टुकड़ा, कबहुँ-कभी भी, पाँवन तर-पाँव के निचे, आँखिन-आँख, पीर-दर्द, घनेरी-बहुत ज्यादा ]

भावार्थ- कबीर दास जी कहते है कभी भी पैरों के निचे आने वाले छोटे से  तिनके की भी निंदा नहीं करनी चाहिए, उसे छोटा समझने की भूल नहीं करनी चाहिए, क्योंकिं जब वही तिनका आँख में उड़कर चला जाए तो बहुत पीड़ा सहनी पड़ती है | असहनीय पीड़ा सहने के बाद आप कभी भी छोटेसे तिनके को भी कम समझने की भूल नहीं करोंगे |

अर्थात मनुष्य को किसी भी इन्सान को छोटा नहीं समझना चाहिए, बहुत बार इन्ही लोगों के वजहसे उसे संकटों को झेलना पड़ता हैं |



 

छिहत्तरवा दोहा 

साधू भूखा भाव का, धन का भूखा नाहिं |
धन का भूखा जी फिरै, सो तो साधू नाहिं ||

[शब्द का अर्थ :-भाव-प्रेम, करुणा, भक्ती  ]

भावार्थ- कबीर दास जी कहते कि साधू हमेशा करुणा और प्रेम का भूखा होता है, इश्वर के भक्ती का भूखा होता है | उसे किसी भी प्रकार के धन संपती का लालच नहीं होता अर्थात वह कभी भी धन का भूखा नहीं होता | जो धन का भूखा होता है, लालची होता है, जो धन का प्राप्त करने के लिए भटकता फिरता है, ऐसा व्यक्ती कभी भी साधू नहीं हो सकता |



 

सतहत्तरवा दोहा

बाहर क्या दिखलाए, अंतर जपिए राम |
कहा काज संसार से, तुझे धानी से काम ||

[शब्द का अर्थ :- धानी-मालिक, स्वामी ]

भावार्थ-  भगवान के नाम का जाप सिर्फ बाहरी दिखावे के लिए नहीं करना चिहिए, नाम को आंतरीक रूप से, मन ही मन में जपना चाहिए | हमें संसार के लोगों से नहीं, संसार की चिंता छोड़कर संसार के मालिक से सम्बन्ध रखना चाहिए वही हमारा मुक्ति दाता है |



KABIR KE DOHE

अठहत्तरवा दोहा 

फल कारण सेवा करे, करे न मन से काम |
कहे कबीर सेवक नही, चाहे चौगुना दाम ||

[शब्द का अर्थ :- चौगुना-चारगुना,  दाम-पैसा ]

भावार्थ- कबीर जी कहते है, जो व्यक्ती भगवान की सेवा करते हैं पर उसके बदले में अपने मन में इच्छा रखकर उसका फल भी चाहता हैं, ऐसा मनुष्य वास्तव में भगवान का भक्त नहीं है, सेवक नहीं है क्योंकि सेवा के बदले वह कीमत चाहता है। और यह कीमत भी वह चौगुनी चाहता है, मतलब वह मनुष्य भगवान की सेवा नहीं मजदूरी कर रहा हैं |



 

उनासीवा दोहा 

आया था किस काम को, तु सोया चादर तान |
सम्भाल ए गाफिल, अपना आप पहचान ||

[शब्द का अर्थ :- आप-स्वयंम ]

भावार्थ- कबीर जी कहते है, हे मनुष्य तु यहाँ परमात्मा का भजन करने आया है, सत्कर्म करने आया है, पर तुम सब कुछ भुलाकर चादर तान कर सो रहे हो | जागो और वास्तविक सत्य को पहचानो, अपना होश ठीक कर और अपने को पहचान तू किस काम के लिए आया हैं? तू कौन हैं ? स्वयं को पहचान और सत्कर्मों में लग जा |



KABIR KE DOHE  

अस्सीवा दोहा 

जब मैं था तब गुरु नहीं, अब गुरु हैं मैं नाय |
प्रेम गली अति साँकरी, ता में दो न समाय ||

[शब्द का अर्थ :- मैं-अहंकार, साँकरी-छोटी ]

भावार्थ- जब तक अहंकार रूपी मैं मेरे अन्दर समाया हुआ था तब तक मैं गुरुं को अपने अन्दर, ह्रदय में स्थान नहीं दे पाया, पर अब जब मुझे गुरू मिल गये है, उनका प्रेम रस प्राप्त हुआ है और साक्षात् गुरु ही मुझमे समा गये हैं तब मेरा अहंकार समाप्त हो गया है, नष्ट हो गया है  | प्रेम की गली इतनी संकरी है कि इसमें एक साथ दो नहीं समा सकते अर्थात् गुरू के रहते हुए अंहकार नहीं उत्पन्न हो सकता।



 

इक्यासीवा दोहा 

कबीर कुता राम का, मुतिया मेरा नाउं |
गले राम की जेवड़ी, जीत खैंचे तित जाउं ||

[शब्द का अर्थ :-कुता-कुत्ता, मुतिया-मोती, नाउं-नाम, जेवड़ी-रस्सी ]

भावार्थ- कबीर जी कहते हैं मैं तो प्रभु राम का कुत्ता हूँ और मोती मेरा नाम है | मैंने मेरे गले में राम नाम की रस्सी बाँध ली है, और दिन-रात मैं मेरे प्रभु के भक्ती में खोया रहता हूँ | मुझे जहाँ मेरे राम ले जाते हैं मैं वहीं अपने आप खिंचा चला जाता हूँ | कबीर जी यहाँ परमात्मा को शरणागत होकर ये कह रहे है |



 

बयासीवा दोहा

जिनके नौबति बाजती, मैंगल बंधते बारि |
एकै हरि के नाव बिन, गए जनम सब हारि ||

[शब्द का अर्थ :-एकै-एक, हरि-इश्वर, नाव-नाम ]

भावार्थ- जिनके द्वार पर पहर–पहर नौबत बजा करती थी और मस्त हाथी जहाँ बंधे हुए झूमते थे अर्थात जो ऐश्वर्य संपन्न थे | ऐसे कुबेर भी अपना सारा धन, ऐश्वर्य गवां बैठे, अपने जीवन की बाजी भी हार गये | यह सब सिर्फ ईसलिए हुआ की सुख के दिनों में वह अपने परमपीता परमेश्वर को भूल गए, उसका स्मरण नहीं किया, उसको याद नहीं किया | 



KABIR KE DOHE 

तिरासीवा दोहा 

परनारी राता फिरैं, चोरी बिढिता खाहि |
दिवस चारि सरसा रहै, अंती समूला जाहि ||

[शब्द का अर्थ :-परनारी-पराई स्त्री, राता-रात, फिरैं-घूमना, समूला-पुरी तरहसे, सरसा-मस्ती में ]

भावार्थ- कबीर जी कहते है, परनारी से जो प्रीति जोड़ते है, प्यार करते है और कुछ भी मेहनत नही करते हुए जो चोरी करके, चोरी की कमाई खाते है | भले ही ऐसे लोग चार दिन फूले-फूले फिरे, मौज-मस्ती में अपना जीवन व्यतीत करे, किन्तु ऐसे लोग अंत में जडमूल से नष्ट हो जाते हैं |



 

चौरासीवा दोहा 

कागद केरी नाव री, पाणी केरी गंग |
कहैं कबीर कैसे तिरूँ, पंच कुसंगी संग ||

[शब्द का अर्थ :-कागद-कागज, नाव-नौका, गंग-गंगा ]

भावार्थ- कबीर जी कहते है, यह जीवन एक कागज की नाव है | मतलब यह जीवन नश्वर है, यह कभी भी ख़त्म हो सकता है, इसका कोइ भरोसा नहीं है | ऊपर से दुनिया में हर तरफ मनुष्य को विचलित करने के लिये मोह, माया के जाल बिछे हुए है | चंचल इन्द्रियों का स्वामी मनुष्य इसमें आसानीसे फस सकता है | उस प्रभु को पाने के लिए मुझे इन सारी बाधाओंको पर करना पड़ेगा | 

अर्थात–नाव यह कागज की है, और गंगा में पानी-ही-पानी भरा है । फिर साथ पाँच कुसंगियों का है, कैसे पार जा सकूँगा ? [ पाँच कुसंगियों से तात्पर्य है पाँच चंचल इन्द्रियों से ।]



KABIR KE DOHE

पचासीवा दोहा 

काजल केरी कोठडी  तैसा यहु संसार |
बलिहारी ता दास की, पैसिर निकसणहार ||

[शब्द का अर्थ :- दास-भक्त, सेवक, संसार-दुनिया ]

भावार्थ- यह दुनिया तो काजल की कोठरी है , जो ही इसमें पैठा, उसे कुछ न  कुछ कालिख तो लग ही जायेगी | धन्य है उस प्रभु भक्त को, जो इसमें पैठकर बिना कालिख लगे साफ़ निकल आता है |

अर्थात कबीर कहते है, यह दुनिया एक ऐसी कोठरी है जिस में मोह, माया, मद, लोभ, क्रोध आदी विकार भरे पड़े है | कोइ भी मनुष्य इन विकारोंका शिकार हो सकता है | पर धन्य है प्रभु के वह भक्त जो इन विकारोंसे भरे संसार में रहकर भी अपने आप को विकारों से दूर रखकर प्रभु के भक्ती में मगन रहते है |



 

छियासीवा दोहा 

संत ना छाडै संतई, जो कोटिक मिले असंत |
चन्दन भुवंगा बैठिया, तउ सीतलता न तजंत ||

[शब्द का अर्थ :-कोटिक-करोड़ों, असंत-दुर्जन, भुवंगा-साप, सीतलता-शीतलता, तजंत-त्यागना ]

भावार्थ- भले ही करोड़ों दुर्जन, दृष्ट लोग संत-महात्मा के रास्ते में आ जाये या उनसे मिले, फिर भी सन्त अपनी अच्छाइयां, सज्जनता और संतपना नहीं छोड़ता | वैसे ही चन्दन के वृक्ष पर कितने ही साँप आ बैठें, तो भी चन्दन अपनी शीतलता को नही छोडता |

अर्थात जीवन में हमे अच्छाइयों का मार्ग कभी भी छोड़ना नहीं चाहिए |



 

सत्तासीवा दोहा

ज्यों तिल माहि तेल है, ज्यों चकमक में आग |
तेरा साईं तुझ ही में हैं, जाग सके तो जाग ||

[शब्द का अर्थ :-चकमक-आग जलानेवाला पत्थर, साईं-परमेश्वर ]

भावार्थ- जैसे तिल में तेल होता हैं और चकमक पत्थर में आग होती हैं, वैसे ही तेरा साई, तेरा प्रभु, तेरा परमात्मा तुझमे ही है | उसे कही बाहर ढूढने की जरूरत नहीं है | हमारे ईश्वर हमारे अन्दर है और हम सोये हुए है, उसे कही और ढूंढ रहे है | कबीर हमें जागने के लिए कह रहे है | हम जगे तो है पर पांचो इन्द्रियों को सुख पहुचाने के लिए जागे है | हमारे भीतर तो परमात्मा है; उसे जानने के मामले में हम अब तक सोये हुए है | कबीर कहते है जाग सके तो जागो और अपने अन्दर वास कर रहे परमेश्वर को जानो |



KABIR KE DOHE

अट्ठासीवा दोहा

चलती चाकी देख के, दिया कबीरा रोय |
दोउ पाटन के बीच में, साबुत बचा न कोय ||

शब्द का अर्थ :- चाकी-अनाज पिसने वाली चक्की, दोऊ-दोनों, साबुत-अखंड ] 

भावार्थ- संसार की चक्की के दो पत्थर-पाटों के बीच हम सब अनाज के दानों की तरह पिस रहें है, और इस पीसाई के अंत में कोई भी साबुत बचने वाला नहीं है | मनुष्य को संसार में सुख-दुःख, पाप-पुण्य के रूपमे अविरत संघर्ष करना पड़ता है | मनुष्य के इस कष्ट को देख कर कबीर जी व्यथित मन से रो देते है | कबीर जी जानते है जो मनुष्य खुद को पहचानेगा, उस परमपिता के शरण में जायेगा वही इस संसार के दुखो से बच पायेगा |  



 

नवासीवा दोहा 

जिन घर साधू न पुजिये, घर की सेवा नाही |
ते घर मरघट जानिए, भूत बसे तीन माही ||

[ शब्द का अर्थ :- मरघट-शमशान ]

भावार्थ- कबीर जी कहते है जिस घर में साधू, संत-महात्मा, उनके विचार और सत्य की पूजा नही होती उस घर में पाप बसता है| साधू-संतो के विचार, उनका मार्गदर्शन जिस घर को मिल जाता है, जो घर उनके बताये गए सत्य मार्ग पर चलता है वह घर एक पवित्र वास्तु होता है, उस घर की हररोज उन्नति होती है | और जिस घर में साधू-संतो और उनके विचारोंका आदर नहीं होता है उस घर की अधोगती होती है, ऐसा घर तो उस शमशान के समान होता है जहाँ दिन में ही भूत प्रेत बसते है |



KABIR KE DOHE 

नब्बेवा दोहा 

सुखिया सब संसार है, खायै अरु सोवै |
दुखिया दास कबीर है, जागै अरु रोवै ||

[ शब्द का अर्थ :- सुखिया- सुखी, अरु-और, सोवै-सोया हुआ, दुखिया–दु:खी,  रोवै- रो रहे ]

भावार्थ- कबीर जी कहते है कि, ये दुनिया सुखि है क्यों की ये केवल खाने और सोने का काम करती है | इसे किसी प्रकार की चिंता नहीं है | उनके अनुसार सबसे दुखी व्यक्ती वो है , जो प्रभु के वियोग में जागते रहते है | वे ईश्वर के सत्यता को जान चुके है इसलिए वह जागे हुए है और इश्वर के वियोग में रो रहे है | 

अर्थात सांसारीक भोग में  लगे हुए व्यक्ती तो सुखपूर्वक रहते है और जो प्रभु वियोग में व्याकुल रहते है वे जागते रहते है |



 

इक्यानबेवा दोहा 

बिरह भुवंगम तन बसै, मंत्र न लागै कोइ |
राम बियोगी न जिवै, जिवै तो बौरा होई  ||

[ शब्द का अर्थ :- बिरह–बिछडने का गम, भुवंगम-भुजंग, सांप, बौरा-पागल, मंत्र-उपाय, बियोगी-विरह में तडपने वाला, जिवै-जीवित ]

भावार्थ- कबीर जी कहते है जब मनुष्यके मन में अपनों के बिछडने का गम सांप बन कर लोड़ने लगता है तो उस पर नही कोई मन्त्र असर करता है ओर नही कोई दवा काम करती है | उसी तरह राम अर्थात इश्वर के वियोग में मनुष्य जीवित नहीं रह सकता और यदि वह जीवित रहता भी है तो उसकी स्थिती पागलों जैसी हो जाती है |

अर्थात संसार में अपने प्रिय प्रभु से बिछड़ने का गम सबसे ज्यादा होता है |



 

बानबेवा दोहा 

हम घर जाल्या आपणा, लिया मुराडा हाथी |
अब घर जालौं तास का, जे चलै हमारे साथि ||

[ शब्द का अर्थ :- जाल्या-जलाया, आपणा-अपना, मुराडा-जलती हुई लकड़ी (ज्ञान), जालौं-जलाऊं, हाथी-हात में, तास का-उसका]

भावार्थ- कबीरजी कहते है उन्होंने अपने हाथों से अपना घर जला दिया है, अर्थात उन्होंने मोह-माया रूपी घर को जला कर ज्ञान प्राप्त कर लिया है |अब उनके हांथों में जलती हुई मशाल है, यानी ज्ञान है | अब वे उसका घर जलाएंगे जो उनके साथ चलना चाहता है और ज्ञान की प्राप्ती करना चाहता है | अर्थात उसे भी मोह-माया से मुक्त होना होगा जो ज्ञान प्राप्त करना चाहता है |



 

तिरानबेवा दोहा 

आवत गारी एक है, उलटत होई अनेक |
कह ‘कबीर’ नहीं उलटिए, वही एक की एक |

[ शब्द का अर्थ :- गारी- गाली ]

भावार्थ- जब कोइ व्यक्ती किसी को गाली देता हैं तो वह एक ही होती है, पर सामने वाला जब उसका उल्टा जवाब देता है तो वह कई रूप ले लेती हैं | जवाब देने पर गलियों का सिलसिला चल निकलता हैं | कबीरजी का कहना है कि गाली का उलटकर उत्तर नही देना चाहिए, ऐसा करने पर वह एक की एक ही रह जाती है अन्यथा उसका स्वरुप बढ़ता जाता है |



 

चौरानबेवा दोहा 

कबीर लहरि समंद की, मोती बिखरे आई |
बगुला भेद न जानई, हंसा चुनी-चुनी खाई ||

[ शब्द का अर्थ :- समंद-समुंदर, समुद्र, भेद-अंतर, लहरि-लहर ]

भावार्थ- कबीर कहते हैं कि समुद्र की लहर अपने साथ में मोती बहाकर लाती है और उन्हें किनारों पर बिखेर देती है । पर अज्ञानी बगुला मोतियों को पहचान नहीं पाता है , परन्तु ज्ञानी हंस उन्हें चुन-चुन कर खा लेता है, हासिल कर लेता है ।

इसका अर्थ यह है कि गुरु सब शिष्योंको इक सामान ही शिक्षा देते है, पर समझदार शिष्य उसे भली-भांती समझकर अपना लेता है और जीवन में अपनी उन्नती कर लेता है | तात्पर्य किसी भी वस्तु का महत्व जानकार ही जानता है ।



KABIR KE DOHE

पंचानबेवा दोहा 

जो उग्या सो अन्तबै, फूल्या सो कुमलाहीं |
जो चिनिया सो ढही पड़े, जो आया सो जाहीं ||

[शब्द का अर्थ :-उग्या-उत्पन्न होना, अन्तबै-अंत, समाप्ति, कुमलाहीं-मुरझना, चिनिया-निर्माण करना, ढही-गिरना]

भावार्थ- इस संसार का नियम यही है कि जिसका उदय हुआ है, उसका अस्त भी होगा | जो विकसित हुआ है वह मुरझा जाएगा। जिसका निर्माण किया गया है वह एक न एक दिन गिर पड़ेगा | और इस संसार में जिसका जनम हुआ है वह एक न एक दिन मर जायेगा | अर्थात इस संसार में जितनी भी वस्तुए है उनका अंत निश्चित है, सभी नश्वर है |



 

छियानबेवा दोहा 

ऐसा कोई ना मिले, हमको दे उपदेस |
भौ सागर में डूबता, कर गहि काढै केस ||

[ शब्द का अर्थ :-उपदेस-उपदेश, भौ सागर-भव सागर ]

भावार्थ- कबीर संसारी जनों के लिए दुखि होते हुए कहते हैं कि इन्हें कोई ऐसा पथदर्शक नही मिला जो इस संसार रुपी भव सागर को पार करने का मार्ग बताता | संसार सागर में डूबते हुए इन प्राणियों को अपने हाथों से  केश पकड़ कर निकाल लेता और इनको मुक्ति का मार्ग बताकर इनका उद्धार करता |



 

सत्तानबेवा दोहा 

कबीर सुता क्या करे, जागी न जपे मुरारी |
एक दिन तू भी सोवेगा, लम्बे पाँव पसारी ||

[ शब्द का अर्थ :- सुता-सोया हुआ, मुरारी-इश्वर, सोवेगा-मर जायेगा ]

भावार्थ- कबीर कहते हैं, अज्ञान की नींद में सोए क्यों रहते हो? ज्ञान की जागृति को हासिल कर, प्रभु का नाम लो । सजग होकर प्रभु का ध्यान करो । वह दिन दूर नहीं जब तुम्हें गहन निद्रा में सो जाना है, इसीलिए जब तक जाग सकते हो जागते क्यों नहीं? प्रभु का नाम स्मरण क्यों नहीं करते ?



 

अट्ठानबेवा दोहा 

हरिया जांणे रूखड़ा, उस पाणी का नेह |
सूका काठ न जानई, कबहूँ बरसा मेंह ||

[ शब्द का अर्थ :-हरिया-हरा, नेह-स्नेह, सूका-सुखा ]

भावार्थ-  वृक्ष को हरा होने के लिए पाणी की जरूरत होती है, बिना पाणी के वह सुख के लकड़ी बन जायेगा | इसलिए उसे पाणी का महत्व मालूम होता है | पानी के स्नेह को हरा वृक्ष ही जानता है | पर सूखा काठ और सुखी  लकड़ी जिन्हें पाणी की जरूरत नही होती, उन्हें पाणी से स्नेह भी नहीं होता है वह  क्या जाने कि कब पानी बरसा?

अर्थात सहृदय मनुष्य ही प्रेम भाव को समझता है, प्रेम के महत्व को जनता है | निर्मम मन इस भावना को क्या जाने ? क्यों की उन्हें कभी किस से प्रेम करना ही नहीं है |



 

निन्यानबेवा दोहा

लंबा मारग दूरि घर, बिकट पंथ बहु मार |
कहौ संतों क्यूं पाइए, दुर्लभ हरि दीदार ||

[ शब्द का अर्थ :- मारग-मार्ग, दुर्लभ-कठिन, हरि-इश्वर, दीदार-दर्शन ]

भावार्थ-  इश्वर के प्राप्ती का मार्ग न केवल लम्बा है बल्की बड़ा कठिन भी है, और इस मार्ग में बहुतसे लुटेरे अर्थात सांसारिक आकर्षण भी मिलते है| कबीर जी कहते है, हे संतो अब आप ही बताइयें ऐसे स्थिती में उस दुर्लभ भगवान के दर्शन कैसे हो|

इस दोहे में काम, क्रोध, लोभ, मोह और मद इन् पांचो विकारों को साधना के मार्ग का लुटेरा कहां गया है|



KABIR KE DOHE 

एक सौ दोहा

कबीर सीप समंद की, रटे पियास पियास |
समुदहि तिनका करि गिने, स्वाति बूँद की आस ||

[ शब्द का अर्थ :-समंद-समुन्दर, रटे-रटना, पियास-प्यास ] 

भावार्थ- कबीरजी कहते हैं कि समुद्र की सीपी प्यास प्यास रटती रहती है | समुद्र की सीपी को स्वाति नक्षत्रमें गीरने वाली बूंदों का इंतज़ार रहता है | इसी बूंदों से सीपी मोती का निर्माण करती है | इसी स्वाति नक्षत्र की बूँद की आशा लिए हुए समुद्र की अपार जलराशि को भी सीपी तिनके के बराबर समझती है |

अर्थात हमारे मन में जिसे पाने की ललक है, जिसे पाने की लगन है, उसके बिना हमें संसार की बाकी सारी चीज़ें  कम महत्व की लगती है |



 

एक सौ एक

बिन रखवाले बाहिरा, चिड़िये खाया खेत |
आधा परधा ऊबरै, चेती सकै तो चेत ||

[ शब्द का अर्थ :- रखवाले-रक्षक, रखवाल,  बाहिरा-बाहर से, चेती-सावधान ]

भावार्थ- खेत में बोया हुआ अनाज बिना रखवाली के था, यह देख कर चिडियोने खेत में उगे हुए अनाज को बाहर से खाना चालू कर दिया और लगभग आधे खेत का अनाज वह खा चुकी है और कुछ खेत अब भी बचा है | अगर उस बचे हुए खेत को चिड़ियों से बचाना है तो जल्दी से जागो, सावधान हो जाओ और खेत को बचालो|

कबीर कहते है जीवन में असावधानी के कारण  इंसान बहुत कुछ गँवा देता है और उसे खबर भी नहीं लगती के नुकसान हो चुका है | यदि जीवन में हम समय पर सावधानी बरतें तो होने वाले नुकसान से बच सकते हैं |



 

एक सौ दो

करता केरे गुन बहुत, औगुन कोई नाहिं |
जे दिल खोजों आपना, सब औगुन मुझ माहिं ||

[ शब्द का अर्थ :- करता-इश्वर, गुन-गुण, औगुन-अवगुण ] 

भावार्थ-  कबीर जी कहते है, इस दुनिया का जो परमपिता परमेश्वर है, जो इस संसार को चलाता है उसमे तो अगणीत गुण है | मैंने पाया है की उसमे एक भी अवगुण नहीं है | पर जब मैंने खुदके बारे में सोचा और अपने दिलके अन्दर खोजा तब मुझे पता चला के समस्त अवगुण तो मेरे अपने अपने ही भीतर हैं |

अर्थात दूसरों के अवगुन देखने से पहले अपने अवगुण ढूँढने चाहिए |



 

एक सौ तीन

तू कहता कागद की लेखी, मैं कहता आँखिन की देखी |
मैं कहता सुरझावन हारि, तू राख्यौ उरझाई रे ||

[ शब्द का अर्थ :- कागद-कागज, आँखिन-आँख, लेखी-लिखा हुआ, उरझाई-उलझन, सुरझावन-सुलझाना ]

भावार्थ-  तुम किताबोंमे, पोथीयों में और शास्त्रों में जो लिखा है उसे रटते रहते हो, उसे ही सत्यवचन और प्रमाण मानते हो | पर मेरा ऐसा नहीं है, मैं जो आँखों से देखता हूँ, महसूस करता हूँ, समझता हूँ उसे ही मैं सत्य मानता हूँ और वही कहता हूँ | मैं सरलता से हर बात को सुलझाना चाहता हूँ और तुम सीधी बातको भी बेवजह उलझाके रख देते हों |

अर्थात किसी भी बात को, समस्याको सरलता से सुलझाना चाहिए | बेवजह उसे उलझाने से समस्या और कठिन हो जाती है |



 

एक सौ चार 

पढ़ी पढ़ी के पत्थर भया, लिख लिख भया जू ईंट |
कहें कबीरा प्रेम की लगी न एको छींट ||

[ शब्द का अर्थ :-पढ़ी पढ़ी के- पढ-पढ के, भया-बन गया, छींट-दाग ]

भावार्थ-  बहुत पढ़-लिख लिया, ज्ञान हासिल किया | ज्ञानी हो गए तो मन में अहंकार आ गया, दूसरों को तुच्छ समझने लगे | पढ़-लिख लिया तो ज्ञान के अहंकार के वजहसे मन पत्थर और ईट जैसा कठोर हो गया | कबीर कहते है इतना पढ़ लिख लेने के बाद भी, ज्ञानी बनने के बाद भी अगर दूसरों के प्रती ह्रदय में स्नेह और प्रेम की भावना नहीं हो तो ऐसी पढाई लिखाई का क्या फायदा | प्रेम की एक बूँद, एक छींटा भर जड़ता को मिटाकर मनुष्य को सजीव बना देता है.   

अर्थात ज्ञानी होने के साथ साथ दूसरों के प्रती मन में प्रेमभाव भी होना चाहिए |



KABIR KE DOHE

एक सौ पाँच

सोना सज्जन साधू जन, टूट जुड़े सौ बार |
दुर्जन कुम्भ कुम्हार के, एइके ढाका दरार ||

[ शब्द का अर्थ :-कुम्भ-मटका, दरार-टूटना, कुम्हार-मिटटी के बर्तन बनाने वाला ]

भावार्थ-  कबीर कहते है सज्जन मनुष्य और साधू यह कीमती धातु सोने की तरह होते है | जिस प्रकार से सोना लचीला होने के वजह से कितने भी आघात झेल लेता है और टूट भी गया तो फिर से जुड़ने की योग्यता रखता है | उसी प्रकार से सज्जन मनुष्य और साधू जीवन में कितने भी दुःख आए, संकट आए उन्हें झेल के फिरसे उठ खड़े होते है | लेकिन दुर्जन व्यक्ति कुम्हार द्वारा बनाये गये मिट्टी के बर्तन जैसा होता है जो एक बार टूट जाने पर वह हमेशा के लिए टूट जाता है।



 

एक सौ छह

लकड़ी कहे लुहार की, तू मति जारे मोहि |
एक दिन ऐसा होयगा, मई जरौंगी तोही ||

[ शब्द का अर्थ :-  लुहार-लोहार, मति-मत, जारे-जलाना, जरौंगी-जलाऊँगी, मोहि-मुझे, तोहि-तुझे ]

भावार्थ-  लोहार जो लोहे से वस्तुओं को बनाता है, लोहे की वस्तुएं बनाने के लिए उसे आग की जरूरत  होती है, जिसे वह लकड़ियों को जलाकर उत्पन्न करता है | वही लकड़ी एक लोहार से कहती है कि आज अपनी जीविका के लिए तुम मुझे जला रहे हो | लेकिन याद रखना एक दिन ऐसा आएगा, जब तुम्हारी मृत्यु हो जायेगी तब मैं तुम्हें चिता पर जला दूंगी |

अर्थात अपने स्वार्थ के लिए किसीको तकलीफ नही देनी चाहिए, वरना भविष्य में हमें उससे समस्याओंका सामना करना पड सकता है |



 

एक सौ सात

कबीर हमारा कोई नहीं, हम काहू के नाहिं |
पारै पहुंचे नाव ज्यौं मिलिके बिछुरी जाहिं || 

[ शब्द का अर्थ :-काहू के-किसी के, मिलिके-मिलकर, बिछुरी-बिछड़ना ]

भावार्थ-  कबीरजी कहते है इस मोहमायासे भरी दुनियासे हमें कितना भी लगाव हो जाए सच तो यही है की यहा हमारा कोई नहीं है और हम किसीके नही है | जैसे नाव में बैठे यात्री सफ़रमे एक दुसरे के दोस्त हो जाते है पर जैसे ही सफ़र ख़त्म होता है वह एक दुसरेसे बिछड जाते है | ठीक उसी तरह से जैसा ही हमारा इस संसार रूपी नाव का सफ़र ख़त्म हो जायेगा हम सबसे बिछड़ने वाले है, हमारे सब सांसारिक सम्बन्ध यहीं छूट जाने वाले हैं |     

अर्थात मनुष्य देह नश्वर है, मृत्यु के पश्चात वह सबसे बिछड़ने वाला है |    



KABIR KE DOHE 

एक सौ आठ

तन को जोगी सब करें, मन को बिरला कोई |
सब सिद्धि सहजे पाइए, जे मन जोगी होइ ||

[ शब्द का अर्थ :-तन-शरीर, जोगी-साधू, बिरला-ख़ास, निराला ]

भावार्थ-  शरीर को योगी जैसा सजाकर मतलब भगवे वस्त्र, भस्म, रुद्राक्ष माला और जटाए बढाकर लोगों को प्रवचन देकर खुद को योगी स्थापित करना और प्रसीद्ध होना आसान बात है | परन्तु मन का योगी बनना बिरले व्यक्तियों का ही काम है, य़दि मन योगी हो जाए तो सारी सिद्धियाँ सहज ही प्राप्त हो जाती हैं। सच्चे योगी के लक्षण भी यही हैं |                      



 

एक सौ नौ

आछे दिन पाछे गए, हरी से किया न हेत |
अब पछताए होत क्या, चिडिया चुग गई खेत ||

[ शब्द का अर्थ :- आछे-अच्छे, पाछे-पीछे गए, छूट गए, हरी-इश्वर, हेत-प्यार, भक्ती, चुग गई-खा गयी, चिडिया-पंछी, पक्षी ]

भावार्थ-  जब मनुष्य के अच्छे दिन होते है तब वह अपने परिवार के साथ मौज-मस्ती और सुख में रममाण रहता है | सुख के दिनों में उसे उस परमपिता परमेश्वर की याद नहीं आती है, वह उसकी भक्ती नही करता है | पर जैसे ही उसके जिन्दगी में दुःख और संकट आने लगते है उसे ईश्वर की याद आने लगती है |

जब अच्छे दिन थे तब प्रभु से प्यार नहीं किया, उसकी भक्ती नहीं की इसका उसको पछतावा होने लगता है | यह उसी तरह से है जब खेत में अनाज था तब उसकी रखवाली नहीं की और जब चिड़ियों ने सारा अनाज खा लिया तो खुद को कोसने लगा | 

अर्थात समय रहते काम कर लिया जाए तो बाद में पछताना नहीं पड़ता |



KABIR KE DOHE 

एक सौ दस

इक दिन ऐसा होइगा, सब सूं पड़े बिछोह |
राजा राणा छत्रपति, सावधान किन होय ||

[ शब्द का अर्थ :-होइगा-होगा, सब सूं-सबसे, बिछोह-बिछडना, किन-क्यों नही ]

भावार्थ-  इस दुनिया की सारी चीजे नश्वर है, सबका अंत होना है | हे मनुष्य तुझे भी एक दिन अपने परिवार से, दोस्तों से और बड़े कष्ट से अर्जित कीए हुये धन-संपत्ति से भी बिछडना है, सबको यही छोड़ जाना है | इसलिए जो भी राजा है, छत्रपति है, सरदार है, धनवान है तुम अभी से सावधान क्यों नहीं हो जाते |



 

एक सौ ग्यारह

कबीर प्रेम न चक्खिया, चक्खि न लिया साव |
सूने घर का पाहुना, ज्यूं आया त्यूं जाव ||

[ शब्द का अर्थ :-चक्खिया-चाटना, साव-स्वाद,  ज्यूं आया-जैसे आया, त्यूं जाव-वैसेही जायेगा, सूने घर-जिस घर में कोइ नहीं रहता ]

भावार्थ-  कबीर जी कहते है, इस संसार में जनम लेकर अगर प्रेम नहीं चखा, उस इश्वर के भक्ति का रस नहीं पिया, उसके कृपा दृष्टी का स्वाद नहीं लीया तो ऐसे मनुष्य का जीवन अर्थहीन है | उसने जीया जीवन ऐसे ही है जैसे किसी सुने घर का मेहमान | सुने घर में किसी की भी आवभगत नहीं होती | वहा पर आये हुए मेहमान को बिना कुछ प्राप्त किए बगैर, खाली हाथ वहासे जाना पड़ता है |



 

एक सौ बारह

मैं मैं बड़ी बलाय है, सकै तो निकसी भागि | 
कब लग राखौं हे सखी, रूई लपेटी आगि ||

[ शब्द का अर्थ :-मैं-अहंकार, बलाय-संकट, सकै तो-हो सके तो, भागि-भाग जाओ, राखौं-रखना, रूई-कपास, आगि-आग ]

भावार्थ-   मनुष्य के जीवन में अहंकार, अहम् यह उसका एक प्रकार से बहुत बड़ा शत्रु है, जिसके वजहसे उसे जीवन में दुःख और संकटो का सामना करना पड सकता है | इसलिए मनुष्य को अहंकार को त्याग देना चाहिए, उससे दूर भागना चाहिए | अहंकार किसी कपास में लपेटी हुयी आग की तरह है, जिस तरह आग पलभर में कपास को जलाकर राख कर देती है,  वैसे ही अहंकार मनुष्य के जीवन को बरबाद कर सकता है |

अर्थात मनुष्य को जीवन में अहंकार से दूर ही रहना चाहिए |  



 

एक सौ तेरह

इस तन का दीवा करों, बाती मेल्यूं जीव |
लोही सींचौं तेल ज्यूं, कब मुख देखों पीव ||

[ शब्द का अर्थ :-तन-शरीर, दीवा-चिराग, दीपक, जीव-प्राण ]

भावार्थ-  उस परमपिता इश्वर के भक्ति में, मैं अपने देह (शरीर) का दीपक बना लूं, चिराग बना लूं और उसमे अपने प्राणों की, आत्मा की बाती बनाकर ऐसे चिराग में अपने रक्त को तेल की तरह इस्तमाल करू | ऐसे अनोखे चिराग को जलाके, रोशन करके क्या मैं अपने प्रिय भगवान के मुख का दर्शन कर पाऊंगा?

अर्थात प्रभु से भक्ती करना, उससे प्यार करना, उससे मिलने की इच्छा रखना यह बहुत ही कठिन साधना है | कोइ भी मोह-माया में फसा साधारणसा मनुष्य यह नहीं कर सकता | उसके लिए तो कोइ असाधारण, योगी प्रवृती का मनुष्य ही चाहिए |       



 

एक सौ चौदह

हिन्दू मुआ राम कहि, मुसलमान खुदाइ |
कहैं कबीर सो जीवता, दुहूँ के निकट न जाई ||

[ शब्द का अर्थ:-मुआ-मर गया, सो जीवता-वही जीता है, दुहूँ-दोनों ]

भावार्थ हिन्दू राम के नाम पर और मुसलमान खुदा के नामपर आपस में झगड़ा करते करते मर जाते है की  किसका भगवान श्रेष्ट और महान है | कबीरदास कहते है इस संसार में वही मनुष्य जिन्दा रहता है जो इस झगड़े से अपने आपको दूर रखता है और खुद को प्रभु के भक्ती में लीन रखता है | ऐसा ही मनुष्य इस संसार में जिन्दगी जीने के लायक है | 

अर्थात इश्वर एक ही है, जो मनुष्य इसे समझ पाता है वही प्रभु को अपने करीब पाता है |



KABIR KE DOHE

एक सौ पन्द्रह

मलिन आवत देख के, कलियन कहे पुकार |
फूले फूले चुन लिए, कलि हमारी बार ||

[ शब्द का अर्थ :-मलिन-बाग़ का माली, कलियन-कलियाँ, आवत-आते हुए, कलि-कल, हमारी बार-हमारा वक्त]

भावार्थ-  बाग़ के माली को आते देखकर बगीचे की कलियाँ अपने कलि साथियों से कहती है | बाग़ का माली आज बगीचे के फूलों को तोड़ने के लिए आ रहा हैं, वह फूलों को तोड़ेगा पर कलियों को नही | पर याद रखना जब हम कलियाँ, कलियों से खिलकर कल फूल बनेगे तब यह बगीचे का माली हमें भी तोड़ेगा |

अर्थात इस जगत में सारी चीजें नश्वर है, सबका अंत तय है | आज किसकी मृत्यु हो गयी तो शोक करलो, पर याद रखना कल तुम्हरी भी मृत्यु होने वाली है |  काल सबके लिए समान है | 



 

एक सौ सोलह

जल में बसे कमोदनी, चंदा बसे आकाश |
जो है जा को भावना, सो ताहि के पास ||

[ शब्द का अर्थ :-जल-पाणी, कमोदनी-कमल, बसे-निवास करना, चंदा-चन्द्रमा, 

भावार्थ-  प्रेम ह्रदय के पवित्र भावना का नाम है | प्रेम में नजदीकी-दूरी, छोटे-बड़े और उंच-नींच का कोई भेद नहीं होता | कुमुदिनी का फूल जल में खिलता है और चन्द्रमा आकाश में होता है फिर भी दोनों का प्रेम संसार भर में प्रसिद्ध है | जिसकी प्रेम भावना जिसमें होती है वह उसीके ह्रदय में वास करता है | उसीके निकट रहता है | फिर दोनों चाहे एक दुसरे से कितने ही दूर क्यूँ न हो |

वैसे ही जब कोई इंसान ईश्वर से सच्चे दिल से  प्रेम करता है, भक्ति करता है, तो ईश्वर प्रसन्न होकर स्वयं चलकर उसके पास आते हैं।



KABIR KE DOHE 

एक सौ सत्रह

ते दिन गए अकारथ ही, संगत भई न संग |
प्रेम बिना पशु जीवन, भक्ति बिना भगवंत ||

[ शब्द का अर्थ :-अकारथ-व्यर्थ, पशु-जानवर, भगवंत-इश्वर, संगत-साथी ]

भावार्थ- दुनिया में अपना जीवन व्यतीत करते हुए मनुष्य जो समय बिताता है उसे व्यर्थ ही समझना अगर उसने ना कभी सज्जनों की संगति की हो और ना ही कोई अच्छा काम किया हो, न किसीसे प्रेम किया हो और ना ही किसीकी भक्ति की हो  | 

मानव जीवन में प्रेम और भक्ति का बड़ा महत्व है | जिस मनुष्यने अपने जीवन में किसीसे भी प्रेम नहीं किया हो, उस परमपीता परमेश्वर की भक्ती नही की तो उस मनुष्य का जीवन किसी पशु (जानवर) समान समझना चाहिए |  भक्ति करने वाले इंसान के ह्रदय में भगवान का वास होता है |



 

एक सौ अठारह

नहीं शीतल है चंद्रमा, हिम नहीं शीतल होय |
कबीर शीतल संत जन, नाम सनेही होय ||

[ शब्द का अर्थ :-शीतल-मुलायम, कोमल, हिम-बर्फ़, सनेही-स्नेह ]  

भावार्थ-  जिसका मन शांत, शीतल होता है वह सबसे प्रेम करता है, सब उसे प्रेम करते है और वह प्रभु के सबसे करीब भी होता है | कबीरजी कहते है दुनिया में सबसे शीतल ना तो सबसे मुलायम रोशनी बिखरने वाला चन्द्रमा होता है और ना तो सबको ठण्ड से जमा देनेवाला बर्फ होता है | 

दुनिया में सबसे शीतल, ह्रदय से मुलायम और कोमल होते है सज्जन पुरुष |  वह सबसे स्नेह करने वाले होते है और सबका भला सोचने वाले होते है |



 

एक सौ उन्नीस

शीलवंत सबसे बड़ा, सब रतनन की खान |
तीन लोक की सम्पदा, रही शील में आन ||

[ शब्द का अर्थ :-शीलवंत-चारित्र्यवान, रतनन-रत्न, शील-चारित्र्य ]

भावार्थ-  इस संसार में मनुष्यों के बीच सबसे बड़ा स्थान नही धनवान का होता है, नही राजा का होता है और नहीं किसी सम्राट का होता है | सबसे बड़ा स्थान होता है शीलवान पुरुष का | शीलवंत पुरुष सज्जनता, सदाचार, धार्मिकता, विनयशीलता और नम्रता इन गुणों से युक्त होता है | 

कबीरजी कहते है शीलवान पुरुष इस संसार में मिलनेवाले रत्नों में से सबसे मौल्यवान रत्न है | जिसके पास शीलता है उसके पास मानों तीनों लोकों की संपत्ति है |



KABIR KE DOHE 

एक सौ बीस

कुटिल वचन सबसे बुरा, जा से होत न चार |
साधू वचन जल रूप है, बरसे अमृत धार ||

[ शब्द का अर्थ :-कुटिल वचन-कठोर बोल, साधू वचन-सज्जन वाणी, मीठे बोल ]

भावार्थ- इस जगत में सबसे बुरे कठोर वचन (बोल) होते हैं, ऐसे कडवे बोल किसी को नहीं बोलने चाहिए जिससे लोग नाराज हो जाये, कडवे बोल किसी भी चीज या समस्या का समाधान नहीं कर सकते | कड़वे शब्द वाले व्यक्तियों को कोई प्यार नहीं करता है | मनुष्य को हमेशा मधुर वाणी ही बोलनी चाहिए |

सज्जन व्यक्ती की मीठी वाणी जल के समान होती है | जब सज्जन व्यक्ती, साधू व्यक्ती अपनी मीठी वाणी से बोलता है तो ऐसा लगता है मानो अमृत की वर्षा हो रही हो |  

अर्थात कडवे वचन बोलने से हमारा ही नुकसान होता है और मधुर वचन बोलने से फायदा |



 

एक सौ इक्कीस

कागा का को धन हरे, कोयल का को देय |
मीठे वचन सुना के, जग अपना कर लेय ||

[ शब्द का अर्थ :-कागा-कव्वा, हरे-चुरा लेना, देय-देना ]

भावार्थ-  इस जगत में कौआ और कोयल के बिच में कोयल को सबसे ज्यादा पसंद किया जाता है | वैसे देखा जाये तो दोना का रंग-रूप समान है, पर फिर भी लोग सबसे ज्यादा कोयल को ही पसंद करते है | कौआ किसीकी धन-संपत्ति को चुराता नहीं है और नही कोयल किसीको कुछ देती है फिर भी लोग कोयल को पसंद करते है, इसका सबसे प्रमुख कारण है बोली | 

कौआ अपनी कर्कश, कठोरे वाणी से सबको परेशान कर देता है पर कोयल अपनी मीठी बोली से सबको आनंद देती है, सबका मन मोह लेती है | यह फर्क है सिर्फ मीठी बोली का |

अर्थात कठौर वचन बोलने से लोग हमसे घृणा करते है और मधुर वचन बोलने से प्यार |



 

एक सौ बाईस

मांगन मरण समान है, मत मांगो कोई भीख |
मांगन से मरना भला, ये सतगुरु की सीख ||

[ शब्द का अर्थ :-मांगन-माँग के खाना , मरण-मृत्यु, भला-अच्छा ]

भावार्थ- इस संसार में मनुष्य के लिए सबसे बड़ा होता है आत्मसन्मान | आत्मनिर्भरता, आत्मसन्मान ही है जो मनुष्य को संसार में इज्जत और मान-सन्मान दिलाता है |  बिना आत्मसन्मान वाले मनुष्य की संसार में कोइ इज्जत नहीं होती है | इसीलिए कबीर जी कहते हैं कि मनुष्य को अपना पेट भरने के लिए, जीवन जीने के लिए किसीके सामने हाथ नहीं पसारने चाहिए, भिखारी बनकर भीख नहीं मांगनी चाहिए, मांगना तो मृत्यु के समान है |

दुनिया को सद्गुरु, साधू-संत सिखा गए है, उपदेश करके गए है की अपना पेट भरने के लिए किसीसे भीख नही मांगनी चाहिए, मांगने से तो मरण अच्छा है, मृत्यु अच्छी है, इससे आत्मसन्मान तो बना रहेगा |



KABIR KE DOHE 

एक सौ तेईस

कबीरा खड़ा बाज़ार में, मांगे सबकी खैर |
ना काहू से दोस्ती,न काहू से बैर ||

[ शब्द का अर्थ :-खैर-सलामती, काहू-किसीसे, बाज़ार-संसार, बैर-दुश्मनी ]

भावार्थ-  कबीर जी कहते है इस संसार में खड़ा होकर परमपिता परमेश्वर से अच्छे-बुरे, धनवान-गरीब सबके सलामती और अच्छाई के लिए में उस प्रभु से दुआ मांगता हूँ | दुनिया में सबके साथ एक समान व्यवहार रखना चाहिए, नाही किसीसे ज्यादा मित्रता करनी चाहिए और नाही किसीसे दुश्मनी करनी चाहिए | दोस्त है तो इसका भला करूऔर दुश्मन है तो इसका बुरा करू इस व्यर्थ सोच में नही पड़ना चाहिए |  

अर्थात मनुष्य को सबका भला करना चाहिए दोस्ती दुश्मनी के चक्कर में नही पड़ना चाहिए |



 

एक सौ चौबीस

कहत सुनत सब दिन गए, उरझि न सुरझ्या मन |
कही कबीर चेत्या नहीं, अजहूँ सो पहला दिन ||

[ शब्द का अर्थ :-उरझि-उलझा, सुरझ्या-सुलझा, चेत्या-सावधान, अजहूँ-आजभी ]

भावार्थ-  कितने दिन-साल गुजर गए पर यह मन अब तक इस संसार में उलझ कर सुलझ नहीं पाया है | यह मन अभी तक भोग-वासनाओमें ही लिपट कर रहना चाहता है | यह मन अभी तक होश में नहीं आया है और विषय-वासनाओंसे  तृप्त नहीं हुआ है | आज भी इसकी अवस्था पहले दीन जैसी ही है, आज भी यह विषय-वासनाओंमें ही रहना चाहता है | अब हमें इस मन को इश्वर के भक्ति की और प्रेरित करना चाहिए |



KABIR KE DOHE

एक सौ पच्चीस

झूठे सुख को सुख कहे, मानत है मन मोद |
जगत चबैना काल का, कुछ मुंह में कुछ गोद ||

[ शब्द का अर्थ :- मानत-समझना, मोद-प्रसन्न, जगत-संसार, चबैना-ग्रास, निवाला ]

भावार्थ-  कबीर जी कहते है, अरे मनुष्य तू संसार के झूठे सुखों को सुख समझकर मन में प्रसन्ना हो रहा है | यह संसार तो काल का ग्रास है, भोजन है कुछ उसके मुख में है तो कुछ उसके झोली में है |  

अर्थात इस संसार के सभी प्राणी नश्वर है कुछ काल द्वारा नष्ट कर दिए गए है और कुछ काल की झोली में है जिनका भी कुछ समय द्वारा अंत हो जाएगा |



 

एक सौ छब्बीस

कबीर सो धन संचे, जो आगे को होय |
सीस चढ़ाए पोटली, ले जात न देख्यो कोय ||

[ शब्द का अर्थ :-संचे-जमा करो, आगे को-भविष्य के लिए, सीस-शीर, सर, कोय-किसीको ]

भावार्थ- कबीरजी कहते है मनुष्य को अपने जीवन में उतने ही धन का संचय करना चाहिए जो उसके वर्तमान और भविष्य के काम आ सके | लोगों से दुर्व्यवहार करके, दींन-रात मेहनत करके बहुत सारा धन जमा करके क्या फायदा, आपने किसी धनवान, सावकार, राजा या सम्राट को मरने के बाद अपना खजाना सर पे लाद के ले जाते हुए देखा है |

अर्थात जब हमें सब कुछ यही छोड़ कर जाना है तो क्यों न सत्कर्म करके, इश्वर की भक्ती करके इस दुनिया से विदा हो जाए |   



 

एक सौ सत्ताईस

कबीर बादल प्रेम का, हम पर बरसा आई |
अंतरि भीगी आतमा, हरी भई बनराई ||

[ शब्द का अर्थ :-आतमा-आत्मा, हरी-इश्वर, बनराई-जंगल, भई-बन गयी ]

भावार्थ- कबीरजी कहते है, प्रेम में इतनी ताकत है की मनुष्य का जीवन बदल देता है | आपबीती सुनाते हुए कबीर कहते है कही से प्रेमरूपी बादल मेरे ऊपर आ गया और प्रेम की वर्षा कर मेरी अंतर आत्मा तक को भिगो गया | प्रेम की इस वर्षा से चमत्कार हो गया और मेरे आस पास का पूरा परिवेश हरा-भरा हो गया, खुश हाल हो गया | यह प्रेम का अपूर्व प्रभाव है |

अर्थात प्रेम में अपार शक्ती है उसे सिर्फ महसूस करने की जरूरत है |



KABIR KE DOHE 

एक सौ अट्ठाईस

लाली मेरे लाल की, जित देखूं तित लाल |
लाली देखन मै गई, मै भी हो गयी लाल। ||

[ शब्द का अर्थ :-लाली–रंगा हुआ , लाल–प्रभु , जित–जिधर, देखन–देखना ]

भावार्थ-  कबीरदास यहां अपने ईश्वर के ज्ञान प्रकाश का जिक्र करते हैं। वह कहते हैं कि यह सारी भक्ति यह सारा संसार, यह सारा ज्ञान मेरे ईश्वर का ही है | मेरे लाल का ही है जिसकी मैं पूजा करता हूं और जिधर भी देखता हूं उधर मेरे प्रभु ही प्रभु ही नजर आते हैं |

एक छोटे से कण में भी, एक चींटी में भी, एक सूक्ष्म से सूक्ष्म जीवों में भी मेरे लाल का ही वास है। उस ज्ञान, उस प्राण, उस जीव को देखने पर मुझे इश्वर ही इश्वर के दर्शन होते है और नजर आते हैं | स्वयं मुझमें भी मेरे प्रभु का वास नजर आता है |

अर्थात सृष्टि के कण कण में इश्वर का वास है |



 

एक सौ उनतीस

काबा फिरी कासी भया, रामहीं भया रहीम |
मोट चून मैदा भया, बैठि कबीरा जीम ||

[ शब्द का अर्थ :-काबा-मुसलमानों का तीर्थस्थल, कासी-(काशी) हिन्दुओंका तीर्थस्थल,  मोट चून-मोटा आटा, बैठि-बैठकर,  जीम-भोजन करना ]

भावार्थ-  इश्वर एक ही है तथा अलग-अलग धर्मों में उसके नाम भिन्न है और उसकी उपासना करने के तरीके अलग-अलग है | हिन्दू लोगों का पवित्र स्थल काशी है और मुसलमानों का काबा |  कबीर कहते है इश्वर एक ही है इसलिए राम ही रहीम है और रहीम ही राम है |

जिस प्रकार से गेहूं को पीसकर मोटा आटा बनता है, मोटे आटे को पीसकर मैदा बनता है और दोनोंका भोजन किया जा सकता है | उसी प्रकार से मनुष्य एक इश्वर की ही संतान है भले ही उनके नाम अलग-अलग क्यों ना हो |

अर्थात जब मनुष्य को सच्चा ज्ञान प्राप्त होता है तब उसे काबा-काशी, राम-रहीम एक ही लगने लगते है | वह सबको एक ही भाव से देखता है |   



KABIR KE DOHE 

एक सौ तीस

श्रम ही ते सब होत है, जो मन राखे धीर |
श्रम ते खोदत कूप ज्यों, थल में प्रगटै नीर ||

[ शब्द का अर्थ :- कूप-कुंआ, थल-जमीन, नीर-पाणी, जल ]

भावार्थ- जीवन में मेहनत से मुश्किल कामों को भी किया जा सकता है, मनुष्यों को बस धेर्यपूर्वक अपने काम में लगे रहना चाहिए | मेहनत ही है जो उसे सफलता का मार्ग दिखला सकती है | जैसे मेहनत से, धेर्य से कुआं खोदने पर कठोरे धरती से भी कोमल शीतल जल निकल आता है |

अर्थात जो मनुष्य अपने जीवन में मेहनत करता है वह यश पाता है |



 

एक सौ इकतीस

झिरमिर- झिरमिर बरसिया, पाहन ऊपर मेंह |
माटी गलि सैजल भई, पांहन बोही तेह ||

[ शब्द का अर्थ :-पाहन-पत्थर, माटी-मट्टी, मेंह-मेघ ]

भावार्थ- अचानक से आसमान में बादल जमा हो गए और रिमझिम-रिमझिम बरसात होने लगी | इस रिमझिम बरसात में पत्थर और मीट्टी दोनों भीग गए | इस बरसात से मिट्टी तो भीग कर सजल हो गई किन्तु पत्थर वैसा का वैसा बना रहा | पत्थर के कठोरता में कुछ भी फर्क नहीं हुआ |

अर्थात कोमल ह्रदय का मनुष्य ही प्रेम को, इश्वर को महसूस कर सकता है | कठोर ह्रदय मनुष्य पर कितनी भी प्रेम की वर्षा हो जाये उसे कुछ महसूस नहीं होता |



 

एक सौ बत्तीस

जो तोकू कांता बुवाई, ताहि बोय तू फूल | 
तोकू फूल के फूल है, बाको है तिरशूल ||

[ शब्द का अर्थ – कांता–काँटा , बुवाई–बोना , ताहि–उसको, बाको–उसको ]

भावार्थ-  कबीरदास जी  का मानना है कि जो जैसा करता है , उसको वैसा ही फल मिलता है  अगर कोई अच्छा कर्म करता है तो उसे अच्छा ही प्राप्त होता है और बुरा कर्म करने वाले को बुरा ही प्राप्त होता है।

कबीरदास कहते हैं आप संतो की भांति व्यवहार करें , जिस प्रकार संत बुरा किए जाने पर भी सदैव हंसकर मुस्कुरा कर बात करते हैं। इसलिए संत का कभी अमंगल नहीं होता , वही कुत्सित बुद्धि वाले का कभी मंगल नहीं होता।



KABIR KE DOHE 

एक सौ तैंतीस

मान, महातम, प्रेम रस, गरवा तण गुण नेह  |
ए सबही अहला गया, जबहीं कह्या कुछ देह ||

[ शब्द का अर्थ :- गरवा-गौरव, नेह-स्नेह, अहला गया-बह गया ]

भावार्थ-  इस संसार में जब लेने की बारी आती है तो लोग खुशीसे स्वीकारते है पर जब उनसे कुछ देने को कहां जाता है तो उनके सामने मानो संकट खड़ा हो जाता है | इस संसार में मान, महत्त्व, प्रेम रस, गौरव, गुण तथा स्नेह सब बाढ़ में बह जाते हैं जब किसी मनुष्य से कुछ देने के लिए कहा जाता है |



 

एक सौ चौंतीस

जाता है सो जाण दे, तेरी दसा न जाइ |
खेवटिया की नांव ज्यूं, घने मिलेंगे आइ ||

[ शब्द का अर्थ :-दसा-दशा, स्थिती ]

भावार्थ- मनुष्यने अपने जीवन में इस बात से कभी भी परेशांन नहीं होना चाहिए, दुखी नहीं होना चाहिए के उसके जीवन में से कोइ चला गया | जो जाता है उसे जाने दो, तुम अपनी स्थिति को, दशा को न जाने दो | केवट की नाव में जैसे अनेक यात्री कुछ देर के लिए सफ़र करते है और फिर बिछड़ जाते है वैसे ही जीवन में अनेक व्यक्ति आकर तुमसे मिलेंगे | इसीलिए तुम किसी के जाने पर शोक नहीं करना, दुखी नहीं होना |



KABIR KE DOHE

एक सौ पैंतीस

जिहि घट प्रेम न प्रीति रस, पुनि रसना नहीं नाम |
ते नर या संसार में , उपजी भए बेकाम ||

[ शब्द का अर्थ :-घट-मन, ह्रदय, रसना-जिह्वा, जबान, उपजी-उत्पन्न होना ]

भावार्थ- इस संसार में जिस मनुष्य के मन में, ह्रदय में उस परमपिता परमेश्वर के प्रती प्रेम ना हो और नाहीं प्रेम का रस हो | जिस मनुष्य अपने जिव्हा से, मुख से अपने जीवन में कभी भी इश्वर का नाम नही लिया हो, उसकी भक्ती नहीं को हो | कबीरजी कहते ऐसे मनुष्य का जीवन व्यर्थ है, ऐसा मनुष्य इस संसार में जनमकर भी कुछ काम का नही है, वह बेकाम है |

अर्थात प्रेम के बिना और इश्वर के भक्ती के बिना मनुष्य का जीवन व्यर्थ है | 



 

एक सौ छत्तीस

यह घर है प्रेम का, खाला का घर नाही |
शीश उतार भुई धरों, फिर पैठो घर माहि ||

[ शब्द का अर्थ:- खाला–मौसी, शीश–सिर, भुई–भूमि, पैठो–जाओ ]

भावार्थ- कबीरदास कहते हैं की भक्ति प्रेम का मार्ग है, प्रेम का घर है | भक्ति प्रेम से होती है और ईश्वर की प्राप्ति के लिए प्रेम अति आवश्यक है | यह कोई रिश्तेदार का घर नहीं है कि आप आए और आपको भक्ति और प्रेम मिल जाए | इसके लिए कठिन तपस्या और साधना की आवश्यकता होती है | इसके लिए सिर झुकाना पड़ता है अर्थात सांसारिक मोह माया को त्यागना पड़ता है और सबको प्रेम भाव से अपनाना पड़ता है | इस प्रेम से ही ईश्वर की प्राप्ति हो सकती है।



 

एक सौ सैंतीस

नैना अंतर आव तू, ज्यूं हौं नैन झंपेउ |
ना हौं देखूं और को, न तुझ देखन देऊँ ||

[ शब्द का अर्थ :-नैना-आँखें, झंपेउ-बंद करना ]

भावार्थ-  कबीरजी कहते है, हे परम पीता परमेश्वर, हे तिनो लोक के स्वामी तुम्हारे भक्ती में, तुम्हारे प्रेम मे, मैं पुरी तरह से डूब चूका हूँ | अब तुम्हारे बिन एक पल भी रहना मुश्कील है | तुम मेरे इन दो नेत्रों के मार्ग से मेरे भीतर, मेरे ह्रदय के अन्दर आ जाओ और फिर में अपने इन आँखों को बंद कर लूँगा | ऐसा करने से न तो मैं किसी और को देख पाऊँगा और नहीं किसी और को तुम्हे देखने दूंगा |



KABIR KE DOHE 

एक सौ अड़तीस

कबीर रेख सिन्दूर की, काजल दिया न जाई |
नैनूं रमैया रमि रहा, दूजा कहाँ समाई ||

[ शब्द का अर्थ :-नैनूं-आँख, दूजा-दूसरा, समाई-समाना, निवास करना ] 

भावार्थ-  विवाहित स्त्री अपने मांग में (बालों में) सिंदूर भरती है | औरतें काजल आँख में लगाती है | जहाँ सिंदूर भरा जाता है वहापर काजल लगाया नहीं जा सकता और जहाँ आखों में काजल लगाया जाता है वहां सिंदूर लगाया नहीं जा सकता | उनकी जगह बदली नहीं जा सकती | उसी प्रकार से जब भक्त के नेत्रों में तीनो लोक के स्वामी स्वयम श्री राम समाये हो तो उन नेत्रों में कोइ और कैसे समां सकता है | यह असंभव है |



 

एक सौ उनतालीस

सातों सबद जू बाजते, घरि घरि होते राग |
ते मंदिर खाली परे, बैसन लागे काग ||

[ शब्द का अर्थ :-सबद-शब्द , काग-कव्वा ]

भावार्थ- जिन घरों में, महलों में कभी सप्तसुर गूंजते थे, बड़े-बड़े गवय्ये अपने मधुर सुर बरसाते थे | जहाँ हर घड़ी आनंद का, उत्सव का माहोल रहता था | ऐसे धनवानो के महल समय के साथ-साथ बुरे वक्त के चलते रित्क्त पड़े है, खाली पड़े है | जहाँ कभी सप्तसुरों से माहोल सजता था, आज वहा कव्वे निवास करने लगे है और अपने कर्कश आवाज में गा रहे है |

अर्थात संसार मे कुछ भी स्थायीरूप में नहीं होता है, पल पल में सब कुछ बदलता रहता है | जहां पहले खुशियाँ थी वहां गम छा जाता है जहां सुख था वहां दुःख डेरा डाल सकता है, यही संसार का नियम है | 



KABIR KE DOHE 

एक सौ चालीस

कबीर मंदिर लाख का, जडियां हीरे लालि |
दिवस चारि का पेषणा, बिनस जाएगा कालि ||

[ शब्द का अर्थ :-चारि-चार, बिनस जाएगा-टूट जाएगा, कालि-कल ]

भावार्थ-  इस संसार में मानव सबसे ज्यादा अपने देहसे (शरीर) प्यार करता है |हर कष्ट से इसे बचाने की कोशिश करता है | जतन करके मेहनत करके शरीर को सजाता हैं, वह भूल जाता है की यह शरीर लाख का बना  मंदिर है जिसमें हीरे और लाल जड़े हुए हैं | यह चार दिन का खिलौना है कभी भी नष्ट हो सकता है और हम जान भी नहीं पाएंगे |

अर्थात यह देह नश्वर है, क्षणभंगुर है, इसे कितना भी प्यार करो एक दीन इसका अंत हो जायेगा |



 

एक सौ इकतालीस

तेरा संगी कोई नहीं, सब स्वारथ बंधी लोइ |
मन परतीति न उपजै, जीव बेसास न होइ ||

[ शब्द का अर्थ :- संगी -साथी, स्वारथ-स्वार्थ, बेसास-विशवास, उपजै-उत्पन्न होना ]

भावार्थ- इस संसार में मनुष्य अपने परिवार में, दोस्तों में इस तरह से रमा रहता है की वो सच जान ही नहीं पाता है की यह रिश्ते-नाते है सब स्वार्थ में बंधे होते है | इस संसार में कोइ किसीका संगी-साथी नहीं है | जब तक मनुष्य में मन में इस बात के प्रती एहसास उत्पन्न नहीं होता तब तक उसका आत्मा के प्रती विश्वास जागृत नही होता | और जब आत्मा के प्रती मनुष्य का विश्वास जागृत होता है तब वह अपने भीतर झांकता है |

अर्थात जब मनुष्य को जीवन के वास्तविकता का ज्ञान होता है तब उसकी अध्यात्मिक उन्नती शुरू होती है |



 

एक सौ बयालीस

झूठे को झूठा मिले, दूंणा बंधे सनेह |
झूठे को साँचा मिले, तब ही टूटे नेह ||

[ शब्द का अर्थ :- साँचा-सच्चा, सनेह-स्नेह, प्रीती, दूंणा-दुगना ]

भावार्थ- जब एक झूठे बोलने वाले व्यक्ती को, झूठ बोलने वाले व्यक्ती से ही मित्रता होती है तो दोनों का एक दुसरे के प्रती स्नेह, प्रेम दीनोदीन बढ़ता ही जाता है | क्योंकी दोनों की प्रवृती, विचार समान होते है | पर जैसे ही एक झूठ बोलने वाले मनुष्य की, एक सच्चे बोलने वाले व्यक्ती से मित्रता होती है, यह मित्रता ज्यादा समय तक नहीं चल पाती और उनका स्नेह टूट जाता है |

अर्थात विपरीत प्रवृत्ति वाले व्यक्ती एक दुसरे के साथ ज्यादा दीन तक नहीं रह सकते |



KABIR KE DOHE 

एक सौ तैंतालीस

कबीर चन्दन के निडै, नींव भी चन्दन होइ |
बूडा बंस बड़ाइता, यों जिनी बूड़े कोइ  ||

[ शब्द का अर्थ :- निडै-करीब, बड़ाइता-बढ़ाई करना ]

भावार्थ- जिन्दगी में अच्छे लोगों के साथ रहनेसे उनके कुछ अच्छे गुण भी हम ग्रहण कर लेते है | जिस प्रकार से चन्दन के सुवासीक वृक्ष के पास अगर कडवे नीम का पेड़ भी हो तो वह चन्दन का कुछ सुवास तो ले ही लेता है, चन्दन के स्वाभाव के कुछ गुण तो ग्रहण ही कर लेता है | पर बांस का पेड़ जो अपनी ऊँचाई के कारण अहंकार में डूबा हुआ रहता है, अपने बड़प्पन के कारण डूब जाता है | इस तरह तो किसी को भी नहीं डूबना चाहिए |

अर्थात मनुष्य को अपने जीवन में अच्छे संगति के द्वारा, अच्छे गुणों का ग्रहण करना चाहिए | अपने गर्व में ही नही  रहना चाहिए, इससे मनुष्य अधोगती को प्राप्त होती है |



 

एक सौ चौवालीस

मूरख संग न कीजिए ,लोहा जल न तिराई |
कदली सीप भावनग मुख, एक बूँद तिहूँ भाई ||

[ शब्द का अर्थ :-मूरख-मुर्ख, संग-सोबत, तिराई-तैरना ] 

भावार्थ-  मनुष्य के जीवन में संगती का परिणाम जरूर होता है | अच्छे संगती का अच्छा और बुरे संगती का बुरा परिणाम देखने को मिलता है | कबीरदास कहते है मूर्ख का साथ मत करो, मूर्ख लोहे के सामान होता है जो जल में तैर नहीं पाता डूब जाता है | मुर्ख आदमी से दोस्ती करके मनुष्य को पछतावा ही करना पड़ता है |

जीवन में अच्छे संगति का प्रभाव इतना पड़ता है कि आकाश से एक बूँद केले के पत्ते पर गिर कर कपूर, सीप के अन्दर गिर कर मोती और सांप के मुख में पड़कर विष बन जाती है |

अर्थात जीवन में सद्गुणी मनुष्य से दोस्ती हमेशा हितकारक होती है |



KABIR KE DOHE

एक सौ पैंतालीस

मन मरया ममता मुई, जहं गई सब छूटी |
जोगी था सो रमि गया, आसणि रही बिभूति ||

[ शब्द का अर्थ :- मरया-मर गया, मुई-समाप्त होना, जोगी-साधू ]

भावार्थ- इस संसार में हमेशा उसकी ही जय होती है, उसका ही नाम रह जाता है, जिस मनुष्य ने अपने  मन को मार डाला हो, सारी मोह, माया, ममता जिसने त्याग दी हो और अपने अहंकार को समाप्त कर दिया हो |ऐसा योगी मनुष्य जिसने अपने जीवन भर में प्रभु की भक्ती की हो और लोक कल्याण का कार्य किया हो | कबीरदास कहते है ऐसा जो योगी था वह तो यहाँ से चला गया अब आसन पर उसकी भस्म – विभूति पड़ी रह गई अर्थात संसार में केवल उसका यश रह गया, उसने कीए हुए कामोंकी किर्ती रह गयी |

अर्थात मनुष्य इस संसार से चला जाता है और पीछे रह जाते है उसने किये हुए कर्म  |



 

एक सौ छियालीस

जल में कुम्भ कुम्भ में जल है, बाहर भीतर पानी |
फूटा कुम्भ जल जलहि समाना, यह तथ कह्यौ गयानी ||

[ शब्द का अर्थ :- कुम्भ-घड़ा, मटका, जल-पाणी, गयानी-ज्ञानी, तथ-तथ्य, सत्य, समाना-एकत्रित होना ]

भावार्थ- जब कुएं का या नदी का पाणी घड़े में भरा जाता है, तब घड़े के अन्दर पाणी जमा हो जाता है | मतलब अब घड़े के अन्दर भी पाणी है और बाहर भी पाणी है जहांसे इस जल को भरा गया | अगर पाणी भरते वक्त घड़ा फूट जाता है तो घड़े के अन्दर का पाणी, बाहर के पाणी में समां जाता है और दोने फिरसे एकरूप हो जाते है, इनमे कोइ अलगाव नहीं रहता, जिस तरहसे मनुष्य की आत्मा और परमात्मा एक है  | 

ज्ञानी जन इस तथ्य को कह गए हैं की आत्मा-परमात्मा दो नहीं एक हैं | आत्मा परमात्मा में और परमात्मा आत्मा में विराजमान है | जब मनुष्य देह त्यागता है तो उसकी आत्मा परमात्मा में विलीन हो जाती है, समा जाती है |



 

एक सौ सैंतालीस

पढ़े गुनै सीखै सुनै, मिटी न संसै सूल |
कहै कबीर कासों कहूं, ये ही दुःख का मूल ||

[ शब्द का अर्थ :-संसै-संशय, सूल-कांटा, कासों कहूं-किससे कहूं ]

भावार्थ- ज्ञानी बनने की चाह में, मन में उभरे सवालों के जवाब ढूंढने की चाह में आदमी बहुत सारी पुस्तके पढता है, गुनता है, सीखता है और सुनता है | फिर भी उसके मन में गड़ा संशय का काँटा नीकलता नहीं है, उसे अपने सवालों के जवाब मिलते नहीं है |

कबीरदास कहते है, कि किसे समझा कर यह कहूं कि यही तो सब दुखों की जड़ है | ऐसे किताबे पढने से,पठन मनन करने से क्या लाभ जो मन का संशय न मिटा सके और नहीं सवालों के जवाब मिल संके |    



 

एक सौ अड़तालीस

कबीर सोई पीर है, जो जाने पर पीर |
जो पर पीर न जानई, सो काफिर बेपीर ||

[ शब्द का अर्थ :-पीर-अच्छा मनुष्य, पर पीर-दूसरों की पीड़ा, काफिर बेपीर-दुष्ट और जालिम ]

भावार्थ-  कबीरदास कहते है, वही मनुष्य अच्छा मनुष्य है, सच्चा मनुष्य है, संत है जो दूसरों के पीड़ा को, दुःख को, दर्द को अपना जानकर समझता है, उसे महसूस करता है और उनके दुखों में शामिल होता है | और जो मनुष्य दूसरे के दुःख, दर्द, पीड़ा को नहीं जानता है, समझता है वह बेदर्द हैं, निष्ठुर हैं और काफिर हैं |

अर्थात जो दूसरोंकी पीड़ा को जानता है, समझता है वही सच्चा मनुष्य, सच्चा संत होता है |



 

एक सौ उनचास

मन मैला तन ऊजला, बगुला कपटी अंग |
तासों तो कौआ भला, तन मन एकही रंग ||

[ शब्द का अर्थ :-मैला-गन्दा, तन-शरीर, तासों तो-उससे तो, भला-अच्छा ]

भावार्थ- अगर कोइ मनुष्य तन से उजला है, उसने अच्छे वस्त्र पहन के रखे है और वह बहुत अच्छी बातें करता है पर अगर उसका मन कपट से, दृष्टता से भरा है तो उसके अच्छे रहेन सेहन का क्या फायदा | जिस तरह से बगुला तन से उजला होता है पर उसका मन कपट से भरा, मैला होता है तो उसके उजला होने से क्या फायदा ? उससे अच्छा तो कव्वा होता है जिसका तन मन एक जैसा होता है और वह किसी को छलता भी नहीं है | 

अर्थात उज्वल मन मनुष्य मात्र का सच्चा आभूषण है |



KABIR KE DOHE 

एक सौ पचास

देह धरे का दंड है, सब काहू को होय |
ज्ञानी भुगते ज्ञान से, अज्ञानी भुगते रोय ||

[ शब्द का अर्थ :-दंड-सज़ा, धरे का-धारण करने का ]

भावार्थ- जब इस संसार में मनुष्य देह धारण करता है तो उसे सुख और दुःख दोनों का सामना करना पड़ता है | आमिर-गरीब, बलवान-दुर्बल या ज्ञानी-अज्ञानी सबको जीवन में सुख-दुःख का सामना करना पड़ता है | अंतर इतना ही है कि ज्ञानी, समझदार व्यक्ति इस भोग को, दुःख को समझदारी से, धैर्य से भोगता है और जीवन में संतुष्ट रहता है | जबकि अज्ञानी व्यक्ती रोते हुए, दुखी मन से सब कुछ झेलता है और अपना जीवन पीड़ा में व्यतीत करता है |

अर्थात मनुष्य को जीवन के दुखोंका धैर्य से सामना करना चाहिए |



 

एक सौ इक्यावन

हीरा परखै जौहरी, शब्दहि परखै साध |
कबीर परखै साध को, ताका मता अगाध ||

[ शब्द का अर्थ :-परखै-जाँचना, साध-साधू, अगाध-गहन ]

भावार्थ-  इस संसार में अनमोल रत्नों की और हिरोंकी परख जौहरी जानता है, शब्द के सार और असार को परखने वाला विवेकी साधु–सज्जन होता है | इन लोगों के निर्णय से हर कोइ सहमत होता है क्योंकी यह पने कार्य में प्रवीण होते है | 

कबीर कहते हैं कि इन सबसे बड़ा विशेषज्ञ होता है वह साधु, योगी जो असाधु को, दुर्जन को  परख लेता है, उसका मत सबसे अधिक गहन गंभीर है |



 

एक सौ बावन

कबीरा ते नर अँध है, गुरु को कहते और |
हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रूठे नहीं ठौर ||

[ शब्द का अर्थ:-नर-मनुष्य, हरि-इश्वर, रूठे-नाराज होना, ठौर-डोर ]

भावार्थ- कबीर दास जी कहते है की इस संसार में मनुष्य अध्यात्मिक दृष्टी से, प्रभु के भक्ती मार्ग को ढूंढने में  अच्छे गुरु के बिना असमर्थ होता है, अंध होता है | कभी कभी वह सच्चाई के मार्गसे भटक जाता है तो गुरु ही उसे सही मार्ग बताता है |

जब किसी कारण इश्वर आपसे नाराज हो जाते है, संकट आपपे मंडराने लगते है तो गुरु एक डोर हैं जो ईश्वर से आपको मिला देती हैं, आपके सारे कष्ट दूर कर देते है | लेकिन अगर गुरु ही आपसे नाराज हो जाए तो इस संसार में ऐसी कोई डोर नही, ऐसा कोइ मार्गदर्शक नहीं होता जो आपको सहारा दे |



 

एक सौ तिरेपन

बैद मुआ रोगी मुआ, मुआ सकल संसार |
एक कबीरा ना मुआ, जेहि के राम आधार ||

[ शब्द का अर्थ :-बैद–वैद्य, चिकित्सक, मुआ–मर जाना, मृत्यु,  सकल–सभी, आधार–सहारा ]

भावार्थ- कबीर दासजी कहते है, वैद्य मर जाता है, रोगी मर जाता है और यह संसार भी एक दिन खत्म हो जाता है | किंतु जो भक्ति के मार्ग पर निकल जाता है, वह कभी समाप्त नहीं होता | जो श्रारीम के संरक्षण में चले जाते हैं, उसका कभी कोई अमंगल नहीं होता | संकट में भी राम की स्नेह रूपी डोर अपने भक्तों से बंधी रहती है |  ऐसे दयावान राम का आधार पाकर कोई भी अमंगल कैसे हो सकता है |

अर्थात भगवान का भक्त सदा सुखी रहता है |



 

एक सौ चौवन

कबीर कहा गरबियौ, ऊंचे देखि अवास |
काल्हि परयूँ भ्वै लौटणा, ऊपरि जामे घास ||

[ शब्द का अर्थ :-गरबियौ-गर्व, आवास-भवन, काल्हि-कल, भ्वै-पृथ्वी, लौटणा-गिरना ]

भावार्थ-  हे मनुष्य ऊँचे ऊँचे भवनों को देखकर गर्व करने से क्या लाभ, यह गर्व निरर्थक है क्यों की समय के साथ यह भवन पुराने हो जायेगे और धरती पर गिर पड़ेंगे, सुनसान हो जायेंगे और इनपर घास उग आयेगी | 

अर्थात सम्पूर्ण वैभव यह नाशवान है | इसलिए मनुष्य ने गर्व छोड़कर सत्कर्म करने चाहिए, इश्वर की आराधना करनी चाहिए उसमेही भलाई है |



KABIR KE DOHE

एक सौ पचपन

राम रसायन प्रेम रस, पीवत अधिक रसाल |
कबीर पिवन दुर्लभ है, मांगे शीश कलाल ||

[ शब्द का अर्थ:– राम–भगवान, रसायन–अभिक्रिया से उत्त्पन्न वैज्ञानिक रस, रसाल–रसीला, दुर्लभ–जो सरल न हो, कलाल–कटा हुआ ]

भावार्थ- कबीर कहते हैं राम नाम का जो रस है जो रसायन है | वह दुर्लभ है वह सभी को नहीं मिलता है |  राम नाम का रस तो उसी को मिलता है जो राम की खोज करता है| इसके लिए अपने शीश को कटवाना पड़ता है | मगर राम नाम का रस जिसको भी मिलता है उसे किसी और चीज़ की आवश्यकता नहीं होती है।

इसी बात को कबीर फिर कहते हैं कि राम नाम का रस दुर्लभ है जो कबीर को भी नहीं मिल पाया | पिने वाले इस रस को रसीला मानते है, इस में मिठास है |



 

एक सौ छप्पन

कबीर सतगुर ना मिल्या, रही अधूरी सीख | 
स्वांग जाति का पहरी कर, घरी घरी मांगे भीख || 

[ शब्द का अर्थ :–सतगुरु–सच से परिचय करवाने वाला, स्वांग– कुत्ता, पहरी–पहरेदारी, घरी–घर ]

भावार्थ- प्रस्तुत पंक्ति में गुरु के महत्व को स्वीकार किया गया है | बिना गुरु के सच्चा ज्ञान नहीं मिल सकता , उसके बिना मिला हुआ ज्ञान अधूरा ही होता है | वह व्यक्ति कभी भी पूर्ण रूप को नहीं जान पाता, अर्थात पूर्ण सत्य को कभी भी नहीं जान पाता |

जिस प्रकार कुत्ता दर-बदर भोजन के लिए भटकता रहता है | ठीक इसी प्रकार अधूरा ज्ञान प्राप्त किया हुआ व्यक्ति भटकता फिरता है | किंतु उसे पूर्ण ज्ञान की कही प्राप्ति नहीं होती |



 

एक सौ सत्तावन

कबीरा गरब ना कीजिये, कभू ना हासिये कोय |
अजहू नाव समुद्र में, ना जाने का होए। || 

[ शब्द का अर्थ :–गरब–गर्व, कभू–कभी, हासिये–हँसिये, कोय–कोई, अजहू–अभी ]

भावार्थ- कबीरदास का स्पष्ट मानना है कि किसी भी व्यक्ति पर हंसना नहीं चाहिए | उस व्यक्ति का उपहास नहीं करना चाहिए तथा कमियों पर कभी भी मुस्कुराना और सार्वजनिक नहीं करना चाहिए | आप किसी का हित कर सकते हैं तो अवश्य करें। किंतु कभी भी हंसने से बचना चाहिए |

समय का फेर है नाव कब समुद्र में डूब जाए, यह कोई नहीं जानता | ठीक इसी प्रकार जीवन में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं | आज आपका दिन ठीक है, कल कैसा रहेगा यह तो कोई नहीं जानता | इसलिए दूसरे पर हंसी उड़ाने से पहले अपने भविष्य को भी जानना चाहिए | कल आपके साथ कैसी घटना घट जाए या स्वयं आप भी नहीं जान  पाते |



 

एक सौ अट्ठावन

सुख सागर का शील है, कोई न पावे थाह |
शब्द बिना साधू नहीं, द्रव्य बिना नहीं शाह || 

[ शब्द का अर्थ :– शील–स्वभाव, थाह–भेद, द्रव्य–पूंजी, शाह–राजा ]

भावार्थ- कबीर दास का मानना है कि सागर का शांत स्वभाव ही ठीक है, शांत रहते हुए भी कोई इसकी था नहीं ले पाता | साधु के शब्द ही उसे महान बनाते हैं, उसके स्वभाव में कभी उग्रता नहीं देखी जाती | जिस प्रकार सागर शांत रहता है इसीलिए वह विशाल है | ठीक इसी प्रकार बिना पूंजी के अर्थात धन के कोई राजा नहीं बन सकता। यह धन उसके गुण उसके शील स्वभाव ही होते हैं |



 

एक सौ उनसठ

गुरु को सर रखिये, चलिए आज्ञा माहि |
कहै कबीर ता दास को, तीन लोक भय नाही ||

[ शब्द का अर्थ :– सर–शीश, माहि–अनुसार, तीन लोक-त्रिलोक ]

भावार्थ- कबीर दास गुरु का विशेष महत्व देते हैं | उनका मानना है कि जो गुरु के बताए हुए मार्ग पर चलता है , वह कभी भी भटकता नहीं है | वह कभी गलत राह को नहीं अपनाता | तीनो लोक में वह निर्भीक हो जाता है, क्योंकि गुरु कभी गलत रास्ता नहीं बताता |



KABIR KE DOHE 

एक सौ साठ

कबीरा लोहा एक है, गढ़ने में है फेर |
ताहि का बख्तर बने, ताहि की शमशेर ||

[ शब्द का अर्थ :– गढ़ने–बनना, आकार देना, बख्तर–रक्षा ढाल, शमशेर–तलवार ]

भावार्थ- कबीर दास ने लोहे का सहारा लेते हुए व्यक्ति के चरित्र निर्माण पर दृष्टिपात किया है। उन्होंने बताया है लोहा एक ही प्रकार का होता है | उसी लोहे से रक्षा करने वाली ढाल अर्थात बख्तर का निर्माण किया जाता है | वहीं दूसरी ओर जीवन हरने वाली तलवार भी बनाई जाती है | दोनों का अपना महत्व है इसके बनाने वाले पर निर्भर करता है कि वह क्या बनाना चाहता है |

ठीक इसी प्रकार व्यक्ति का चरित्र निर्माण भी संभव है | शिक्षक जिस प्रकार अपने शिष्य को तैयार करेगा वह शिष्य भी उसी प्रकार तैयार होगा | कहने का आशय यह है कि व्यक्ति में जिस प्रकार के गुण डाले जाएंगे उसी प्रकार का गुण व्यक्ति में होगा |



 

एक सौ इकसठ

जाका गुरु भी अंधला, चेला खरा निरंध |
अंधै अंधा ठेलिया, दून्यूँ कूप पडंत ||

[ शब्द का अर्थ:- जाका-जिसका, अंधला-अँधा, चेला-शिष्य, कूप-कूआ, पडंत-पड़ते है, दून्यूँ-दोनों ]

भावार्थ- कबीरदास जी कहते है,  शिष्य को गुरु चयन के वक्त अंत्यंत सावधानी बरतनी चाहिये, गुरु अगर अज्ञानी मिल जाता है, मूढ़ मील जाता है तो ऐसे शिष्य की दुर्गती ही होती है | गुरु और शिष्य दोनों ही मुर्ख होगे तो वो सही मार्ग पर न चलकर कूए में जा गिरेंगे, अर्थात खुद संकट में फस जायेंगे | इसलिए जीवन में ज्ञानी गुरु का होना बहुत महत्वपूर्ण है |



 

एक सौ बासठ

यह तन जारौं मसि करो, लिखौ राम का नाऊँ |
लेखनी करौ करंक की, लिखी लिखी राम पठाऊँ ||

[ शब्द का अर्थ- तन-शरीर, जारौं-जलाकर, मसि-स्याही, नाऊँ-नाम, करंक-हड्डी, पठाऊँ-भेजूंगी ]

भावार्थ- परमात्मा के विरह में व्याकुल जीवात्मा कहती है मैं अपने शरीर को जलाकर उसकी स्याही बनाऊंगी और मैं इस अपने शरीर के हड्डियों की लेखनी बनाकर उस स्याही से राम का नाम लिखकर, अपने उस प्रियतम राम के पास बार बार भेजती रहूँगी | अर्थात जिससे मुझ विरहनी के विरह दशा और पिडा को वो समझ सकेंगे |



 

एक सौ तिरेसठ

सतगुरु की महिमा अनंत, अनंत किया उपकार |
लोचन अनंत उघारिया, अनंत दिखावण हार ||

[ शब्द का अर्थ:- सतगुरु–शिक्षक, अनंत–जिसका कोई अंत न हो, उपकार–कृपा करना, उद्धार करना, लोचन – आँख, उघारिया–खोलना, दिखावण–दिखाना ]

भावार्थ-  कबीरदास कहते हैं कि गुरु के माध्यम से ही हमें वह दिव्य चक्षु अथवा ज्ञान की प्राप्ति होती है जिससे हम निराकार और अब निर्गुण में रूप का दर्शन कर पाते हैं | सतगुरु ही वह माध्यम है जिसके माध्यम से हमारे आंखों पर पड़े पर्दे हट सकते हैं | गुरु ही उस आवरण को हटाता है जिसके कारण हम ज्ञान की प्राप्ति नहीं कर पाते | अर्थात निर्गुण निराकार के दर्शन नहीं कर पाते | सद्गुरु ही हमारे अंदर के चक्षु , आंखों को खोलते हैं उनके माध्यम से ही हमें अनंत, निराकार के दर्शन होते हैं |



 

एक सौ चौंसठ

जांमण मरण बिचारि, करि कूड़े काम निबारि |
जिनि पंथूं तुझ चालणा, सोई पंथ संवारि ||

[ शब्द का अर्थ :-जांमण-जन्म, मरण-मृत्यु, बिचारि-विचार करके, जिनि पंथूं-जिस पंथपर, चालणा-चलना ]

भावार्थ- इस संसार के मनुष्यों को इस बात का हमेशा स्मरण रखना चाहिए की जिसने इस धरती पर जन्म लिया है उसकी मृत्यु भी निश्चित है | जन्म-मरण के फेरे से अब तक कोइ भी बच नहीं पाया है भले ही वह महात्मा ही न क्यों हो | इस बात का ध्यान रखते हुए मनुष्य को बुरे कर्मों को छोड़ देना चाहिए और सदमार्ग अपनाना चाहिए | 

जिस सदमार्ग पर मनुष्य को चलना है उस मार्ग का स्मरण करके, उसे याद रखके, उस मार्ग को सवार के सुन्दर बनाना चाहिए |



KABIR KE DOHE

एक सौ पैंसठ

तीरथ गए से एक फल, संत मिले फल चार |
सतगुरु मिले अनेक फल, कहे कबीर विचार ||

[ शब्द का अर्थ :-तीरथ-तीर्थ क्षेत्र, फल-लाभ ,प्रसाद, प्राप्ती, सतगुरु-सद्गुरु ]

भावार्थ- कबीरदास जी कहते है, जब मनुष्य पवित्र तीर्थ क्षेत्रों पर जाकर भगवान के दर्शन करता है तब उसे  एक फल की प्राप्ती होती है | जब उसे संतो की संगति मिलती है, उनकी सेवा करने का, उनसे ज्ञान प्राप्त करने का अवसर मिलता है तो वह चार फल के प्राप्ती के बराबर होता है | अगर मनुष्य को संतो के संत, सद्गुरु से ज्ञान मिलता है, उनका कृपा प्रसाद मिलता है तो ऐसे संगतीसे उसे अनेको फलों की प्राप्ती होती है |  



 

एक सौ छियासठ

प्रेम पियाला जो पिए, सिस दक्षिणा देय |
लोभी शीश न दे सके, नाम प्रेम का लेय ||

[ शब्द का अर्थ :-पियाला-प्याला, सिस-शीर ]

भावार्थ-  इस संसार में जिस मनुष्य को भी प्रभु की भक्ती करनी है, प्रभू के प्रेम का रस पीना है उसे अपना शीश प्रभु को अर्पण करना होता है अर्थात अपने काम, क्रोध, भय, इच्छा, मोह, अहंकार को त्यागना होता है |

जो लालची इन्सान होता है वह प्रभु का प्रेम, कृपा प्रसाद तो पाना चाहता है पर अपने काम, क्रोध, लोभ, अहंकार और मस्तर को त्यागना नहीं चाहता है | सारे भोगों को भोगते हुए वह प्रभु का प्रेम उसकी कृपा चाहता है | 



 

एक सौ सड़सठ

राम बुलावा भेजिया, दिया कबीरा रोय |
जो सुख साधू संग में, सो बैकुंठ न होय ||

[ शब्द का अर्थ :-राम-प्रभु / इश्वर,  संग-साथी / सोबती ] 

भावार्थ- कबीरदास जी कहते है, मैंने अपना जीवन साधू-संतो के संग स्वर्गीय आनंद में बिताया है | जब मुझे मेरे जीवन के अंतिम समय में उस परमपिता परमेश्वर का बुलावा आया तो मैं दुःख से रो दीया | मैं इसलिए नहीं रोया के में मौत से डर गया | इसका कारण था साधू-संतो के संग मैंने जो ज्ञान पाया, जो अति आंनद पाया उतना आनंद तो साक्षात् प्रभु के वैकुण्ठ (स्वर्ग)में भी नहीं होगा |



 

एक सौ अड़सठ

ज्ञान रतन का जतन कर, माटी का संसार |
हाय कबीरा फिर गया, फीका है संसार ||

[ शब्द का अर्थ :-माटी-मिट्टी, जतन कर-संभल के रख, संसार-दुनिया ] 

भावार्थ- कबीर दास जी कहते हैं कि यह संसार तो माटी का है, नश्वर है | यहा हर एक मनुष्य की मृत्यु निश्चित है | इस संसार में मृत्यु के बाद जीवन और जीवन के बाद मृत्यु इस फेरे में सारे जीवित प्राणी फसे हुए है | इसीलिए यहां जीते जी मनुष्य को हो सके उतना ज्ञान पाने की कोशिश करनी चाहिए नहीं तो मृत्यु के बाद जीवन और फिर जीवन के बाद मृत्यु यही क्रम चलता रहेगा |



 

एक सौ उनहत्तर

ज्यों नैनन में पुतली, त्यों मालिक घर माँहि |
मूरख लोग न जानिए, बाहर ढूँढत जाहिं ||

[ शब्द का अर्थ :-मूरख-मुर्ख, नैनन-आँख, मालिक-स्वामी / प्रभु, माँहि-मेरा ] 

भावार्थ- इस संसार में मनुष्य, इश्वर की तलाश में सारा जहाँ तलाश करता है, दर दर भटकता है, ठोकरे खाता है, पर उसे इश्वर मिलता नही |  जैसे हमारे आँख के अन्दर पुतली होती है, ठीक वैसे ही ईश्वर हमारे अंदर बसा होता  है | मूर्ख लोग इस बात को नहीं जान पाते और बाहर ही ईश्वर को तलाशते रहते हैं |



KABIR KE DOHE 

एक सौ सत्तर

कबीरा जब हम पैदा हुए, जग हँसे हम रोये |
ऐसी करनी कर चलो, हम हँसे जग रोये ||

[ शब्द का अर्थ :-करनी-कर्म ] 

भावार्थ-  कबीर दास जी कहते हैं कि जब हम इस संसार में जनम लेते है, तो हम रोते हुए इस संसार में पैदा होते है | पर हमारे आगमन से, घर परिवार वाले, रिश्तेदार सारे खुशियाँ मनाते है, आनंद से हसते है | संसार में आये है तो हमें जीते जी अपने जीवन में कुछ ऐसा कर्म, अच्छे काम करके जाना चाहिए के हमारे मरने के बाद यह दुनिया दुःख से रोये और हम हँसे।



 

एक सौ इकहत्तर

कबीर देवल ढहि पड्या, ईंट भई सेंवार |
करी चिजारा सौं प्रीतड़ी, ज्यूं ढहे न दूजी बार ||

[ शब्द का अर्थ :-सेंवार-शैवाल, ढहि पड्या-गिर गया/ नष्ट हो गया, दूजी बार-दुसरी बार, देवल-मंदिर, प्रीतड़ी-प्रेम ]

भावार्थ- प्रभु का मंदीर (देवालय) गिर पड़ा है और मंदिर के हर एक ईट पर, पत्थर पर शैवाल (काई) जम गई है | अर्थात कबीर जी यहाँ मनुष्य के शरीर को प्रभु ने बनाये हुए मंदीर की उपमा देते है और कहते है की शरीर रूपी मंदिर ढह गया और शरीर का अंग-अंग शैवाल में बदला गया मतलब नष्ट हो गया | कबीरजी मनुष्य को कहते है इस देवालय को बनाने वाले प्रभु से प्रेम करो जिससे यह देवालय दूसरी बार फिरसे  नष्ट न हो |



 

एक सौ बहत्तर

कबीर यह तनु जात है, सकै तो लेहू बहोरि |
नंगे हाथूं ते गए, जिनके लाख करोडि ||

[ शब्द का अर्थ :-तनु-देह, शरीर, नंगे हाथूं-खाली हाथ ]

भावार्थ- कबीरदास जी कहते हैं कि मानव शरीर नश्वर है, इसे एक न एक दीन नष्ट हों जाना है | इसलिए हे मनुष्य अब भी संभल जाओ और कुछ सत्कर्म कर लो जिससे तुम्हारा जीवन सार्थक हो जाए | इस संसार में अनेकों मनुष्योने लाखो, करोडो धन कमाया और धनवान बन गए जा| उनके पास लाखों करोड़ों की संपत्ति थी पर जब उनकी मृत्यु हो गयी तो वे खाली हाथ ही गए हैं |

इसलिए मनुष्य ने अपना जीवन सिर्फ धन संपत्ति जोड़ने में ही नही लगाना चाहिए | अच्छे कर्म कर्म करके अपने जीवन को सवारना चाहिए |



 

एक सौ तिहत्तर

मन जाणे सब बात, जांणत ही औगुन करै |
काहे की कुसलात, कर दीपक कूंवै पड़े ||

[ शब्द का अर्थ :-औगुन-अवगुण, कुसलात-कुशल, कर-हाथ ]

भावार्थ-  मनुष्य का मन अच्छा-बुरा, गुण-अवगुण इन् सब बातों को जानता हैं | इन सब बातों को जानते हुए भी वह अवगुणों के चक्कर में फस जाता है | अवगुणों को अपनाकर जीवन में संकटों का सामना करना पड़ेगा यह जानते हुए भी वह अवगुणों को त्यागता नही | यह ऐसे ही जैसे अंधेरेमे दीपक हाथ में होते हुए भी कुंए में गीर पड़ना | दीपक हाथ में होते हुए भी कुंए में गीर पड़ने वाले व्यक्ती का क्या कुशल और क्या अकुशल |



 

एक सौ चौहत्तर

हिरदा भीतर आरसी, मुख देखा नहीं जाई |
मुख तो तौ परि देखिए, जे मन की दुविधा जाई ||

[ शब्द का अर्थ :-हिरदा-ह्रदय, मन, दुविधा-संशय, आरसी-आयना ]

भावार्थ- मनुष्य अपने जीवन में जो कुछ अच्छे-बूरें कर्म करता है, यह उसके मन को, ह्रदय को, अंतरात्मा को मालूम होता है | ह्रदय ही उसके कर्मों का दर्पण होता है | परन्तु भोग, विलास, विषय-वासनाओके मलिनता के कारण मनुष्य को अपना वास्तवीक मुख (चेहरा), स्वरुप  दिखाई ही नहीं देता है |

मनुष्य को अपना वास्तविक स्वरूप, चेहरा, मुख अपने ह्रदय के भीतर तभी दिखाई देता है जब उसके मन का संशय मीट जाता है |  



KABIR KE DOHE

एक सौ पचहत्तर

हू तन तो सब बन भया, करम भए कुहांडि |
आप आप कूँ काटि है, कहै कबीर बिचारि ||

[ शब्द का अर्थ :-तन-देह, बन-जंगल, करम-कर्म, कुहांडि-कुल्हाड़ी, काटि-काटना ]

भावार्थ- हमारा यह शरीर हमारे अच्छे-बूरें कामोंसे जंगल की तरह भरा हूआ होता है | हमारे अच्छे-बूरें कर्म ही कुल्हाडी बनकर हमारे जंगल रूपी शरीर को काट रहे है | इस प्रकार हम खुद ही अपने आपको अपने कर्मो के माध्यम से काट रहे हैं, यह बात कबीर सोच विचार कर कहते हैं |



 

एक सौ छिहत्तर

जानि बूझि साँचहि तजै, करै झूठ सूं नेह |
ताकी संगति रामजी, सुपिनै ही जिनि देहु ||

[ शब्द का अर्थ :-जानि बूझि- जानबूझकर, साँचहि-सत्य, तजै-त्याजना, त्यागना, नेह-स्नेह, सुपिनै-सपना ]

भावार्थ- जो मनुष्य जानबूझ कर, सब समझते हुए भी सत्य का साथ, सत्य का मार्ग छोड़ देता है और असत्य का मार्ग अपनाकर झूठ से स्नेह कर लेता है | कबीरदास जी कहते है हे प्रभु, हे इश्वर ऐसे लोगों का साथ, संगती कृपा करके हमें सपने में भी नही देना |



 

एक सौ सतहत्तर

तरवर तास बिलम्बिए, बारह मांस फलंत |
सीतल छाया गहर फल, पंछी केलि करंत ||

[ शब्द का अर्थ :-तरवर-वृक्ष, मांस-महीना, फलंत-फल देता है, सीतल-शीतल, केलि-क्रीडा ]

भावार्थ- कबीरदास जी कहते हैं कि इन्सान ने हमेशा ऐसे वृक्ष के नीचे विश्राम करना चाहिए, जो बारहों महीने फल देता है, क्यों की बारहों महीने फल देने वाला वृक्ष हर समय मनुष्य की भूख मिटा सकता है | जिस वृक्ष की छाया शीतल हो, वह शीतल छाया देनेवाला वृक्ष मनुष्य को धुप से बचाता है | जिस वृक्ष के फल सघन हों और जहां पक्षी क्रीडा करते हों |



 

एक सौ अठहत्तर

काची काया मन अथिर, थिर थिर काम करंत |
ज्यूं ज्यूं नर निधड़क फिरै, त्यूं त्यूं काल हसन्त ||

[ शब्द का अर्थ:- काची-कच्चा, काया-शरीर, अथिर-चंचल, थिर-स्थीर, नर-पुरुष, निधड़क-निडर /बेधड़क, हसन्त-हस रहा ]

भावार्थ-  कबीरदास कहते है, यह शरीर कच्चा है, यह कभी भी नष्ट हो सकता है | यह मन चंचल है, अस्थिर है, यह कभी भी अवगुणों को ग्रहण कर सकता है | पर मनुष्य इस सबसे बेखबर संसार में रमकर, निडर होकर घूमता है और अपने भोग विलास मे मगन रहता है | 

इस दुनिया में मृत्यु पास है यह जानकर भी इंसान अनजान बना रहता है | उसकी इस बेपरवा वृती को देखकर काल (मृत्यु) उसपर हसता है | यह कितनी दुखभरी बात है |



 

एक सौ उनासी

या दुनिया दो रोज की, मत कर यासो हेत |
गुरु चरनन चित लाइये, जो पुराण सुख हेत ||

[ शब्द का अर्थ-दो रोज-दो दिन, यासो-इससे, चरनन-चरण, चित-मन, पुराण-पूर्ण ]

भावार्थ- कबीरदास जी कहते है, यह दुनिया नश्वर है और इस संसार की सारी चीजें, रिश्ते-नाते, भोग-विलास सारे दो दीन के चोचले है | अतः इस दो दिनकी उम्रवाली नश्वर दुनियासे मनुष्यने प्रभावित होकर मोह सम्बन्ध जोड़ने नहीं चाहिए |

इस संसार में पूर्ण सुख देनेवाली कोइ जगह है तो वह है सद्गुरु के चरण | मनुष्य को सद्गुरु के चरणों में अपना मन लगाना चाहिए, उनसे ज्ञान पाकर, सदमार्ग पे चलकर प्रभु की भक्ती करनी चाहिए, इसीमे पूर्ण सुख है |



KABIR KE DOHE 

एक सौ अस्सी

गाँठी होय सो हाथ कर, हाथ होय सो देह |
आगे हाट न बानिया, लेना होय सो लेह ||

[ शब्द का अर्थ:- हाट-बाजार, बानिया-व्यापारी ]

भावार्थ- इस संसार में मनुष्य ने जो भी धन संपती कमाई है, अपने तिजोरियोंमें गाँठ बांधके रखी हैं उसे उसने हाथ में लेना चाहिए और जो हाँथ में धन है उसे परोपकार में लगाना चाहिए | अच्छे काम में धन लगाकर परोपकार करके पुण्य कमाना चाहिए |

मनुष्य को जो भी अच्छे कर्म करने है, परोपकार करना है, यह कार्य उसे जीवित रहते ही करना होगा | मानव शरीर नष्ट होने के बाद मनुष्य पुण्य कर्म नहीं कर सकता क्यों की नर-शरीर के पश्चात् इतर खानियों में बाजार-व्यापारी कोई नहीं है | इसिलए जो भी पुण्य कमाना है, परोपकार करना है, जो लेना देना होगा वह मनुष्य को इससे    

जो गाँठ में बाँध रखा है, उसे हाथ में ला, और जो हाथ में हो उसे परोपकार में लगा। नर-शरीर के पश्चात् इतर खानियों में बाजार-व्यापारी कोई नहीं है, लेना हो सो यही ले-लो।



 

एक सौ इक्यासी

बहते को मत बहन दो, कर गहि एचहु ठौर |
कह्यो सुन्यो मानै नहीं, शब्द कहो दुइ और ||

[ शब्द का अर्थ:- कह्यो सुन्यो-कहा सुना, दुइ-दो ] 

भावार्थ- कबीरदास जी कहते है, अगर इस संसार में कोइ अवगुणों में फसकर, बुराइयों के मार्ग पर बहता चला जा रह हो तो आपका यह कर्तव्य है की उसे बुराई के नदी में मत बहने दो | हाथ पकड़ कर उसको मानवता की दृष्टिकोण से उस गंदगी से बाहर निकाल लो | यदि वह आपके लाख समझाने पर भी आपका कहा-सुना न माने, तो भी निर्णय के दो कठोर वचन और सुना दो पर उसे बुराइयोंमें मत बहने दो | 



 

एक सौ बयासी

बार-बार तोसों कहा, सुन रे मनुवा नीच |
बनजारे का बैल ज्यों, पैडा माही मीच ||

[ शब्द का अर्थ:- तोसों-तुझसे, मनुवा-मनुष्य,  बनजारे-व्यापारी/ सौदागर, नीच-दृष्ट ]

भावार्थ- हे दृष्ट मनुष्य, नीच मनुष्य मैं तुझे बार-बार कह रहां हूँ, तू अपने जीवन में अवगुनोसे, असत्य के मार्ग से दूर रह | भोग विलास, विषय-वासनाओमे रमकर अपने जीवन को बर्बाद मत कर | देह नश्वर है इसका कोइ भरोसा नही | जैसे किसी व्यापारी का बैल बीच मार्ग में ही मर जाता है | वैसे तू भी अचानक एक दिन मर जाएगा | वक्त रहते हे तू अपने आपको संभाल ले |



KABIR KE DOHE 

एक सौ तिरासी

बनिजारे के बैल ज्यों, भरमि फिर्यो चहुँदेश |
खाँड़ लादी भुस खात है, बिन सतगुरु उपदेश ||

[ शब्द का अर्थ:- बनिजारे-व्यापारी/सौदागर, चहुँदेश-चारों दिशा, खाँड़-शक्कर ]

भावार्थ- व्यापारी अपना माल ढोने के लिए बैलों का इस्तेमाल करते है | यह बैल व्यापारियों के साथ चोरों दिशाओंमे भ्रमण करते है | इन बैलों के पीठ पर व्यपारी शक्कर भी लाद देते है तो भी वह भूसा खाते हुयें चारों दिशाओंमे घूमते है | इसी प्रकार से अपने पास ज्ञान होते हुए भी मनुष्य, उचित, योग्य और सच्चे सद्गुरु के उपदेश के आभाव में, मार्गदर्शन के बिना ससार के भोग विलास में, विषय–प्रपंचो में उलझकर मनुष्य अपने आप नष्ट हो जाते है।



 

एक सौ चौरासी

जीवत कोय समुझै नहीं, मुवा न कह संदेश |
तन – मन से परिचय नहीं, ताको क्या उपदेश |

[ शब्द का अर्थ:- जीवत-जिन्दा, कोय-कोई, समुझै-समझता, मुवा-मरा हुआ, ताको क्या-उसको क्या ]

भावार्थ-  इस संसार में मनुष्य जब जीवीत होता है तब उसे अगर कोई यतार्थ ज्ञान की बात समझाता है, सदमार्ग पे चलने की बात समझाता है, तब वह उसे समझना नहीं चाहता और मर जाने पर इनको कौन उपदेश करने जाएगा | जिनको अपने तन-मन का होश नहीं है, सदमार्ग की पहचान नही, उनको क्या उपदेश किया जाये? उनको उपदेश करना व्यर्थ है |  



KABIR KE DOHE

एक सौ पचासी

कबीर तहां न जाइए, जहां जो कुल को हेत |
साधु गुन जाने नहीं, नाम बाप का लेत || 
 

[ शब्द का अर्थ:- तहां-वहां पर, गुन-गुण ]

भावार्थ-   कबीरदासजी कहते है, साधू, योगी, महनीय व्यक्तीयोने हो सके तो वहापर जाना टालना चाहिए जहाँ पर उनके पूर्व के कुल-कुटुम्ब का सम्बन्ध हो | क्योंकि वे लोग आपकी साधुता, कार्यों का महत्व को नहीं जानेंगे, उनके लिए तो आप केवल आपके पीता के पुत्र है | वह सिर्फ आपके शारीरिक पिता का नाम लेंगे ‘अमुक का लड़का आया है |      



 

एक सौ छियासी

कहते को कही जान दे, गुरु की सीख तू लेय |
साकट जन औश्वान को, फेरि जवाब न देय ||

[ शब्द का अर्थ – कही जान दे-बोलते जाने दे, सीख-शिक्षा, साकट-दृष्ट, औश्वान-कुत्ते ]

भावार्थ- इस जगत में ऐसे भी लोग होते है जो सज्जनों को गलत बोलते रहते है | उनका अपमान करते रहते है, उनको नीचा दिखाना की कोशिश करते रहते है | ऐसे वक्त में मनुष्यने गुरु की शिक्षा का पालन करना चाहिए | ऐसे दृष्ट लोगों को तथा भोकने वाले कुत्तों को पलट कर जवाब नहीं देना चाहिए | अपने सत्कर्मों को जारी रखना चाहिए |  



 

एक सौ सत्तासी

कबीर संगति साध की, कड़े न निर्फल होई |
चन्दन होसी बावना, नीब न कहसी कोई ||

[ शब्द का अर्थ:- साध-साधू, कड़े-कभी, बावना-बौना, नीब-नीम का वृक्ष ]

भावार्थ- कबीरदास कहते है की साधू-संतो की संगती, उनका उपदेश, मार्गदर्शन और उन्होंने दिया हुआ ज्ञान कभी भी निष्फल नहीं होता | अगर चन्दन का वृक्ष बौना है तो क्या कोइ उसे नीम का वृक्ष कह सकता है | चन्दन अपनी सुगंधता से आसपास के परिवेश को खुशबू से भर देता है | चन्दन की खुशबू की तरह ही साधू के संगती में रहने वाले मनुष्य का जीवन ज्ञान की और भक्ती के खुशबू से भर जाता है |



 

एक सौ अट्ठासी

गारी मोटा ज्ञान, जो रंचक उर में जरै |
कोटि सँवारे काम, बैरि उलटि पायन परै |
गारी सो क्या हान, हिरदै जो यह ज्ञान धरै |

[ शब्द का अर्थ – गारी-गाली, बैरि-दुश्मन, पायन-पाँव/ पैर, परै-पड़ना, हिरदै-ह्रदय ]

भावार्थ- अगर आप में अपमान सहन करने की शक्ती है | किसीने दी हुयी गालीयाँ आप का ह्रदय सहन करने की शक्ती रखता है, तो आप पाएंगे के मिली हुई गाली में भी भारी ज्ञान होता है | विपरीत परिस्थितियों में भी जो संयम रखता है उसके करोडो काम संवर जाते है | ऐसे आदमी की शत्रु भी प्रशंसा करता है और पैरों में आके गिरते है | दुश्मनों द्वारा दी गयी गालीसे अगर हमारे ह्रदय में ज्ञान आता है, तो ऐसे मीली हुई गाली से हमारी हांनी क्या है ?



 

एक सौ नवासी

कबीर तहाँ न जाइये, जहाँ सिध्द को गाँव |
स्वामी कहै न बैठना, फिर-फिर पूछै नाँव ||

[ शब्द का अर्थ :– नाँव-नाम, तहाँ-वहां पर ]

भावार्थ- कबीरदास कहते है की, मनुष्य ने ऐसे गावं में या ऐसे स्थान पर कभी भी नहीं जाना चाहिए, जहापर अहंकारी, खुदको सबसे श्रेष्ठ समझने वाले अभिमानी सिद्ध रहते हो | जो दूसरों को कम आंकते हो | जिनके यहा जाने पर वहांके स्वामीजी आपसे बैठने तक को ना कहे और आपसे बार बार आपका नाम ही पूंछते रहे | 

अर्थात मनुष्य ने ऐसे स्थान पर कभी भी नही जाना चाहिए जहाँ पर उसको कोइ पूछता नहीं हो, जहा उसको कोई मान नही हो |



KABIR KE DOHE 

एक सौ नब्बे

कबीर संगी साधु का, दल आया भरपूर |
इन्द्रिन को तब बाँधीया, या तन किया धर ||

[ शब्द का अर्थ :– इन्द्रिन-इन्द्रिय, दल-समूह ]

भावार्थ-  कबीरदास कहते है, संतो के साथ रहकर, उनसे ज्ञान पाकर, उनके कृपा प्रसाद से ह्रदय में जब परिपूर्ण रूप से विवेक-वैराग्य, दया, क्षमा, समता आदि का दल आ जाता है | तब शरीर के लोभ, क्रोध, मोह, मद, भोग, विषय वासना इन व्यधियोंको, इन्द्रियों पर विजय प्राप्त कर नष्ट कीया जाता है | 

अर्थात तन मन को जो वश कर लेता है वही सच्चा साधू होता है |



 

एक सौ इक्यानबे

बन्दे तू कर बन्दगी, तो पावै दीदार |
औसर मानुष जन्म का, बहुरि न बारम्बार ||

[ शब्द का अर्थ :– बन्दे-भक्त, बन्दगी-भक्ती, औसर-अवसर, बारम्बार-बार बार, दीदार-दर्शन, पावै-पायेगा ]

भावार्थ-  हे भक्त ! तू उस परमपिता परमेश्वर की भक्ती कर, उसके बताये हुए सत्य के मार्ग पे चल, परोपकार कर, तुझे अपने आप उसके दर्शन हो जायेंगे | इस संसार में मनुष्य के रूप में जनम ने का अवसर सबको बार बार नहीं मिलता है | तू इस अवसर का लाभ उठा और ईश्वर को पाने की कोशिश कर |



 

एक सौ बानबे

मन राजा नायक भया, टाँडा लादा जाय |
है है है है है रही, पूँजी गयी बिलाय ||

[ शब्द का अर्थ :– भया-हो गया, टाँडा-बहुत सौदा,  बिलाय-नष्ट होना ]

भावार्थ- मनुष्य का मन किसी राजा से कम नहीं है, वह जो चाहता है वही मनुष्य से करवा लेता है | जब यह  राजा मन व्यापारी बना तो विषय-वासनाओंका टाँडा इसने लाद लिया |  भोगों-एश्वर्योंमें लाभ है, आनंद है ऐसा दुनिया कहती है यह जानकर वह खुश हुआ | परन्तु भोग विलासोंमे लिप्त रहने से मानवता की पूँजी भी नष्ट हो जाती है | समाज में मनुष्य का मान सन्मान नष्ट हो जाता है |

अर्थात चंचल मन को काबू में रखने में ही मनुष्य की भलाई है | 



 

एक सौ तिरानबे

जिही जिवरी से जाग बँधा, तु जनी बँधे कबीर |
जासी आटा लौन ज्यों, सोन समान शरीर ||

[ शब्द का अर्थ :– जाग-जगत/ दूनिया, जिवरी-बंधन, सोन-सोना (मूल्यवान धातु) ]  

भावार्थ-  जिस मोह-माया के बंधन में इस जगत के लोग बंधे है, जिसके कारन उनका विनाश हो जाता है | हे मनुष्य ! अगर तुझे अपना उद्धार करना है तो तू इस मोह माया के बंधन में खुद को मत बांध लेना | जैसे नमक के बगैर आटा फीका होता है वैसे ही बिना हरी के सुमिरन के तुम्हारा यह जीवन भी फीका पड़ जाता है | यदि तुम हरी का सुमिरण करते हो, सतमार्ग पर चलते हो तो यह तुम्हारे शरीर को ‘स्वर्ण’ के समान ही मूलयवान बना देता है |



 

एक सौ चौरानबे

मैं मैं मेरी जिनी करै, मेरी सूल बिनास |
मेरी पग का पैषणा, मेरी गल की पास ||

[ शब्द का अर्थ:-बिनास-विनाश, पग-पाँव, पैषणा-बेडी, गल की पास-गले का फास ]

भावार्थ-  मनुष्य जिन्दगी भर मैं और मेरा की रट लगाये रहता है | मैं मतलब उसका खुद के बारे में सोचना, उसका अहंकार, खुदको दूसरों से श्रेष्ठ समझना | मेरा मतलब उसका अपना परिवार और उसने जमा की हुयी धन संपती, जिनसे उसका लगाव होता है | 

कबीरदास कहते है, हे मनुष्य ! तू इस संसार में, मेरी और मैं अर्थात ममता और अहंकार में मत फ़सना, नहीं खुद को इसमें बाँध लेना | तू जो इस मोह, माया, ममता और अहंकार के चक्कर में फस गया तो तेरा विनाश पक्का है क्यों की यही विनाश का मूल है, जड़ है | ममता पैरों की बेडी है और गले की फांसी है |



KABIR KE DOHE 

एक सौ पंचानबे

कबीर नाव जर्जरी, कूड़े खेवनहार |
हलके हलके तिरि गए, बूड़े तिनि सर भार ||

[ शब्द का अर्थ:- नाव-नौका, जर्जरी-पुरानी, तिरि-तैरना, तिनि-उनके ]

भावार्थ- कबीरदास कहते हैं की, मनुष्य के जीवन की नौका संकटोंका, दुखोंका, कठिन परिस्थ्तियोंका सामना कर करके टूट फूट गयी है और उसे चलाने वाले मुर्ख है | जिन मनुष्योंके सर पर भोग, विषय वासनाओंका बोझ होता है वे तो संसार सागर में डूब जाते हैं, इसी दुनिया में संसारी बनकर उलझ जाते है | पर जो मनुष्य इन सब उलझनोसे दूर होते है, भोग, विषय वासनाओंका बोझ सर पर नही होने के कारन मुक्त होते है, हलके होते है | जिसकी वजह से वे इस संसार सागर में तर जाते हैं, पार लग जाते हैं और भव सागर में डूबने से बच जाते हैं |



 

एक सौ छियानबे

उज्जवल पहरे कापड़ा, पान सुपारी खाय |
एक हरी के नाम बिन, बंधा यमपुर जाय ||

[ शब्द का अर्थ:-उज्जवल- प्रभावशाली, पहरे-पहनना, हरी-इश्वर, यमपुर-नरक ]

भावार्थ-  जिस मनुष्य की समाज में प्रतिष्ठा है, जो धनवान है, हमेशा वह अच्छे, प्रभावशाली महेंगे कपडे पहनता है और मूह में उसके पान सुपारी भरा है, उसको समाज में आदर तो मिल जाता है | पर अगर वह मुख से कभी भी इश्वर का नाम नही लेता है, इश्वर की भक्ती नही करता है, परोपकार नहीं करता है तो उस मनुष्य का नरक से बचना मुश्किल होता है |



 

एक सौ सत्तानबे

ऊँचे पानी ना टिके, नीचे ही ठहराय |
नीचा हो सो भारी पी, ऊँचा प्यासा जाय ||

[ शब्द का अर्थ:-टिके-ठहरता नहीं ]

भावार्थ- पाणी हमेशा ऊँचे से होकर निचे की तरफ ही बहता है | जिसकी वजह से यह निचे आकर ठहरता है और जमा हो जाता है | इसी कारण से जो निचे जमीन पर होते है वह भरपूर पानी पीकर अपनी प्यास बुझा लेते है  पर जो ऊँचाई पर है, हवा मैं तैर रहे है वो ऐसा नही कर सकते और प्यासे ही रह जाते है | 

अर्थात जो मनुष्य सारे भोग-विलास, अहंकारोंसे दूर है, जो प्रभु के भक्ती में लीन है, जो जमीन पर लोगों के परोपकार में जुडा है उसे प्रभु के कृपा का रस मिल जाता है और वह धन्य हो जाता है | और जो मनुष्य अहंकार में डूबा है, खुदको सबसे ऊँचा समझता है, श्रेष्ट समझता है, अपनी ही मस्ती में रहता है और हवा मैं तैरता है, वह अपने जीवन में कभी भी इश्वर के कृपा का रस पी नहीं सकता और प्यासा ही रह जाता है |



 

एक सौ अट्ठानबे

कबीरा आप ठागइए, और न ठगिये कोय |
आप ठगे सुख होत है, और ठगे दुःख होय ||

[ शब्द का अर्थ:- ठागइए-धोखेबाजी/ फ़साना ]

भावार्थ- कबीरदास कहते है, अगर मनुष्य को किसीको ठगना है, मुर्ख बनाना है तो उसे स्वयंम को ही ठगना चाहिए दूसरों को नही | खुद को बेवकूफ बनाने में कोई बुराई नहीं है क्यों की इससे किसीका नुकसान नही होगा और सच्चाई तो आज या कल तो पता ही चल जायेगी | पर हम अगर किसी दुसरे को ठग लेते है, बेवकूफ बनाते है तो हमें ही दुःख का सामना करना पड़ता है |

अर्थात अपने आपको प्रभु के भक्ती में ठग लेने जैसा दूसरा आनंद नहीं है | 



 

एक सौ निन्यानबे

जहा काम तहा नाम नहीं, जहा नाम नहीं वहा काम |
दोनों कभू नहीं मिले, रवि रजनी इक धाम ||

[ शब्द का अर्थ:- काम-विषय-वासना, तहा-वहाँ, कभू-कभी भी, रवि-सूरज, रजनी-रात, धाम-निवास ] 

भावार्थ- जिस मनुष्य के जीवन में भोग और विषय वासनाओंको स्थान है | जो रात-दीन भोग भोगने के बारे में सोचता रहता है | ऐसे मनुष्य के जीवन में इश्वर कभी भी नहीं आते | जो मनुष्य सदा इश्वर का नाम लेते रहता है और परोपकार करता है ऐसे मनुष्य के जीवन में इश्वर का वास होता है | जैसे सूरज और रात कभी भी एक दुसरे से मिल नहीं सकते, वैसे ही जहा विषय वासनोंओंका वास होता है वहाँ भगववान कभी भी प्रकट नहीं हो सकते |



 

दो सौ

जा पल दरसन साधू का, ता पल की बलिहारी |
राम नाम रसना बस, लीजै जनम सुधारी ||

[ शब्द का अर्थ:- पल-क्षण, दरसन-दर्शन, रसना-जिव्हा ]

भावार्थ-  जीवन में चमत्कार हो गया जब साधू संतो के दर्शन हो गए, उनका सहवास मिला | साधू संतो से ज्ञान मिला, जीवन को उनका उपदेश और मार्गदर्शन मिला और मेरा जीवन पुरी तरह से बदल गया | उस अनमोल क्षण की जय हो जब मैं साधू संतो से मिला | मैंने राम नाम का जप किया, मेरा पूरा जीवन राममय हो गया और मैंने पाया के मेरा सारा जनम सुधर गया |  

 

Shani Chalisa: पढ़िए अद्भुत शनी चालीसा उसके अर्थ और लाभ सहीत (Download PDF)

Shani Chalisa
Shani Dev

SHANI CHALISAकिसी भी समस्या से बचने के लिए शनि चालीसा (Shani Chalisa) का पाठ कीया जाता है| शनि को भाग्य की देवता कहां जाता है| ऐसा माना जाता है की कलयुगमें केवल दो ही जागृत देवता है एक शनि देवता और दुसरे भगवान हनुमान (Hanuman)|

शनि देवता के बारे में कहा जाता है की किसी भी व्यक्ती को राजा, रंक, साधू, शैतान या विद्वान बना देना उनका ही काम है| शनि देवता समस्या जरूर पैदा कर देते है पर किसी भी व्यक्ती का भविष्य उज्जवल कर देना भी उनका ही काम है|

जीवन में किसी भी तरह की कठिनाई हो, विघ्न हो, समस्या हो या अडचने हो तो शनि चालीसा (Shani Chalisa) का उपयोग इन् समस्याओंसे बचने के लिए किया जाता है| शनि चालीसा का पाठ करने के विशिष्ट तरीके होते है जैसे की-

शनि चालीसा का पाठ करने के विशिष्ट तरीके

  • शनिवार के दीन शाम को सूर्य अस्त होने के बाद शनि चालीसा का पाठ करना चाहिए|
  • एक वक्त में शनी चालीसा के ग्यारह पाठ करने चाहिये|
  • Shani Chalisa पाठ के लिए आप ११ या २१ शानिवार पाठ का संकल्प कर सकते है| या आप हमेशा के लिए भी शनि चालीसा का पाठ कर सकते है|
shani chalisa
श्री शनी देव- शनी शिगानापूर (Shree Shani Dev at Shignapur)

ll श्री शनि देव चालीसा ll 

 ll दोहा ll

जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल करण कृपाल।                                                                      दीनन के दुख दूर करि, कीजै नाथ निहाल॥
जय जय श्री शनिदेव प्रभु, सुनहु विनय महाराज।
करहु कृपा हे रवि तनय, राखहु जन की लाज॥

भगवान गणेश, आपके लिए पहाड़ का वजन भी एक फूल की तरह होता है। हमारी परेशानियों को आप दया से हटाएं और हमारी चेतना को बढ़ाएं। हे भगवान शनि देव, आप इतने विजयी और दयालु हैं। हमारी प्रार्थना सुनें और अपने भक्तों की पवित्रता और धार्मिकता की रक्षा करें।

 

ll चौपाई ll

जयति जयति शनिदेव दयाला।                                                                                        करत सदा भक्तन प्रतिपाला॥                                                                                          चारि भुजा, तनु श्याम विराजै।                                                                                        माथे रतन मुकुट छबि छाजै ॥1॥

दयालु शनि देव की जीत हो, आप उन लोगों के रक्षक हैं जो आपकी शरण लेते हैं। हे शाम वर्ण और चार भुजाधारी आपके माथे पर मोती जडा मुकुट बहुत सजता है ।  

परम विशाल मनोहर भाला।                                                                                              टेढ़ी दृष्टि भृकुटि विकराला॥                                                                                              कुण्डल श्रवण चमाचम चमके।                                                                                          हिय माल मुक्तन मणि दमके ॥2॥

आपका रूप बहुत ही मनोहर हैं और आप एक चमकदार भाला रखते हैं। तू एक कातिलों की तरह दिखने से  भयावह रूप बनाता है। कान के छल्ले और मोती का हार आप प्रकाश में चकाचौंध पहनते हैं।

कर में गदा त्रिशूल कुठारा।                                                                                            पल बिच करैं अरिहिं संहारा॥                                                                                        पिंगल, कृष्णो, छाया नन्दन।                                                                                            यम, कोणस्थ, रौद्र, दुखभंजन॥3॥

आप अपनी बाहों में एक गदा, त्रिशूल और युद्ध-कुल्हाड़ी लेकर चलते हैं, जो आगे बढ़ते दुश्मनों को काटती है। चय के पुत्र, आपको पिंगलो, कृष्ण, यम, कण्ठ, रौद्र और दर्द और पीड़ा का निवारण करने वाला कहा जाता है।

सौरी, मन्द, शनी, दश नामा।                                                                                          भानु पुत्र पूजहिं सब कामा॥                                                                                              जा पर प्रभु प्रसन्न ह्वैं जाहीं।                                                                                            रंकहुँ राव करैं क्षण माहीं॥4॥

सौरी और मंदा सहित दस नाम आप के हैं। भगवान सूर्य के प्रसिद्ध पुत्र, यदि आप प्रसन्न या अप्रसन्न हैं तो आप एक भिखारी को राजा या इसके विपरीत में बदल सकते हैं।

पर्वतहू तृण होई निहारत।                                                                                                तृणहू को पर्वत करि डारत॥                                                                                              राज मिलत बन रामहिं दीन्हयो।                                                                                          कैकेइहुँ की मति हरि लीन्हयो॥5॥

आपकी इच्छाशक्ति पर, सरल चीजें भी जटिल और कठिन हो सकती हैं। आपका आशीर्वाद सबसे मुश्किल कामों को सरल में बदल सकता है। जब आपने दशरथ की पत्नी कैकेयी की इच्छा को मोड़ने के लिए चुना, तब भी राम को अपना राज्य छोड़ना पड़ा और वनवास के लिए जंगल जाना पड़ा ।

बनहूँ में मृग कपट दिखाई।                                                                                             मातु जानकी गई चुराई॥                                                                                            लखनहिं शक्ति विकल करिडारा।                                                                                      मचिगा दल में हाहाकारा॥6॥

राम एक भ्रामक हिरण के साथ जंगल में विचलित थे। इसके कारण, माता सीता, प्रकृति के रूप का अपहरण कर लिया गया था। राम के भाई लक्ष्मण को रणभूमि में बेहोश होना पड़ा जिसने राम की सेना में सभी के मन में भय पैदा कर दिया।

रावण की गति-मति बौराई।                                                                                              रामचन्द्र सों बैर बढ़ाई॥                                                                                                दियो कीट करि कंचन लंका।                                                                                          बजि बजरंग बीर की डंका॥7॥

रावण ने अपने अच्छे ज्ञान और ज्ञान को खोने का अहंकार महसूस किया। परिणामस्वरूप उन्होंने राम के साथ लड़ाई की। एक बार हनुमान ने लंका पर आक्रमण किया, स्वर्ण लंका राख में बदल गई।

नृप विक्रम पर तुहि पगु धारा।                                                                                          चित्र मयूर निगलि गै हारा॥                                                                                              हार नौलखा लाग्यो चोरी।                                                                                                हाथ पैर डरवायो तोरी॥8॥

शनि से पीड़ित होने के दौरान, राजा विक्रमादित्य का हार एक चित्रित मोर द्वारा निगल लिया गया था। भगवान कृष्ण को भी बुरी तरह पीटने का आरोप लगाया गया।

भारी दशा निकृष्ट दिखायो।                                                                                              तेलिहिं घर कोल्हू चलवायो॥                                                                                          विनय राग दीपक महं कीन्हयों।                                                                                        तब प्रसन्न प्रभु ह्वै सुख दीन्हयों॥9॥

जब आपके महा दशा काल में जीवन दुखों से भरा हुआ था, तब भी भगवान कृष्ण को एक आम आदमी के घर काम करना पड़ा था। जब उसने आपसे भक्ति के साथ प्रार्थना की, तो उसे वह सब प्राप्त हुआ जो वह चाहता था।

हरिश्चन्द्र नृप नारि बिकानी।                                                                                              आपहुं भरे डोम घर पानी॥                                                                                              तैसे नल पर दशा सिरानी।                                                                                                भूंजी-मीन कूद गई पानी॥10॥

शनि दशा काल ने राजा हरिश्चंद्र को भी नहीं छोड़ा जिन्होंने अपनी पत्नी सहित उन सभी को खो दिया था। उन्हें एक गरीब स्वीपर के घर पर एक मेनियल जॉब करनी थी।

श्री शंकरहिं गह्यो जब जाई।                                                                                              पारवती को सती कराई॥                                                                                              तनिक विलोकत ही करि रीसा।                                                                                        नभ उड़ि गयो गौरिसुत सीसा॥11॥

जब आप भगवान शिव की राशि के माध्यम से चले गए, तो उनकी पत्नी पार्वती को अग्नि में जीवित होना पड़ा। आपके लगने से गणेश का सिर नष्ट हो गया।

पाण्डव पर भै दशा तुम्हारी।                                                                                            बची द्रौपदी होति उघारी॥                                                                                                कौरव के भी गति मति मारयो।                                                                                        युद्ध महाभारत करि डारयो॥12॥

शनि दशा के दौरान, पांडवों ने अपनी पत्नी द्रौपती को खो दिया था और कोई सामान नहीं था। कौरवों ने अपना सारा ज्ञान खो दिया और पांडवों के खिलाफ एक भयानक लड़ाई का सामना किया। 

रवि कहँ मुख महँ धरि तत्काला।                                                                                        लेकर कूदि परयो पाताला॥                                                                                              शेष देव-लखि विनती लाई।                                                                                            रवि को मुख ते दियो छुड़ाई॥13॥

हे शनि देव, आपने सूर्य को भी अर्घ्य दिया और तीसरी दुनिया में भाग गए। जब देवताओं ने आकर आपसे प्रार्थना की, तब ही आपने सूर्य को कैद से छुड़ाया।

वाहन प्रभु के सात सुजाना।                                                                                              जग दिग्गज गर्दभ मृग स्वाना॥                                                                                            जम्बुक सिंह आदि नख धारी।                                                                                            सो फल ज्योतिष कहत पुकारी॥14॥

हे शनि देव, आप एक हाथी, घोड़ा, गधा, हिरण, कुत्ता, सियार और शेर सहित सात वाहनों पर सवार हैं। इन सभी जानवरों के पास भयानक नाखून हैं। इसलिए ज्योतिषी घोषणा करते हैं।

गज वाहन लक्ष्मी गृह आवैं।                                                                                              हय ते सुख सम्पति उपजावैं॥                                                                                            गर्दभ हानि करै बहु काजा।                                                                                            सिंह सिद्धकर राज समाजा॥15॥

हाथी पर सवार होते हुए, तुम धन लाते हो; घोड़े पर सवारी करते समय, आप आराम और धन लाते हैं; जब आप गधे पर सवार होते हैं, तो आप कई तरीकों से नुकसान उठाते हैं, शेर पर सवार होकर, आप राज्य और प्रसिद्धि लाते हैं

जम्बुक बुद्धि नष्ट कर डारै।                                                                                              मृग दे कष्ट प्राण संहारै॥                                                                                                जब आवहिं प्रभु स्वान सवारी।                                                                                          चोरी आदि होय डर भारी॥16॥

सियार की सवारी करते समय, आप ज्ञान छीन लेते हैं; जब आप हिरण पर सवार होते हैं, तो आप मृत्यु और पीड़ा को भड़काते हैं; जब आप कुत्ते पर चढ़ते हैं, तो आप चोरी का आरोप लगाते हैं, जिससे भिखारी को शाप मिलता है।

तैसहि चारि चरण यह नामा।                                                                                            स्वर्ण लौह चाँदी अरु तामा॥                                                                                              लौह चरण पर जब प्रभु आवैं।                                                                                          धन जन सम्पत्ति नष्ट करावैं॥17॥

आपके पास सोने, लोहे, तांबे और चांदी में बने आपके पैरों के चार अलग-अलग संस्करण हैं। लोहे के पैर के साथ आने पर, आप एक संपत्ति और धन को नष्ट कर देते हैं।

समता ताम्र रजत शुभकारी।                                                                                            स्वर्ण सर्व सर्व सुख मंगल भारी॥                                                                                          जो यह शनि चरित्र नित गावै।                                                                                          कबहुं न दशा निकृष्ट सतावै॥18॥

आपके तांबे के पैरों से संकेत मिलता है कि चीजों को नुकसान नहीं पहुंचेगा; आपके चांदी के पैर कई लाभ लाएंगे; आपके सुनहरे पैर इस धरती पर सारी खुशियाँ लाएँगे। जो आपसे प्रार्थना करते हैं, उनके जीवन में कभी प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना नहीं करना पड़ेगा। 

अद्भुत नाथ दिखावैं लीला।                                                                                            करैं शत्रु के नशि बलि ढीला॥                                                                                            जो पण्डित सुयोग्य बुलवाई।                                                                                            विधिवत शनि ग्रह शांति कराई॥19॥

आप अपने भक्तों के सामने अपनी शक्तियों को दिखाते हैं और अपने दुश्मनों को मारते हैं या उन्हें असहाय बनाते हैं। सीखे हुए पुरुष और पुजारी आपको पवित्र पूजन और अनुष्ठानों के साथ वैदिक तरीके का सहारा लेते हैं।

पीपल जल शनि दिवस चढ़ावत।                                                                                          दीप दान दै बहु सुख पावत॥                                                                                          कहत राम सुन्दर प्रभु दासा।                                                                                            शनि सुमिरत सुख होत प्रकाशा॥20॥

चूंकि पीपल का पेड़ शनि का प्रतिनिधित्व करता है, जो लोग शनिवार को इसे पानी देते हैं और अपने पैरों पर अगरबत्ती चढ़ाते हैं, उन्हें सभी सुख, धन और स्वास्थ्य प्राप्त होते हैं। हे सुंदर शनि देव, इस प्रकार कहते हैं राम, आपके भक्त।

ll दोहा ll

पाठ शनिश्चर देव को, की हों ‘भक्त’ तैयार।                                                                          करत पाठ चालीस दिन, हो भवसागर पार॥

जो भक्त चालीस दिनों तक भक्तिभाव से शनि चालीसा का गायन करते हैं, वे अपने स्वर्ग के मार्ग को प्राप्त करेंगे। 

शनि चालीसा के अद्भुत लाभ

  • अच्छे कर्म करते हुए जो भी व्यक्ती शनि चालीसा का पाठ करता है उसका कष्टों से सामना बहुत कम होता है|
  • शनि की साढ़े साती या महादशा के दौरान शनी चालीसा का नियमीत पाठ करने से आनेवाले संकट समाप्त हो जाते है| 
  • नियमित रूप से शनि देव की चालीसा का जाप करने से आपके विचारों में सकारात्मकता आ जाती है|
  • आप जीवन में भौतिक समृद्धि और आराम प्राप्त करेंगे।
  • आप झूठे आरोपों, अपराधों और बुरे कार्यों से सुरक्षा प्राप्त कर सकते हैं।
  • आप जीवन में दुर्घटनाओं और आपदाओं से बच जाएंगे।

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Durga Chalisa in Hindi | श्री दुर्गा चालीसा | नमो नमो दुर्गे सुख करनी

Durga Chalisa in Hindi: दुर्गा, देवी यह शक्ति और वीरता का रूप है| माँ दुर्गा यह हिन्दू पुराण कथाओ के अनुसार देवी का एक उग्र रूप है| माँ दुर्गा को महिषासुर मर्दिनी भी कहा जाता है| महिषासुर यह एक क्रूर राक्षस था जिसने देव लोक पर कब्ज़ा करके देवताओंको परेशान करना शुरू कर दिया था| सभी देवताओंने माँ दुर्गा का आवाहन करके उनसे महिषासुर दैत्य का वध करने को कहा| 

हजारो साल पहले महिषासुर नामक एक दैत्य था जिसका आधा शरीर भैसे का और आधा शरीर राक्षस का था| उसने कई सालो तक घोर तपस्या करके ब्रह्माजी को प्रसन्न किया| ब्रह्मा से उसने देव या मानव, इनमेसे कोई भी उसका वध ना कर सके ऐसा वर मांग लिया| 

ब्रह्मदेव से वर मिलने के बाद महिषासुर ने देव लोकपर कब्ज़ा कर के देवो को देव लोक से भगाना शुरू कर दिया| डरे हुए देवोने माँ दुर्गा का आवाहन करके महिषासुर का वध करने को कहा| माँ दुर्गा ने दशहरे के दिन महिषासुर राक्षस का वध किया और विश्व का विनाश होने से बचा लिया| 

Durga chalisa में माँ दुर्गा के विविध रूपों का वर्णन करके उनकी स्तुती की गयी है| उनसे सारे विश्व को और मानव जाती को महिषासुर रुपी दानवो का विनाश करके सभी को सुखी रखने का आवाहन किया गया है|

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Durga Chalisa in Hindi | नमो नमो दुर्गे सुख करनी

नमो नमो दुर्गे सुख करनी | नमो नमो दुर्गे दुःख हरनी ||                                                            निरंकार है ज्योति तुम्हारी | तिहूँ लोक फैली उजियारी ||
शशि ललाट मुख महाविशाला | नेत्र लाल भृकुटि विकराला ||
रूप मातु को अधिक सुहावे | दरश करत जन अति सुख पावे ||1||

तुम संसार शक्ति लै कीना | पालन हेतु अन्न धन दीना ||
अन्नपूर्णा हुई जग पाला | तुम ही आदि सुन्दरी बाला ||
प्रलयकाल सब नाशन हारी | तुम गौरी शिवशंकर प्यारी ||
शिव योगी तुम्हरे गुण गावें | ब्रह्मा विष्णु तुम्हें नित ध्यावें  ||2||

रूप सरस्वती को तुम धारा | दे सुबुद्धि ऋषि मुनिन उबारा ||
धरयो रूप नरसिंह को अम्बा | परगट भई फाड़कर खम्बा ||
रक्षा करि प्रह्लाद बचायो | हिरण्याक्ष को स्वर्ग पठायो ||
लक्ष्मी रूप धरो जग माहीं | श्री नारायण अंग समाहीं ||3||

क्षीरसिन्धु में करत विलासा | दयासिन्धु दीजै मन आसा ||
हिंगलाज में तुम्हीं भवानी | महिमा अमित न जात बखानी ||
मातंगी अरु धूमावति माता | भुवनेश्वरी बगला सुख दाता ||
श्री भैरव तारा जग तारिणी | छिन्न भाल भव दुःख निवारिणी ||4||

केहरि वाहन सोह भवानी | लांगुर वीर चलत अगवानी ||
कर में खप्पर खड्ग विराजै | जाको देख काल डर भाजै ||
सोहै अस्त्र और त्रिशूला | जाते उठत शत्रु हिय शूला ||
नगरकोट में तुम्हीं विराजत | तिहुँलोक में डंका बाजत ||5||

शुम्भ निशुम्भ दानव तुम मारे | रक्तबीज शंखन संहारे ||
महिषासुर नृप अति अभिमानी | जेहि अघ भार मही अकुलानी ||
रूप कराल कालिका धारा | सेन सहित तुम तिहि संहारा ||
परी गाढ़ सन्तन र जब जब | भई सहाय मातु तुम तब तब ||6||

अमरपुरी अरु बासव लोका | तब महिमा सब रहें अशोका ||
ज्वाला में है ज्योति तुम्हारी | तुम्हें सदा पूजें नरनारी ||
प्रेम भक्ति से जो यश गावें | दुःख दारिद्र निकट नहिं आवें ||
ध्यावे तुम्हें जो नर मन लाई | जन्ममरण ताकौ छुटि जाई ||7||

जोगी सुर मुनि कहत पुकारी | योग न हो बिन शक्ति तुम्हारी ||
शंकर आचारज तप कीनो | काम अरु क्रोध जीति सब लीनो ||
निशिदिन ध्यान धरो शंकर को | काहु काल नहिं सुमिरो तुमको ||
शक्ति रूप का मरम न पायो | शक्ति गई तब मन पछितायो ||8||

शरणागत हुई कीर्ति बखानी | जय जय जय जगदम्ब भवानी ||
भई प्रसन्न आदि जगदम्बा | दई शक्ति नहिं कीन विलम्बा ||
मोको मातु कष्ट अति घेरो | तुम बिन कौन हरै दुःख मेरो ||
आशा तृष्णा निपट सतावें | मोह मदादिक सब बिनशावें ||9||

शत्रु नाश कीजै महारानी | सुमिरौं इकचित तुम्हें भवानी ||
करो कृपा हे मातु दयाला | ऋद्धिसिद्धि दै करहु निहाला ||
जब लगि जिऊँ दया फल पाऊँ | तुम्हरो यश मैं सदा सुनाऊँ ||
श्री दुर्गा चालीसा जो कोई गावै | सब सुख भोग परमपद पावै ||10||

देवीदास शरण निज जानी | कहु कृपा जगदम्ब भवानी ||

Sai Baba hd images | श्री सच्छिदान्नद सद्गुरु साईं नाथ महाराज की जय

|| श्री सच्छिदान्नद सद्गुरु साईं नाथ महाराज की जय ||

Sai Baba hd images: महाराष्ट्र राज्य के अहमदनगर जिल्हे के एक छोटेसे गाँव शिर्डी में 16 साल के एक बाल योगी नीम वृक्ष के निचे साधना में लींन पाए गए| इतनी कम उम्र में कठोरे तपस्या करते हुए बालयोगी को देखकर लोगो को सुखद आश्चर्य हुआ| लोगो से बहुत ही कम बात करने वाला यह बाल योगी एक दिन अचानक शिर्डी से चला गया| शिर्डी के लोगो ने उन्हें धुंडने का बहुत प्रयत्न किया पर वोह नहीं मिले|

तीन साल बाद यह योगी फिरसे शिर्डी आ गया और हमेशा के लिए शिर्डी का ही हो गया| यही योगी आगे चल कर साईं बाबा के नाम से मशहूर हो गए| 

Sai Baba की जानकारी 

महाराष्ट्र के पाथरी (पातरी) गांव में साईं बाबा का जन्म 28 सितंबर 1835 को हुआ था। कुछ लोग मानते हैं कि उनका जन्म 27 सितंबर 1838 को तत्कालीन आंध्रप्रदेश के पथरी गांव में हुआ था और उनकी मृत्यु 28 सितंबर 1918 को शिर्डी में हुई|

शिर्डी के साईबाबा के अनेको चमत्कार प्रसिद्ध है| जो भी भक्त उनकी मनोभावे भक्ती करता है साईं उसके सारे दुःख हर लेते है| साईं बाबा के भक्त पुरे दुनिया में फैले हुए है और साल में एक बार तो अवश्य वोह शिर्डी आके बाबा के दर्शन करते है| 

साईं बाबा के भक्त हिन्दू और मुसलमान दोनों भी थे पर साईं स्वयम हिन्दू थे| 

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Hanuman Chalisa in Tamil | தமிழில் அனுமன் சாலிசா

Hanuman Chalisa in Tamil: ஹனுமான் சாலிசா என்பது இந்து பக்தி பாடல் (ஸ்தோத்ரா) என்பது ஹனுமான் என்று உரையாற்றப்படுகிறது. இதை 16 ஆம் நூற்றாண்டில் புனித துளசிதாஸ் எழுதியுள்ளார். ஹனுமான் சாலிசா ஆரம்பத்தில் மற்றும் முடிவில் தோஹாக்களைத் தவிர 40 வசனங்களைக் கொண்டுள்ளார்.

Hanuman Chalisa in Tamil
Hanuman Chalisa in Tamil

Hanuman Chalisa in Tamil | அனுமன் சாலிசா

  • முதல் பத்து ச up பாய்கள் விவரிக்கப்பட்டுள்ளன, நல்ல வடிவம், அறிவு, நல்லொழுக்கங்கள், சக்திகள் மற்றும் அனுமனின் துணிச்சல்.
  • பதினொன்றாம் முதல் பதினைந்தாவது ச up பைஸ், லட்சுமணனை மீண்டும் நனவுக்கு கொண்டு வருவதில் அனுமனின் பங்கை விவரிக்கிறார்.
  • பதினொரு முதல் இருபது ச up பாய்கள், பிரபு ஸ்ரீ ராமுக்கு அவர் செய்த சேவையில் அனுமனின் செயலை விவரிக்கிறார்கள்.
  • இருபத்தியோராம் ச up பாயிலிருந்து, துளசிதாஸ் அனுமனின் கிருபாவின் அவசியத்தை விவரிக்கிறார். இறுதியில், புனித துளசிதாஸ் அனுமனை பகவான் வாழ்த்தி, அவரது இதயத்தில் வசிக்கும்படி கேட்டுக்கொள்கிறார்.

 

முதல் அறிமுக தோஹா ஷ்ரு என்ற வார்த்தையிலிருந்து தொடங்குகிறது, இது அனுமனின் குருவாகக் கருதப்படும் மாதா சீதாவைக் குறிக்கிறது.

|| அறிமுக தோஹா ||

ஶ்ரீ குரு சரண ஸரோஜ ரஜ னிஜமன முகுர ஸுதாரி |
வரணௌ ரகுவர விமலயஶ ஜோ தாயக பலசாரி ||

|| சௌபாஈ ||

ஜய ஹனுமான ஜ்ஞான குண ஸாகர |
ஜய கபீஶ திஹு லோக உஜாகர || 1 ||

ராமதூத அதுலித பலதாமா |
அம்ஜனி புத்ர பவனஸுத னாமா || 2 ||

மஹாவீர விக்ரம பஜரங்கீ |
குமதி னிவார ஸுமதி கே ஸங்கீ ||3 ||

கம்சன வரண விராஜ ஸுவேஶா |
கானன கும்டல கும்சித கேஶா || 4 ||

ஹாதவஜ்ர ஔ த்வஜா விராஜை |
காம்தே மூம்ஜ ஜனேவூ ஸாஜை || 5||

ஶம்கர ஸுவன கேஸரீ னன்தன |
தேஜ ப்ரதாப மஹாஜக வன்தன || 6 ||

வித்யாவான குணீ அதி சாதுர |
ராம காஜ கரிவே கோ ஆதுர || 7 ||

ப்ரபு சரித்ர ஸுனிவே கோ ரஸியா |
ராமலகன ஸீதா மன பஸியா || 8||

ஸூக்ஷ்ம ரூபதரி ஸியஹி திகாவா |
விகட ரூபதரி லம்க ஜராவா || 9 ||

பீம ரூபதரி அஸுர ஸம்ஹாரே |
ராமசம்த்ர கே காஜ ஸம்வாரே || 10 ||

லாய ஸம்ஜீவன லகன ஜியாயே |
ஶ்ரீ ரகுவீர ஹரஷி உரலாயே || 11 ||

ரகுபதி கீன்ஹீ பஹுத படாயீ |
தும மம ப்ரிய பரதஹி ஸம பாயீ || 12 ||

ஸஹஸ வதன தும்ஹரோ யஶகாவை |
அஸ கஹி ஶ்ரீபதி கண்ட லகாவை || 13 ||

ஸனகாதிக ப்ரஹ்மாதி முனீஶா |
னாரத ஶாரத ஸஹித அஹீஶா || 14 ||

யம குபேர திகபால ஜஹாம் தே |
கவி கோவித கஹி ஸகே கஹாம் தே || 15 ||

தும உபகார ஸுக்ரீவஹி கீன்ஹா |
ராம மிலாய ராஜபத தீன்ஹா || 16 ||

தும்ஹரோ மன்த்ர விபீஷண மானா |
லம்கேஶ்வர பயே ஸப ஜக ஜானா || 17 ||

யுக ஸஹஸ்ர யோஜன பர பானூ |
லீல்யோ தாஹி மதுர பல ஜானூ || 18 ||

ப்ரபு முத்ரிகா மேலி முக மாஹீ |
ஜலதி லாம்கி கயே அசரஜ னாஹீ || 19 ||

துர்கம காஜ ஜகத கே ஜேதே |
ஸுகம அனுக்ரஹ தும்ஹரே தேதே || 20 ||

ராம துஆரே தும ரகவாரே |
ஹோத ன ஆஜ்ஞா பினு பைஸாரே || 21 ||

ஸப ஸுக லஹை தும்ஹாரீ ஶரணா |
தும ரக்ஷக காஹூ கோ டர னா || 22 ||

ஆபன தேஜ தும்ஹாரோ ஆபை |
தீனோம் லோக ஹாம்க தே காம்பை || 23 ||

பூத பிஶாச னிகட னஹி ஆவை |
மஹவீர ஜப னாம ஸுனாவை || 24 ||

னாஸை ரோக ஹரை ஸப பீரா |
ஜபத னிரம்தர ஹனுமத வீரா || 25 ||

ஸம்கட ஸேம் ஹனுமான சுடாவை |
மன க்ரம வசன த்யான ஜோ லாவை || 26 ||

ஸப பர ராம தபஸ்வீ ராஜா |
தினகே காஜ ஸகல தும ஸாஜா || 27 ||

ஔர மனோரத ஜோ கோயி லாவை |
தாஸு அமித ஜீவன பல பாவை || 28 ||

சாரோ யுக பரிதாப தும்ஹாரா |
ஹை பரஸித்த ஜகத உஜியாரா || 29 ||

ஸாது ஸன்த கே தும ரகவாரே |
அஸுர னிகன்தன ராம துலாரே || 30 ||

அஷ்டஸித்தி னவ னிதி கே தாதா |
அஸ வர தீன்ஹ ஜானகீ மாதா || 31 ||

ராம ரஸாயன தும்ஹாரே பாஸா |
ஸாத ரஹோ ரகுபதி கே தாஸா || 32 ||

தும்ஹரே பஜன ராமகோ பாவை |
ஜன்ம ஜன்ம கே துக பிஸராவை || 33 ||

அம்த கால ரகுவர புரஜாயீ |
ஜஹாம் ஜன்ம ஹரிபக்த கஹாயீ || 34 ||

ஔர தேவதா சித்த ன தரயீ |
ஹனுமத ஸேயி ஸர்வ ஸுக கரயீ || 35 ||

ஸம்கட கடை மிடை ஸப பீரா |
ஜோ ஸுமிரை ஹனுமத பல வீரா || 36 ||

ஜை ஜை ஜை ஹனுமான கோஸாயீ |
க்றுபா கரோ குருதேவ கீ னாயீ || 37 ||

ஜோ ஶத வார பாட கர கோயீ |
சூடஹி பன்தி மஹா ஸுக ஹோயீ || 38 ||

ஜோ யஹ படை ஹனுமான சாலீஸா |
ஹோய ஸித்தி ஸாகீ கௌரீஶா || 39 ||

துலஸீதாஸ ஸதா ஹரி சேரா |
கீஜை னாத ஹ்றுதய மஹ டேரா || 40 ||

முடிவடைந்த தோஹா, ராமு, லக்ஷ்மன் மற்றும் சீதாவுடன் ஹனுமனை இதயத்தில் வசிக்குமாறு கேட்டுக்கொள்கிறார்.

|| தோஹா முடிந்தது ||

பவன தனய ஸங்கட ஹரண – மங்கள மூரதி ரூப் |
ராம லகன ஸீதா ஸஹித – ஹ்றுதய பஸஹு ஸுரபூப் ||

ஜெய் கோஷ்

போல் பஜாரங்கபாலி கி ஜெய் | 
பவன் புத்ரா ஹனுமான் கி ஜெய் ||

 

 

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Hanuman Chalisha in Oriya-Odia | ଶ୍ରୀ ହନୁମାନ ଚାଳିଶ

Hanuman Chalisha in Oriya: Hanuman Chalisa is a Hindu devotional hymn (stotra) addressed to Lord Hanuman. It is written by saint Tulsidas in the 16th century. Hanuman Chalisa has 40 verses excluding the dohas at the beginning and at the end.

Hanuman Chalisha in Oriya
Hanuman Chalisha in Oriya

Hanuman Chalisha in Oriya

  • The first ten Chaupais are described, auspicious form, knowledge, virtues, powers, and bravery of Hanuman.
  • Eleventh to fifteenth Chaupais describing the role of Hanuman in bringing back Lakshman to consciousness.
  • Eleven to twenty Chaupais describe the act of Hanuman in his service to Prabhu Shri Ram.
  • From the twenty-first Chaupai, Tulsidas describes the need for Hanuman’s Kripa. In the end, Saint Tulsidas greets Lord Hanuman and requests him to reside in his heart. 

 

The first introductory Doha begins with the word shrī, which refers to Mata Sita, who is considered the Guru of Hanuman.

ଶ୍ରୀ ହନୁମାନ ଚାଳିଶ

।। ଦୋହା ।।

ଶ୍ରୀ ଗୁରୁ ଚରଣ ସରୋଜ ରଜ ନିଜମନ ମୁକୁର ସୁଧାରି |
ଵରଣୌ ରଘୁଵର ଵିମଲୟଶ ଜୋ ଦାୟକ ଫଲଚାରି ||

।। ଚୌପାଈ ।।

ଜୟ ହନୁମାନ ଜ୍ଞାନ ଗୁଣ ସାଗର |
ଜୟ କପୀଶ ତିହୁ ଲୋକ ଉଜାଗର || 1 ||

ରାମଦୂତ ଅତୁଲିତ ବଲଧାମା |
ଅଂଜନି ପୁତ୍ର ପଵନସୁତ ନାମା || 2 ||

ମହାଵୀର ଵିକ୍ରମ ବଜରଙ୍ଗୀ |
କୁମତି ନିଵାର ସୁମତି କେ ସଙ୍ଗୀ || 3 ||

କଂଚନ ଵରଣ ଵିରାଜ ସୁଵେଶା |
କାନନ କୁଂଡଲ କୁଂଚିତ କେଶା || 4 ||

ହାଥଵଜ୍ର ଔ ଧ୍ଵଜା ଵିରାଜୈ |
କାଂଥେ ମୂଂଜ ଜନେଵୂ ସାଜୈ || 5 ||

ଶଂକର ସୁଵନ କେସରୀ ନନ୍ଦନ |
ତେଜ ପ୍ରତାପ ମହାଜଗ ଵନ୍ଦନ || 6 ||

ଵିଦ୍ୟାଵାନ ଗୁଣୀ ଅତି ଚାତୁର |
ରାମ କାଜ କରିଵେ କୋ ଆତୁର || 7 ||

ପ୍ରଭୁ ଚରିତ୍ର ସୁନିଵେ କୋ ରସିୟା |
ରାମଲଖନ ସୀତା ମନ ବସିୟା || 8 ||

ସୂକ୍ଷ୍ମ ରୂପଧରି ସିୟହି ଦିଖାଵା |
ଵିକଟ ରୂପଧରି ଲଂକ ଜରାଵା || 9 ||

ଭୀମ ରୂପଧରି ଅସୁର ସଂହାରେ |
ରାମଚଂଦ୍ର କେ କାଜ ସଂଵାରେ || 10 ||

ଲାୟ ସଂଜୀଵନ ଲଖନ ଜିୟାୟେ |
ଶ୍ରୀ ରଘୁଵୀର ହରଷି ଉରଲାୟେ || 11 ||

ରଘୁପତି କୀନ୍ହୀ ବହୁତ ବଡାୟୀ |
ତୁମ ମମ ପ୍ରିୟ ଭରତହି ସମ ଭାୟୀ || 12 ||

ସହସ ଵଦନ ତୁମ୍ହରୋ ୟଶଗାଵୈ |
ଅସ କହି ଶ୍ରୀପତି କଣ୍ଠ ଲଗାଵୈ || 13 ||

ସନକାଦିକ ବ୍ରହ୍ମାଦି ମୁନୀଶା |
ନାରଦ ଶାରଦ ସହିତ ଅହୀଶା || 14 ||

ୟମ କୁବେର ଦିଗପାଲ ଜହାଂ ତେ |
କଵି କୋଵିଦ କହି ସକେ କହାଂ ତେ || 15 ||

ତୁମ ଉପକାର ସୁଗ୍ରୀଵହି କୀନ୍ହା |
ରାମ ମିଲାୟ ରାଜପଦ ଦୀନ୍ହା || 16 ||

ତୁମ୍ହରୋ ମନ୍ତ୍ର ଵିଭୀଷଣ ମାନା |
ଲଂକେଶ୍ୱର ଭୟେ ସବ ଜଗ ଜାନା || 17 ||

ୟୁଗ ସହସ୍ର ୟୋଜନ ପର ଭାନୂ |
ଲୀଲ୍ୟୋ ତାହି ମଧୁର ଫଲ ଜାନୂ || 18 ||

ପ୍ରଭୁ ମୁଦ୍ରିକା ମେଲି ମୁଖ ମାହୀ |
ଜଲଧି ଲାଂଘି ଗୟେ ଅଚରଜ ନାହୀ || 19 ||

ଦୁର୍ଗମ କାଜ ଜଗତ କେ ଜେତେ |
ସୁଗମ ଅନୁଗ୍ରହ ତୁମ୍ହରେ ତେତେ || 20 ||

ରାମ ଦୁଆରେ ତୁମ ରଖଵାରେ |
ହୋତ ନ ଆଜ୍ଞା ବିନୁ ପୈସାରେ || 21 ||

ସବ ସୁଖ ଲହୈ ତୁମ୍ହାରୀ ଶରଣା |
ତୁମ ରକ୍ଷକ କାହୂ କୋ ଡର ନା || 22 ||

ଆପନ ତେଜ ତୁମ୍ହାରୋ ଆପୈ |
ତୀନୋଂ ଲୋକ ହାଂକ ତେ କାଂପୈ || 23 ||

ଭୂତ ପିଶାଚ ନିକଟ ନହି ଆଵୈ |
ମହଵୀର ଜବ ନାମ ସୁନାଵୈ || 24 ||

ନାସୈ ରୋଗ ହରୈ ସବ ପୀରା |
ଜପତ ନିରଂତର ହନୁମତ ଵୀରା || 25 ||

ସଂକଟ ସେଂ ହନୁମାନ ଛୁଡାଵୈ |
ମନ କ୍ରମ ଵଚନ ଧ୍ୟାନ ଜୋ ଲାଵୈ || 26 ||

ସବ ପର ରାମ ତପସ୍ଵୀ ରାଜା |
ତିନକେ କାଜ ସକଲ ତୁମ ସାଜା || 27 ||

ଔର ମନୋରଧ ଜୋ କୋୟି ଲାଵୈ |
ତାସୁ ଅମିତ ଜୀଵନ ଫଲ ପାଵୈ || 28 ||

ଚାରୋ ୟୁଗ ପରିତାପ ତୁମ୍ହାରା |
ହୈ ପରସିଦ୍ଧ ଜଗତ ଉଜିୟାରା || 29 ||

ସାଧୁ ସନ୍ତ କେ ତୁମ ରଖୱାରେ |
ଅସୁର ନିକନ୍ଦନ ରାମ ଦୁଲାରେ || 30 ||

ଅଷ୍ଠସିଦ୍ଧି ନଵ ନିଧି କେ ଦାତା |
ଅସ ଵର ଦୀନ୍ହ ଜାନକୀ ମାତା || 31 ||

ରାମ ରସାୟନ ତୁମ୍ହାରେ ପାସା |
ସାଦ ରହୋ ରଘୁପତି କେ ଦାସା || 32 ||

ତୁମ୍ହରେ ଭଜନ ରାମକୋ ପାଵୈ |
ଜନ୍ମ ଜନ୍ମ କେ ଦୁଖ ବିସରାଵୈ || 33 ||

ଅଂତ କାଲ ରଘୁଵର ପୁରଜାୟୀ |
ଜହାଂ ଜନ୍ମ ହରିଭକ୍ତ କହାୟୀ || 34 ||

ଔର ଦେଵତା ଚିତ୍ତ ନ ଧରୟୀ |
ହନୁମତ ସେୟି ସର୍ଵ ସୁଖ କରୟୀ || 35 ||

ସଂକଟ କଟୈ ମିଟୈ ସବ ପୀରା |
ଜୋ ସୁମିରୈ ହନୁମତ ବଲ ଵୀରା || 36 ||

ଜୈ ଜୈ ଜୈ ହନୁମାନ ଗୋସାୟୀ |
କୃପା କରୋ ଗୁରୁଦେଵ କୀ ନାୟୀ || 37 ||

ଜୋ ଶତ ଵାର ପାଠ କର କୋୟୀ |
ଛୂଟହି ବନ୍ଦି ମହା ସୁଖ ହୋୟୀ || 38 ||

ଜୋ ୟହ ପଡୈ ହନୁମାନ ଚାଲୀସା |
ହୋୟ ସିଦ୍ଧି ସାଖୀ ଗୌରୀଶା || 39 ||

ତୁଲସୀଦାସ ସଦା ହରି ଚେରା |
କୀଜୈ ନାଥ ହୃଦୟ ମହ ଡେରା || 40 ||

The concluding Doha requests Hanuman to reside in the heart, along with Ram, Lakshman and Sita.

।। ଦୋହା ।।

ବୁଦ୍ଧିହୀନ ତନୁଜାନିକୈ ସୁମିରୌ ପଵନ କୁମାର |
ବଲ ବୁଦ୍ଧି ଵିଦ୍ୟା ଦେହୁ ମୋହି ହରହୁ କଲେଶ ଵିକାର ||

ସିୟାଵର ରାମଚନ୍ଦ୍ରକୀ ଜୟ |
ପଵନସୁତ ହନୁମାନକୀ ଜୟ |
ବୋଲୋ ଭାୟୀ ସବ ସନ୍ତନକୀ ଜୟ |

 

 

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Hanuman Chalisa in Marathi | मराठी श्री हनुमान चालीसा

Hanuman Chalisa in Marathi: हनुमान चालीसा हे भगवान हनुमानाला संबोधित केलेले हिंदू भक्ती स्तोत्र आहे. हे 16 व्या शतकात संत तुळशीदास यांनी लिहिले आहे. हनुमान चालीसा मध्ये सुरवातीचा आणि शेवटचा दोहा सोडून एकंदरीत 40 श्लोक आहेत ज्यांना चौपाई म्हटले जाते. 

Hanuman Chalisa in Marathi
Hanuman Chalisa in Marathi

Hanuman Chalisa in Marathi

  • सुरवातीच्या पहिल्या दहा चौपायां मध्ये हनुमानजींच्या शुभ स्वरूप, ज्ञान, गुण, शक्ती आणि शौर्या चे वर्णन केले आहे.
  • अकराव्या ते पंधराव्या चौपाईमध्ये लक्ष्मणांना मुर्छित अवस्थेतून चैतन्यात आणण्याच्या हनुमानजींच्या भूमिकेचे वर्णन केले आहे.
  • अकरा ते वीस चौपाईमध्ये मध्ये भगवान श्रीरामाच्या सेवेमध्ये हनुमानजींच्या कार्याचे वर्णन केले आहे.
  • एकविसाव्या चौपाई पासून तुळशीदास हनुमानजींच्या कृपेची आवश्यकता वर्णन करतात. शेवटी संत तुळशीदास भगवान हनुमानास अभिवादन करतात आणि हृदयात वास करण्याची विनंती करतात.
  • पहिला परिचयात्मक दोहा हा श्री या शब्दापासून सुरू होतो, श्री या शब्दाचा सन्दर्भ माता सीतेशी आहे, माता सीतेला हनुमानाचा गुरु मानले जाते.

 

मराठी व हिंदी या दोनही भाषा देवनागरी लिपित लिहिल्या जात असल्या मुळे श्री हनुमान चालीसा चे मराठीत भाषांतर करण्याची आवशक्ता नाही आहे. वाचकास विनंती आहे की त्यांनी खाली दिलेली हिंदी हनुमान चालीसा वाचावी. धन्यवाद.

|| परिचयात्मक दोहा ||

श्रीगुरु चरन सरोज रज निज मनु मुकुरु सुधारि ।
बरनउँ रघुबर बिमल जसु जो दायकु फल चारि ॥

बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौ पवनकुमार।
बल बुद्धि विद्या देहु मोहि हरहु कलेस विकार॥

|| चौपाई ||

जय हनुमान ज्ञान गुन सागर।
जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥ १ ॥

राम दूत अतुलित बल धामा।
अंजनि पुत्र पवनसुत नामा॥ २ ॥

महावीर विक्रम बजरंगी।
कुमति निवार सुमति के संगी॥ ३ ॥

कंचन बरन बिराज सुबेसा।
कानन कुंडल कुंचित केसा॥ ४ ॥

हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै।
काँधे मूँज जनेऊ साजै॥ ५ ॥

शंकर सुवन केसरी नंदन।
तेज प्रताप महा जग बंदन॥ ६ ॥

विद्यावान गुनी अति चातुर।
राम काज करिबे को आतुर॥ ७ ॥

प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया।
राम लखन सीता मन बसिया॥ ८ ॥

सूक्ष्म रूप धरी सियहिं दिखावा।
बिकट रूप धरि लंक जरावा॥ ९ ॥

भीम रूप धरि असुर सँहारे।
रामचन्द्र के काज सँवारे॥ १० ॥

लाय सँजीवनि लखन जियाए।
श्रीरघुबीर हरषि उर लाए॥ ११ ॥

रघुपति कीन्हीं बहुत बड़ाई।
तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई॥ १२ ॥

सहस बदन तुम्हरो जस गावैं।
अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं॥ १३ ॥

सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा।
नारद सारद सहित अहीसा॥ १४ ॥

जम कुबेर दिक्पाल जहाँ ते।
कबी कोबिद कहि सकैं कहाँ ते॥ १५ ॥

तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा।
राम मिलाय राजपद दीन्हा॥ १६ ॥

तुम्हरो मन्त्र बिभीषन माना।
लंकेश्वर भए सब जग जाना॥ १७ ॥

जुग सहस्र जोजन पर भानू।
लील्यो ताहि मधुर फल जानू॥ १८ ॥

प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं।
जलधि लाँघि गये अचरज नाहीं॥ १९ ॥

दुर्गम काज जगत के जेते । 
सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते॥ २० ॥

राम दुआरे तुम रखवारे।
होत न आज्ञा बिनु पैसारे॥ २१ ॥

सब सुख लहै तुम्हारी शरना।
तुम रक्षक काहू को डरना॥ २२ ॥

आपन तेज सम्हारो आपै।
तीनौं लोक हाँक ते काँपे॥ २३ ॥

भूत पिशाच निकट नहिं आवै।
महाबीर जब नाम सुनावै॥ २४ ॥

नासै रोग हरै सब पीरा।
जपत निरंतर हनुमत बीरा॥ २५ ॥

संकट तें हनुमान छुड़ावै।
मन क्रम बचन ध्यान जो लावै॥ २६ ॥

सब पर राम तपस्वी राजा।
तिन के काज सकल तुम साजा॥ २७ ॥

और मनोरथ जो कोई लावै।
सोहि अमित जीवन फल पावै॥ २८ ॥

चारों जुग परताप तुम्हारा।
है परसिद्ध जगत उजियारा॥ २९ ॥

साधु संत के तुम रखवारे।
असुर निकंदन राम दुलारे॥ ३० ॥

अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता।
अस बर दीन्ह जानकी माता॥ ३१ ॥

राम रसायन तुम्हरे पासा।
सदा रहो रघुपति के दासा॥ ३२ ॥

तुम्हरे भजन राम को पावै।
जनम जनम के दुख बिसरावै॥ ३३ ॥

अंत काल रघुबर पुर जाई।
जहाँ जन्म हरिभक्त कहाई॥ ३४ ॥

और देवता चित्त न धरई।
हनुमत सेइ सर्व सुख करई॥ ३५ ॥

संकट कटै मिटै सब पीरा।
जो सुमिरै हनुमत बलबीरा॥ ३६ ॥

जय जय जय हनुमान गुसाईं।
कृपा करहु गुरुदेव की नाईं॥ ३७ ॥

जो शत बार पाठ कर कोई।
छूटहि बंदि महा सुख होई॥ ३८ ॥

जो यह पढे हनुमान चालीसा।
होय सिद्धि साखी गौरीसा॥ ३९ ॥

तुलसीदास सदा हरि चेरा।
कीजै नाथ हृदय महँ डेरा॥ ४० ॥

शेवटच्या दोह्यामध्ये तुलसीदास हनुमानजीना प्रभु राम, प्रभु लक्ष्मण आणी सीता माते सोबत हृदया मध्ये निवास करण्याची विनंती करतात.

|| दोहा का समापन ||

पवनतनय संकट हरन मंगल मूरति रूप।
राम लखन सीता सहित हृदय बसहु सुर भूप॥

|| जय घोष ||

बोला बजरंगबली की जय l
पवनपुत्र हनुमान की जय ll 

 

 

 

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Hanuman Chalisa in Gujarati | ગુજરાતીમાં હનુમાન ચાલીસા

Hanuman Chalisa in Gujarati: હનુમાન ચાલીસા એ ભગવાન હનુમાનને સંબોધિત એક હિન્દુ ભક્તિ સ્તોત્ર છે. તે સંત તુલસીદાસે 16 મી સદીમાં લખ્યું છે. હનુમાન ચાલીસાના શરૂઆતમાં અને અંતમાં દોહા સિવાય 40 શ્લોકો છે.

Hanuman Chalisa in Gujarati
Hanuman Chalisa in Gujarati

Hanuman Chalisa in Gujarati | હનુમાન ચાલીસા

  • પ્રથમ દસ ચૌપૈયા વર્ણવેલ છે, શુભ સ્વરૂપ, ગુણો, શક્તિઓ અને હનુમાનની બહાદુરી.
  • લક્ષ્મણને ચેતનામાં પાછા લાવવામાં હનુમાનની ભૂમિકા વર્ણવતા અગિયારમીથી પંદરમી ચોપાઈઓ.
  • અગિયારથી વીસ ચોપાઈઓ પ્રભુ શ્રી રામની તેમની સેવામાં હનુમાનના કાર્યનું વર્ણન કરે છે.
  • એકવીસમી ચોપાઈમાંથી, તુલસીદાસે હનુમાનની કૃપાની આવશ્યકતા વર્ણવી છે. અંતે, સંત તુલસીદાસે ભગવાન હનુમાનને શુભેચ્છા પાઠવી છે અને તેમના હૃદયમાં રહેવાની વિનંતી કરી છે.

 

પ્રથમ પ્રારંભિક દોહા શ્રી શબ્દથી શરૂ થાય છે, જે માતા સીતાનો સંદર્ભ આપે છે, જેમને હનુમાનના ગુરુ માનવામાં આવે છે.

|| પ્રસ્તાવના દોહા ||

શ્રી ગુરુ ચરણ સરોજ રજ નિજમન મુકુર સુધારિ |
વરણૌ રઘુવર વિમલયશ જો દાયક ફલચારિ ||

બુદ્ધિહીન તનુજાનિકૈ સુમિરૌ પવન કુમાર |
બલ બુદ્ધિ વિદ્યા દેહુ મોહિ હરહુ કલેશ વિકાર્ ||

|| ચોપાઈ ||

જય હનુમાન જ્ઞાન ગુણ સાગર |
જય કપીશ તિહુ લોક ઉજાગર || 1 ||

રામદૂત અતુલિત બલધામા |
અંજનિ પુત્ર પવનસુત નામા || 2 ||

મહાવીર વિક્રમ બજરંગી |
કુમતિ નિવાર સુમતિ કે સંગી ||3 ||

કંચન વરણ વિરાજ સુવેશા |
કાનન કુંડલ કુંચિત કેશા || 4 ||

હાથવજ્ર ઔ ધ્વજા વિરાજૈ |
કાંથે મૂંજ જનેવૂ સાજૈ || 5||

શંકર સુવન કેસરી નંદન |
તેજ પ્રતાપ મહાજગ વંદન || 6 ||

વિદ્યાવાન ગુણી અતિ ચાતુર |
રામ કાજ કરિવે કો આતુર || 7 ||

પ્રભુ ચરિત્ર સુનિવે કો રસિયા |
રામલખન સીતા મન બસિયા || 8||

સૂક્ષ્મ રૂપધરિ સિયહિ દિખાવા |
વિકટ રૂપધરિ લંક જરાવા || 9 ||

ભીમ રૂપધરિ અસુર સંહારે |
રામચંદ્ર કે કાજ સંવારે || 10 ||

લાય સંજીવન લખન જિયાયે |
શ્રી રઘુવીર હરષિ ઉરલાયે || 11 ||

રઘુપતિ કીન્હી બહુત બડાયી |
તુમ મમ પ્રિય ભરતહિ સમ ભાયી || 12 ||

સહસ વદન તુમ્હરો યશગાવૈ |
અસ કહિ શ્રીપતિ કંઠ લગાવૈ || 13 ||

સનકાદિક બ્રહ્માદિ મુનીશા |
નારદ શારદ સહિત અહીશા || 14 ||

યમ કુબેર દિગપાલ જહાં તે |
કવિ કોવિદ કહિ સકે કહાં તે || 15 ||

તુમ ઉપકાર સુગ્રીવહિ કીન્હા |
રામ મિલાય રાજપદ દીન્હા || 16 ||

તુમ્હરો મંત્ર વિભીષણ માના |
લંકેશ્વર ભયે સબ જગ જાના || 17 ||

યુગ સહસ્ર યોજન પર ભાનૂ |
લીલ્યો તાહિ મધુર ફલ જાનૂ || 18 ||

પ્રભુ મુદ્રિકા મેલિ મુખ માહી |
જલધિ લાંઘિ ગયે અચરજ નાહી || 19 ||

દુર્ગમ કાજ જગત કે જેતે |
સુગમ અનુગ્રહ તુમ્હરે તેતે || 20 ||

રામ દુઆરે તુમ રખવારે |
હોત ન આજ્ઞા બિનુ પૈસારે || 21 ||

સબ સુખ લહૈ તુમ્હારી શરણા |
તુમ રક્ષક કાહૂ કો ડર ના || 22 ||

આપન તેજ તુમ્હારો આપૈ |
તીનોં લોક હાંક તે કાંપૈ || 23 ||

ભૂત પિશાચ નિકટ નહિ આવૈ |
મહવીર જબ નામ સુનાવૈ || 24 ||

નાસૈ રોગ હરૈ સબ પીરા |
જપત નિરંતર હનુમત વીરા || 25 ||

સંકટ સેં હનુમાન છુડાવૈ |
મન ક્રમ વચન ધ્યાન જો લાવૈ || 26 ||

સબ પર રામ તપસ્વી રાજા |
તિનકે કાજ સકલ તુમ સાજા || 27 ||

ઔર મનોરધ જો કોયિ લાવૈ |
તાસુ અમિત જીવન ફલ પાવૈ || 28 ||

ચારો યુગ પરિતાપ તુમ્હારા |
હૈ પરસિદ્ધ જગત ઉજિયારા || 29 ||

સાધુ સંત કે તુમ રખવારે |
અસુર નિકંદન રામ દુલારે || 30 ||

અષ્ઠસિદ્ધિ નવ નિધિ કે દાતા |
અસ વર દીન્હ જાનકી માતા || 31 ||

રામ રસાયન તુમ્હારે પાસા |
સાદ રહો રઘુપતિ કે દાસા || 32 ||

તુમ્હરે ભજન રામકો પાવૈ |
જન્મ જન્મ કે દુખ બિસરાવૈ || 33 ||

અંત કાલ રઘુવર પુરજાયી |
જહાં જન્મ હરિભક્ત કહાયી || 34 ||

ઔર દેવતા ચિત્ત ન ધરયી |
હનુમત સેયિ સર્વ સુખ કરયી || 35 ||

સંકટ કટૈ મિટૈ સબ પીરા |
જો સુમિરૈ હનુમત બલ વીરા || 36 ||

જૈ જૈ જૈ હનુમાન ગોસાયી |
કૃપા કરો ગુરુદેવ કી નાયી || 37 ||

જો શત વાર પાઠ કર કોયી |
છૂટહિ બંદિ મહા સુખ હોયી || 38 ||

જો યહ પડૈ હનુમાન ચાલીસા |
હોય સિદ્ધિ સાખી ગૌરીશા || 39 ||

તુલસીદાસ સદા હરિ ચેરા |
કીજૈ નાથ હૃદય મહ ડેરા || 40 ||

અંતિમ દોહા રામ, લક્ષ્મણ અને સીતાની સાથે હનુમાનને હૃદયમાં રહેવા વિનંતી કરે છે.

|| દોહા સમાપ્ત ||

પવન તનય સંકટ હરણ – મંગળ મૂરતિ રૂપ્ |
રામ લખન સીતા સહિત – હૃદય બસહુ સુરભૂપ્ ||

|| જય ઘોષ ||

બોલ બજરંગબળી કી જય ।
પવન પુત્ર હનુમાન કી જય ॥

 

 

 

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Gujarati

Hanuman Chalisa in Kannada | ಕನ್ನಡದಲ್ಲಿ ಹನುಮಾನ್ ಚಾಲಿಸಾ

Hanuman Chalisa in Kannada: ಹನುಮಾನ್ ಚಾಲಿಸಾ ಎಂಬುದು ಹಿಂದೂ ಭಕ್ತಿ ಸ್ತೋತ್ರ (ಸ್ತೋತ್ರ). ಇದನ್ನು 16 ನೇ ಶತಮಾನದಲ್ಲಿ ಸಂತ ತುಳಸಿದಾಸ್ ಬರೆದಿದ್ದಾರೆ. ಹನುಮಾನ್ ಚಾಲಿಸಾ ಆರಂಭದಲ್ಲಿ ಮತ್ತು ಕೊನೆಯಲ್ಲಿ ದೋಹಾಗಳನ್ನು ಹೊರತುಪಡಿಸಿ 40 ಪದ್ಯಗಳನ್ನು ಹೊಂದಿದೆ.

Hanuman Chalisa in Kannada
Hanuman Chalisa in Kannada

hanuman chalisa in kannada | ಹನುಮಾನ್ ಚಾಲಿಸಾ

  • ಮೊದಲ ಹತ್ತು ಚೌಪಾಯಿಗಳನ್ನು ವಿವರಿಸಲಾಗಿದೆ, ಶುಭ ರೂಪ, ಜ್ಞಾನ, ಸದ್ಗುಣಗಳು, ಅಧಿಕಾರಗಳು ಮತ್ತು ಹನುಮನ ಧೈರ್ಯ.
  • ಹನ್ನೊಂದನೇಯಿಂದ ಹದಿನೈದನೆಯ ಚೌಪಾಯರು ಲಕ್ಷ್ಮಣನನ್ನು ಪ್ರಜ್ಞೆಗೆ ಮರಳಿಸುವಲ್ಲಿ ಹನುಮನ ಪಾತ್ರವನ್ನು ವಿವರಿಸುತ್ತಾರೆ.
  • ಹನ್ನೊಂದರಿಂದ ಇಪ್ಪತ್ತು ಚೌಪಾಯರು ಪ್ರಭು ಶ್ರೀ ರಾಮ್‌ಗೆ ಮಾಡಿದ ಸೇವೆಯಲ್ಲಿ ಹನುಮಾನ್ ಮಾಡಿದ ಕಾರ್ಯವನ್ನು ವಿವರಿಸುತ್ತಾರೆ.
  • ಇಪ್ಪತ್ತೊಂದನೇ ಚೌಪೈನಿಂದ, ತುಳಸಿದಾಸ್ ಹನುಮನ ಕೃಪಾ ಅಗತ್ಯವನ್ನು ವಿವರಿಸುತ್ತಾನೆ. ಕೊನೆಯಲ್ಲಿ, ಸಂತ ತುಳಸಿದಾಸ್ ಭಗವಾನ್ ಹನುಮನನ್ನು ಸ್ವಾಗತಿಸುತ್ತಾನೆ ಮತ್ತು ಅವನ ಹೃದಯದಲ್ಲಿ ವಾಸಿಸುವಂತೆ ವಿನಂತಿಸುತ್ತಾನೆ.

 

ಮೊದಲ ಪರಿಚಯಾತ್ಮಕ ದೋಹಾವು ಶ್ರೀ ಎಂಬ ಪದದಿಂದ ಪ್ರಾರಂಭವಾಗುತ್ತದೆ, ಇದು ಹನುಮನ ಗುರು ಎಂದು ಪರಿಗಣಿಸಲ್ಪಟ್ಟ ಮಾತಾ ಸೀತೆಯನ್ನು ಸೂಚಿಸುತ್ತದೆ.

ಪರಿಚಯಾತ್ಮಕ ದೋಹಾ

ಶ್ರೀ ಗುರು ಚರಣ ಸರೋಜ ರಜ ನಿಜಮನ ಮುಕುರ ಸುಧಾರಿ |
ವರಣೌ ರಘುವರ ವಿಮಲಯಶ ಜೋ ದಾಯಕ ಫಲಚಾರಿ ||                                                

ಬುದ್ಧಿಹೀನ ತನುಜಾನಿಕೈ ಸುಮಿರೌ ಪವನ ಕುಮಾರ |
ಬಲ ಬುದ್ಧಿ ವಿದ್ಯಾ ದೇಹು ಮೋಹಿ ಹರಹು ಕಲೇಶ ವಿಕಾರ್ ||

ಚೌಪೈ

ಜಯ ಹನುಮಾನ ಜ್ಞಾನ ಗುಣ ಸಾಗರ |
ಜಯ ಕಪೀಶ ತಿಹು ಲೋಕ ಉಜಾಗರ || 1 ||

ರಾಮದೂತ ಅತುಲಿತ ಬಲಧಾಮಾ |
ಅಂಜನಿ ಪುತ್ರ ಪವನಸುತ ನಾಮಾ || 2 ||

ಮಹಾವೀರ ವಿಕ್ರಮ ಬಜರಂಗೀ |
ಕುಮತಿ ನಿವಾರ ಸುಮತಿ ಕೇ ಸಂಗೀ ||3 ||

ಕಂಚನ ವರಣ ವಿರಾಜ ಸುವೇಶಾ |
ಕಾನನ ಕುಂಡಲ ಕುಂಚಿತ ಕೇಶಾ || 4 ||

ಹಾಥವಜ್ರ ಔ ಧ್ವಜಾ ವಿರಾಜೈ |
ಕಾಂಥೇ ಮೂಂಜ ಜನೇವೂ ಸಾಜೈ || 5||

ಶಂಕರ ಸುವನ ಕೇಸರೀ ನಂದನ |
ತೇಜ ಪ್ರತಾಪ ಮಹಾಜಗ ವಂದನ || 6 ||

ವಿದ್ಯಾವಾನ ಗುಣೀ ಅತಿ ಚಾತುರ |
ರಾಮ ಕಾಜ ಕರಿವೇ ಕೋ ಆತುರ || 7 ||

ಪ್ರಭು ಚರಿತ್ರ ಸುನಿವೇ ಕೋ ರಸಿಯಾ |
ರಾಮಲಖನ ಸೀತಾ ಮನ ಬಸಿಯಾ || 8||

ಸೂಕ್ಷ್ಮ ರೂಪಧರಿ ಸಿಯಹಿ ದಿಖಾವಾ |
ವಿಕಟ ರೂಪಧರಿ ಲಂಕ ಜರಾವಾ || 9 ||

ಭೀಮ ರೂಪಧರಿ ಅಸುರ ಸಂಹಾರೇ |
ರಾಮಚಂದ್ರ ಕೇ ಕಾಜ ಸಂವಾರೇ || 10 ||

ಲಾಯ ಸಂಜೀವನ ಲಖನ ಜಿಯಾಯೇ |
ಶ್ರೀ ರಘುವೀರ ಹರಷಿ ಉರಲಾಯೇ || 11 ||

ರಘುಪತಿ ಕೀನ್ಹೀ ಬಹುತ ಬಡಾಯೀ |
ತುಮ ಮಮ ಪ್ರಿಯ ಭರತಹಿ ಸಮ ಭಾಯೀ || 12 ||

ಸಹಸ ವದನ ತುಮ್ಹರೋ ಯಶಗಾವೈ |
ಅಸ ಕಹಿ ಶ್ರೀಪತಿ ಕಂಠ ಲಗಾವೈ || 13 ||

ಸನಕಾದಿಕ ಬ್ರಹ್ಮಾದಿ ಮುನೀಶಾ |
ನಾರದ ಶಾರದ ಸಹಿತ ಅಹೀಶಾ || 14 ||

ಯಮ ಕುಬೇರ ದಿಗಪಾಲ ಜಹಾಂ ತೇ |
ಕವಿ ಕೋವಿದ ಕಹಿ ಸಕೇ ಕಹಾಂ ತೇ || 15 ||

ತುಮ ಉಪಕಾರ ಸುಗ್ರೀವಹಿ ಕೀನ್ಹಾ |
ರಾಮ ಮಿಲಾಯ ರಾಜಪದ ದೀನ್ಹಾ || 16 ||

ತುಮ್ಹರೋ ಮಂತ್ರ ವಿಭೀಷಣ ಮಾನಾ |
ಲಂಕೇಶ್ವರ ಭಯೇ ಸಬ ಜಗ ಜಾನಾ || 17 ||

ಯುಗ ಸಹಸ್ರ ಯೋಜನ ಪರ ಭಾನೂ |
ಲೀಲ್ಯೋ ತಾಹಿ ಮಧುರ ಫಲ ಜಾನೂ || 18 ||

ಪ್ರಭು ಮುದ್ರಿಕಾ ಮೇಲಿ ಮುಖ ಮಾಹೀ |
ಜಲಧಿ ಲಾಂಘಿ ಗಯೇ ಅಚರಜ ನಾಹೀ || 19 ||

ದುರ್ಗಮ ಕಾಜ ಜಗತ ಕೇ ಜೇತೇ |
ಸುಗಮ ಅನುಗ್ರಹ ತುಮ್ಹರೇ ತೇತೇ || 20 ||

ರಾಮ ದುಆರೇ ತುಮ ರಖವಾರೇ |
ಹೋತ ನ ಆಜ್ಞಾ ಬಿನು ಪೈಸಾರೇ || 21 ||

ಸಬ ಸುಖ ಲಹೈ ತುಮ್ಹಾರೀ ಶರಣಾ |
ತುಮ ರಕ್ಷಕ ಕಾಹೂ ಕೋ ಡರ ನಾ || 22 ||

ಆಪನ ತೇಜ ತುಮ್ಹಾರೋ ಆಪೈ |
ತೀನೋಂ ಲೋಕ ಹಾಂಕ ತೇ ಕಾಂಪೈ || 23 ||

ಭೂತ ಪಿಶಾಚ ನಿಕಟ ನಹಿ ಆವೈ |
ಮಹವೀರ ಜಬ ನಾಮ ಸುನಾವೈ || 24 ||

ನಾಸೈ ರೋಗ ಹರೈ ಸಬ ಪೀರಾ |
ಜಪತ ನಿರಂತರ ಹನುಮತ ವೀರಾ || 25 ||

ಸಂಕಟ ಸೇಂ ಹನುಮಾನ ಛುಡಾವೈ |
ಮನ ಕ್ರಮ ವಚನ ಧ್ಯಾನ ಜೋ ಲಾವೈ || 26 ||

ಸಬ ಪರ ರಾಮ ತಪಸ್ವೀ ರಾಜಾ |
ತಿನಕೇ ಕಾಜ ಸಕಲ ತುಮ ಸಾಜಾ || 27 ||

ಔರ ಮನೋರಧ ಜೋ ಕೋಯಿ ಲಾವೈ |
ತಾಸು ಅಮಿತ ಜೀವನ ಫಲ ಪಾವೈ || 28 ||

ಚಾರೋ ಯುಗ ಪರಿತಾಪ ತುಮ್ಹಾರಾ |
ಹೈ ಪರಸಿದ್ಧ ಜಗತ ಉಜಿಯಾರಾ || 29 ||

ಸಾಧು ಸಂತ ಕೇ ತುಮ ರಖವಾರೇ |
ಅಸುರ ನಿಕಂದನ ರಾಮ ದುಲಾರೇ || 30 ||

ಅಷ್ಠಸಿದ್ಧಿ ನವ ನಿಧಿ ಕೇ ದಾತಾ |
ಅಸ ವರ ದೀನ್ಹ ಜಾನಕೀ ಮಾತಾ || 31 ||

ರಾಮ ರಸಾಯನ ತುಮ್ಹಾರೇ ಪಾಸಾ |
ಸಾದ ರಹೋ ರಘುಪತಿ ಕೇ ದಾಸಾ || 32 ||

ತುಮ್ಹರೇ ಭಜನ ರಾಮಕೋ ಪಾವೈ |
ಜನ್ಮ ಜನ್ಮ ಕೇ ದುಖ ಬಿಸರಾವೈ || 33 ||

ಅಂತ ಕಾಲ ರಘುವರ ಪುರಜಾಯೀ |
ಜಹಾಂ ಜನ್ಮ ಹರಿಭಕ್ತ ಕಹಾಯೀ || 34 ||

ಔರ ದೇವತಾ ಚಿತ್ತ ನ ಧರಯೀ |
ಹನುಮತ ಸೇಯಿ ಸರ್ವ ಸುಖ ಕರಯೀ || 35 ||

ಸಂಕಟ ಕಟೈ ಮಿಟೈ ಸಬ ಪೀರಾ |
ಜೋ ಸುಮಿರೈ ಹನುಮತ ಬಲ ವೀರಾ || 36 ||

ಜೈ ಜೈ ಜೈ ಹನುಮಾನ ಗೋಸಾಯೀ |
ಕೃಪಾ ಕರೋ ಗುರುದೇವ ಕೀ ನಾಯೀ || 37 ||

ಜೋ ಶತ ವಾರ ಪಾಠ ಕರ ಕೋಯೀ |
ಛೂಟಹಿ ಬಂದಿ ಮಹಾ ಸುಖ ಹೋಯೀ || 38 ||

ಜೋ ಯಹ ಪಡೈ ಹನುಮಾನ ಚಾಲೀಸಾ |
ಹೋಯ ಸಿದ್ಧಿ ಸಾಖೀ ಗೌರೀಶಾ || 39 ||

ತುಲಸೀದಾಸ ಸದಾ ಹರಿ ಚೇರಾ |
ಕೀಜೈ ನಾಥ ಹೃದಯ ಮಹ ಡೇರಾ || 40 ||

ಕೊನೆಯ ದೋಹಾ ಹನುಮನನ್ನು ರಾಮ್, ಲಕ್ಷ್ಮಣ್ ಮತ್ತು ಸೀತಾ ಅವರೊಂದಿಗೆ ಹೃದಯದಲ್ಲಿ ವಾಸಿಸುವಂತೆ ವಿನಂತಿಸುತ್ತಾನೆ.

ದೋಹಾ

ಪವನ ತನಯ ಸಂಕಟ ಹರಣ – ಮಂಗಳ ಮೂರತಿ ರೂಪ್ |
ರಾಮ ಲಖನ ಸೀತಾ ಸಹಿತ – ಹೃದಯ ಬಸಹು ಸುರಭೂಪ್ ||

ಜೈ ಘೋಷ್

ಸಿಯಾವರ ರಾಮಚಂದ್ರಕೀ ಜಯ |                                                                        ಪವನಸುತ ಹನುಮಾನಕೀ ಜಯ |                                                                            ಬೋಲೋ ಭಾಯೀ ಸಬ ಸಂತನಕೀ ಜಯ ||

 

 

 

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Lord Krishna Wallpapers in hd | श्री कृष्ण की मनमोहक तस्वीरे

Lord Krishna सनातन धर्म में भगवान विष्णु के आठवे अवतार माने जाते है| भगवान श्रीकृष्ण हिन्दू धर्म के एक लोकप्रिय देवता है जो दया, कोमलता और प्रेम के देवता है|

भगवान श्रीकृष्ण का जन्म द्वापर युग में हुआ था| महर्षी वेद व्यास जो श्रीकृष्ण के समकालीन थे उनकी रचित श्रीमद्भागवत और महाभारत में श्रीकृष्ण के चरित्र का विस्तृत वर्णन किया गया है| भगवान श्रीकृष्ण के देहांत के साथ द्वापर युग समाप्त हो गया| 

Lord Krishna Wallpapers in hd

लगभग 180 ईसा पूर्व में इंडो-ग्रीक राजा ‘अगाथोकल्स’ ने देवताओं के चित्र धारण करने वाले कुछ सिक्के जारी किए थे| इन सिक्को पर गदा, हल और भगवान श्रीकृष्ण, शंख और सुदर्शन चक्र दर्शाये हुए है| 

कई पुरानो में कृष्ण के जीवन कथा को बताया गया है| महाकाव्य महाभारत मे भगवान श्रीकृष्ण के बारे में विस्तृत विवरण दिया गया है| भागवत पुराण और विष्णु पुराण इत्यादी में भी कृष्ण कहानिया दी गयी है पर यह कहानिया एक दुसरे से थोडीसी भिन्न है| 

भगवान श्रीकृष्ण का जन्म ‘मथुरा’ के कारागार में भाद्रपद मास के कृष्णपक्ष में अष्टिमी तिथि, रोहिणी नक्षत्र के दिन रात्रि के 12 बजे हुआ था| कृष्ण का जन्म दिन जन्माष्टमी के नाम से भारत, नेपाल, अमेरिका सहित विश्व के बहुत सारे देशो में आनंद से मनाया जाता है| 

१२४ वर्ष के जीवन काल के बाद श्रीकृष्ण ने अपना मानव अवतार त्याग दिया| भागवत पुराण के अध्याय ३१ में कहा गया है की भगवान श्रीकृष्ण अपने देहांत के बाद, योगिक एकाग्रता की वजह से सीधे वैकुंठ (स्वर्ग) में लौटे| 

दक्षिण भारत में कृष्ण जन्माष्टमी व्यापक रूप से मनाए जाने वाले त्योहारों में से एक है। तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और केरल के राज्यों में कई प्रमुख कृष्ण मंदिर हैं|

कृष्ण की प्रतिमाओं को थाईलैंड में भी पाया गया है| वियतनाम और कंबोडिया की मध्यकालीन युग में कृष्ण कला की विशेषता है|

भगवान श्रीकृष्ण का चित्रण आमतौर पर विष्णु जैसे कृष्ण, काले या नीले रंग की त्वचा के साथ किया जाता है| कृष्ण को अक्सर मोर-पंख वाले मुकुट और भारतीय बांसुरी बजाते हुए दिखाया जाता है। कृष्ण को आमतौर पर त्रिभन्ग मुद्रा में पर एक पैर को दुसरे पैर में डाले रूप में चित्रित किया जाता है| कृष्ण को अक्सर बालक के रूप में भी दिखाया जाता है|

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Shivaji Maharaj HD Wallpapers और उनके परिवार के बारे में पूरी जानकारी 2020 तक

पूरे हिंदुस्तान और महाराष्ट्र के आराध्य दैवत, हिन्दुओ के प्रेरणा स्थान श्री छत्रपति Shivaji Maharaj का जनम 19 फ़रवरी 1630 को शिवनेरी किले पर हुआ| उनके पिताजी का नाम श्री छत्रपति शाहजी महाराज और माताजी का नाम राजमाता जिजाऊ था| 

अपने पराक्रम से श्री छत्रपति Shivaji Maharaj ने मराठो के साम्राज्य की नीव रखी| जिसकी बदौलत मराठोने भीम पराक्रम दिखाकर मुघलो को मात देकर लगभग पुरे हिंदुस्तान को जीत लिया था| 

श्री छत्रपति Shivaji Maharaj के परिवार के बारे में जानकारी 

श्री छत्रपति Shivaji Maharaj के आठ विवाह हुए थे| उनके पत्नियो के नाम 

  1. सईबाई निम्बालकर
  2. सोयराबाई मोहिते 
  3. पुतलाबाई पालकर 
  4. लक्ष्मीबाई विचारे 
  5. गूनवंताबाई इंगले 
  6. काशीबाई जाधव
  7. सगुनाबाई शिंदे 
  8. सकवाराबाई गायकवाड 

श्री छत्रपति Shivaji Maharaj को दो बेटे और छह बेटियां थी|

बेटों के नाम

  1. छत्रपति संभाजी महाराज   (माता सईबाई निम्बालकर)
  2. छत्रपति राजाराम महाराज  (माता सोयराबाई मोहिते)

बेटियों के नाम 

  1. अम्बिकाबाई महाडिक  (माता सईबाई निम्बालकर)
  2. रानुबाई पाटकर  (माता सईबाई निम्बालकर)
  3. सखुबाई निम्बालकर  (माता सईबाई निम्बालकर)
  4. दीपाबाई  (माता सोयराबाई)
  5. राजकुंवरबाई  (माता सगूनाबाई)
  6. कमलाबाई   (माता सकवारबाई)

श्री छत्रपति Shivaji Maharaj के बेटों का परिवार 

छत्रपति संभाजी महाराज के पत्नी का नाम येसूबाई था| इनको एक बेटा और तीन बेटिया थी| उनके नाम शाहुमहाराज (बेटा), भवानिबाई (बेटी), बाईसाहेब (बेटी) और अहिल्याबाई (बेटी)|

छत्रपति संभाजी महाराज के बाद उनके बेटे शाहुमहाराज ने सातारा के गद्दी को संभाला| 

सातारा के शाहुमहाराज के दत्तक पुत्र थे रामराजा|

और प्रतापसिंह के बेटे है आजके सातारा के उदयन राजे भोसले (2020)|

छत्रपति राजाराम महाराज की चार पत्निया थी|

  1. जानकीबाई गुजर 
  2. ताराबाई मोहिते 
  3. राजसबाई कगलकर घाटगे 
  4. अम्बिकाबाई 

छत्रपति राजाराम महाराज के दो बेटे थे| स्वयम छत्रपति राजाराम महाराज कोल्हापुर के राजा थे| उनके बाद उनके बेटो ने कोल्हापुर के गद्दी को संभाला|

  1. शिवाजी राजे  (माता ताराबाई)
  2. संभाजी राजे  (माता राजसबाई)

संभाजी राजे के पुत्र का नाम था शिवाजी राजे (तीसरे)|

 शाहू राजे के दो पुत्र है संभाजी राजे (साल 2020) और मालोजी राजे|

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इन्हें भी पढ़िए |

Durga Mata Ji images | दुर्गा माताजी की नयी अलौकिक तस्वीरे

Durga Mata ji images: दुर्गा माता को हिन्दू धर्म में दानव और दुष्टोंका संहार करने वाली माना जाता है| दानव और दुष्टोंका संहार करके दुर्गा माता लोंगो के जीवन में सुख, शांति और समृद्धि लाती है| इसलिए हिन्दू धर्म में दुर्गा माता का महत्वपूर्ण स्थान है|

Durga Mata Ji images

माता दुर्गा के दर्शन मात्र से ही जीवन में मौजूद परेशानिया, कष्ट, संकट दूर हो जाते है और मानव जीवन सुखी और समृद्ध जो जाता है| आप भी दुर्गा माता की इन अलौकिक तस्वीरोंका दर्शन कीजिये और धन्य हो जाये|

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महिषासुर दानव का वध करने के लिए विश्व के निर्माता ब्रह्माजी ने दुर्गा माता को बनाया था| दशहरे के दिन माता दुर्गा ने  महिषासुर दानव का वध किया था| 

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हिन्दू धर्म में दुर्गा माता को नारी शक्ति का एक रूप माना जाता है| नारी को दुर्गा की उपमा देकर सन्मानित किया जाता है|

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दुर्गा माता की सवारी शेर है|

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हिंदुस्तान में प्रमुख रूप से बंगाल में दुर्गोस्तव धूम-धाम से मनाया जाता है|

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Hanuman Chalisa in Bengali | বাংলা ভাষায় হনুমান চালিশা

Hanuman Chalisa in Bengali : হনুমান চালিশা হলেন হিন্দু ভক্তিমূলক স্তোত্র (স্টোত্র) যা ভগবান হনুমানকে সম্বোধন করেছিলেন। এটি ষোড়শ শতাব্দীতে সাধু তুলসীদাস লিখেছেন। শুরুতে ও শেষে দোহাস বাদে হনুমান চালিশার চল্লিশটি আয়াত রয়েছে। Hanuman Chalisa.

Hanuman Chalisa in Bengali
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Hanuman Chalisa in Bengali | হনুমান চালিশা

  • প্রথম দশটি চৌপাই বর্ণিত হয়েছে, শুভ রূপ, জ্ঞান, গুণ, শক্তি এবং হনুমানের সাহসী।
  • লক্ষ্মণকে চেতনাতে ফিরিয়ে আনতে হনুমানের ভূমিকা বর্ণনা করে একাদশ থেকে পনেরো চৌপাশ।
  • প্রভু শ্রী রামের সেবায় হনুমানের কাজকে এগারো থেকে বিশ জন চৌপাই বর্ণনা করেছেন।  
  • একবিংশ চৌপাই থেকে তুলসীদাস হনুমানের কৃপা প্রয়োজনের বর্ণনা দিয়েছেন। শেষ পর্যন্ত, संत তুলসীদাস ভগবান হনুমানকে শুভেচ্ছা জানিয়েছেন এবং তাঁর অন্তরে স্থির থাকার জন্য অনুরোধ করেছেন।  

প্রথম দোহায় শ্রী শব্দের মধ্য দিয়ে শুরু হয়েছিল, যা হনুমানের গুরু হিসাবে বিবেচিত মা সীতা বোঝায়।  

পরিচায়ক দোহা

শ্রী গুরু চরণ সরোজ রজ নিজমন মুকুর সুধারি |                                                            বরণৌ রঘুবর বিমলযশ জো দাযক ফলচারি ||

বুদ্ধিহীন তনুজানিকৈ সুমিরৌ পবন কুমার |                                                                      বল বুদ্ধি বিদ্যা দেহু মোহি হরহু কলেশ বিকার্ ||

চৌপাঈ

জয হনুমান জ্ঞান গুণ সাগর |                                                                                    জয কপীশ তিহু লোক উজাগর || 1 ||

রামদূত অতুলিত বলধামা |                                                                                    অংজনি পুত্র পবনসুত নামা || 2 ||

মহাবীর বিক্রম বজরংগী |                                                                                      কুমতি নিবার সুমতি কে সংগী ||3 || 

কংচন বরণ বিরাজ সুবেশা |                                                                                      কানন কুংডল কুংচিত কেশা || 4 ||

হাথবজ্র ঔ ধ্বজা বিরাজৈ |                                                                                      কাংথে মূংজ জনেবূ সাজৈ || 5||

শংকর সুবন কেসরী নংদন |                                                                                      তেজ প্রতাপ মহাজগ বংদন || 6 ||

বিদ্যাবান গুণী অতি চাতুর |                                                                                        রাম কাজ করিবে কো আতুর || 7 ||

প্রভু চরিত্র সুনিবে কো রসিযা |                                                                                      রামলখন সীতা মন বসিযা || 8||

সূক্ষ্ম রূপধরি সিযহি দিখাবা |                                                                                    বিকট রূপধরি লংক জরাবা || 9 ||

ভীম রূপধরি অসুর সংহারে |                                                                                  রামচংদ্র কে কাজ সংবারে || 10 ||

লায সংজীবন লখন জিযাযে |                                                                                      শ্রী রঘুবীর হরষি উরলাযে || 11 ||

রঘুপতি কীন্হী বহুত বডাযী |                                                                                      তুম মম প্রিয ভরতহি সম ভাযী || 12 ||

সহস বদন তুম্হরো যশগাবৈ |                                                                                    অস কহি শ্রীপতি কংঠ লগাবৈ || 13 ||

সনকাদিক ব্রহ্মাদি মুনীশা |                                                                                      নারদ শারদ সহিত অহীশা || 14 || 

যম কুবের দিগপাল জহাং তে |                                                                                  কবি কোবিদ কহি সকে কহাং তে || 15 ||

তুম উপকার সুগ্রীবহি কীন্হা |                                                                                    রাম মিলায রাজপদ দীন্হা || 16 ||

তুম্হরো মংত্র বিভীষণ মানা |                                                                                  লংকেশ্বর ভযে সব জগ জানা || 17 ||

যুগ সহস্র যোজন পর ভানূ |                                                                                        লীল্যো তাহি মধুর ফল জানূ || 18 || 

প্রভু মুদ্রিকা মেলি মুখ মাহী |                                                                                    জলধি লাংঘি গযে অচরজ নাহী || 19 ||

দুর্গম কাজ জগত কে জেতে |                                                                                  সুগম অনুগ্রহ তুম্হরে তেতে || 20 ||

রাম দুআরে তুম রখবারে |                                                                                        হোত ন আজ্ঞা বিনু পৈসারে || 21 ||

সব সুখ লহৈ তুম্হারী শরণা |                                                                                          তুম রক্ষক কাহূ কো ডর না || 22 ||

আপন তেজ তুম্হারো আপৈ |                                                                                  তীনোং লোক হাংক তে কাংপৈ || 23 ||

ভূত পিশাচ নিকট নহি আবৈ |                                                                                  মহবীর জব নাম সুনাবৈ || 24 ||

নাসৈ রোগ হরৈ সব পীরা |                                                                                      জপত নিরংতর হনুমত বীরা || 25 ||

সংকট সেং হনুমান ছুডাবৈ |                                                                                      মন ক্রম বচন ধ্যান জো লাবৈ || 26 ||

সব পর রাম তপস্বী রাজা |                                                                                    তিনকে কাজ সকল তুম সাজা || 27 ||

ঔর মনোরধ জো কোযি লাবৈ |                                                                                  তাসু অমিত জীবন ফল পাবৈ || 28 ||

চারো যুগ পরিতাপ তুম্হারা |                                                                                        হৈ পরসিদ্ধ জগত উজিযারা || 29 ||

সাধু সংত কে তুম রখবারে |                                                                                    অসুর নিকংদন রাম দুলারে || 30 ||

অষ্ঠসিদ্ধি নব নিধি কে দাতা |                                                                                      অস বর দীন্হ জানকী মাতা || 31 ||

রাম রসাযন তুম্হারে পাসা |                                                                                      সাদ রহো রঘুপতি কে দাসা || 32 ||

তুম্হরে ভজন রামকো পাবৈ |                                                                                    জন্ম জন্ম কে দুখ বিসরাবৈ || 33 ||

অংত কাল রঘুবর পুরজাযী |                                                                                          জহাং জন্ম হরিভক্ত কহাযী || 34 ||

ঔর দেবতা চিত্ত ন ধরযী |                                                                                      হনুমত সেযি সর্ব সুখ করযী || 35 ||

সংকট কটৈ মিটৈ সব পীরা |                                                                                      জো সুমিরৈ হনুমত বল বীরা || 36 ||

জৈ জৈ জৈ হনুমান গোসাযী |                                                                                      কৃপা করো গুরুদেব কী নাযী || 37 ||

জো শত বার পাঠ কর কোযী |                                                                                    ছূটহি বংদি মহা সুখ হোযী || 38 ||

জো যহ পডৈ হনুমান চালীসা |                                                                                  হোয সিদ্ধি সাখী গৌরীশা || 39 ||

তুলসীদাস সদা হরি চেরা |                                                                                      কীজৈ নাথ হৃদয মহ ডেরা || 40 ||

শেষ হওয়া দোহা রাম, লক্ষ্মণ এবং সীতার সাথে হনুমানকে হৃদয়ে থাকতে অনুরোধ করলেন।  

দোহার সমাপ্তি

পবন তনয সংকট হরণ – মংগল মূরতি রূপ্ |                                                                  রাম লখন সীতা সহিত – হৃদয বসহু সুরভূপ্ ||

জয় ঘোষ

সিযাবর রামচংদ্রকী জয | পবনসুত হনুমানকী জয | বোলো ভাযী সব সংতনকী জয |

 

Shiv Chalisa in Hindi | चमत्कारी श्री शीव चालीसा

Shiv Chalisa in Hindi: यह हिंदू देवता, भगवान शिव को समर्पित एक भक्ति भजन (स्तोत्र) हैl शिव पुराण के अनुसार, इसमें 40 (चालिस) चौपाइयां (छंद) शामिल हैंl Shiv Chalisa का प्रतिदिन या विशेष उत्सवोंमें, जैसे महा शिवरात्रि के दिन शिव के उपासक और शीव भक्त पठन करते हैl 

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Shiv Chalisa in Hindi

केवल भगवान शंकर ही ऐसे देव है जो मानव और दानव दोनों के इष्ट देव है| भगवन शीव के स्तुती में श्री Shiv Chalisa सबसे श्रेष्ट मानी गयी है और कल्याणकारी भी| 

भगवान शीव किसी एक जाती और धर्म के नहीं है बल्कि पुरे मानव समाज के है वैसे ही Shiv Chalisa और शिवभक्ति का अधिकार पुरे मानव समाज को है| 

सिर्फ बेल पत्र और जल समर्पित करने से प्रसन्न होने वाले भोले शंकर Shiv Chalisa का पाठ करने से अतिप्रसन्न हो जाते है और भक्तो की हर एक मनोकामना पुरी कर देते है|

Shiv Chalisa का प्रतिदिन पाठ करनेसे और सुननेसे घर में सुख, शांति, धन, वैभव, भक्ति और प्रेम के वृद्धि होती है|

इस Shiv Chalisa का आप स्वयं भी पाठ कीजिये और दुसरो को भी सुनाइए, इससे अपार पूण्य की प्राप्ति होती है|

ॐ नम: शिवाय 

ll  प्रारंभिक दोहा ll

जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल मूल सुजान |

कहत अयोध्यादास तुम, देहु अभय वरदान ||

ll चौपाई ll

जय गिरिजा पति दीन दयाला |सदा करत सन्तन प्रतिपाल || 1 ||

भाल चन्द्रमा सोहत नीके | कानन कुण्डल नागफनी के || 2 ||  

अंग गौर शिर गंग बहाये | मुण्डमाल तन क्षार लगाए || 3 ||   

वस्त्र खाल बाघम्बर सोहे | छवि को देखि नाग मन मोहे || 4 ||

मैना मातु की हवे दुलारी | बाम अंग सोहत छवि न्यारी || 5 ||

कर त्रिशूल सोहत छवि भारी | करत सदा शत्रुन क्षयकारी || 6||     

नन्दि गणेश सोहै तहँ कैसे | सागर मध्य कमल हैं जैसे || 7 ||  

कार्तिक श्याम और गणराऊ | या छवि को कहि जात न काऊ || 8 ||

देवन जबहीं जाय पुकारा |  तब ही दुख प्रभु आप निवारा || 9 ||   

किया उपद्रव तारक भारी | देवन सब मिलि तुमहिं जुहारी  || 10 ||

तुरत षडानन आप पठायउ | लवनिमेष महँ मारि गिरायउ || 11 || 

आप जलंधर असुर संहारा | सुयश तुम्हार विदित संसारा || 12 ||

त्रिपुरासुर सन युद्ध मचाई | सबहिं कृपा कर लीन बचाई  || 13 ||  

किया तपहिं भागीरथ भारी | पुरब प्रतिज्ञा तासु पुरारी || 14 ||   

दानिन महँ तुम सम कोउ नाहीं | सेवक स्तुति करत सदाहीं || 15 || 

वेद माहि महिमा तुम गाई | अकथ अनादि भेद नहिं पाई || 16 ||

प्रकटी उदधि मंथन में ज्वाला | जरत सुरासुर भए विहाला || 17 ||  

कीन्ही दया तहं करी सहाई | नीलकण्ठ तब नाम कहाई || 18||

पूजन रामचन्द्र जब कीन्हा | जीत के लंक विभीषण दीन्हा || 19 ||                    

सहस कमल में हो रहे धारी | कीन्ह परीक्षा तबहिं पुरारी || 20 ||

एक कमल प्रभु राखेउ जोई | कमल नयन पूजन चहं सोई || 21 || 

कठिन भक्ति देखी प्रभु शंकर | भए प्रसन्न दिए इच्छित वर || 22 ||    

जय जय जय अनन्त अविनाशी | करत कृपा सब के घटवासी || 23 ||

दुष्ट सकल नित मोहि सतावै | भ्रमत रहौं मोहि चैन न आवै || 24 ||

त्राहि त्राहि मैं नाथ पुकारो | येहि अवसर मोहि आन उबारो || 25 ||

लै त्रिशूल शत्रुन को मारो | संकट ते मोहि आन उबारो || 26 ||

मात-पिता भ्राता सब होई | संकट में पूछत नहिं कोई || 27 ||  

स्वामी एक है आस तुम्हारी | आय हरहु मम संकट भारी || 28 ||

धन निर्धन को देत सदा हीं | जो कोई जांचे सो फल पाहीं || 29 ||  

अस्तुति केहि विधि करैं तुम्हारी | क्षमहु नाथ अब चूक हमारी || 30 ||

शंकर हो संकट के नाशन | मंगल कारण विघ्न विनाशन || 31 ||  

योगी यति मुनि ध्यान लगावैं | शारद नारद शीश नवावैं || 32 ||

नमो नमो जय नमः शिवाय | सुर ब्रह्मादिक पार न पाय || 33 ||  

जो यह पाठ करे मन लाई | ता पर होत है शम्भु सहाई || 34 ||

ॠनियां जो कोई हो अधिकारी | पाठ करे सो पावन हारी || 35 ||   

पुत्र होन कर इच्छा जोई | निश्चय शिव प्रसाद तेहि होई || 36 ||

पण्डित त्रयोदशी को लावे | ध्यान पूर्वक होम करावे || 37 ||  

त्रयोदशी व्रत करै हमेशा | ताके तन नहीं रहै कलेशा || 38 ||       

धूप दीप नैवेद्य चढ़ावे | शंकर सम्मुख पाठ सुनावे || 39 ||

जन्म जन्म के पाप नसावे | अन्त धाम शिवपुर में पावे || 40 ||

कहैं अयोध्यादास आस तुम्हारी | जानि सकल दुःख हरहु हमारी ||

ll समापन दोहा ll

नित्त नेम कर प्रातः ही, पाठ करौं चालीसा | तुम मेरी मनोकामना, पूर्ण करो जगदीश ||    

मगसर छठि हेमन्त ॠतु, संवत चौसठ जान | अस्तुति चालीसा शिवहि, पूर्ण कीन कल्याण ||

 

 

Hanuman Chalisa in Telugu | తెలుగులో హనుమాన్ చలిసా

Hanuman Chalisa in Telugu: హనుమంతుడు చలిసా హనుమంతుడిని ఉద్దేశించి హిందూ భక్తి శ్లోకం (స్తోత్రం). దీనిని 16 వ శతాబ్దంలో సెయింట్ తులసీదాస్ రాశారు. హనుమాన్ చలిసా  ప్రారంభంలో మరియు చివరిలో దోహాలను మినహాయించి 40 శ్లోకాలు ఉన్నాయి.

Hanuman Chalisa in Telugu
Hanuman Chalisa in Telugu

Hanuman Chalisa in Telugu

  • మొదటి పది చౌపాయిలు వర్ణించబడ్డాయి, శుభ రూపం, జ్ఞానం, ధర్మాలు, శక్తులు మరియు హనుమంతుడి ధైర్యం.
  • పదకొండవ నుండి పదిహేనవ చౌపైస్, లక్ష్మణుడిని స్పృహలోకి తీసుకురావడంలో హనుమంతుడి పాత్రను వివరిస్తాడు.  
  • పదకొండు నుండి ఇరవై చౌపాయిస్ ప్రభు శ్రీ రామ్కు చేసిన సేవలో హనుమంతుడి చర్యను వివరిస్తారు.  
  • ఇరవై మొదటి చౌపాయ్ నుండి, తులసీదాస్ హనుమంతుడి కృపా యొక్క అవసరాన్ని వివరించాడు. చివరికి, సెయింట్ తులసీదాస్ హనుమంతుడిని పలకరించి, తన హృదయంలో నివసించమని అభ్యర్థిస్తాడు.

 

మొదటి పరిచయ దోహా ష్రు అనే పదంతో ప్రారంభమవుతుంది, ఇది హనుమంతుని గురువుగా భావించే మాతా సీతను సూచిస్తుంది.  

పరిచయ దోహా  

శ్రీ గురు చరణ సరోజ రజ నిజమన ముకుర సుధారి l
వరణౌ రఘువర విమల యశ జో దాయక ఫలచారి ll

బుద్ధిహీన తనుజానికై సుమిరౌ పవన కుమార l
బల బుద్ధి విద్యా దేహు మోహి హరహు కలేశ వికార్ ll

చౌపాయీ

జయ హనుమాన జ్ఞానగుణసాగర
జయ కపీశ తిహుం లోక ఉజాగర ll 1 ll

రామదూత అతులితబలధామా
అంజనిపుత్ర పవనసుతనామా ll 2 ll

మహావీర విక్రమ బజరంగీ 
కుమతి నివార సుమతి కే సంగీ ll 3 ll

కంచనవరన విరాజ సువేసా 
కానన కుండల కుంచిత కేశా ll 4 ll

హాథ వజ్ర అరు ధ్వజా విరాజై 
కాంధే మూంజ జనేవూ సాజై ll 5 ll

శంకరసువన కేసరీనందన 
తేజ ప్రతాప మహాజగవందన ll 6 ll

విద్యావాన గుణీ అతిచాతుర 
రామ కాజ కరివే కో ఆతుర ll 7 ll

ప్రభు చరిత్ర సునివే కో రసియా 
రామ లఖన సీతా మన బసియా ll 8 ll

సూక్ష్మ రూప ధరి సియహిం దిఖావా 
వికట రూప ధరి లంక జరావా ll 9 ll

భీమ రూప ధరి అసుర సంహారే 
రామచంద్ర కే కాజ సంవారే ll 10 ll

లాయ సంజీవన లఖన జియాయే 
శ్రీరఘువీర హరషి ఉర లాయే ll 11 ll

రఘుపతి కీన్హీ బహుత బడాయీ 
కహా భరత సమ తుమ ప్రియ భాయీ ll 12 ll

సహస వదన తుమ్హరో యస గావైం 
అస కహి శ్రీపతి కంఠ లగావై ll 13 ll

సనకాదిక బ్రహ్మాది మునీశా 
నారద శారద సహిత అహీశా ll 14 ll

యమ కుబేర దిగపాల జహాం తే 
కవి కోవిద కహి సకే కహాం తే ll 15 ll

తుమ ఉపకార సుగ్రీవహిం కీన్హా 
రామ మిలాయ రాజపద దీన్హా ll 16 ll

తుమ్హరో మంత్ర విభీషన మానా 
లంకేశ్వర భయే సబ జగ జానా ll 17 ll

యుగ సహస్ర యోజన పర భానూ 
లీల్యో తాహి మధుర ఫల జానూ ll 18 ll

ప్రభు ముద్రికా మేలి ముఖమాహీ 
జలధి లాంఘి గయే అచరజ నాహీం ll 19 ll

దుర్గమ కాజ జగత కే జేతే 
సుగమ అనుగ్రహ తుమ్హరే తేతే ll 20 ll

రామ ద్వారే తుమ రఖవారే 
హోత న ఆజ్ఞా బిను పైసారే ll 21 ll

సబ సుఖ లహై తుమ్హారీ శరణా 
తుమ రక్షక కాహూ కో డరనా ll 22 ll

ఆపన తేజ సంహారో ఆపై 
తీనోం లోక హాంక తేం కాంపై ll 23 ll

భూత పిశాచ నికట నహిం ఆవై 
మహావీర జబ నామ సునావై ll 24 ll

నాసై రోగ హరై సబ పీరా 
జపత నిరంతర హనుమత వీరా ll 25 ll

సంకటసే హనుమాన ఛుడావై
మన క్రమ వచన ధ్యాన జో లావై ll 26 ll

సబ పర రామ తపస్వీ రాజా 
తిన కే కాజ సకల తుమ సాజా ll 27 ll

ఔర మనోరథ జో కోయీ లావై 
సోయీ అమిత జీవన ఫల పావై ll 28 ll

చారోం యుగ పరతాప తుమ్హారా 
హై పరసిద్ధ జగత ఉజియారా ll 29 ll

సాధు సంత కే తుమ రఖవారే 
అసుర నికందన రామ దులారే ll 30 ll

అష్ట సిద్ధి నవ నిధి కే దాతా 
అస వర దీన జానకీ మాతా ll 31 ll

రామ రసాయన తుమ్హరే పాసా 
సదా రహో రఘుపతి కే దాసా ll 32 ll

తుమ్హరే భజన రామ కో పావై 
జనమ జనమ కే దుఖ బిసరావై ll 33 ll

అంత కాల రఘుపతి పుర జాయీ 
జహాం జన్మ హరిభక్త కహాయీ ll 34 ll

ఔర దేవతా చిత్త న ధరయీ 
హనుమత సేయి సర్వ సుఖ కరయీ ll 35 ll

సంకట హరై మిటై సబ పీరా – 
జో సుమిరై హనుమత బలబీరా ll 36 ll

జై జై జై హనుమాన గోసాయీ 
కృపా కరహు గురు దేవ కీ నాయీ ll 37 ll

జో శత బార పాఠ కర కోయీ 
ఛూటహి బంది మహా సుఖ హోయీ ll 38 ll

జో యహ పఢై హనుమాన చలీసా 
హోయ సిద్ధి సాఖీ గౌరీసా ll 39 ll

తులసీదాస సదా హరి చేరా 
కీజై నాథ హృదయ మహ డేరా ll 40 ll

దోహాను ముగించారు

పవనతనయ సంకట హరణ మంగల మూరతి రూప్
రామ లఖన సీతా సహిత హృదయ బసహు సుర భూప్ |

జై ఘోష్  

బోల్ బజరంగబలి కి విక్టరీ l
పవన్ పుత్ర హనుమాన్ కి విక్టరీ ll

 

 

 

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Hanuman Chalisa

Hanuman Chalisa in English | Hanuman Chalisa with English lyrics

Hanuman Chalisa in English: Hanuman Chalisa is a Hindu devotional hymn (stotra) addressed to Lord Hanuman. It is written by saint Tulsidas in the 16th century. Hanuman Chalisa has 40 verses excluding the dohas at the beginning and at the end. 

You can download this Hanuman Chalisa in PDF, in Jpg form or even print. Click on the button above to save this Chalisa. For Chalisa, a PDF download link is given at the end of Hanuman Chalisa. 

You can download Hanuman Chalisa PDF in Your mobile or desktop and read it at any time you want. 

Hanuman Chalisa in English
Hanuman Chalisa in English

Hanuman Chalisa in English      

  • The first ten Chaupais are described, auspicious form, knowledge, virtues, powers, and bravery of Hanuman.
  • Eleventh to fifteenth Chaupais describing the role of Hanuman in bringing back Lakshman to consciousness.
  • Eleven to twenty Chaupais describe the act of Hanuman in his service to Prabhu Shri Ram.
  • From the twenty-first Chaupai, Tulsidas describes the need for Hanuman’s Kripa. In the end, Saint Tulsidas greets Lord Hanuman and requests him to reside in his heart. 

 

The first introductory Doha begins with the word shrī, which refers to Mata Sita, who is considered the Guru of Hanuman.

Introductory Doha

Shri guru charana saroj raj, neej manu mukuru sudhari |
Baranau raghubara bimala jasu, jo dayaku phal chari ||

Buddhiheena tanu janike, sumero pavan kumar |
Bal budhi vidya dehu mohi harahu kalesa vikara ||

Chaupai 

Jai Hanuman gyana gun sagar |
Jai Kapis tihun lok ujagar || 1 ||

Ram doot atulit bal dhama |
Anjaani-putra Pavan sut nama || 2 ||

Mahavir vikram Bajrangi |
Kumati nivar sumati ke sangi || 3 ||

Kanchan baran biraj subesa |
Kanan Kundal Kunchit Kesa || 4 ||

Hath bajra au dhvaja birajai |
Kaandhe moonja janehu sajai || 5 ||

Shankar suvan kesri nandan |
Tej prataap maha jag bandana || 6 ||

Vidyavaan guni ati chatur |
Ram kaj karibe ko aatur || 7 ||

Prabhu charitra sunibe ko rasiya |
Ram Lakhan Sita mana Basiya || 8 ||

Sukshma roop dhari siyahi dikhava |
Bikat roop dhari lanka jarava || 9 ||

Bhima roop dhari asura sanghare |
Ramachandra ke kaj sanvare || 10 ||

Laye Sanjivani Lakhan Jiyaye |
Shri Raghubir harashi ura laye || 11 ||

Raghupati kinhi bahut badhai |
Tum mama priya Bharat-hi-sam bhai || 12 ||

Sahas badan tumharo jas gaave |
Asa-kahi shripati kanth lagaave || 13 ||

Sankadhik Brahmaadi Munisa |
Narad-Sarad sahit ahisa || 14 ||

jama Kuber Dikpaal Jahan te |
Kabi kovid kahi sake kahan te || 15 ||

Tum upkar Sugreevahin kinha |
Ram milaye rajpad dinha || 16 ||

Tumharo mantra Vibheeshan maana |
Lankeshwar bhaye sab jag jana || 17 ||

Yug sahastra jojan par bhanu |
Leelyo tahi madhur phala janu || 18 ||

Prabhu mudrika meli mukh mahee |
Jaladhi langhi gaye achraj nahee || 19 ||

Durgaam kaj jagath ke jete |
Sugam anugraha tumhre tete || 20 ||

Ram duwaare tum rakhvare |
Hoat na agya binu paisare || 21 ||

Sub sukh lahae tumhari sarna l
Tum rakshak kahu ko darnaa ll 22 ||

Aapan tej samharo aapai |
Teenhon lok hank te kanpai || 23 ||

Bhoot pisaach nikat nahin aavai |
Mahabir jab naam sunavae || 24 ||

Nase rog hare sab peera |
Japat nirantar Hanumant beera || 25 ||

Sankat te Hanuman chhudave |
Man Karam Vachan dyan jo lavai || 26 ||

Sab par Ram tapasvee raja |
Tina ke kaj sakal Tum saja || 27 ||

Aur manorath jo koi lave |
Sohi amit jeevan phal pave || 28 ||

Charon jug partap tumhara |
Hai parasiddh jagat ujiyara || 29 ||

Sadhu sant ke tum rakhware |
Asur nikandan Ram dulhare || 30 ||

Ashta-sidhi nav nidhi ke daata |
Asa-bar deen Janki mata || 31 ||

Ram rasayan tumhare pasa |
Sada raho Raghupati ke dasa || 32 ||

Tumhare bhajan Ram ko pave |
Janam-janam ke dukh bisraave || 33 ||

Anth-kaal Raghubir pur jaee |
Jahan janam Hari-Bhakta Kahai || 34 ||

Aur devta chitta na dharaee |
Hanumanth se hi sarba sukh karaee || 35 ||

Sankat kate-mite sab peera |
Jo sumire Hanumata balbeera || 36 ||

Jai Jai Jai Hanuman gosaee |
Kripa karahu gurudev ki naee || 37 ||

Jo shath baar paath kara koi |
Chhutahi bandhi maha sukh hoee || 38 ||

Jo yaha padhe Hanuman Chalisa |
Hoye siddhi saakhi Gaureesa || 39 ||

Tulsidas sada hari chera |
Keejai nath hridaye maha dera || 40 ||

The concluding Doha requests Hanuman to reside in the heart, along with Ram, Lakshman and Sita.

Concluding Doha

Pavan tanay sankat harana mangal murti roop |
Ram Lakhan Sita sahit hriday basau soor bhoop ||

|| Jai Ghosh ||

Bol Bajarangabali ki jai | 
Pavan putra Hanuman ki jai ||

 

 

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Ganeshji images | श्री गणेशजी की मनमोहक अद्भूत तस्वीरे

Ganeshji images: गणेशजी की सिर्फ मनमोहक तस्वीरे देखने भर से ही हमारे सारे दुःख, कष्ट, परेशानी दूर हो जाती है| सकल हिंदुस्तान के आराध्य दैवत गणेशजी है| Ganeshji को विघ्नहर्ता भी कहा जाता है| शुभ काम में हमेशा पहले गणेशजी का ही स्मरण कीया जाता है| किसी भी शुभ काम की शुरुआत करने से पहले गणेशजी के दर्शन किये जाते है|

Ganeshji images 

श्री गणेश की मुरतियाँ पूरे भारत, नेपाल, श्रीलंका, फिजी, थाईलैंड, मॉरीशस, बाली (इंडोनेशिया) और बांग्लादेश में पाई जाती है। गणेश की भक्ति व्यापक रूप से फैली हुई है|

भारत में गणेशोस्तव (Ganesh Festival) बड़े ही धाम धूम से मनाया जाता है| विशेष रूप से महाराष्ट्र में गणेशोस्तव व्यापक रूप में मनाया जाता है| महाराष्ट्र का गणेशोस्तव देखने के लिए देश विदेश से पर्यटक आते है|  

श्री गणेश की पूजा कई धार्मिक और धर्मनिरपेक्ष अवसरों पर की जाती है, विशेषकर उपक्रमों की शुरुआत में जैसे वाहन खरीदना या व्यवसाय शुरू करना| कहा जाता है भारत में शायद ही कोई हिंदू घर हो, जिसमें गणपति की मूर्ति (Ganeshji images) न हो।

Ganeshji भारत में सबसे लोकप्रिय देवता

भारत में सबसे लोकप्रिय देवता होने के नाते गणपति की पूजा लगभग सभी जातियों और सभी हिस्सों में की जाती है| भक्तों का मानना ​​है कि यदि गणेश का प्रचार किया जाता है, तो वे सफलता, समृद्धि और प्रतिकूलता से सुरक्षा प्रदान करते हैं|

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