Kabir Das ke Dohe | कबीर दास जी के दोहे अर्थ सहित

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Kabir Das ke Dohe: कबीरदास ज्ञानमार्गी शाखा के प्रतिनीधी कवि मने जाते है |  कबीरजी का जन्म 1398 ई. में काशी में हुआ | कहां जाता है कि इनका जन्म एक विधवा ब्राह्मणी के गर्भ से हुआ था और वह लोक-लाज के डर से कबीर को लहरतारा नामक तालाब के निकट छोड़ आई थी |

कबीर को नीमा और नीरू जुलाहा दम्पंती ने स्वीकारा और इनका पालन पोषण किया | 

कहां जाता है इनके पत्नी का नाम लोइ था जिससे उनको कमाल और कमाली दो संताने थी|

कबीरजी के गुरु रामानंद थे |

कबीरजी की मृत्यु 1518 ई. में महनगर में हुई |

कबीर अनपढ़ थे | उनके शिष्यों ने उनके दोहों को लिखित स्वरुप में संग्रहीत करके रखा था |

संत कबीर हिंदी साहित्य काल के इकलौते ऐसे कवी है जिन्होंने जीवन भर समाज में पाए जाने वाले अवडम्बरों के खिलाफ अपनी आवाज उठाई थी और समाज में पाए जाने वाले कुप्रथाओं पर अपने दोहों के माध्यम से कड़ा प्रहार किया था |  

Kabir Das ke Dohe

पहला दोहा

धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय |
माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय ||

[शब्द का अर्थ- माली-बागवान, सींचे-पानी देना ]

भावार्थ-  किसी भी ध्येय को प्राप्त करने के लिए हमे सब्र की जरूरत होती है | हमने किसी चीज़ की कामना की तो वह कभी भी तुरंत प्राप्त नहीं होती है | उसे प्राप्त करने के लिए हमें कड़े मेहनत, धीरज और परिश्रम की जरूरत होती है |

जिस तरह से किसी बाग़ का माली अगर पेड़ को एक साथ सौ घड़ा पानी अर्पण करता है तो भी उस पेड़ को फल ॠतु आने पर ही लगते है | कितने भी घड़े पानी से पेड़ को सींचे, जिस तरह से उसे ॠतु आने से पहले फल नही लग सकते कबीर कहते है उसी तरह से कोइ भी कार्य धीरे धीरे ही सफल होता है |



दुसरा दोहा

धर्म किए धन ना घटे, नदी न घटे नीर |                                                                            अपनी आंखन देख लो, कह गये दास कबीर || 

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[शब्द का अर्थ:- घटे-कम होना, नीर–जल,पाणी, आंखन-आँख]

भावार्थ- कबीर जी कहते है, नदी का जल अगणीत लोगों की प्यास बुझाकर भी जिस प्रकार से कम नही होता उसी तरह से धर्म के लिए जो व्यक्ती अपना धन बाटता है उसके धन में कटोती होने के बजाय निरंतर वृद्धि होती जाती है | 



तिसरा दोहा

रात गंवाई सोय के, दिवस गंवाया खाय |
हीरा जन्म अमोल सा, कोड़ी बदले जाय ||

[शब्द का अर्थ:- सोय-सोना, नींद, खाय-भोजन करना]

भावार्थ- हमे हिरे जैसा अनमोल जीवन मिला है इसे अगर हम रात भर सोने में और दिनभर सिर्फ खाते हुए गुजार देंगे तो यह जीवन व्यर्थ हो जायेंगा | हमें इस हीरे जैसे अनमोल जीवन का आदर करते हुए इसे सार्थक कर देना चाहिए |



चौथा दोहा

माया मरी न मन मरा, मर-मर गए शरीर |                                                                            आशा तृष्णा न मरी, कह गए दास कबीर || 

[शब्द का अर्थ- माया-इच्छा, मरी-मृत्यु, तृष्णा-प्यास]      

भावार्थ- कबीर जी कहते है, मनुष्य की भले ही संपती नष्ट हो जाये, ऐश्वर्य नष्ट हो जाये, किर्ती नष्ट हो जाये या उसका अनमोल शरीर भी नष्ट हो जाये परन्तु उसकी भोग भोगने की आसक्ती, मोह, लोभ, आशा कभी भी नहीं मरती है |



पांचवा दोहा

बडा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर |                                                                            पंथी को छाया नही, फल लागे अति दूर ||

[शब्द का अर्थ- पंथी-राहगीर, मुसाफीर]

भावार्थ- समाज का प्रतिष्टित, धनवान व्यक्ती अगर लोगोंके सुख दुःख में काम नहीं आता है तो यह व्यक्ती खजूर के उस पेड जैसा ही है जो कद में बड़ा जरूर होता है, पर वह राह चलते मुसाफीर को न तो छाया प्रदान करता है और फल ऊँचाई पर होने के कारण न तो उसकी भूख मिटा सकता है |

ऐसे बड़े कद का कोइ उपयोग नही अगर वह किसीके काम न आ सके |



छठा दोहा

दुःख में सुमिरन सब करै, सुख में करै न कोय |                                                                      जो सुख में सुमिरन करै, तो दुख काहे होय ||

[शब्द का अर्थ- सुमिरन-याद करना, कोय-कोई, होय-होना ]

भावार्थ- जब मनुष्य के जीवन में सुख होता है, समाधान होता है ऐसे वक्त में वह प्रभु का, इश्वर का नामस्मरण करना भूल जाता है | पर जैसे ही जीवन में दुःख का प्रवेश होता है उसे इश्वर की याद आती है वह उसकी पूजा करने लगता है, नामस्मरण करता है |

र्अथात अगर सुख के दिनों में ही इश्वर का स्मरण किया जाये तो जीवन में दुःख आएगा ही नही |



सातवा दोहा

जैसा भोजन खाइये, तैसा ही मन होय |                                                                              जैसा पानी पीजिये, तैसी बानी होय ||

[शब्द का अर्थ- बानी-वाणी]

भावार्थ- मनुष्य अपने जीवन में जिस तरह के भोजन, पाणी आदी का समावेश करता है, उसका मन और वाणी उसी तरह की हो जाती है | अगर मनुष्य सात्विक भोजन करता है तो उसका मन और वाणी सात्विक हो जाती है | अगर अपने आहार में वह तामसी भोजन का समावेश करता है तो तामसी प्रवृती का हो जाता है | 



आठवा दोहा

मसि कागद छुयौ नहीं, कलम गही ना हाथ |                                                                          चारों जुग कै महातम कबिरा मुखहिं जनाई बात ||

[शब्द का अर्थ-मसी-मैंने, कागद- कागज ]

भावार्थ- कबीरजी स्वयं के बारे में कहते है के में एक फकीर हूँ जिसने औपचारिक तौर पर किसी भी तरह शिक्षा नही ली है और कभी कागज और कलम को छुआ ही नही l पर मुझे जो कुछ भी ज्ञान प्राप्त है वह सब साधू संगती का परिणाम है | मैं चारो युगों के महात्मय की बात मुहजबानी बताता हूँ |

कबीरजी ने स्वयं ग्रन्थ नहीं लिखे उनके मूँह से जो अनमोल वचन निकले उसे उनके शिष्योने लिख लिया |



नववा  दोहा

पाहन पूजे हरि मिले, तो मैं पूजूं पहार |                                                                              याते चाकी भली जो, पीस खाए संसार ||

[शब्द का अर्थ:- पाहन-पत्थर, हरी-इश्वर, पहार-पहाड़, चाकी-अनाज पिसने वाली चक्की]

भावार्थ- अगर पत्थर पूजने से इश्वर की प्राप्ती होती है तो में बड़े से पहाड़ को ही क्यों न पूजू इससे मुझे जल्दी से इश्वर मिल जायेगा l दरअसल कबीर यह व्यंग में कह रहे है और लोगों के कर्मकांडो पर प्रहार कर रहे है | उनका कहना है की अगर सच में पत्थर पुजके भगवान मिल जाते है तो में उस अनाज पिसने वाले चक्की के पत्थर को पुजूंगा जिससे मिलने वाले अन्न को ग्रहण करके समस्त मानव जाती का कल्याण हो जाता है |



दसवा दोहा

बुरा जो देखन मैं चला, बुरा ना मिलिया कोय |                                                                          जो दिल खोजा आपनो, मुझ सा बुरा न कोय ||

[शब्द का अर्थ:- देखन-देखने, आपनो-अपना ]

भावार्थ- में जगत में बुराई ढूँढने निकल पड़ा और मैंने सब प्रकार की बुराइयां देखी | जब मैंने अपने दिल के भीतर झाँका तो मुझे पता चला की मैंने अब तो जो भी बुराइयां देखी उससे ज्यादा बुराइयां तो मेरे अन्दर समाई हुयी है, मतलब मुझसे ज्यादा बुरा तो जगत में दुसरा कोइ नही |

तात्पर्य यह है की अगर हर मनुष्यने सबसे पहले अपने अन्दर की बुराइयां समाप्त की तो यह दुनिया अपने आप ही सुन्दर बन जायेगी |



ग्यारहवा दोहा

पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय |                                                                      ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होयl ||

[शब्द का अर्थ :– पोथी– धार्मिक किताबे, मुआ–मृत्यु, पंडित–विद्वान, भया-हुआ, आखर–अक्षर ]

भावार्थ-  कबीर कहते है बड़ी बड़ी किताबे और ग्रन्थ जीवन में पढ़ते पढ़ते कई लोगों की मृत्यु हो गयी पर वह विद्वान अरथात पंडित बन न सके | पर अगर किसी ने सबसे प्यार करना सिख लिया तो साधारणसा व्यक्ती भी पंडीत कहलाता है |

कहने का तात्पर्य यह है की आप कितनी भी किताबे पढ़ लीजिये अगर आपके मन में प्रेम नहीं है, स्वभाव में विनम्रता नही है तब तक आपके किताबी ज्ञान का कोइ मूल्य नही | प्रेम ही आपके स्वाभाव को विनम्र बनाता है| प्रेम से ही मानव जाती का कल्याण और इश्वर प्राप्ती की जा सकती है |



बारहवा दोहा

एकही बार परखिये, ना वा बारम्बार |
बालू तो हू किरकिरी, जो छानै सौ बार ||

[शब्द का अर्थ :– परखिये-जांच करना, छानै- छानना, बालू-रेत ]

भावार्थ- किसी भी व्यक्ती के साथ दोस्ती करनी हो, रिश्ता बढ़ाना हो या किसी भी प्रकार का व्यवहार करना हो तो उस व्यक्ती को पहली मुलाकात में ही अच्छे तरहसे परख लेना चाहिए | उसके गुण, अवगुण, अच्छाई, बुराइयाँ को समझ लेना चाहिए |

जिस प्रकार यदि रेत को अगर सौ बार भी छाना जाए तो भी उसकी किरकिराहट दूर नहीं होती, इसी प्रकार दुर्जन व्यक्ती को बार बार भी परखो तब भी वह हमें दुष्टता से भरा हुआ ही मिलेगा | जबकि सज्जन व्यक्ती की परख एक बार में ही हो जाती है ।



तेरहवा दोहा

जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान |                                                                              मोल करो तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान ||

[शब्द का अर्थ :– मोल-कीमत, तरवार-तलवार]

भावार्थ- जगत में ज्ञान महत्व रखता है न किसी व्यक्ति की जाति | किसी भी व्यक्ती की जाती से हम उसके ज्ञान का अनुमान नहीं लगा सकते और न ही किसी सज्जन की सज्नता का अनुमान | इसलिए किसी से उसकी जाति पूछना व्यर्थ है उसका ज्ञान और व्यवहार ही अनमोल होता है |

जिस तरह तलवार और म्यान में तलवार का अधिक महत्व है, क्यों की म्यान महज़ उसका उपरी आवरण होता है | उसी तरह से जाति मनुष्य का केवल एक शाब्दिक नाम है उसका ज्ञान और सज्जनता से कोइ लेनादेना नही |



चौदहवा दोहा

गारी ही से उपजै, कलह कष्ट औ मीच ।
हारि चले सो सन्त है, लागि मरै सो नीच ।।

[शब्द का अर्थ :– गारी-अपशब्द, गाली, उपजै-उत्पन्न होना, कलह-लड़ाई, झगडा  ]

भावार्थ- लड़ाई झगड़े, दुःख एवम् हत्या के क्रूर विचार व्यक्ति के दिलो-दिमाग में केवल किसी के कहे गए गाली-गलौच और अपशब्द के कारण ही उत्पन्न होते है | जो व्यक्ती इन सबसे हार मानकर अपना मार्ग बदलता है वही सच्चा संत हो जाता है और जो इसी दलदल में रहकर अपना जीवन व्यतित करता है, वह नीच होता है |



पंधरहवा दोहा

ऊँचे कुल का जनमिया, करनी ऊँची न होय |                                                                        सुवर्ण कलश सुरा भरा, साधू निंदा होय ||

[शब्द का अर्थ :– जनमिया–जनम लेना, करनी-कर्म, सुरा- मद्य ]

भावार्थ- सिर्फ ऊँचे कूल में पैदा होने से कोइ ऊँचा नही कहलाता, उसके लिए कर्म भी ऊँचे होने चाहिए | जिस तरह से सुवर्ण कलश में अगर मद्य या जहर भरा होगा तो उस सुवर्ण कलश की चारों ओर निंदा ही होती है | ऐसे ही अगर ऊँचे कूल में जन्मे हुए किसी व्यक्ती के कर्म अगर अच्छे नही होते है तो वह भी समाज में निंदा का पात्र होता है |



सोलहवा दोहा

कबीर घास न निंदिए, जो पाऊ तली होई |                                                                          उडी पडे जब आँख में , खरी दुहेली होई ||

[शब्द का अर्थ :– निंदिए–किसीकी निंदा करना, पाऊ -पाँव, तली- नीचे, दुहेली-दर्द होना]

भावार्थ- कबीर जी कहते है के उस घास की निंदा कभी भी नहीं करनी चाहिए जो हमारे पाँव में निचे होती है | क्योंकी इसी घास का तिनका जब हवा में उडकर हमारे आँख में चला जाता है तो असहनीय दर्द होता है |

अर्थात कबीरजी का कहना है की हमें छोटी चीजों को महत्त्वहीन नहीं समझना चाहिए| जिस तरह छोटासा घास का टुकड़ा हमें दर्द दे सकता है वैसे ही हमें महत्वहीन लगने वाले लोग हमें बड़ी परेशानी में दाल सकते है |

इस दोहे में माध्यम से कबीरजी समाज में समानता का सन्देश देना चाहते है |



सतरहवा दोहा

जग में बैरी कोइ नहीं, जो मन सीतल होय |                                                                          या आपा को डारी दे, दया करे सब कोय ||

[शब्द का अर्थ :– मन –दिल, होय–होता है, आपा- अहंकार,घमंड, डारी दे-त्याग देना, डाल देता है, निचे कर देता है, गीरा देता है]

भावार्थ- उस मनुष्य का दुनिया में कोइ भी शत्रु या बैरी नहीं होता है जिसका मन शांत होता है, शीतल होता है | जो अपने अहंकार को त्याग देता है और हो सभी पर दया करता है |

अर्थात वही मनुष्य बिना शत्रु के होता है जिसके मन में अहंकार नही होता है | अहंकार मनुष्य को नष्ट करता है |



अठरहवा दोहा

माला तो कर में फिरे, जीभि फिरे मुख माही |                                                                      मनुवा तो चहूँ दिसि फिरै, यह तो सुमिरन नाही ||

[शब्द का अर्थ :– माला-जप माला, कर-हाथ, जीभि-जीभ, जुबान, मनुवा-मन, दहूँ-दस, दिसि-दिशा, सुमिरन-स्मरण]

भावार्थ- कबीरजी कहते है की जपमाला हाथ में घूमाई जा रही है और मुख से प्रभु का नाम लिया जा रहां है | पर मन किसी और ही विचारों में डूबा हुआ है यह इश्वर का सच्चा स्मरण नही है | सिर्फ दिखावे के लिए भगवान का स्मरण नही करना चाहिए |



उन्नीसवा दोहा

काल करै सौ आज कर, आज करै सौ अब |                                                                        पल में परलै होयगो, बहुरि करैगो कब ||

[शब्द का अर्थ :– काल-कल, परलै-प्रलय, पल-क्षण, बहुरि-शुरुआत]

भावार्थ- जो काम हमें कल करना है उसकी शुरुआत हम आज से कर सकते है | जो काम हमें आजसे करना है उसकी शुरुआत हम अभी से कर सकते है | कौन जनता है किसी भी क्षण प्रलय हो सकता है, तुम काम के शुरुआत कब करोगे |

अर्थात हमें काम को टालना नहीं चाहिए | जो काम हमें करना है उसकी शुरुआत हमें जल्द से जल्द करनी चाहिए इसीमे हमारी भलाई होती है |



बिसवा दोहा

माटी कहे कुम्हार को, तू क्या रोंदे मोहे |                                                                              एक दिन ऐसा आवेगा, मैं रोंदुंगी तोहे ||

[शब्द का अर्थ :– माटी-मिटटी, मोहे-मुझे, आवेगा-आयेगा, तोहे-तुझे]

भावार्थ- कबीरजी ने इस दोहे में जीवन का शाश्वत सत्य बताया है जो हर एक मनुष्य को मालूम होता है पर वह उसे मानने के लिए तैयार नहीं होता है | उन्होंने कुम्हार और माटी का उदाहरन लेके इस बात को समझाया है |

माटी कुम्हार को कहती है तू आज मुझे जरूर रौंद रहा है पर याद रखना इक दीन ऐसा आएगा के में तुझे रौंद दूंगी | अर्थात हे मनुष्य एक दीन तेरी मृत्यु अवश्य होने वाली है और तू मिटटी में मिल जाने वाला है इसीलिए ज्यादा अहंकार मत कर |



इक्कीसवा दोहा

आए हैं सो जायेंगे, राजा रंक फकीर |                                                                                एक सिंहासन चढ़ चले, एक बंधें जंजीर ||

[शब्द का अर्थ :– रंक-गरीब व्यक्ती]

भावार्थ- इस दुनिया में जो भी व्यक्ती जनम लेता है वो राजा हो, फकीर हो, अमीर हो या गरीब हो हर एक की मृत्यु निश्चित है | मृत्यु के सामने सब समान है, पर मृत्यु के पश्चात वही सिहासन पर सवार हो के जाएगा जिसने अपने जीवन में अच्छे कर्म किये है | जिनके कर्म अच्छे नहीं है उनको जंजीर में बाँध के ले जाया जायेगा|

मृत्य के पश्चात सिर्फ आपके कर्मों का हिसाब होता है आपकी दौलत, शौहरत या रुतबे का नही |



बाईसवा दोहा

अति का भला न बोलना, अति की भली न चूप |                                                                    अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप ||

[शब्द का अर्थ :– अति-जरूरत से ज्यादा]

भावार्थ- जरूरत से ज्यादा बोलना भी अच्छा नहीं होता और ना ही ज्यादा चुप रहना भी अच्छा होता है |  जिस तरह से ज्यादा बारिश अच्छी नहीं होती उसी तरह से ज्यादा धूप भी अच्छी नहीं होती | जीवन में हर एक क्रिया में संतुलन होना आवश्यक है तभी जीवन सुखमय गुजरता है |



तेईसवा दोहा

दुर्लभ मानुष जन्म है, देह न बारम्बार |
तरुवर ज्यों पत्ता झड़े, बहुरि न लागे डार ||

[शब्द का अर्थ :– दुर्लभ-मूल्यवान, असाधारण, मानुष-मनुष्य, तरुवर-पेड़, डार-डाल, बारम्बार-बारबार ]

भावार्थ- मनुष्य का जन्म बहुत मूल्यवान है, असाधारणसा है | यह मनुष्य शरीर किसी भी व्यक्ती को बारबार नही मिलता | जिस तरह किसी वृक्ष से कोइ पत्ता झड जाता है, टूट के गिर जाता है तो वह फिर से उस डाल से जुड़ नहीं सकता | उसी प्रकार से एक बार मनुष्य के शरीर त्याग देने पर उसे मानव शरीर दुबारा नही मिलता है | 

इस संसार में मनुष्य का जन्म मुश्किल से मिलता है । यह मानव शरीर उसी तरह बार-बार नहीं मिलता जैसे वृक्ष से पत्ता  झड़ जाए तो दोबारा डाल पर नहीं लगता |



चौबिसवा दोहा

हाड़ जलै ज्यूं लाकड़ी, केस जलै ज्यूं घास |
सब तन जलता देखि करि, भया कबीर उदास ||

[शब्द का अर्थ :हाड़-हड्डी, जलै-जलना, ज्यूं-जैसे, तन-शरीर]

भावार्थ- मनुष्य के मृत्यु के पश्चात जब अन्त्यविधि करके उसके शरीर को जलाया जाता है l तब मनुष्य के नश्वर देह को अग्नी जलाने लगती है | उसकी हड्डियाँ किसी लकड़ी की तरह जल उठती है तो उसके बाल किसी सूखे घास की तरह जलते है | अंत समय में मानव के निचेत पड़े सम्पूर्ण शरीर को इस तरह जलता देख, कबीर का मन उदासी से भर जाता है |



पच्चीसवा दोहा

करता था तो क्यूं रहया, जब करि क्यूं पछिताय |
बोये पेड़ बबूल का, अम्ब कहाँ ते खाय ||

[शब्द का अर्थ :– करता-कर्म करने वाला, पछिताय-पछताना, अम्ब-आम ]

भावार्थ- संत कबीर कहते है की मनुष्य किसी काम को करने से पहले नही सोचता है | परन्तु जब वह काम गलत हो जाता है तो बाद में पछताता है | जिस प्रकार से बबुलका पेड  लगाकर आम नहीं खा जाया सकते, वैसे ही किसी काम को करने के बाद पछताना नहीं चाहिए और उसे करने से पहले उसके विषय में गंभीरता से सोच लेना चाहिए |



छब्बीसवा दोहा

जिन खोजा तिन पाइया, गहरे पानी पैठ |                                                                              मैं बपुरा बूडन डरा, रहा किनारे बैठ ||

[शब्द का अर्थ :– खोजा-ढूढना, पाईया-मिलना, बपुरा-बेचारा]

भावार्थ- जीवन में जो परिश्रम करते है, मेहनत करते है, कर्म करते है वो अनेक कठिनाइओंका सामना करके भी अपने मंजिलोको, लक्ष्यको जरूर प्राप्त कर लेते है | जैसे कोइ गोताखोर गहरे पानी की पर्वा न करते हुए पानी में गोता लगाता है और पाणी में से जरूर कुछ न कुछ लेके आता है | लेकिन कुछ बेचारे लोग ऐसे भी होते है जो पानी में डूबने के भय से किनारे पे ही बैठे रहते है और जीवन में कुछ भी नहीं प्राप्त करते है |

अर्थात जीवन में जो लोग संकटों से बिना डरे अपना कर्म करते है वो जरूर सफल होते है |



सत्ताईसवा दोहा

चाह गई, चिंता मिटी, मनवा बेपरवाह |
जिसको कुछ नहीं चाहिए, वह शहनशा ||

[शब्द का अर्थ :– चाह-इच्छा, ख़्वाहिश,  मनवा-मन]

भावार्थ- जिस मनुष्य के मन से, दिल से इच्छा, ख्वाहीशे समाप्त हो जाती है, उस मनुष्य के जीवन से अपने आप ही चिंता मिट जाती है और मन मस्त मौला, आनंदी हो जाता है | क्योंकी इच्छा ही सब दुखों का मूल है और जब वही समाप्त हो जाती है तो कबीर कहते है उस व्यक्ती का जीवन किसी राजा या शेनशाह के सामान होता है |



अट्ठाईसवा दोहा

ऐसी बाँणी बोलिये, मन का आपा खोई |                                                                          अपना तन सीतल करै, औरन कौ सुख होई ||

[शब्द का अर्थ :– बाँणी- बोली, आपा-अहंकार, खोई-त्याग करना, सीतल-शीतल, औरन कौ-दूसरों को ]

भावार्थ- हमे अपने मन का अहंकार त्याग कर ऐसी भाषा, बोली का प्रयोग करना चाहिए | जिससे हमारा अपना तनमन भी स्वस्थ रहे और दूसरों को भी कोई कष्ट न हो मतलब दूसरों को भी सुख प्राप्त हो | इन्सान को विनम्रता से बोलना चाहिए ताकी सुनने वाले के मन को भी अच्छा लगे और आपका मन भी प्रसन्न हो |



उनतीसवा दोहा

कस्तूरी कुंडली बसै, मृग ढूंढे बन माँही |                                                                              ऐसे घटी-घटी राम है, दुनिया देखै नाहिं || 

[शब्द का अर्थ :कस्तूरी-एक सुगन्धित पदार्थ, कुंडली-नाभि, मृग-हीरण, घटीघटी-कण-कण, बन-जंगल]

भावार्थ- हीरण कस्तुरी के सुगंध को ढूंढते हुए पुरे जंगले में भटक रहा है | पर वह इस बात से अनजान है की कस्तुरी स्वयम उसके नाभि में ही बसी हुयी है| उसी तरह से दुनिया के जो लोग हे उन्हें राम नही दिख रहे है, इश्वर नहीं दिख रहे है, वो उन्हें मंदिर, तीर्थस्थान, देवालायोंमे ढूंढते है जब की इश्वर दुनिया के हर एक कण-कण में बसा है | इश्वर स्वयंम उनके मन में ही बसा है और वो उसे जगह जगह कस्तुरी मृग की तरह ढूंढते फिर रह है |



तीसवा दोहा

जब मैं था तब हरी नहीं, अब हरी हैं मैं नाहि |                                                                        सब अँधियारा मिटी गया, जब दीपक देख्या माहि ||

[शब्द का अर्थ :मैंअहंकार, हरी-इश्वर, अँधियारा-अंधकार ]

भावार्थ- जब तक मुझमे अहंकार था तब तक मुझे भगवान के दर्शन प्राप्त नहीं हो सके| पर जैसे ही मेरा अहंकार समाप्त हो गया मुझे भगवान के सीवाय, उस परम पीता के बगैर कुछ भी दिखाई नही पड़ रहा है| 

कबीर दास कहते है यह ठीक वैसे ही हुआ जिस प्रकार से दीप प्रज्वल्लीत होते ही समस्त अँधियारा समाप्त हो जाता है | ऐसे ही हमारे अंतर्मन में जो अहंकार था वह जैसे ही समाप्त हो गया तो संपूर्ण जगत दृश्यमान हो जाता है इसी तरह से मुझे संपूर्ण दिशाओमें इश्वर के दर्शन हो गए |



एकतिसवा दोहा

गुरु गोबिंद दोऊँ खड़े, काके लांगू पाँय |                                                                                बलिहारी गुरु आपने, गोविन्द दियो मिलाय ||

[शब्द का अर्थ :गोविन्द-भगवान, इश्वर, दोऊँ-दोनो, काके-किसके, पाँय-पाँव, बलिहारी-धन्य हो ]

भावार्थ- अगर गुरु और इश्वर दोनों एक साथ खड़े है तो पहले किसके चरण स्पर्श करने चाहिए | कबिरदासजी कहते है, में पहले गुरु को ही प्रणाम करूँगा क्यों की गुरु ही है जिन्होंने मुझे इश्वर तक पहुचने का मार्ग बताया है |

अर्थात कबीरजी इस दोहे द्वारा कह रहे है की जो शिक्षा और ज्ञान देने वाला गुरू हैं वो इश्वर से भी बड़ा है |



बत्तीसवा दोहा

साईं इतना दीजिये, जा में कुटुम समाय |                                                                                मैं भी भूखा न रहूँ, साधू भी ना भूखा जाय ||

[शब्द का अर्थ :साई-इश्वर, भगवान, कुटुम-कुटुंब ]

भावार्थ- कबीरदास जी कहते है की हे प्रभू तुम मुझे केवल इतना ही धन धान्य देना जितने में, मैं और मेरे परिवार का गुजारा चल जाए | में खुद भी कभी भूखा ना रहूँ और मेरे घर में जो अतीथी आये उन्हें कभी भी भूखा वापस न जाना पड़े |

कबीरजी कहते है की मानव को कोइ लोभ नहीं करना चाहिए जो कुछ उसके पास है वो सब उस इश्वर का दीया है उसमे ही संतोष करना चाहिए ज्यादा इच्छाएं नहीं बढ़ानी चाहिए | क्यों की इच्छाएं जब बढ़ती है तो मुसीबतें भी बढ़ती है |



तेहतीसवा दोहा

निन्दक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय |                                                                            बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय ||

[शब्द का अर्थ :निन्दक-निंदा करनेवाला, नियरे- करीब, सुभाय-स्वभाव ]

भावार्थ- कबीरदासजी कहते है, जो व्यक्ती हमारी निंदा करता है, जो हमारा निंदक है ऐसे व्यक्ती को हमेशा अपने करीब ही रखना चाहिए | क्यों की उसके द्वारा हमें हमारे कमियों के बारे में पता चलता रहता है | हमें हमारे शरीर को साफ़ करने के लिए पानी और साबुन की जरूरत होती है | पर अगर हमारी निंदा करने वाला अगर हमारे पड़ोसी होगा तो हमें हमारे कमियों के बारे में पता चलता रहेगा और हम अपने आप में सुधार ला सकेंगे, और बिना पानी साबुन के ही हम हमारे स्वभाव को साफ़ रख सकते है |



चौंतीसवा दोहा

पानी कर बुदबुदा, अस मानुष की जात |                                                                                एक दीना छीप जायेगा, ज्यों तारा परभात ||

[शब्द का अर्थ :बुदबुदा- बुलबुला, मानुष-मनुष्य, दीना-दिन, परभात-सुबह, प्रभात]

भावार्थ- जिस तरह पानी का बुलबुला कुछ ही क्षण में पाणी के सतह पर आकर समाप्त हो जाता है वैसे ही मनुष्य का देह भी क्षणभंगुर है | इस मनुष्य शरीर की कोइ शाश्वती नहीं है और यह एक दीन समाप्त होने वाला है | जिस तरह से रात को आसमान में दीखने वाले तारे सुबह होते ही छीप जाते है वैसे ही यह शरीर भी एक दीन नष्ट हो जायेगा |



पैंतीसवा दोहा

यह तन काचा कुम्भ है, लिया फिरे था साथ |                                                                        ढबका लगा फूटीगा, कछु न आया हाथ ||

[शब्द का अर्थ : कुम्भ-मटका, काचा-कच्चा, ढबका-चोट, फूटीगा-टूटना ]

भावार्थ- कबीर कहते है जिस शरीर को तूने जिन्दगी भर सजाया, सवारा जिसकी देखभाल की, जिससे बेहद प्यार किया और जिसे जिन्दगी भर साथ लिए घूमता रहा दरअसल यह एक कच्चा घड़ा है | जरा सी चोट लगने पर यह फूट गया और तेरे हाथ में कुछ भी न आया |

अर्थात मनुष्य जिस देह से अपार प्रेम करता है और जिसे सजाये-सवारे, संभाले फिरता है यह एक नश्वर देह है जो एक दिन त्याग देना है | इसीलिए मनुष्य ने अपने जीवन में अच्छे कर्म करने चाहिए वही उसकी असली पूंजी है|



छतीसवा दोहा

यह तन विष की बेलरी, गुरु अमृत की खान |                                                                          सीस दिये जो गुरु मिले, तो भी सस्ता जान ||

[शब्द का अर्थ :तन-शरीर, बेलरी-बेल, खान-खजाना, सीस -शीर, मस्तक ]

भावार्थ- कबीरजी कहते है की यह शरीर विष की लता (बेल) है और इसमें विष के फल अर्थात काम, क्रोध, लोभ, मद यही फलेंगे | हमारे जीवन में गुरु किसी अमृत के खजाने समान है जो हमें अच्छाई का मार्ग बतातें है और हमारा उद्धार करते है | अपना शीर चढ़ा देने पर भी अगर ऐसे सद्गुरु से हमारी भेट हो जाये तो हमें यह सस्ता सौदा ही समझना चाहिए |

इस दोहे में कबीरजी ने मनुष्य के जीवन में गुरु के महत्व का वर्णन किया है |



 सैंतीसवा दोहा

माला फेरत जुग गया, मिटा न मन का फेर |                                                                      करका मन का डारि के, मन का मनका फेर ||

[शब्द का अर्थ : माला-जपमाला, फेरत-घूमाते हुए, जुग-युग, मिटा-समाप्त, मन का फेर-मन की अशांतता, करका-हाथ का, डारी के-छोड देना ]

भावार्थ- कोइ व्यक्ती -अगर लम्बे समय तक हाथ में मोती की जप माला लेकर घूमाता है, इश्वर का स्मरण करता है और फिर भी इससे उसके मन का भाव नहीं बदलता और उसके मन की हलचल भी शांत नहीं होती | कबीर ऐसे व्यक्ती को कहते है की हाथैसे माला को फेरने का पाखण्ड छोड़कर अपने मन में शुद्ध विचारों को भरना चाहिए तथा सच्चे मन से सब का भला करना चाहिए |

अर्थात माला फेरते फेरते युग बिता दिए लेकिन अब तक मन शांत नही हुआ| हाथ की माला छोड़ दे और मन की माला फेरना शुरू कर | हमें हाथ की माला का फेरना छोड़कर अच्छे कर्म करने चाहिए जिससे हमसे हमारे भगवान प्रसन्ना हो |



 अड़तीसवा दोहा

प्रेम न बाडी ऊपजै, प्रेम न हाट बिकाय |                                                                                राजा परजा जेही रुचै, सीस देह लेइ जाय ||

[शब्द का अर्थ :-बाडी- खेत, ऊपजै-उपजना, हाट-बाजार, बिकाय-बिकता हैं, परजा-प्रजा, सीस-शीर ]

भावार्थ- प्रेम किसी खेत में नहीं उपजता, और नहीं प्रेम कोइ बाजार में खरीदने बेचने वाली वस्तु है | अगर कोइ प्रेम पाना चाहता हे वह राजा हो या कोइ सामान्य आदमी, प्रेम पाने के लिए उसे त्याग और बलीदान देना ही पड़ता है | त्याग और बलिदान के बिना प्यार को पाया नही जा सकता|

कबीर जी कहते है प्रेम यह एक गहरी भावना है जो खरीदी या बेची नहीं जा सकती |



 उनतालीसवा दोहा

बृच्छ कबहूँ नहीं फल भखै, नदी न संचै नीर |                                                                        परमारथ के कारने, साधून धरा सरीर ||

[शब्द का अर्थ :बृच्छ-वृक्ष, पेड़, भखै-भक्षण करना, नीर-पानी, जल, परमारथ-परमार्थ, सरीर-शरीर ]

भावार्थ- पेड़ कभी अपना फल नहीं खाते ,नदियां कभी अपना पानी स्वयं नहीं पीती, यह तो परहित अर्थात दूसरों के लिए सब कुछ न्योछावर कर देते हैं | उसी प्रकार से साधू-संत का जीवन भी दूसरों के परोपकार और कल्याण के लिए ही होता है | हमें भी अपने जीवन को आदर्शवादी बनाते हुए परोपकारी बनना चाहिए |

इस दोहे में हमें परोपकारी बनने सदाचारी बनने का उपदेश दिया है|



 चालीसवा दोहा

दुर्बल को न सताइए, जाकी लम्बी हाय |                                                                              मुई खाल के स्वांस सों, लोह भसम हैं जाय ||

[शब्द का अर्थ :मुई खाल- मरे हुए पशु का चमडा, हाय-बद्दुवा, लोह-लोहा, भसम-ख़त्म हो जाना ]

भावार्थ- शक्तिशाली व्यक्ती को अपने बल का उपयोग करकर किसी कमजोर व्यक्ती पर अत्याचार नहीं करना चाहिए, क्यों की दुखी व्यक्ती के ह्रदय की बद्दुवा बहुत ही हानिकारक होती है | जैसे मरे हुए पशु के चमड़े से लोहा तक जल के राख हो जाता है वैसे ही दुखी व्यक्ती की बद्दुवाओंसे समस्त कूल का नाश हो जाता है |



इकतालिसवा दोहा

जाको राखे साईयाँ, मारि सके ना कोय |                                                                              बाल न बाँका करी सकै, जो जग बैरी होय ||

[शब्द का अर्थ :– साईयाँ-इश्वर, बैरी-दुश्मन, मारि-मार देना, कोय-कोई ]

भावार्थ- कबीर जी कहते है जिस मनुष्य पर इश्वर की कृपा होती है उसे कोइ भी नुकसान पहुंचा नहीं सकता | ऐसे मनुष्य का कोइ बाल भी बाका नहीं कर सकता चाहे सारा संसार ही उसका दुश्मन ही क्यों न हो जाये जिसपर इश्वर की कृपा होती है |

अर्थात जो मनुष्य इश्वर की शरण में जाता है, इश्वर उसका सदैव रक्षण करता है |



 बयालीसवा दोहा

मन के हारे हार है, मन के जिते जीत |                                                                                  कहे कबीर हरी पाइए, मन ही के परतीत ||

[शब्द का अर्थ :हरी –इश्वर]

भावार्थ- जीवन में जय और पराजय केवल मन ही पर निर्भर करती है | यदी मनुष्य मन से हार गया तो पराजय निश्चीत है और यदी उसने मन को जीत लिया तो जीत निश्चित है | इश्वर को भी आप मन के विश्वास से ही प्राप्त कर सकते है, यदी मन में विश्वास है तो वोह जरूर मिलेगा और मन में विश्वास नहीं है तो कभी नहीं मिलेगा |



 तैंतालीसवा दोहा

कबीर तन पंछी भया, जहाँ मन तहां उडी जाई |                                                                      जो जैसी संगती कर, सो वैसा ही फल पाई ||

[शब्द का अर्थ :- तन-शरीर, पंछी-पक्षी, पाई-मिलना, प्राप्त होना]

भावार्थ- कबीर कहते है के संसार के माहौल में रहने वाले व्यक्ती का शरीर पंछी जैसा बन गया है और जहाँ उसका मन जाता है उसका शरीर भी उड़कर वही पहुँच जाता है | जो जैसे लोगों के साथ रहता है वो वैसे ही बन जाता है और वैसे ही फल पाता है |

अर्थात आपको हमेशा अच्छे लोगों के संगत में ही रहना चाहिए |



 चौवालीसवा दोहा

गुरु कुम्हार सीष कुंभ है, गढ़ी-गढ़ी काढे खोट |                                                                        अंतर हाथ सहार दै, बाहर बाहै चोट ||

[शब्द का अर्थ :- कुंभ-घडा, सीष-शिष्य, गढ़ी-गढ़ी- घड़ी घड़ी, बाहै-करे, सहार-सहारा ]

भावार्थ- गुरु कुम्हार के सामान है और शिष्य घड़े के समान है| गुरु शिष्य के अन्दर जो कमियां होती है उन्हें घड़ी घड़ी निकालता रहता है | कबीर कहते है की गुरु शिष्य को घड़े के सामान गढ़ता है और ठोक–ठोक कर उसके दोषों को दूर करता है | जिस प्रकारसे कुम्हार मिटटी के कच्चे घड़े में हाथ डालकर उसे सहारा देता है और उसे बाहर से चोट मारता है उसी प्रकार गुरु बाहर से तो डांट फटकार करता है पर अन्दर से शिष्य के साथ प्रेममय व्यवहार करता है |

अर्थात गुरु शिष्य को कठोर अनुशासन में रखकर अंतर से प्रेम भावना रखते हुए शिष्य की बुराईयोंको दूर करके संसार में सन्माननीय बनता है |



 पैंतालीसवा दोहा

सब धरती कागद करूँ, लेखनी सब बनराय |                                                                        सात समुंद की मसि करूं, गुरु गून लिखा न जाय ||

[शब्द का अर्थ :- कागद-कागज, बनराय- जंगल, समुंद- समुद्र, समुन्दर, मसि-स्याही, गुन-गुण ]

भावार्थ- कबीर कहते है गुरु के गुणों का बखान करना उनके सामर्थ्य के बाहर है | सारे धरती को मैं कागज बना दूं और जंगले की सारी लकड़ियों को लेखनी कर दूं और सातों समुन्दर के जल को मैं स्याही कर दूं उसके बाद भी हम गुरु के गूण को नहीं लिख सकते अर्थात गुरु के गुण अनंत है |



 छियालीसवा दोहा

जब गुण को गाहक मिले, तब गुण लाख बिकाई |                                                                    जब गुण को गाहक नहीं, तब कौड़ी बदले जाई ||

[शब्द का अर्थ :गाहक-ग्राहक, खरीदने वाला, बिकाई-बेचना, कौड़ी-बिना मोल के-कीमत के ]

भावार्थ- जब गुण को परखने वाला ग्राहक मिल जाता है तो उस गुण की कीमत बहुत ज्यादा हो जाती है और जब गुण को कोइ ग्राहक नहीं मिलता अर्थात परखने वाला नहीं मिलता है तो गुण कौड़ी के भाव चला जाता है | इसीलिए अपने गुणोकों लोगों को पहचानने दो इनमेसे ऐसा तो कोइ होगा जो आपके गुणों को पहचान के आपको सही राह दिखाएगा और आपकी किस्मत खुल जायेगी |



 सैंतालीसवा दोहा

कबीर कहा गरबियो, काल गहे कर केस |                                                                            ना जाने कहाँ मारिसी, कै घर कै परदेस ||

[शब्द का अर्थ :–  मारिसी- मार देगा, प्राण लेगा ]

भावार्थ- हे मानव तू क्या घमंड करता है काल अपने हाथों में तेरे केश पकडे हुए है | तू चाहे घर में हो या परदेस में तेरा मरना तय है | इसीलिए अपनी किसी भी चीज़ पर कभी भी घमंड नहीं करना चाहिए क्यों की एक न एक दीन सबको मरना है यहाँ किसीको नहीं रहना हैं तो क्यूँ न सबके दिल में जगह बनाकर जाया जाए |



 अड़तालीसवा दोहा

दोस पराए देखि करि, चला हसन्त हसन्त |                                                                          अपने याद न आवई, जिनका आदि न अंत ||

[शब्द का अर्थ :दोस-दोष, पराए-दूसरों के, हसन्त-हसते हुए ] 

भावार्थ- कबीर जी कहते है की, यह मनुष्य का स्वभाव है के जब उसके सामने किसी की बुराई हो रही होती है तो वह बहुत खुश होकर उसे सून रहां होता है| वह यह भूल जाता हैं की उसके अन्दर भी ऐसी लाखों बुराइयाँ है जिनकी न तो कई शुरुवात दिखाई देती है और न ही उसका कही अंत दिखाई देता है |

अर्थात किसी के दोषों पर और कमियों पर हमें हसना नहीं चाहियें | हमें यह नहीं भुलाना चाहिए की संसार में कोइ भी व्यक्ती बिना दोषों का नही है वह स्वयं भी |



उनचासवा दोहा

मौको कहाँ ढूंढे बन्दे, मैं तो तेरे पास में |                                                                              न मैं देवल, ना मैं मस्जीद ना काबे कैलाश में ||

[शब्द का अर्थ :मौको-मुझे, देवल-मंदिर, बन्दे-मनुष्य ]

भावार्थ- इन्सान भगवान को ढूंढने के लिए मंदीर, मस्जीद, पहाड़ों और तीर्थक्षेत्र में घूमता है | मन की शांती के लिए माला फेरता है, व्रत करता है | कबीरजी कहते है के इश्वर हमारे मन में वास करता है, यदी हमारा मन अच्छा हैं तो समझ लीजिये इश्वर हमारे साथ है | इश्वर को ढूंढने के लिए हमें ना तो मंदिर, मस्जीद, काबुल और ना तो कैलाश मैं जाने की जरूरत है, इश्वर हमारे साथही होता हैं हमे बस उसे पहचानना होता है |



 पचासवा दोहा

प्रेमभाव एक चहिए, भेष अनेक बनाए |                                                                              भावी घर में वास करें, भावै वन में जाए ||

[शब्द का अर्थ :- भेष-रूप ]

भावार्थ- ह्रदय में हमेशा इश्वर के प्रती एक प्रेमभाव होना चाहिए | चाहे कौनसा भी रूप धारण करो या कोनसा भी वेष बना लो | चाहे संसारिक बन्धनों में बंधकर गृहस्थ जीवन बिता रहे हो या फिर वन के एकांत वातावरण में वैराग्यपूर्ण जीवन बिता रहे हो | जीवन का कोनसा भी स्वरुप हो वहा प्रेमभाव सदा बना रहना चाहिए | ऐसा प्रेमभाव जो हर स्थिती, हर रूप, हर उम्र में एकसमान बना रहे, वो सिर्फ परम पिता परमात्मा से ही स्थापित हो सकता है |



 इक्यावनवा दोहा 

जा घट प्रेम न संचरे, सो घट जानू मसान |                                                                              जैसे खाल लुहार की, साँस लेतु बिन प्राण ||

[शब्द का अर्थ :- घट-मन, ह्रदय, संचरे-संचार करना, मसान-शमशान, खाल लुहार की- लुहार का आग को हवा देनेवाला अवजार (धौकनी), साँस-श्वास ]   ]

भावार्थ- जिस मनुष्यके ह्रदय में, मन में प्रेमभाव का संचार नहीं होता उसे शमशान के भांती समझना चाहिए | जैसे मृत जानवर के खाल से बनी लोहार की धौकनी भी यूं तो साँस लेती है किन्तु उसमे प्राण नहीं होते | इसी तरह जिस मनुष्य के ह्रदय में इश्वर के प्रती सच्चे प्रेम का भाव नहीं है वह सांस तो ले रहा है पर प्राण विहीन है |

अर्थात जिस मनुष्य के मन में इश्वर के प्रती प्रेम भाव नहीं है उस का जीवन व्यर्थ है |



 बावनवा दोहा

लूट सके तो लूट ले, राम नाम की लूट |                                                                              पाछे फिर पछताओगे, प्राण जाहि जब छूट ||

[शब्द का अर्थ :- पाछे-बाद में, जाहि-जाएंगे ]

भावार्थ- कबीरजी कहते हैं की हमारे जीवन में सुख शांती, समृद्धी और जीवन का उद्धार करने के लिए एक राम का नाम ही काफी है | तो क्यूँ न हम जब तक जीवीत है हर समय राम नाम का जाप करके खुद का उद्धार कर ले |  अन्यथा अपने जीवन के अंतिम क्षण में हम खेद महसूस करेंगे की मैंने जीवन भर राम का नाम नही लिया और मेरा सारा जीवन व्यर्थ गया |

अर्थात वक्त रहते ही हमें प्रभु की भक्ती करनी चाहिए वरना अंतिम समय में पछताने से कुछ लाभ नहीं होगा |



 तिरेपनवा दोहा 

आठ पहर चौसंठ घड़ी, लगे रहे अनुराग |                                                                            ह्रदय पलक ना बिसरे, तब साँचा वैराग ||

[शब्द का अर्थ :- आठ पहर चौसंठ घड़ी-दिन के चौबीस घंटे, अनुराग- भक्ति, निष्ठा, लगन, प्रेम, प्यार ]

भावार्थ- हर पल, हर श्वांस, हर घड़ी जब उस बनाने वाले इश्वर के प्रती ह्रदय में भक्ती बनी रहे तब समझो की हमें उससे सच्चा प्रेम है | हर क्षण ऐसे समर्पण से प्रेम करने वाला ही सद्गुरु और ह्रदय में बसे इश्वर से असीम प्रेम का पात्र बन सकता है |



 चौवनवा दोहा 

जो आवे तो जाये नहीं, जाये तो आवे नाही |                                                                        अकथ कहानी प्रेम की, समझलेहूँ मन माहि ||

[शब्द का अर्थ :- अकथ-अकथनीय, आवे- आएगा ]

भावार्थ- सच्चे प्रेम की कहानी अकथनीय है | इसलिए परम पिता परमेश्वर का सच्चा अनुग्रह प्राप्त करने वाले प्रेमियों को प्रेम के इस गुण के बारें में अपने मन को भली भांती समझा लेना चाहिए | क्यों की उस बनानेवाले (इश्वर) का सच्चा प्रेम जिसको भी प्राप्त हो जाता है तो सदैव उसपर परमेश्वर की कृपा बनी रहती है | किन्तु जब परमेश्वर द्वारा श्वांस के रूप में मिला हूवा प्रेम प्रसाद चला जाता है तो फिर कभी वापिस नहीं आता | इसीलिए परमेश्वर के इस प्रेम को ह्रदय से स्वीकार करना चाहिए |



 पचपनवा दोहा 

पिय का मार्ग सुगम है, तेरा चलन अनेड |                                                                            नाच न जाने बापुरी, कहे आंगना टेढ़ ||

[शब्द का अर्थ :- सुगम-आसान, चलन-आचरण, अनेड-उचित, टेढ़-टेढ़ा, आंगना-आंगण ]

भावार्थ- इश्वर से मिलन का मार्ग एकदम आसान है जो सच्चे प्रेम और ह्रदय से होकर गुजरता है | जो इसे कठिन बताते है उनका स्वयंम का आचरण ही उचित नहीं है | वो स्वयं ही उल्टा मार्ग चुनते है और कहते है परमेश्वर की प्राप्ती कठिन है | यह तो वही वाली बात हुयी नाच स्वयंम नहीं जानते और आँगन टेढ़ा बताकर अपनी गलती का दोष आँगन को दे देते है |



  छप्पनवा दोहा 

नाम ना रटा तो क्या हुआ, जो अंतर है हेत |                                                                      पतिव्रता पति को भजै, मुखसे नाम ना लेत ||

[शब्द का अर्थ :- रटा-उच्चारण, भजै-पूजा करना ]

भावार्थ- अगर ह्रदय में इश्वर के लिए सच्ची लगन, भक्ती है तो ऐसा मनुष्य मुख से इश्वर का नाम भी ना ले तो उससे क्या फर्क पडता है | यह ठीक वैसे ही जैसे कोइ पतिव्रता स्त्री कभी भी अपने मुख से अपने पती का नाम उच्चारण नहीं करती किन्तु मन ही मन अपने पती का नित्य स्मरण ही करती है | उसी प्रकार से मुख से परमेश्वर का नाम लेने का दिखावा इतना महत्वपूर्ण नहीं है जितना की उस परमेश्वर का ह्रदय से स्मरण करना |



 सत्तावनवा दोहा 

मेरा मुझमे कुछ नही, जो कुछ है सो तेरा |                                                                          तेरा तुझको सौपता, क्या लागे हैं मेरा ||

[शब्द का अर्थ :- सौपता-अर्पण करना, लौटा देना  ]

भावार्थ- कबीर जी कहते है, हे परमेश्वर मेरे पास जो भी है वो सब कुछ तेरा दिया हुआ है, इसपर मेरा कुछ भी अधिकार नहीं है | यहाँतक के मेरी सांसो से लेकर मेरे जीवन पर भी तेरा ही अधिकार है | हे परमेश्वर अगर तूने दिया हुआ सबकुछ मैं तुझको लौटा देता हूँ तो मेरे पास कुछ भी नहीं रहेगा क्यों की यह सब कुछ तेरा है और इसपर तेरा ही अधिकार है मैं तो नाममात्र हूँ |



 अट्ठावनवा दोहा 

माखी गुड में गाडी रहे, पंख रहे लिपटाये |                                                                          हाथ मले और सिर धुले, लालच बुरी बलाय ||

[शब्द का अर्थ :-माखी-मक्खी, गाडी रहे-लिपटे रेहना, बलाय-बला, लालच-लोभ ]

भावार्थ- पहले तो मक्खी गुड में लिपटी रहती है, अपने सारे पंख और सर गुड में चिपका लेती हैं | लेकिन जब उड़ने का प्रयास करती है तो उड़ नहीं पाती है और तब उसे अपने लोभी स्वाभाव पर अफ़सोस होता है | ठीक उसी तरह से इन्सान भी अपने सांसारिक सुखों में सर से पाँव तक लिपटा रहता है और जब अंत समय नजदीक आता है तो उसे अपने आचरण पर अफ़सोस होता है लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होती हैं |



 उनसठवा दोहा 

नहाये धोये क्या हुआ, जो मन मैल न जाय |                                                                          मीन सदा जल में रहे, धोये बास न जाय ||

 [शब्द का अर्थ :- मीन-मछली, बास-दुर्गन्ध, मैल-गंदगी ]

भावार्थ- कबीरजी कहते है आप कीतना भी नहा धो लीजिये, लेकिन अगर आपका मन साफ़ नहीं हुआ तो उस नहाने का क्या फायदा | जैसे मछली हमेशा पानी में रहती है फिर भी वो साफ़ नहीं होती और उससे बदबू आती रहती है |

अर्थात उपरी साफ सफाई से ज्यादा आंतरिक साफ सफाई महत्वपूर्ण है | मन का साफ़ होना, निर्मल होना बहुत जरूरी है बजाय के बाहरी सौन्दर्यता | मनुष्य शरीर की कितनी भी स्वछता करले पर अगर उसका मन कुलशीत है, पापी है तो बाहरी साफ़ सफाई अर्थहीन है| 



 साठवा दोहा

कामी, क्रोधी, लालची, इनसे भक्ती ना होय |                                                                        भक्ति करै कोई सूरमा, जाति बरन कुल खोय ||

[शब्द का अर्थ :- सूरमा-शूरवीर, खोय-त्याग करना ]

भावार्थ- कबीर कहते है, कामी मनुष्य विषय वासनाओमें लिप्त रहता है, क्रोधी मनुष्य दूसरों का द्वेष करता है और लालची मनुष्य निरंतर संग्रह करने में व्यस्त रहता है, इन लोगोंसे भक्ती नही हो सकती | भक्ती तो कोई शूरवीर और पुरुषार्थी कर सकता है, जो जाती, वर्ण, कूल और अहंकार का त्याग कर सकता है |

अर्थात परमेश्वर की भक्ती गुणवान और त्यागी मनुष्य ही कर सकता है, दुर्जन मनुष्य नही |



 इकसठवा दोहा

भक्ति जु सीढ़ी मुक्ति की, चढ़े भक्त की हरषाय |                                                                      और न कोई चढ़ी सकै, नीज मन समझो आय ||

[शब्द का अर्थ :-  हरषाय-खुशी होना ]

भावार्थ- भक्ति मुक्ति की वह सीढी है, जिसपर चढ़कर भक्त को अपार खुशी मिलती है |  दूसरा कोई भी मनुष्य जो सच्ची भक्ति नहीं कर सकता इस पर नहीं चढ़ सकता है यह समझ लेना चाहिए |

अर्थात भक्ति की सीढी को सच्चा भक्त ही चढ़ सकता है क्योंकि यह मुक्ति का द्वार दिखाने वाली होती है, यह मन में निश्चित कर लो की भक्त के अलावा अन्य कोई यह सीढ़ी नहीं चढ़ सकता है। भक्ति मार्ग पर बढ़ने के लिए अभिमान का त्याग करना पड़ता है इसलिए यह कोई आसान कार्य भी नहीं है।



 बासठवा दोहा

भक्ति बिन नहिं निस्तरे, लाख करे जो कोय |                                                                        शब्द सनेही होय रहे, घर को पहुँचे सोय ||

[शब्द का अर्थ :- बिन-बगैर, कोय-कोई ]

भावार्थ- किसी भी मनुष्य के लिए भक्ति के बिना मुक्ति संभव नही हैं, चाहे वह लाख कोशिश कर ले | पर जो मनुष्य सद्गुरुके वचनों को अर्थात शब्दोको ध्यान से सुनता है और उनके बताये मार्ग पर चलता है, वे ही अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है |



 तिरेसठवा दोहा 

काह भरोसा देह का, बिनसी जाय छिन मांहि |                                                                      सांस, सांस सुमिरन करो, और जतन कछु नाहिं ||

[शब्द का अर्थ :- काह-क्या, देह-शरीर, सुमिरन-स्मरण, सांस-साँस, श्वास ]

भावार्थ- कबीर कहते है, इस शरीर का क्या भरोसा है, किसी भी क्षण यह नश्वर शरीर हमसे छिन सकता है | इसलिए हर साँस में, हर पल में उस परम पीता परमेश्वर को याद करो वही है जो तुम्हे मुक्ती दिला सकता है | इसके आलावा मुक्ती का कोइ दूसरा मार्ग नहीं है |



 चौंसठवा दोहा 

हिन्दू कहे मोहि राम पियारा, तुर्क कहे रहमाना |                                                                  आपस में दोउ लड़ी लड़ी मुए, मरम न जाना कोए ||

[शब्द का अर्थ :-मोहि-मुझे, पियारा-प्यारा, तुर्क-मुसलमान, रहमाना-अल्ला, दोउ-दोनों, मुए-मर गए, मरम-मर्म]

भावार्थ- कबीरजी कहते है, हिन्दू कहते है की उसे राम प्यारा है और मुसलमान कहता है के उसे रहमान (अल्ला) प्यारा है | इसी विषय पर बहस कर करकर दोनो आपस में लड लड़कर मर जाते है | पर दोनों मे से  सच्चाई कोइ नहीं जान पाता है की इश्वर एक है |

अर्थात इश्वर एक ही है उसकी तुम किसी भी रूप में भक्ती करो |



 पैंसठवा दोहा 

साधू ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय |                                                                                    सार-सार को गही रहै, थोथा देई उडाए ||

[शब्द का अर्थ :- सुभाय-स्वभाव, सार-सार्थ,अच्छा, थोथा-कचरा, निरर्थक  ]

भावार्थ- सज्जन व्यक्ती को इस प्रकार होना चाहिए जैसे अनाज साफ करने वाला सूप होता है | वोह सार वस्तु को ग्रहण कर लेता है और थोथा वस्तु अर्थात सारहीन वस्तु को उडा देता है, बाहर कर देता है | इसी प्रकार हमें भी ज्ञानवाली चीज़े, ज्ञानवाले विचार अपने पास रख लेने चाहिए और बेकार की बातों से अपने आपको दूर ही रखना चाहिए |



 छियासठवा दोहा 

जबही नाम हिरदे धरा, भया पाप का नाश |                                                                          मनो चिगीं आग की, पारी पुरानी घास ||

 [शब्द का अर्थ :- हिरदे-ह्रदय, चिगीं-चिंगारी, भया-हो गया ]

भावार्थ- कबीरजी कहते है, जबसे हमने भगवान का नाम ह्रदय में धरा है, भगवान के भक्ती में लीन हो गए है तबसे हमारे सारे पापों का नाश हो गया है| जैसे किसी पुरानी सुखी घास पर आग की चिंगारी पड जाने पर वह जल कर राख हो जाती है, वैसे ही उस परमपिता परमेश्वर का नाम अपने ह्रदय में धरने से मेरे सारे पापों का नाश हो गया है |



 सड़सठवा दोहा

जहाँ दया तहँ धर्म है, जहाँ लोभ तहँ पाप |                                                                          जहाँ क्रोध तहँ काल है, जहाँ छिमा तहँ आप || 

[शब्द का अर्थ :- तहँ-वहां, लोभ-लालच, छिमा-क्षमा ]

भावार्थ- जहाँ लोगों के मन में दया-भाव होता है वहांपर धर्म निवास करता है और जहाँ लोगों के मन में लालच होता है वहां पाप निवास करता है | जिन व्यक्तीयों के मन में हमेशा क्रोध रहता है वह काल के समान होता है, उनका काल हमेशा उनके इर्द-गिर्द घूमता रहता है |और जहाँ क्षमा वास करती है, जहाँ दूसरोंके गलतियोंको क्षमा किया जाता है वहां इश्वर स्वयंम निवास करते है |



 अड़सठवा दोहा 

हस्ती चढिए ज्ञान कौ, सहज दुलीचा डारी |                                                                              स्वान रूप संसार है, भूकन दे झक मारी ||

[शब्द का अर्थ :- हस्ती-हाथी, स्वान-कुत्ता, भूकन दे-भोंकने दो ]

भावार्थ- कबीरजी कहते है, ऐसे उच्च ज्ञान को प्राप्त कीजिये जिससे तुम्हारी अंतरात्मा सहज जो जाए | क्यों की यह संसार तो एक श्वान (कुत्ता) के समान है यह आप ऊँचाई को प्राप्त कर लोंगे तो भी बोलेगा और नहीं प्राप्त कर सके तब भी बोलेगा | इसलिए उन्हें भोकने दो, बोलने दो उसपर अपनी कोइ भी प्रतिक्रिया व्यक्त न करो, आप हमेशा अपनी उन्नती पर ध्यान दो |

अर्थात इस दोहे में कबीरजी कहना चाहते है, साधक मस्ती से ज्ञानरुपी हाथी पर चढ़े हुए जा रहे है और संसार भर के कुत्ते भोंक भोंककर शांत हो रहे है परन्तु वह हाथी का कुछ बिगाड़ नहीं पा रहे हैं | यह दोहा निन्दको पर व्यंग है और साधकोंके लिए प्रेरणा | 



 उनहत्तरवा दोहा 

प्रेमी ढूँढत मैं फिरों, प्रेमी मिले न कोइ |                                                                              प्रेमी को प्रेमी मिले, सब विष अमृत होई ||

[शब्द का अर्थ :- प्रेमी-इश्वर(रूपकात्मक), फिरों-भटकना ]

भावार्थ- मैं परमात्मा का वास्तवीक ज्ञान अर्थात परमात्मा को ढूढंता फिरता रहा पर मुझे उसकी प्राप्ती ही नही हुई | मैंने उसे पाने के लिए पूजा- पाठ,  कर्म- काण्ड सब कुछ किया पर मुझे उसके दर्शन नहीं हुए | पर मुझे वास्तविक इश्वर की प्राप्ती तब हुई जब मेरे लिए सब समान हो गए, मेरे मन में उंच-नीच, छोटा बड़ा ऐसा कोइ  भेद भाव ही नहीं रहा | मेरे लिए विष और अमृत दोनों एक सामान हो गए |

अर्थात कबीर जी इस दोहे में अपने प्रेमी रुपी इश्वर की खोज में हैं जो उन्हें कही मिल नही रहा | वे कहते है अपने प्रेमी अर्थात इश्वर से मिलने पर इस प्रेमी भक्त के मन का सारा दुःख रुपी विष, सुख के अमृत में बदल जायेगा |



 सत्तरवा दोहा 

पखापखी के कारने, सब जग रहा भूलान |                                                                        निरपख होई के हरि भजै, सोई संत सुजान ||

[शब्द का अर्थ :-पखापखी-पक्ष-विपक्ष, भूलान-भूल गयी है, निरपख-निरपेक्ष, हरि-इश्वर, सोई-वही, सुजान-ज्ञानी] 

भावार्थ- पक्ष-विपक्ष, समर्थन-विरोध, सही-गलत के कारन हम सब जग को, सारे संसार को भुला बैठे है |      पक्ष-विपक्ष के चक्कर में इस दुनिया के लोग आपस में लढ रहे है, वे अपने झगड़े में इश्वर को भूल गए है | ज्यो व्यक्ती बिना किसी भेद भाव के, निरपेक्ष होकर जो इश्वर का भजन करता है, चिंतन करता है तो उसी मनुष्य को अच्छा व्यक्ती, संत व्यक्ती, सज्जन व्यक्ती कहां जाता है | वही मनुष्य मोक्ष को प्राप्त करने वाला होता है |



 इकहत्तरवा दोहा

कबीर खड़ा बाज़ार में, मांगे सबकी खैर |                                                                              ना काहू से दोस्ती, न काहू से बैर ||

[शब्द का अर्थ :- खैर-सलामती, भलाई, काहू-किसीसे, बैर-दुश्मनी ]

भावार्थ- इस संसार में आकर कबीर अपने जीवन में बस यही चाहते है कि सबका भला हो और संसार में यदी किसीसे दोस्ती नही तो दुश्मनी भी न हो |



 बहत्तरवा दोहा 

मन हीं मनोरथ छांडी दे, तेरा किया न होई |                                                                        पानी में घिव निकसे, तो रुखा खाए न कोई ||

[शब्द का अर्थ :- मनोरथ-इच्छा, छांडी दे-त्यागना, छोड देना, घिव-घी, निकसे-निकलना, रुखा-सुखा हुआ ]

भावार्थ- मनुष्य मात्र को समझाते हुए कबीर कहते है कि मन की इच्छाएं छोड़ दो, उन्हें तुम अपने बूते पर हासिल नहीं कर सकते | मन की इच्छाओं का कोई अंत नहीं यह कभी भी ख़त्म नही होती है, इनके पीछे भागना बेवकूफी है| यदी पानी से घी निकल आए, तो रुखी रोटी कोई नही खाएगा |

अर्थात मन के इच्छाओं की कोई सीमा नहीं एक पूरी हो गयी तो दुसरी सामने आती है | 



 तिहत्तरवा दोहा

आधी औ रुखी भली, सारी सोग संताप |                                                                              जो चाहेगा चूपड़ी, बहुत करेगा पाप ||

[शब्द का अर्थ :-भली-अच्छी ]

भावार्थ- अपनी मेहनत की कमाई से जो भी कुछ मिले, वह आधी और सुखी रोटी ही बहुत अच्छी है | यदि तू  घी चुपड़ी रोटी चाहेगा तो सम्भव है तुम्हे पाप करना पड़े |

कबीर जी का कहना है कि बुनियादी आवश्यकताओं से परे आवश्यकताओं को बढ़ाना ठीक नहीं है। इससे समाज में विषमता की सृष्टि होती है |



 चौहत्तरवा दोहा 

कुछ कहि नीच न छेडीये, भलो न वाको संग |                                                                      पत्थर डारे कीच में, उछलि बिगाड़े अंग ||

[शब्द का अर्थ :-संग-संगत, डारे-डाले, वाको-उसका, कीच-कीचड़, बिगाड़े-ख़राब करना ]

भावार्थ- किसी दुर्जन या दृष्ट व्यक्ति को कुछ भी कहकर कभी मत छेडीयें वह उसके दृष्ट स्वाभाव के अनुसार हमें हानी पहुंचा सकता है, और उसकी संगती में भी हमारी कोई भलाई नहीं होती है | जिस प्रकारसे कीचड़ में पत्थर डालने से पत्थर फेकने वाले का ही छींटे उछलने से शरीर गन्दा होता है, उसी प्रकार दुर्जन व्यक्ति से व्यवहार रखने पर व्यवहार रखने वाले का ही बुरा होता है।



 पचहत्तरवा दोहा 

तिनका कबहुँ ना निन्दिये, जो पाँवन तर होय |                                                                      कबहुँ उड़ी आँखिन पड़े, तो पीर घनेरी होय ||

[शब्द का अर्थ :-तिनका-सूखे घास का टुकड़ा, कबहुँ-कभी भी, पाँवन तर-पाँव के निचे, आँखिन-आँख, पीर-दर्द, घनेरी-बहुत ज्यादा ]

भावार्थ- कबीर दास जी कहते है कभी भी पैरों के निचे आने वाले छोटे से  तिनके की भी निंदा नहीं करनी चाहिए, उसे छोटा समझने की भूल नहीं करनी चाहिए, क्योंकिं जब वही तिनका आँख में उड़कर चला जाए तो बहुत पीड़ा सहनी पड़ती है | असहनीय पीड़ा सहने के बाद आप कभी भी छोटेसे तिनके को भी कम समझने की भूल नहीं करोंगे |

अर्थात मनुष्य को किसी भी इन्सान को छोटा नहीं समझना चाहिए, बहुत बार इन्ही लोगों के वजहसे उसे संकटों को झेलना पड़ता हैं |



छिहत्तरवा दोहा 

साधू भूखा भाव का, धन का भूखा नाहिं |                                                                            धन का भूखा जी फिरै, सो तो साधू नाहिं ||

[शब्द का अर्थ :-भाव-प्रेम, करुणा, भक्ती  ]

भावार्थ- कबीर दास जी कहते कि साधू हमेशा करुणा और प्रेम का भूखा होता है, इश्वर के भक्ती का भूखा होता है | उसे किसी भी प्रकार के धन संपती का लालच नहीं होता अर्थात वह कभी भी धन का भूखा नहीं होता | जो धन का भूखा होता है, लालची होता है, जो धन का प्राप्त करने के लिए भटकता फिरता है, ऐसा व्यक्ती कभी भी साधू नहीं हो सकता |



 सतहत्तरवा दोहा

बाहर क्या दिखलाए , अंतर जपिए राम |                                                                                कहा काज संसार से, तुझे धानी से काम ||

[शब्द का अर्थ :- धानी-मालिक, स्वामी ]

भावार्थ-  भगवान के नाम का जाप सिर्फ बाहरी दिखावे के लिए नहीं करना चिहिए, नाम को आंतरीक रूप से, मन ही मन में जपना चाहिए | हमें संसार के लोगों से नहीं, संसार की चिंता छोड़कर संसार के मालिक से सम्बन्ध रखना चाहिए वही हमारा मुक्ति दाता है |



 अठहत्तरवा दोहा 

फल कारण सेवा करे, करे न मन से काम |                                                                            कहे कबीर सेवक नही, चाहे चौगुना दाम ||

[शब्द का अर्थ :- चौगुना-चारगुना,  दाम-पैसा ]

भावार्थ- कबीर जी कहते है, जो व्यक्ती भगवान की सेवा करते हैं पर उसके बदले में अपने मन में इच्छा रखकर उसका फल भी चाहता हैं, ऐसा मनुष्य वास्तव में भगवान का भक्त नहीं है, सेवक नहीं है क्योंकि सेवा के बदले वह कीमत चाहता है। और यह कीमत भी वह चौगुनी चाहता है, मतलब वह मनुष्य भगवान की सेवा नहीं मजदूरी कर रहा हैं |



 उनासीवा दोहा 

आया था किस काम को, तु सोया चादर तान |                                                                  सम्भाल ए गाफिल, अपना आप पहचान ||

[शब्द का अर्थ :- आप-स्वयंम ]

भावार्थ- कबीर जी कहते है, हे मनुष्य तु यहाँ परमात्मा का भजन करने आया है, सत्कर्म करने आया है, पर तुम सब कुछ भुलाकर चादर तान कर सो रहे हो | जागो और वास्तविक सत्य को पहचानो, अपना होश ठीक कर और अपने को पहचान तू किस काम के लिए आया हैं? तू कौन हैं ? स्वयं को पहचान और सत्कर्मों में लग जा |



 अस्सीवा दोहा 

जब मैं था तब गुरु नहीं, अब गुरु हैं मैं नाय |                                                                        प्रेम गली अति साँकरी, ता में दो न समाय ||

[शब्द का अर्थ :- मैं-अहंकार, साँकरी-छोटी ]

भावार्थ- जब तक अहंकार रूपी मैं मेरे अन्दर समाया हुआ था तब तक मैं गुरुं को अपने अन्दर, ह्रदय में स्थान नहीं दे पाया, पर अब जब मुझे गुरू मिल गये है, उनका प्रेम रस प्राप्त हुआ है और साक्षात् गुरु ही मुझमे समा गये हैं तब मेरा अहंकार समाप्त हो गया है, नष्ट हो गया है  | प्रेम की गली इतनी संकरी है कि इसमें एक साथ दो नहीं समा सकते अर्थात् गुरू के रहते हुए अंहकार नहीं उत्पन्न हो सकता।



 इक्यासीवा दोहा 

कबीर कुता राम का, मुतिया मेरा नाउं |                                                                              गले राम की जेवड़ी, जीत खैंचे तित जाउं ||

[शब्द का अर्थ :-कुता-कुत्ता, मुतिया-मोती, नाउं-नाम, जेवड़ी-रस्सी ]

भावार्थ- कबीर जी कहते हैं मैं तो प्रभु राम का कुत्ता हूँ और मोती मेरा नाम है | मैंने मेरे गले में राम नाम की रस्सी बाँध ली है, और दिन-रात मैं मेरे प्रभु के भक्ती में खोया रहता हूँ | मुझे जहाँ मेरे राम ले जाते हैं मैं वहीं अपने आप खिंचा चला जाता हूँ | कबीर जी यहाँ परमात्मा को शरणागत होकर ये कह रहे है |



 बयासीवा दोहा

जिनके नौबति बाजती, मैंगल बंधते बारि |                                                                            एकै हरि के नाव बिन, गए जनम सब हारि ||

[शब्द का अर्थ :-एकै-एक, हरि-इश्वर, नाव-नाम ]

भावार्थ- जिनके द्वार पर पहर–पहर नौबत बजा करती थी और मस्त हाथी जहाँ बंधे हुए झूमते थे अर्थात जो ऐश्वर्य संपन्न थे | ऐसे कुबेर भी अपना सारा धन, ऐश्वर्य गवां बैठे, अपने जीवन की बाजी भी हार गये | यह सब सिर्फ ईसलिए हुआ की सुख के दिनों में वह अपने परमपीता परमेश्वर को भूल गए, उसका स्मरण नहीं किया, उसको याद नहीं किया | 



 तिरासीवा दोहा 

परनारी राता फिरैं, चोरी बिढिता खाहि |                                                                            दिवस चारि सरसा रहै, अंती समूला जाहि ||

[शब्द का अर्थ :-परनारी-पराई स्त्री, राता-रात, फिरैं-घूमना, समूला-पुरी तरहसे, सरसा-मस्ती में ]

भावार्थ- कबीर जी कहते है, परनारी से जो प्रीति जोड़ते है, प्यार करते है और कुछ भी मेहनत नही करते हुए जो चोरी करके, चोरी की कमाई खाते है | भले ही ऐसे लोग चार दिन फूले-फूले फिरे, मौज-मस्ती में अपना जीवन व्यतीत करे, किन्तु ऐसे लोग अंत में जडमूल से नष्ट हो जाते हैं |



 चौरासीवा दोहा 

कागद केरी नाव री, पाणी केरी गंग |                                                                                  कहैं कबीर कैसे तिरूँ, पंच कुसंगी संग ||

[शब्द का अर्थ :-कागद-कागज, नाव-नौका, गंग-गंगा ]

भावार्थ- कबीर जी कहते है, यह जीवन एक कागज की नाव है | मतलब यह जीवन नश्वर है, यह कभी भी ख़त्म हो सकता है, इसका कोइ भरोसा नहीं है | ऊपर से दुनिया में हर तरफ मनुष्य को विचलित करने के लिये मोह, माया के जाल बिछे हुए है | चंचल इन्द्रियों का स्वामी मनुष्य इसमें आसानीसे फस सकता है | उस प्रभु को पाने के लिए मुझे इन सारी बाधाओंको पर करना पड़ेगा | 

अर्थात–नाव यह कागज की है, और गंगा में पानी-ही-पानी भरा है । फिर साथ पाँच कुसंगियों का है, कैसे पार जा सकूँगा ? [ पाँच कुसंगियों से तात्पर्य है पाँच चंचल इन्द्रियों से ।]



 पचासीवा दोहा 

काजल केरी कोठडी  तैसा यहु संसार |                                                                            बलिहारी ता दास की, पैसिर निकसणहार ||

[शब्द का अर्थ :- दास-भक्त, सेवक, संसार-दुनिया ]

भावार्थ- यह दुनिया तो काजल की कोठरी है , जो ही इसमें पैठा, उसे कुछ न  कुछ कालिख तो लग ही जायेगी | धन्य है उस प्रभु भक्त को, जो इसमें पैठकर बिना कालिख लगे साफ़ निकल आता है |

अर्थात कबीर कहते है, यह दुनिया एक ऐसी कोठरी है जिस में मोह, माया, मद, लोभ, क्रोध आदी विकार भरे पड़े है | कोइ भी मनुष्य इन विकारोंका शिकार हो सकता है | पर धन्य है प्रभु के वह भक्त जो इन विकारोंसे भरे संसार में रहकर भी अपने आप को विकारों से दूर रखकर प्रभु के भक्ती में मगन रहते है |



 छियासीवा दोहा 

संत ना छाडै संतई, जो कोटिक मिले असंत |                                                                          चन्दन भुवंगा बैठिया, तउ सीतलता न तजंत ||

[शब्द का अर्थ :-कोटिक-करोड़ों, असंत-दुर्जन, भुवंगा-साप, सीतलता-शीतलता, तजंत-त्यागना ]

भावार्थ- भले ही करोड़ों दुर्जन, दृष्ट लोग संत-महात्मा के रास्ते में आ जाये या उनसे मिले, फिर भी सन्त अपनी अच्छाइयां, सज्जनता और संतपना नहीं छोड़ता | वैसे ही चन्दन के वृक्ष पर कितने ही साँप आ बैठें, तो भी चन्दन अपनी शीतलता को नही छोडता |

अर्थात जीवन में हमे अच्छाइयों का मार्ग कभी भी छोड़ना नहीं चाहिए |



 सत्तासीवा दोहा

ज्यों तिल माहि तेल है, ज्यों चकमक में आग |                                                                        तेरा साईं तुझ ही में हैं, जाग सके तो जाग ||

[शब्द का अर्थ :-चकमक-आग जलानेवाला पत्थर, साईं-परमेश्वर ]

भावार्थ- जैसे तिल में तेल होता हैं और चकमक पत्थर में आग होती हैं, वैसे ही तेरा साई, तेरा प्रभु, तेरा परमात्मा तुझमे ही है | उसे कही बाहर ढूढने की जरूरत नहीं है | हमारे ईश्वर हमारे अन्दर है और हम सोये हुए है, उसे कही और ढूंढ रहे है | कबीर हमें जागने के लिए कह रहे है | हम जगे तो है पर पांचो इन्द्रियों को सुख पहुचाने के लिए जागे है | हमारे भीतर तो परमात्मा है; उसे जानने के मामले में हम अब तक सोये हुए है | कबीर कहते है जाग सके तो जागो और अपने अन्दर वास कर रहे परमेश्वर को जानो |



 अट्ठासीवा दोहा

चलती चाकी देख के, दिया कबीरा रोय |                                                                              दोउ पाटन के बीच में, साबुत बचा न कोय ||

शब्द का अर्थ :- चाकी-अनाज पिसने वाली चक्की, दोऊ-दोनों, साबुत-अखंड ] 

भावार्थ- संसार की चक्की के दो पत्थर-पाटों के बीच हम सब अनाज के दानों की तरह पिस रहें है, और इस पीसाई के अंत में कोई भी साबुत बचने वाला नहीं है | मनुष्य को संसार में सुख-दुःख, पाप-पुण्य के रूपमे अविरत संघर्ष करना पड़ता है | मनुष्य के इस कष्ट को देख कर कबीर जी व्यथित मन से रो देते है | कबीर जी जानते है जो मनुष्य खुद को पहचानेगा, उस परमपिता के शरण में जायेगा वही इस संसार के दुखो से बच पायेगा |  



 नवासीवा दोहा 

जिन घर साधू न पुजिये , घर की सेवा नाही |                                                                          ते घर मरघट जानिए , भूत बसे तीन माही ||

[ शब्द का अर्थ :- मरघट-शमशान ]

भावार्थ- कबीर जी कहते है जिस घर में साधू, संत-महात्मा, उनके विचार और सत्य की पूजा नही होती उस घर में पाप बसता है| साधू-संतो के विचार, उनका मार्गदर्शन जिस घर को मिल जाता है, जो घर उनके बताये गए सत्य मार्ग पर चलता है वह घर एक पवित्र वास्तु होता है, उस घर की हररोज उन्नति होती है | और जिस घर में साधू-संतो और उनके विचारोंका आदर नहीं होता है उस घर की अधोगती होती है, ऐसा घर तो उस शमशान के समान होता है जहाँ दिन में ही भूत प्रेत बसते है |



 नब्बेवा दोहा 

सुखिया सब संसार है, खायै अरु सोवै |                                                                            दुखिया दास कबीर है, जागै अरु रोवै ||

[ शब्द का अर्थ :- सुखिया- सुखी, अरु-और, सोवै-सोया हुआ, दुखिया–दु:खी,  रोवै- रो रहे ]

भावार्थ- कबीर जी कहते है कि, ये दुनिया सुखि है क्यों की ये केवल खाने और सोने का काम करती है | इसे किसी प्रकार की चिंता नहीं है | उनके अनुसार सबसे दुखी व्यक्ती वो है , जो प्रभु के वियोग में जागते रहते है | वे ईश्वर के सत्यता को जान चुके है इसलिए वह जागे हुए है और इश्वर के वियोग में रो रहे है | 

अर्थात सांसारीक भोग में  लगे हुए व्यक्ती तो सुखपूर्वक रहते है और जो प्रभु वियोग में व्याकुल रहते है वे जागते रहते है |



 इक्यानबेवा दोहा 

बिरह भुवंगम तन बसै, मंत्र न लागै कोइ |                                                                              राम बियोगी न जिवै, जिवै तो बौरा होई  ||

[ शब्द का अर्थ :- बिरह–बिछडने का गम, भुवंगम-भुजंग, सांप, बौरा-पागल, मंत्र-उपाय, बियोगी-विरह में तडपने वाला, जिवै-जीवित ]

भावार्थ- कबीर जी कहते है जब मनुष्यके मन में अपनों के बिछडने का गम सांप बन कर लोड़ने लगता है तो उस पर न कोई मन्त्र असर करता है ओर नही कोई दवा असर करती है | उसी तरह राम अर्थात इश्वर के वियोग में मनुष्य जीवित नहीं रह सकता और यदि वह जीवित रहता भी है तो उसकी स्थिती पागलों जैसी हो जाती है |



 बानबेवा दोहा 

 हम घर जाल्या आपणा, लिया मुराडा हाथी |                                                                        अब घर जालौं तास का, जे चलै हमारे साथि ||

[ शब्द का अर्थ :- जाल्या-जलाया, आपणा-अपना, मुराडा-जलती हुई लकड़ी (ज्ञान), जालौं-जलाऊं, हाथी-हात में, तास का-उसका]

भावार्थ- कबीरजी कहते है उन्होंने अपने हाथों से अपना घर जला दिया है, अर्थात उन्होंने मोह-माया रूपी घर को जला कर ज्ञान प्राप्त कर लिया है |अब उनके हांथों में जलती हुई मशाल है, यानी ज्ञान है | अब वे उसका घर जलाएंगे जो उनके साथ चलना चाहता है और ज्ञान की प्राप्ती करना चाहता है | अर्थात उसे भी मोह-माया से मुक्त होना होगा जो ज्ञान प्राप्त करना चाहता है |



 तिरानबेवा दोहा 

आवत गारी एक है, उलटत होई अनेक |                                                                              कह ‘कबीर’ नहीं उलटिए, वही एक की एक ||

[ शब्द का अर्थ :- गारी- गाली ]

भावार्थ- जब कोइ व्यक्ती किसी को गाली देता हैं तो वह एक ही होती है, पर सामने वाला जब उसका उल्टा जवाब देता है तो वह कई रूप ले लेती हैं | जवाब देने पर गलियों का सिलसिला चल निकलता हैं | कबीरजी का कहना है कि गाली का उलटकर उत्तर नही देना चाहिए, ऐसा करने पर वह एक की एक ही रह जाती है अन्यथा उसका स्वरुप बढ़ता जाता है |



 चौरानबेवा दोहा 

कबीर लहरि समंद की, मोती बिखरे आई |
बगुला भेद न जानई, हंसा चुनी-चुनी खाई ||

[ शब्द का अर्थ :- समंद-समुंदर, समुद्र, भेद-अंतर, लहरि-लहर ]

भावार्थ- कबीर कहते हैं कि समुद्र की लहर अपने साथ में मोती बहाकर लाती है और उन्हें किनारों पर बिखेर देती है । पर अज्ञानी बगुला मोतियों को पहचान नहीं पाता है , परन्तु ज्ञानी हंस उन्हें चुन-चुन कर खा लेता है, हासिल कर लेता है ।

इसका अर्थ यह है कि गुरु सब शिष्योंको इक सामान ही शिक्षा देते है, पर समझदार शिष्य उसे भली-भांती समझकर अपना लेता है और जीवन में अपनी उन्नती कर लेता है | तात्पर्य किसी भी वस्तु का महत्व जानकार ही जानता है ।



पंचानबेवा दोहा 

जो उग्या सो अन्तबै, फूल्या सो कुमलाहीं |
जो चिनिया सो ढही पड़े, जो आया सो जाहीं ||

[शब्द का अर्थ :-उग्या-उत्पन्न होना, अन्तबै-अंत, समाप्ति, कुमलाहीं-मुरझना, चिनिया-निर्माण करना, ढही-गिरना]

भावार्थ- इस संसार का नियम यही है कि जिसका उदय हुआ है, उसका अस्त भी होगा | जो विकसित हुआ है वह मुरझा जाएगा। जिसका निर्माण किया गया है वह एक न एक दिन गिर पड़ेगा | और इस संसार में जिसका जनम हुआ है वह एक न एक दिन मर जायेगा | अर्थात इस संसार में जितनी भी वस्तुए है उनका अंत निश्चित है, सभी नश्वर है |



छियानबेवा दोहा 

ऐसा कोई ना मिले, हमको दे उपदेस |
भौ सागर में डूबता, कर गहि काढै केस ||

[ शब्द का अर्थ :-उपदेस-उपदेश, भौ सागर-भव सागर ]

भावार्थ- कबीर संसारी जनों के लिए दुखि होते हुए कहते हैं कि इन्हें कोई ऐसा पथदर्शक नही मिला जो इस संसार रुपी भव सागर को पार करने का मार्ग बताता | संसार सागर में डूबते हुए इन प्राणियों को अपने हाथों से  केश पकड़ कर निकाल लेता और इनको मुक्ति का मार्ग बताकर इनका उद्धार करता |



सत्तानबेवा दोहा 

कबीर सुता क्या करे, जागी न जपे मुरारी |
एक दिन तू भी सोवेगा, लम्बे पाँव पसारी ||

[ शब्द का अर्थ :- सुता-सोया हुआ, मुरारी-इश्वर, सोवेगा-मर जायेगा ]

भावार्थ- कबीर कहते हैं, अज्ञान की नींद में सोए क्यों रहते हो? ज्ञान की जागृति को हासिल कर, प्रभु का नाम लो । सजग होकर प्रभु का ध्यान करो । वह दिन दूर नहीं जब तुम्हें गहन निद्रा में सो जाना है, इसीलिए जब तक जाग सकते हो जागते क्यों नहीं? प्रभु का नाम स्मरण क्यों नहीं करते ?



अट्ठानबेवा दोहा 

हरिया जांणे रूखड़ा, उस पाणी का नेह |
सूका काठ न जानई, कबहूँ बरसा मेंह ||

[ शब्द का अर्थ :-हरिया-हरा, नेह-स्नेह, सूका-सुखा ]

भावार्थ-  वृक्ष को हरा होने के लिए पाणी की जरूरत होती है, बिना पाणी के वह सुख के लकड़ी बन जायेगा | इसलिए उसे पाणी का महत्व मालूम होता है | पानी के स्नेह को हरा वृक्ष ही जानता है | पर सूखा काठ और सुखी  लकड़ी जिन्हें पाणी की जरूरत नही होती, उन्हें पाणी से स्नेह भी नहीं होता है वह  क्या जाने कि कब पानी बरसा?

अर्थात सहृदय मनुष्य ही प्रेम भाव को समझता है, प्रेम के महत्व को जनता है | निर्मम मन इस भावना को क्या जाने ? क्यों की उन्हें कभी किस से प्रेम करना ही नहीं है |



निन्यानबेवा दोहा

लंबा मारग दूरि घर, बिकट पंथ बहु मार |
कहौ संतों क्यूं पाइए, दुर्लभ हरि दीदार ||

[ शब्द का अर्थ :- मारग-मार्ग, दुर्लभ-कठिन, हरि-इश्वर, दीदार-दर्शन ]

भावार्थ-  इश्वर के प्राप्ती का मार्ग न केवल लम्बा है बल्की बड़ा कठिन भी है, और इस मार्ग में बहुतसे लुटेरे अर्थात सांसारिक आकर्षण भी मिलते है| कबीर जी कहते है, हे संतो अब आप ही बताइयें ऐसे स्थिती में उस दुर्लभ भगवान के दर्शन कैसे हो|

इस दोहे में काम, क्रोध, लोभ, मोह और मद इन् पांचो विकारों को साधना के मार्ग का लुटेरा कहां गया है|



एक सौ दोहा

कबीर सीप समंद की, रटे पियास पियास |
समुदहि तिनका करि गिने, स्वाति बूँद की आस ||

[ शब्द का अर्थ :-समंद-समुन्दर, रटे-रटना, पियास-प्यास ] 

भावार्थ- कबीरजी कहते हैं कि समुद्र की सीपी प्यास प्यास रटती रहती है | समुद्र की सीपी को स्वाति नक्षत्रमें गीरने वाली बूंदों का इंतज़ार रहता है | इसी बूंदों से सीपी मोती का निर्माण करती है | इसी स्वाति नक्षत्र की बूँद की आशा लिए हुए समुद्र की अपार जलराशि को भी सीपी तिनके के बराबर समझती है |

अर्थात हमारे मन में जिसे पाने की ललक है, जिसे पाने की लगन है, उसके बिना हमें संसार की बाकी सारी चीज़ें  कम महत्व की लगती है |



एक सौ एक

बिन रखवाले बाहिरा, चिड़िये खाया खेत ।
आधा परधा ऊबरै, चेती सकै तो चेत ॥

[ शब्द का अर्थ :- रखवाले-रक्षक, रखवाल,  बाहिरा-बाहर से, चेती-सावधान ]

भावार्थ- खेत में बोया हुआ अनाज बिना रखवाली के था, यह देख कर चिडियोने खेत में उगे हुए अनाज को बाहर से खाना चालू कर दिया और लगभग आधे खेत का अनाज वह खा चुकी है और कुछ खेत अब भी बचा है | अगर उस बचे हुए खेत को चिड़ियों से बचाना है तो जल्दी से जागो, सावधान हो जाओ और खेत को बचालो|

कबीर कहते है जीवन में असावधानी के कारण  इंसान बहुत कुछ गँवा देता है और उसे खबर भी नहीं लगती के नुकसान हो चुका है | यदि जीवन में हम समय पर सावधानी बरतें तो होने वाले नुकसान से बच सकते हैं |



एक सौ दो

करता केरे गुन बहुत, औगुन कोई नाहिं।
जे दिल खोजों आपना, सब औगुन मुझ माहिं ॥

[ शब्द का अर्थ :- करता-इश्वर, गुन-गुण, औगुन-अवगुण ] 

भावार्थ-  कबीर जी कहते है, इस दुनिया का जो परमपिता परमेश्वर है, जो इस संसार को चलाता है उसमे तो अगणीत गुण है | मैंने पाया है की उसमे एक भी अवगुण नहीं है | पर जब मैंने खुदके बारे में सोचा और अपने दिलके अन्दर खोजा तब मुझे पता चला के समस्त अवगुण तो मेरे अपने अपने ही भीतर हैं |

अर्थात दूसरों के अवगुन देखने से पहले अपने अवगुण ढूँढने चाहिए |



एक सौ तीन

तू कहता कागद की लेखी, मैं कहता आँखिन की देखी |
मैं कहता सुरझावन हारि, तू राख्यौ उरझाई रे ||

[ शब्द का अर्थ :- कागद-कागज, आँखिन-आँख, लेखी-लिखा हुआ, उरझाई-उलझन, सुरझावन-सुलझाना ]

भावार्थ-  तुम किताबोंमे, पोथीयों में और शास्त्रों में जो लिखा है उसे रटते रहते हो, उसे ही सत्यवचन और प्रमाण मानते हो | पर मेरा ऐसा नहीं है, मैं जो आँखों से देखता हूँ, महसूस करता हूँ, समझता हूँ उसे ही मैं सत्य मानता हूँ और वही कहता हूँ | मैं सरलता से हर बात को सुलझाना चाहता हूँ और तुम सीधी बातको भी बेवजह उलझाके रख देते हों |

अर्थात किसी भी बात को, समस्याको सरलता से सुलझाना चाहिए | बेवजह उसे उलझाने से समस्या और कठिन हो जाती है |



एक सौ चार 

पढ़ी पढ़ी के पत्थर भया, लिख लिख भया जू ईंट |
कहें कबीरा प्रेम की लगी न एको छींट ||

[ शब्द का अर्थ :-पढ़ी पढ़ी के- पढ-पढ के, भया-बन गया, छींट-दाग ]

भावार्थ-  बहुत पढ़-लिख लिया, ज्ञान हासिल किया | ज्ञानी हो गए तो मन में अहंकार आ गया, दूसरों को तुच्छ समझने लगे | पढ़-लिख लिया तो ज्ञान के अहंकार के वजहसे मन पत्थर और ईट जैसा कठोर हो गया | कबीर कहते है इतना पढ़ लिख लेने के बाद भी, ज्ञानी बनने के बाद भी अगर दूसरों के प्रती ह्रदय में स्नेह और प्रेम की भावना नहीं हो तो ऐसी पढाई लिखाई का क्या फायदा | प्रेम की एक बूँद, एक छींटा भर जड़ता को मिटाकर मनुष्य को सजीव बना देता है.   

अर्थात ज्ञानी होने के साथ साथ दूसरों के प्रती मन में प्रेमभाव भी होना चाहिए |



एक सौ पाँच

सोना सज्जन साधू जन, टूट जुड़े सौ बार |
दुर्जन कुम्भ कुम्हार के, एइके ढाका दरार ||

[ शब्द का अर्थ :-कुम्भ-मटका, दरार-टूटना, कुम्हार-मिटटी के बर्तन बनाने वाला ]

भावार्थ-  कबीर कहते है सज्जन मनुष्य और साधू यह कीमती धातु सोने की तरह होते है | जिस प्रकार से सोना लचीला होने के वजह से कितने भी आघात झेल लेता है और टूट भी गया तो फिर से जुड़ने की योग्यता रखता है | उसी प्रकार से सज्जन मनुष्य और साधू जीवन में कितने भी दुःख आए, संकट आए उन्हें झेल के फिरसे उठ खड़े होते है | लेकिन दुर्जन व्यक्ति कुम्हार द्वारा बनाये गये मिट्टी के बर्तन जैसा होता है जो एक बार टूट जाने पर वह हमेशा के लिए टूट जाता है।



एक सौ छह

लकड़ी कहे लुहार की, तू मति जारे मोहि |
एक दिन ऐसा होयगा, मई जरौंगी तोही ||

[ शब्द का अर्थ :-  लुहार-लोहार, मति-मत, जारे-जलाना, जरौंगी-जलाऊँगी, मोहि-मुझे, तोहि-तुझे ]

भावार्थ-  लोहार जो लोहे से वस्तुओं को बनाता है, लोहे की वस्तुएं बनाने के लिए उसे आग की जरूरत  होती है, जिसे वह लकड़ियों को जलाकर उत्पन्न करता है | वही लकड़ी एक लोहार से कहती है कि आज अपनी जीविका के लिए तुम मुझे जला रहे हो | लेकिन याद रखना एक दिन ऐसा आएगा, जब तुम्हारी मृत्यु हो जायेगी तब मैं तुम्हें चिता पर जला दूंगी |

अर्थात अपने स्वार्थ के लिए किसीको तकलीफ नही देनी चाहिए, वरना भविष्य में हमें उससे समस्याओंका सामना करना पड सकता है |



एक सौ सात

कबीर हमारा कोई नहीं, हम काहू के नाहिं ।
पारै पहुंचे नाव ज्यौं मिलिके बिछुरी जाहिं ॥ 

[ शब्द का अर्थ :-काहू के-किसी के, मिलिके-मिलकर, बिछुरी-बिछड़ना ]

भावार्थ-  कबीरजी कहते है इस मोहमायासे भरी दुनियासे हमें कितना भी लगाव हो जाए सच तो यही है की यहा हमारा कोई नहीं है और हम किसीके नही है | जैसे नाव में बैठे यात्री सफ़रमे एक दुसरे के दोस्त हो जाते है पर जैसे ही सफ़र ख़त्म होता है वह एक दुसरेसे बिछड जाते है | ठीक उसी तरह से जैसा ही हमारा इस संसार रूपी नाव का सफ़र ख़त्म हो जायेगा हम सबसे बिछड़ने वाले है, हमारे सब सांसारिक सम्बन्ध यहीं छूट जाने वाले हैं |     

अर्थात मनुष्य देह नश्वर है, मृत्यु के पश्चात वह सबसे बिछड़ने वाला है |    



एक सौ आठ

तन को जोगी सब करें, मन को बिरला कोई |
सब सिद्धि सहजे पाइए, जे मन जोगी होइ ||

[ शब्द का अर्थ :-तन-शरीर, जोगी-साधू, बिरला-ख़ास, निराला ]

भावार्थ-  शरीर को योगी जैसा सजाकर मतलब भगवे वस्त्र, भस्म, रुद्राक्ष माला और जटाए बढाकर लोगों को प्रवचन देकर खुद को योगी स्थापित करना और प्रसीद्ध होना आसान बात है | परन्तु मन का योगी बनना बिरले व्यक्तियों का ही काम है, य़दि मन योगी हो जाए तो सारी सिद्धियाँ सहज ही प्राप्त हो जाती हैं। सच्चे योगी के लक्षण भी यही हैं |                      



एक सौ नौ

आछे दिन पाछे गए, हरी से किया न हेत |
अब पछताए होत क्या, चिडिया चुग गई खेत ||

[ शब्द का अर्थ :- आछे-अच्छे, पाछे-पीछे गए, छूट गए, हरी-इश्वर, हेत-प्यार, भक्ती, चुग गई-खा गयी, चिडिया-पंछी, पक्षी ]

भावार्थ-  जब मनुष्य के अच्छे दिन होते है तब वह अपने परिवार के साथ मौज-मस्ती और सुख में रममाण रहता है | सुख के दिनों में उसे उस परमपिता परमेश्वर की याद नहीं आती है, वह उसकी भक्ती नही करता है | पर जैसे ही उसके जिन्दगी में दुःख और संकट आने लगते है उसे ईश्वर की याद आने लगती है |

जब अच्छे दिन थे तब प्रभु से प्यार नहीं किया, उसकी भक्ती नहीं की इसका उसको पछतावा होने लगता है | यह उसी तरह से है जब खेत में अनाज था तब उसकी रखवाली नहीं की और जब चिड़ियों ने सारा अनाज खा लिया तो खुद को कोसने लगा | 

अर्थात समय रहते काम कर लिया जाए तो बाद में पछताना नहीं पड़ता |



एक सौ दस

इक दिन ऐसा होइगा, सब सूं पड़े बिछोह |
राजा राणा छत्रपति, सावधान किन होय ||

[ शब्द का अर्थ :-होइगा-होगा, सब सूं-सबसे, बिछोह-बिछडना, किन-क्यों नही ]

भावार्थ-  इस दुनिया की सारी चीजे नश्वर है, सबका अंत होना है | हे मनुष्य तुझे भी एक दिन अपने परिवार से, दोस्तों से और बड़े कष्ट से अर्जित कीए हुये धन-संपत्ति से भी बिछडना है, सबको यही छोड़ जाना है | इसलिए जो भी राजा है, छत्रपति है, सरदार है, धनवान है तुम अभी से सावधान क्यों नहीं हो जाते |



एक सौ ग्यारह

कबीर प्रेम न चक्खिया, चक्खि न लिया साव |
सूने घर का पाहुना, ज्यूं आया त्यूं जाव ||

[ शब्द का अर्थ :-चक्खिया-चाटना, साव-स्वाद,  ज्यूं आया-जैसे आया, त्यूं जाव-वैसेही जायेगा, सूने घर-जिस घर में कोइ नहीं रहता ]

भावार्थ-  कबीर जी कहते है, इस संसार में जनम लेकर अगर प्रेम नहीं चखा, उस इश्वर के भक्ति का रस नहीं पिया, उसके कृपा दृष्टी का स्वाद नहीं लीया तो ऐसे मनुष्य का जीवन अर्थहीन है | उसने जीया जीवन ऐसे ही है जैसे किसी सुने घर का मेहमान | सुने घर में किसी की भी आवभगत नहीं होती | वहा पर आये हुए मेहमान को बिना कुछ प्राप्त किए बगैर, खाली हाथ वहासे जाना पड़ता है |



एक सौ बारह

मैं मैं बड़ी बलाय है, सकै तो निकसी भागि | 
कब लग राखौं हे सखी, रूई लपेटी आगि ||

[ शब्द का अर्थ :-मैं-अहंकार, बलाय-संकट, सकै तो-हो सके तो, भागि-भाग जाओ, राखौं-रखना, रूई-कपास, आगि-आग ]

भावार्थ-   मनुष्य के जीवन में अहंकार, अहम् यह उसका एक प्रकार से बहुत बड़ा शत्रु है, जिसके वजहसे उसे जीवन में दुःख और संकटो का सामना करना पड सकता है | इसलिए मनुष्य को अहंकार को त्याग देना चाहिए, उससे दूर भागना चाहिए | अहंकार किसी कपास में लपेटी हुयी आग की तरह है, जिस तरह आग पलभर में कपास को जलाकर राख कर देती है,  वैसे ही अहंकार मनुष्य के जीवन को बरबाद कर सकता है |

अर्थात मनुष्य को जीवन में अहंकार से दूर ही रहना चाहिए |  



एक सौ तेरह

इस तन का दीवा करों, बाती मेल्यूं जीव |
लोही सींचौं तेल ज्यूं, कब मुख देखों पीव ||

[ शब्द का अर्थ :-तन-शरीर, दीवा-चिराग, दीपक, जीव-प्राण ]

भावार्थ-  उस परमपिता इश्वर के भक्ति में, मैं अपने देह (शरीर) का दीपक बना लूं, चिराग बना लूं और उसमे अपने प्राणों की, आत्मा की बाती बनाकर ऐसे चिराग में अपने रक्त को तेल की तरह इस्तमाल करू | ऐसे अनोखे चिराग को जलाके, रोशन करके क्या मैं अपने प्रिय भगवान के मुख का दर्शन कर पाऊंगा?

अर्थात प्रभु से भक्ती करना, उससे प्यार करना, उससे मिलने की इच्छा रखना यह बहुत ही कठिन साधना है | कोइ भी मोह-माया में फसा साधारणसा मनुष्य यह नहीं कर सकता | उसके लिए तो कोइ असाधारण, योगी प्रवृती का मनुष्य ही चाहिए |       



एक सौ चौदह

लाली मेरे लाल की जित देखूं तित लाल |                                                                              लाली देखन मै गई मै भी हो गयी लाल। ||

[ शब्द का अर्थ :- लाली–रंगा हुआ , लाल–प्रभु , जित–जिधर, देखन–देखना ]

भावार्थ-  कबीरदास यहां अपने ईश्वर के ज्ञान प्रकाश का जिक्र करते हैं। वह कहते हैं कि यह सारी भक्ति यह सारा संसार , यह सारा ज्ञान मेरे ईश्वर का ही है। मेरे लाल का ही है जिसकी मैं पूजा करता हूं , और जिधर भी देखता हूं उधर मेरे लाल ही लाल नजर आते हैं। एक छोटे से कण में भी , एक चींटी में भी , एक सूक्ष्म से सूक्ष्म जीवों में भी मेरे लाल का ही वास है। उस ज्ञान उस प्राण उस जीव को देखने पर मुझे लाल ही लाल के दर्शन होते है और नजर आते हैं। स्वयं मुझमें भी मेरे प्रभु का वास नजर आता है |



एक सौ पन्द्रह

मलिन आवत देख के, कलियन कहे पुकार |                                                                          फूले फूले चुन लिए, कलि हमारी बार ||

[ शब्द का अर्थ :-मलिन-बाग़ का माली, कलियन-कलियाँ, आवत-आते हुए, कलि-कल, हमारी बार-हमारा वक्त]

भावार्थ-  बाग़ के माली को आते देखकर बगीचे की कलियाँ अपने कलि साथियों से कहती है | बाग़ का माली आज बगीचे के फूलों को तोड़ने के लिए आ रहा हैं, वह फूलों को तोड़ेगा पर कलियों को नही | पर याद रखना जब हम कलियाँ, कलियों से खिलकर कल फूल बनेगे तब यह बगीचे का माली हमें भी तोड़ेगा |

अर्थात इस जगत में सारी चीजें नश्वर है, सबका अंत तय है | आज किसकी मृत्यु हो गयी तो शोक करलो, पर याद रखना कल तुम्हरी भी मृत्यु होने वाली है |  काल सबके लिए समान है | 



एक सौ सोलह

जल में बसे कमोदनी, चंदा बसे आकाश |                                                                            जो है जा को भावना सो ताहि के पास ||

[ शब्द का अर्थ :-जल-पाणी, कमोदनी-कमल, बसे-निवास करना, चंदा-चन्द्रमा, 

भावार्थ-  प्रेम ह्रदय के पवित्र भावना का नाम है | प्रेम में नजदीकी-दूरी, छोटे-बड़े और उंच-नींच का कोई भेद नहीं होता | कुमुदिनी का फूल जल में खिलता है और चन्द्रमा आकाश में होता है फिर भी दोनों का प्रेम संसार भर में प्रसिद्ध है | जिसकी प्रेम भावना जिसमें होती है वह उसीके ह्रदय में वास करता है | उसीके निकट रहता है | फिर दोनों चाहे एक दुसरे से कितने ही दूर क्यूँ न हो |

वैसे ही जब कोई इंसान ईश्वर से सच्चे दिल से  प्रेम करता है, भक्ति करता है, तो ईश्वर प्रसन्न होकर स्वयं चलकर उसके पास आते हैं।



एक सौ सत्रह

ते दिन गए अकारथ ही, संगत भई न संग |                                                                              प्रेम बिना पशु जीवन, भक्ति बिना भगवंत ||

[ शब्द का अर्थ :-अकारथ-व्यर्थ, पशु-जानवर, भगवंत-इश्वर, संगत-साथी ]

भावार्थ- दुनिया में अपना जीवन व्यतीत करते हुए मनुष्य जो समय बिताता है उसे व्यर्थ ही समझना अगर उसने ना कभी सज्जनों की संगति की हो और ना ही कोई अच्छा काम किया हो, न किसीसे प्रेम किया हो और ना ही किसीकी भक्ति की हो  | 

मानव जीवन में प्रेम और भक्ति का बड़ा महत्व है | जिस मनुष्यने अपने जीवन में किसीसे भी प्रेम नहीं किया हो, उस परमपीता परमेश्वर की भक्ती नही की तो उस मनुष्य का जीवन किसी पशु (जानवर) समान समझना चाहिए |  भक्ति करने वाले इंसान के ह्रदय में भगवान का वास होता है |



एक सौ अठारह

नहीं शीतल है चंद्रमा, हिम नहीं शीतल होय |                                                                      कबीर शीतल संत जन, नाम सनेही होय ||

[ शब्द का अर्थ :-शीतल-मुलायम, कोमल, हिम-बर्फ़, सनेही-स्नेह ]  

भावार्थ-  जिसका मन शांत, शीतल होता है वह सबसे प्रेम करता है, सब उसे प्रेम करते है और वह प्रभु के सबसे करीब भी होता है | कबीरजी कहते है दुनिया में सबसे शीतल ना तो सबसे मुलायम रोशनी बिखरने वाला चन्द्रमा होता है और ना तो सबको ठण्ड से जमा देनेवाला बर्फ होता है | 

दुनिया में सबसे शीतल, ह्रदय से मुलायम और कोमल होते है सज्जन पुरुष |  वह सबसे स्नेह करने वाले होते है और सबका भला सोचने वाले होते है |



एक सौ उन्नीस

शीलवंत सबसे बड़ा, सब रतनन की खान |                                                                            तीन लोक की सम्पदा, रही शील में आन ||

[ शब्द का अर्थ :-शीलवंत-चारित्र्यवान, रतनन-रत्न, शील-चारित्र्य ]

भावार्थ-  इस संसार में मनुष्यों के बीच सबसे बड़ा स्थान नही धनवान का होता है, नही राजा का होता है और नहीं किसी सम्राट का होता है | सबसे बड़ा स्थान होता है शीलवान पुरुष का | शीलवंत पुरुष सज्जनता, सदाचार, धार्मिकता, विनयशीलता और नम्रता इन गुणों से युक्त होता है | 

कबीरजी कहते है शीलवान पुरुष इस संसार में मिलनेवाले रत्नों में से सबसे मौल्यवान रत्न है | जिसके पास शीलता है उसके पास मानों तीनों लोकों की संपत्ति है |



एक सौ बीस

कुटिल वचन सबसे बुरा, जा से होत न चार |                                                                        साधू वचन जल रूप है, बरसे अमृत धार ||

[ शब्द का अर्थ :-कुटिल वचन-कठोर बोल, साधू वचन-सज्जन वाणी, मीठे बोल ]

भावार्थ- इस जगत में सबसे बुरे कठोर वचन (बोल) होते हैं, ऐसे कडवे बोल किसी को नहीं बोलने चाहिए जिससे लोग नाराज हो जाये, कडवे बोल किसी भी चीज या समस्या का समाधान नहीं कर सकते | कड़वे शब्द वाले व्यक्तियों को कोई प्यार नहीं करता है | मनुष्य को हमेशा मधुर वाणी ही बोलनी चाहिए |

सज्जन व्यक्ती की मीठी वाणी जल के समान होती है | जब सज्जन व्यक्ती, साधू व्यक्ती अपनी मीठी वाणी से बोलता है तो ऐसा लगता है मानो अमृत की वर्षा हो रही हो |  

अर्थात कडवे वचन बोलने से हमारा ही नुकसान होता है और मधुर वचन बोलने से फायदा |



एक सौ इक्कीस

कागा का को धन हरे, कोयल का को देय |                                                                          मीठे वचन सुना के, जग अपना कर लेय ||

[ शब्द का अर्थ :-कागा-कव्वा, हरे-चुरा लेना, देय-देना ]

भावार्थ-  इस जगत में कौआ और कोयल के बिच में कोयल को सबसे ज्यादा पसंद किया जाता है | वैसे देखा जाये तो दोना का रंग-रूप समान है, पर फिर भी लोग सबसे ज्यादा कोयल को ही पसंद करते है | कौआ किसीकी धन-संपत्ति को चुराता नहीं है और नही कोयल किसीको कुछ देती है फिर भी लोग कोयल को पसंद करते है, इसका सबसे प्रमुख कारण है बोली | 

कौआ अपनी कर्कश, कठोरे वाणी से सबको परेशान कर देता है पर कोयल अपनी मीठी बोली से सबको आनंद देती है, सबका मन मोह लेती है | यह फर्क है सिर्फ मीठी बोली का |

अर्थात कठौर वचन बोलने से लोग हमसे घृणा करते है और मधुर वचन बोलने से प्यार |



एक सौ बाईस

मांगन मरण समान है, मत मांगो कोई भीख |                                                                          मांगन से मरना भला, ये सतगुरु की सीख ||

[ शब्द का अर्थ :-मांगन-माँग के खाना , मरण-मृत्यु, भला-अच्छा ]

भावार्थ- इस संसार में मनुष्य के लिए सबसे बड़ा होता है आत्मसन्मान | आत्मनिर्भरता, आत्मसन्मान ही है जो मनुष्य को संसार में इज्जत और मान-सन्मान दिलाता है |  बिना आत्मसन्मान वाले मनुष्य की संसार में कोइ इज्जत नहीं होती है | इसीलिए कबीर जी कहते हैं कि मनुष्य को अपना पेट भरने के लिए, जीवन जीने के लिए किसीके सामने हाथ नहीं पसारने चाहिए, भिखारी बनकर भीख नहीं मांगनी चाहिए, मांगना तो मृत्यु के समान है |

दुनिया को सद्गुरु, साधू-संत सिखा गए है, उपदेश करके गए है की अपना पेट भरने के लिए किसीसे भीख नही मांगनी चाहिए, मांगने से तो मरण अच्छा है, मृत्यु अच्छी है इससे आत्मसन्मान तो बना रहेगा |


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