Kabir ji ke Dohe | कबीर दास जी के दोहे लिखे हुए अर्थ सहित

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Kabir ji ke Dohe: संत कबीर हिंदी साहित्य काल के इकलौते ऐसे कवी है जिन्होंने जीवन भर समाज में पाए जाने वाले अवडम्बरों के खिलाफ अपनी आवाज उठाई थी और समाज में पाए जाने वाले कुप्रथाओं पर अपने दोहों के माध्यम से कड़ा प्रहार किया था |

Kabir ji ke Dohe


लाली मेरे लाल की, जित देखूं तित लाल |
लाली देखन मै गई, मै भी हो गयी लाल ||

[ शब्द का अर्थ :- लाली–रंगा हुआ , लाल–प्रभु , जित–जिधर, देखन–देखना ]

भावार्थ- कबीरदास यहां अपने ईश्वर के ज्ञान प्रकाश का जिक्र करते हैं। वह कहते हैं कि यह सारी भक्ति यह सारा संसार , यह सारा ज्ञान मेरे ईश्वर का ही है। मेरे लाल का ही है जिसकी मैं पूजा करता हूं , और जिधर भी देखता हूं उधर मेरे लाल ही लाल नजर आते हैं।

एक छोटे से कण में भी , एक चींटी में भी , एक सूक्ष्म से सूक्ष्म जीवों में भी मेरे लाल का ही वास है। उस ज्ञान उस प्राण उस जीव को देखने पर मुझे लाल ही लाल के दर्शन होते है और नजर आते हैं। स्वयं मुझमें भी मेरे प्रभु का वास नजर आता है |



जाका गुरु भी अंधला, चेला खरा निरंध |
अंधै अंधा ठेलिया, दून्यूँ कूप पडंत ||

[शब्द का अर्थ- जाका-जिसका, अंधला-अँधा, चेला-शिष्य, कूप-कूआ, पडंत-पड़ते है|, दून्यूँ-दोनों ]

भावार्थ- कबीर जी कहते है, गुरु चयन के वक्त हमें सावधानी बरतनी चाहिये, गुरु अगर अज्ञानी मिल जाता है, तो ऐसे शिष्य की क्या दुर्गती ही होगी | गुरु और शिष्य दोनों ही मुर्ख होगे तो वो सही मार्ग पर न चलकर कूए में जा गिरेंगे | इसलिए ज्ञानी गुरु का होना बहुत महत्वपूर्ण है |



जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नांहि |
सब अँधियारा मिटी गया, जब दीपक देख्या माँहि ||

[ शब्द का अर्थ- मैं-अहंकार, अँधियारा-अंधकार ]

भावार्थ- मनुष्य में जब तक अहंकार होता है तब तक उसे भगवान की प्राप्ती नहीं होती अर्थात जब था उसकी अंतरात्मा में लोभ, क्रोध, मोह, मद होता है तब तक उसे सत्य प्रतीत नहीं होता है| इन् विकारों पर विजय प्राप्त करने पर मनुष्य को जब अपने अन्दर छूपे दीपक का प्रकाश दिखाई देता है, तब तक उसका अज्ञान रूपी अंधकार उससे कोसो दूर चला जाता है|



यह तन जारौं मसि करो, लिखौ राम का नाऊँ |
लेखनी करौ करंक की, लिखी लिखी राम पठाऊँ ||

[ शब्द का अर्थ- तन-शरीर, जारौं-जलाकर, मसि-स्याही, नाऊँ-नाम, करंक-हड्डी, पठाऊँ-भेजूंगी ]

भावार्थ- परमात्मा के विरह में व्याकुल जीवात्मा कहती है मैं अपने शरीर को जलाकर उसकी स्याही बनाऊंगी और मैं इस अपने शरीर के हड्डियों की लेखनी बनाकर उस स्याही से राम का नाम लिखकर अपने उस प्रियतम राम के पास बार बार भेजती  रहूँगी| अर्थात जिससे मुझ विरहनी के विरह दशा और पिडा को वो समझ सकेंगे |



सतगुरु की महिमा अनंत, अनंत किया उपकार |
लोचन अनंत उघारिया, अनंत दिखावण हार ||

[शब्द का अर्थ: सतगुरु– शिक्षक, अनंत– जिसका कोई अंत न हो, उपकार– कृपा करना उद्धार करना, लोचन– आँख, उघारिया– खोलना, दिखावण– दिखाना ]

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भावार्थ- कबीरदास उपयुक्त पंक्ति में गुरु की महिमा का बखान कर रहे हैं। वह कहता चाहते हैं कि गुरु के माध्यम से ही हमें वह दिव्य चक्षु अथवा ज्ञान की प्राप्ति होती है जिससे हम निराकार और अब निर्गुण में रूप का दर्शन कर पाते हैं। सतगुरु ही वह माध्यम है जिसके माध्यम से हमारे आंखों पर पड़े पर्दे हट सकते हैं। गुरु ही उस आवरण को हटाता है जिसके कारण हम ज्ञान की प्राप्ति नहीं कर पाते। अर्थात निर्गुण निराकार के दर्शन नहीं कर पाते। सद्गुरु ही हमारे अंदर के चक्षु , आंखों को खोलते हैं उनके माध्यम से ही हमें अनंत , निराकार के दर्शन होते हैं।



यह घर है प्रेम का, खाला का घर नाही |
शीश उतार भुई धरों, फिर पैठो घर माहि ||

[ शब्द का अर्थ: खाला- मौसी, शीश– सिर, भुई– भूमि, पैठो– जाओ ]

भावार्थ- उपर्युक्त पंक्ति के माध्यम से कबीरदास कहते हैं की भक्ति प्रेम का मार्ग है प्रेम का घर है। भक्ति प्रेम से होती है और ईश्वर की प्राप्ति के लिए प्रेम अति आवश्यक है। यह कोई रिश्तेदार का घर नहीं है कि आप आए और आपको भक्ति और प्रेम मिल जाए।  इसके लिए कठिन तपस्या और साधना की आवश्यकता होती है। इसके लिए सिर झुकाना पड़ता है अर्थात सांसारिक मोह माया को त्यागना पड़ता है और सबको प्रेम भाव से अपनाना पड़ता है। इस प्रेम से ही ईश्वर की प्राप्ति हो सकती है।



बैद मुआ रोगी मुआ, मुआ सकल संसार |
एक कबीरा ना मुआ, जेहि के राम आधार ||

[ शब्द का अर्थ: बैद– वेद, मुआ– मर जाना (मृत्यु), सकल– सभी, आधार– सहारा ]

भावार्थ- कबीर कहते हैं , समय-समय पर वेद नष्ट हो जाता है , रोगी मर जाता है और यह संसार भी एक दिन खत्म हो जाता है। किंतु जो भक्ति के मार्ग पर निकल जाता है , वह कभी समाप्त नहीं होता। जो राम के संरक्षण में चले जाते हैं , उसका कभी कोई अमंगल नहीं होता। विपत्ति में भी राम की स्नेह रूपी डोर अपने भक्तों से बंधी रहती है।  ऐसे राम का आधार पाकर कोई भी अमंगल कैसे हो सकता है।



जो तोकू कांता बुवाई, ताहि बोय तू फूल |
तोकू फूल के फूल है, बाको है तिरशूल ||

[ शब्द का अर्थ: कांता– काँटा, बुवाई– बोना, ताहि– उसको, बाको– उसको ]

भावार्थ- कबीरदास का मानना है कि जो जैसा करता है , उसको वैसा ही फल मिलता है। अगर कोई अच्छा कर्म करता है तो उसे अच्छा ही प्राप्त होता है और बुरा कर्म करने वाले को बुरा ही प्राप्त होता है।

कबीरदास कहते हैं आप संतो की भांति व्यवहार करें , जिस प्रकार संत बुरा किए जाने पर भी सदैव हंसकर मुस्कुरा कर बात करते हैं। इसलिए संत का कभी अमंगल नहीं होता , वही कुत्सित बुद्धि वाले का कभी मंगल नहीं होता।



राम रसायन प्रेम रस, पीवत अधिक रसाल |
कबीर पिवन दुर्लभ है, मांगे शीश कलाल ||

[ शब्द का अर्थ: राम– भगवान, रसायन– अभिक्रिया से उत्त्पन्न वैज्ञानिक रस, रसाल– रसीला, दुर्लभ– जो सरल न हो, कलाल– कटा हुआ ]

भावार्थ-

कबीर कहते हैं राम नाम का जो रस है जो रसायन है।  वह दुर्लभ है वह सभी को नहीं मिलता है।  राम नाम का रस तो उसी को मिलता है जो राम की खोज करता है। इसके लिए अपने शीश को कटवाना पड़ता है।

मगर राम नाम का रस जिसको भी मिलता है उसे किसी और चीज़ की आवश्यकता नहीं होती है। इसी बात को कबीर फिर कहते हैं कि राम नाम का रस दुर्लभ है जो कबीर को भी नहीं मिल पाई। पिने वाले इस रस को रसीला मानते है , इस में मिठास है।



कबीर सतगुर ना मिल्या, रही अधूरी सीख |
स्वांग जाति का पहरी कर, घरी घरी मांगे भीख ||

[ शब्द का अर्थ: सतगुरु– सच से परिचय करवाने वाला,  स्वांग– कुत्ता,  पहरी– पहरेदारी, घरी– घर ]

भावार्थ- प्रस्तुत पंक्ति में गुरु के महत्व को स्वीकार किया गया है। बिना गुरु के सच्चा ज्ञान नहीं मिल सकता , उसके बिना मिला हुआ ज्ञान अधूरा ही होता है। वह व्यक्ति कभी भी पूर्ण रूप को नहीं जान पाता , अर्थात पूर्ण सत्य को कभी भी नहीं जान पाता। जिस प्रकार कुत्ता दर-बदर भोजन के लिए भटकता रहता है। ठीक इसी प्रकार अधूरा ज्ञान प्राप्त किया हुआ व्यक्ति भटकता फिरता है।  किंतु उसे पूर्ण ज्ञान की कही प्राप्ति नहीं होती।



कबीरा गरब ना कीजिये, कभू ना हासिये कोय |
अजहू नाव समुद्र में, ना जाने का होए ||

[ शब्द का अर्थ: गरब– गर्व, कभू– कभी, हासिये– हँसिये, कोय– कोई, अजहू– अभी ]

भावार्थ- कबीरदास का स्पष्ट मानना है कि किसी भी व्यक्ति पर हंसना नहीं चाहिए। उस व्यक्ति का उपहास नहीं करना चाहिए तथा कमियों पर कभी भी मुस्कुराना और सार्वजनिक नहीं करना चाहिए। आप किसी का हित कर सकते हैं तो अवश्य करें। किंतु कभी भी हंसने से बचना चाहिए।

समय का फेर है नाव कब समुद्र में डूब जाए , यह कोई नहीं जानता। ठीक इसी प्रकार जीवन में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं। आज आपका दिन ठीक है , कल कैसा रहेगा यह तो कोई नहीं जानता। इसलिए दूसरे पर हंसी उड़ाने से पहले अपने भविष्य को भी जानना चाहिए। कल आपके साथ कैसी घटना घट जाए या स्वयं आप भी नहीं जान  पाते।



सुख सागर का शील है, कोई न पावे थाह |
शब्द बिना साधू नहीं, द्रव्य बिना नहीं शाह ||

[ शब्द का अर्थ:  शील– स्वभाव, थाह– भेद, द्रव्य– पूंजी, शाह– राजा ]

भावार्थ- कबीर दास का मानना है कि सागर का शांत स्वभाव ही ठीक है , शांत रहते हुए भी कोई इसकी था नहीं ले पाता। साधु के शब्द ही उसे महान बनाते हैं , उसके स्वभाव में कभी उग्रता नहीं देखी जाती। जिस प्रकार सागर शांत रहता है इसीलिए वह विशाल है। ठीक इसी प्रकार बिना पूंजी के अर्थात धन के कोई राजा नहीं बन सकता। यह धन उसके गुण उसके शील स्वभाव ही होते हैं।



गुरु को सर रखिये, चलिए आज्ञा माहि |
कहै कबीर ता दास को, तीन लोक भय नाही ||

[ शब्द का अर्थ: सर– शीश, माहि– अनुसार ]

भावार्थ- कबीर दास गुरु का विशेष महत्व देते हैं। उनका मानना है कि जो गुरु के बताए हुए मार्ग पर चलता है , वह कभी भी भटकता नहीं है। वह कभी गलत राह को नहीं अपनाता।  तीनो लोक में वह निर्भीक हो जाता है , क्योंकि गुरु कभी गलत रास्ता नहीं बताता।



कुटिल बचन सबसे बुरा, जासे होत न हार |
साधू बचन जल रूप है, बरसे अमृत धार ||

[ शब्द का अर्थ: कुटिल– कड़वे, बचन– वचन, जासे– इससे ]

भावार्थ- कड़वे वचन बोलने से व्यक्ति का स्वयं नुकसान होता है। कड़वे वचन बोलकर व्यक्ति ना ही किसी को हरा सकता है और ना ही उससे जीत सकता है। किंतु मीठे वचन से सदैव दूसरे को जीता जा सकता है। इसलिए कबीरदास कहते हैं साधु वचन अर्थात मीठे वचन की भांति बोलना चाहिए , जो साफ-सुथरे होते हैं। इस मीठे वचन से अमृत वर्षा अर्थात ज्ञान की वर्षा होती है , जिससे घर परिवार तथा समाज सभी का कल्याण होता है। ऐसी भावना रखकर साधु वचन का ही प्रयोग करना चाहिए।



कबीरा लोहा एक है, गढ़ने में है फेर |
ताहि का बख्तर बने, ताहि की शमशेर ||

[ शब्द का अर्थ: गढ़ने– बनना / आकार देना, बख्तर– रक्षा ढाल, शमशेर– तलवार ]

भावार्थ- कबीर दास ने लोहे का सहारा लेते हुए व्यक्ति के चरित्र निर्माण पर दृष्टिपात किया है। उन्होंने बताया है लोहा एक ही प्रकार का होता है।  उसी लोहे से रक्षा करने वाली ढाल अर्थात बख्तर का निर्माण किया जाता है। वहीं दूसरी ओर जीवन हरने वाली तलवार भी बनाई जाती है। दोनों का अपना महत्व है इसके बनाने वाले पर निर्भर करता है कि वह क्या बनाना चाहता है।

ठीक इसी प्रकार व्यक्ति का चरित्र निर्माण भी संभव है। शिक्षक जिस प्रकार अपने शिष्य को तैयार करेगा वह शिष्य भी उसी प्रकार तैयार होगा। कहने का आशय यह है कि व्यक्ति में जिस प्रकार के गुण डाले जाएंगे उसी प्रकार का गुण व्यक्ति में होगा।



कबीरा खड़ा बाज़ार में, मांगे सबकी खैर |
ना काहू से दोस्ती, न काहू से बैर ||

भावार्थ- इस संसार में आकर कबीर अपने जीवन में बस यही चाहते हैं कि सबका भला हो और संसार में यदि किसी से दोस्ती नहीं तो दुश्मनी भी न हो !



कहत सुनत सब दिन गए, उरझि न सुरझ्या मन | 
कही कबीर चेत्या नहीं, अजहूँ सो पहला दिन ||

भावार्थ- कहते सुनते सब दिन निकल गए, पर यह मन उलझ कर न सुलझ पाया। कबीर कहते हैं कि अब भी यह मन होश में नहीं आता। आज भी इसकी अवस्था पहले दिन के समान ही है।



झूठे सुख को सुख कहे, मानत है मन मोद |
खलक चबैना काल का, कुछ मुंह में कुछ गोद ||

भावार्थ- कबीर कहते हैं कि अरे जीव ! तू झूठे सुख को सुख कहता है और मन में प्रसन्न होता है? देख यह सारा संसार मृत्यु के लिए उस भोजन के समान है, जो कुछ तो उसके मुंह में है और कुछ गोद में खाने के लिए रखा है |



कबीर सो धन संचे, जो आगे को होय |
सीस चढ़ाए पोटली, ले जात न देख्यो कोय ||

भावार्थ- कबीर कहते हैं कि उस धन को इकट्ठा करो जो भविष्य में काम आए। सर पर धन की गठरी बाँध कर ले जाते तो किसी को नहीं देखा।



कबीर बादल प्रेम का, हम पर बरसा आई |
अंतरि भीगी आतमा, हरी भई बनराई ||

भावार्थ- कबीर कहते हैं – प्रेम का बादल मेरे ऊपर आकर बरस पडा  – जिससे अंतरात्मा  तक भीग गई, आस पास पूरा परिवेश हरा-भरा हो गया – खुश हाल हो गया – यह प्रेम का अपूर्व प्रभाव है ! हम इसी प्रेम में क्यों नहीं जीते !



संत ना छाडै संतई, जो कोटिक मिले असंत |
चन्दन भुवंगा बैठिया, तऊ सीतलता न तजंत ||

भावार्थ- सज्जन को चाहे करोड़ों दुष्ट पुरुष मिलें फिर भी वह अपने भले स्वभाव को नहीं छोड़ता। चन्दन के पेड़ से सांप लिपटे रहते हैं, पर वह अपनी शीतलता नहीं छोड़ता।



झिरमिर- झिरमिर बरसिया, पाहन ऊपर मेंह |
माटी गलि सैजल भई, पांहन बोही तेह ||

भावार्थ- बादल पत्थर के ऊपर झिरमिर करके बरसने लगे. इससे मिट्टी तो भीग कर सजल हो गई किन्तु पत्थर वैसा का वैसा बना रहा |



कबीर थोड़ा जीवना, मांड़े बहुत मंड़ाण |
कबीर थोड़ा जीवना, मांड़े बहुत मंड़ाण ||

भावार्थ- बादल पत्थर के ऊपर झिरमिर करके बरसने लगे. इससे मिट्टी तो भीग कर सजल हो गई किन्तु पत्थर वैसा का वैसा बना रहा



मान, महातम, प्रेम रस, गरवा तण गुण नेह  |
ए सबही अहला गया, जबहीं कह्या कुछ देह ||

भावार्थ- मान, महत्त्व, प्रेम रस, गौरव गुण तथा स्नेह – सब बाढ़ में बह जाते हैं जब किसी मनुष्य से कुछ देने के लिए कहा जाता है.



जाता है सो जाण दे, तेरी दसा न जाइ |
खेवटिया की नांव ज्यूं, घने मिलेंगे आइ ||

भावार्थ- जो जाता है उसे जाने दो. तुम अपनी स्थिति को, दशा को न जाने दो. यदि तुम अपने स्वरूप में बने रहे तो केवट की नाव की तरह अनेक व्यक्ति आकर तुमसे मिलेंगे.



जिहि घट प्रेम न प्रीति रस, पुनि रसना नहीं नाम |
ते नर या संसार में , उपजी भए बेकाम ||

भावार्थ- जिनके ह्रदय में न तो प्रीति है और न प्रेम का स्वाद, जिनकी जिह्वा पर राम का नाम नहीं रहता – वे मनुष्य इस संसार में उत्पन्न हो कर भी व्यर्थ हैं. प्रेम जीवन की सार्थकता है. प्रेम रस में डूबे रहना जीवन का सार है.



नैना अंतर आव तू, ज्यूं हौं नैन झंपेउ |
ना हौं देखूं और को, न तुझ देखन देऊँ ||

भावार्थ- हे प्रिय ! ( प्रभु ) तुम इन दो नेत्रों की राह से मेरे भीतर आ जाओ और फिर मैं अपने इन नेत्रों को बंद कर लूं ! फिर न तो मैं किसी दूसरे  को देखूं और न ही किसी और को तुम्हें देखने दूं !



कबीर रेख सिन्दूर की, काजल दिया न जाई |
नैनूं रमैया रमि रहा, दूजा कहाँ समाई ||

भावार्थ- कबीर  कहते हैं कि जहां सिन्दूर की रेखा है – वहां काजल नहीं दिया जा सकता. जब नेत्रों में राम विराज रहे हैं तो वहां कोई अन्य कैसे निवास कर सकता है



सातों सबद जू बाजते, घरि घरि होते राग |
ते मंदिर खाली परे, बैसन लागे काग ||

भावार्थ- कबीर कहते हैं कि जिन घरों में सप्त स्वर गूंजते थे, पल पल उत्सव मनाए जाते थे, वे घर भी अब खाली पड़े हैं – उनपर कौए बैठने लगे हैं. हमेशा एक सा समय तो नहीं रहता ! जहां खुशियाँ थी वहां गम छा जाता है जहां हर्ष था वहां विषाद डेरा डाल सकता है – यह  इस संसार में होता है !



कबीर मंदिर लाख का, जडियां हीरे लालि |
दिवस चारि का पेषणा, बिनस जाएगा कालि ||

भावार्थ- यह शरीर लाख का बना मंदिर है जिसमें हीरे और लाल जड़े हुए हैं. यह चार दिन का खिलौना है कल ही नष्ट हो जाएगा. शरीर नश्वर है – जतन करके मेहनत  करके उसे सजाते हैं तब उसकी क्षण भंगुरता को भूल जाते हैं किन्तु सत्य तो इतना ही है कि देह किसी कच्चे खिलौने की तरह टूट फूट जाती है – अचानक ऐसे कि हम जान भी नहीं पाते.



तेरा संगी कोई नहीं, सब स्वारथ बंधी लोइ |
मन परतीति न उपजै, जीव बेसास न होइ ||

भावार्थ- तेरा साथी कोई भी नहीं है. सब मनुष्य स्वार्थ में बंधे हुए हैं, जब तक इस बात की प्रतीति – भरोसा – मन में उत्पन्न नहीं होता तब तक आत्मा के प्रति विशवास जाग्रत नहीं होता. अर्थात वास्तविकता का ज्ञान न होने से मनुष्य संसार में रमा रहता है जब संसार के सच को जान लेता है – इस स्वार्थमय सृष्टि को समझ लेता है – तब ही अंतरात्मा की ओर उन्मुख होता है – भीतर झांकता है.



झूठे को झूठा मिले, दूंणा बंधे सनेह |
झूठे को साँचा मिले, तब ही टूटे नेह ||

भावार्थ- जब झूठे आदमी को दूसरा झूठा आदमी मिलता है तो दूना प्रेम बढ़ता है. पर जब झूठे को एक सच्चा आदमी मिलता है तभी प्रेम टूट जाता है.



कबीर चन्दन के निडै, नींव भी चन्दन होइ |
बूडा बंस बड़ाइता, यों जिनी बूड़े कोइ  ||

भावार्थ- कबीर कहते हैं कि यदि चंदन के वृक्ष के पास नीम  का वृक्ष हो तो वह भी कुछ सुवास ले लेता है – चंदन का कुछ प्रभाव पा लेता है . लेकिन बांस अपनी लम्बाई – बडेपन – बड़प्पन के कारण डूब जाता है. इस तरह तो किसी को भी नहीं डूबना चाहिए. संगति का अच्छा प्रभाव ग्रहण करना चाहिए – आपने गर्व में ही न रहना चाहिए .



मूरख संग न कीजिए ,लोहा जल न तिराई |
कदली सीप भावनग मुख, एक बूँद तिहूँ भाई ||

भावार्थ- मूर्ख का साथ मत करो.मूर्ख लोहे के सामान है जो जल में तैर नहीं पाता  डूब जाता है . संगति का प्रभाव इतना पड़ता है कि आकाश से एक बूँद केले के पत्ते पर गिर कर कपूर, सीप के अन्दर गिर कर मोती और सांप के मुख में पड़कर विष बन जाती है.



मन मरया ममता मुई, जहं गई सब छूटी |
जोगी था सो रमि गया, आसणि रही बिभूति ||

भावार्थ- मन को मार डाला ममता भी समाप्त हो गई अहंकार सब नष्ट हो गया जो योगी था वह तो यहाँ से चला गया अब आसन पर उसकी भस्म – विभूति पड़ी रह गई अर्थात संसार में केवल उसका यश रह गया.



जल में कुम्भ, कुम्भ में जल है, बाहर भीतर पानी |
फूटा कुम्भ, जल जलहि समाना, यह तथ कह्यौ गयानी ||

भावार्थ- जब पानी भरने जाएं तो घडा जल में रहता है और भरने पर जल घड़े के अन्दर आ जाता है इस तरह देखें तो – बाहर और भीतर पानी ही रहता है – पानी की ही सत्ता है. जब घडा फूट जाए तो उसका जल जल में ही मिल जाता है – अलगाव नहीं रहता – ज्ञानी जन इस तथ्य को कह गए हैं !  आत्मा-परमात्मा दो नहीं एक हैं – आत्मा परमात्मा में और परमात्मा आत्मा में विराजमान है. अंतत: परमात्मा की ही सत्ता है –  जब देह विलीन होती है – वह परमात्मा का ही अंश हो जाती है – उसी में समा जाती है. एकाकार हो जाती है.



पढ़े गुनै सीखै सुनै, मिटी न संसै सूल |
कहै कबीर कासों कहूं, ये ही दुःख का मूल ||

भावार्थ- बहुत सी पुस्तकों को पढ़ा गुना सुना सीखा  पर फिर भी मन में गड़ा संशय का काँटा न निकला कबीर कहते हैं कि किसे समझा कर यह कहूं कि यही तो सब दुखों की जड़ है – ऐसे पठन मनन से क्या लाभ जो मन का संशय न मिटा सके?



कबीर सोई पीर है, जो जाने पर पीर |
जो पर पीर न जानई, सो काफिर बेपीर ||

भावार्थ- कबीर  कहते हैं कि सच्चा पीर – संत वही है जो दूसरे की पीड़ा को जानता है जो दूसरे के दुःख को नहीं जानते वे बेदर्द हैं – निष्ठुर हैं और काफिर हैं.



मन मैला तन ऊजला, बगुला कपटी अंग |
तासों तो कौआ भला, तन मन एकही रंग ||

भावार्थ- बगुले का शरीर तो उज्जवल है पर मन काला – कपट से भरा है – उससे  तो कौआ भला है जिसका तन मन एक जैसा है और वह किसी को छलता भी नहीं है.



देह धरे का दंड है, सब काहू को होय |
ज्ञानी भुगते ज्ञान से, अज्ञानी भुगते रोय ||

भावार्थ- देह धारण करने का दंड – भोग या प्रारब्ध निश्चित है जो सब को भुगतना होता है. अंतर इतना ही है कि ज्ञानी या समझदार व्यक्ति इस भोग को या दुःख को समझदारी से भोगता है निभाता है संतुष्ट रहता है जबकि अज्ञानी रोते हुए – दुखी मन से सब कुछ झेलता है.



हीरा परखै जौहरी, शब्दहि परखै साध |
कबीर परखै साध को, ताका मता अगाध ||

भावार्थ- हीरे की परख जौहरी जानता है – शब्द के सार– असार को परखने वाला विवेकी साधु – सज्जन होता है . कबीर कहते हैं कि जो साधु–असाधु को परख लेता है उसका मत – अधिक गहन गंभीर है !



कबीरा ते नर अँध है, गुरु को कहते और |
हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रूठे नहीं ठौर ||

भावार्थ- कबीर दास जी ने इस दोहे में जीवन में गुरु का क्या महत्व हैं वो बताया हैं . वे कहते हैं कि मनुष्य तो अँधा हैं सब कुछ गुरु ही बताता हैं अगर ईश्वर नाराज हो जाए तो गुरु एक डोर हैं जो ईश्वर से मिला देती हैं लेकिन अगर गुरु ही नाराज हो जाए तो कोई डोर नही होती जो सहारा दे .



बैद मुआ रोगी मुआ, मुआ सकल संसार |
एक कबीरा ना मुआ, जेहि के राम आधार ||

भावार्थ-  एक चिकित्सक को मरना है, एक रोगी को मरना है। कबीर की मृत्यु नहीं हुई क्योंकि उन्होंने स्वयं को राम को अर्पित कर दिया था जो कि सर्वव्यापी चेतना है ।



जाता है सो जाण दे, तेरी दसा न जाइ |
खेवटिया की नांव ज्यूं, घने मिलेंगे आइ ||

भावार्थ- जो जाता है उसे जाने दो. तुम अपनी स्थिति को, दशा को न जाने दो. यदि तुम अपने स्वरूप में बने रहे तो केवट की नाव की तरह अनेक व्यक्ति आकर तुमसे मिलेंगे.



कबीर बादल प्रेम का, हम पर बरसा आई | 
अंतरि भीगी आतमा, हरी भई बनराई ||

भावार्थ- कबीर कहते हैं – प्रेम का बादल मेरे ऊपर आकर बरस पडा – जिससे अंतरात्मा तक भीग गई, आस पास पूरा परिवेश हरा-भरा हो गया – खुश हाल हो गया – यह प्रेम का अपूर्व प्रभाव है ! हम इसी प्रेम में क्यों नहीं जीते !



जिहि घट प्रेम न प्रीति रस, पुनि रसना नहीं नाम |
ते नर या संसार में , उपजी भए बेकाम ||

भावार्थ- जिनके ह्रदय में न तो प्रीति है और न प्रेम का स्वाद, जिनकी जिह्वा पर राम का नाम नहीं रहता – वे मनुष्य इस संसार में उत्पन्न हो कर भी व्यर्थ हैं. प्रेम जीवन की सार्थकता है. प्रेम रस में डूबे रहना जीवन का सार है|



कबीर कहा गरबियौ, ऊंचे देखि अवास |
काल्हि परयौ भू लेटना ऊपरि जामे घास ||

भावार्थ- कबीर कहते है कि ऊंचे भवनों को देख कर क्या गर्व करते हो ? कल या परसों ये ऊंचाइयां और (आप भी) धरती पर लेट जाएंगे ध्वस्त हो जाएंगे और ऊपर से घास उगने लगेगी ! वीरान सुनसान हो जाएगा जो अभी हंसता खिलखिलाता घर आँगन है ! इसलिए कभी गर्व न करना चाहिए



जांमण मरण बिचारि, करि कूड़े काम निबारि |
जिनि पंथूं तुझ चालणा, सोई पंथ संवारि ||

भावार्थ- जन्म और मरण का विचार करके , बुरे कर्मों को छोड़ दे. जिस मार्ग पर तुझे चलना है उसी मार्ग का स्मरण कर – उसे ही याद रख – उसे ही संवार सुन्दर बना



तीरथ गए से एक फल, संत मिले फल चार |
सतगुरु मिले अनेक फल, कहे कबीर विचार ||

भावार्थ- तीर्थ करने से एक पुण्य मिलता है, लेकिन संतो की संगति से पुण्य मिलते हैं, और सच्चे गुरु के पा लेने से जीवन में अनेक पुण्य मिल जाते हैं.



प्रेम पियाला जो पिए, सिस दक्षिणा देय |
लोभी शीश न दे सके, नाम प्रेम का लेय ||

भावार्थ- जिसको ईश्वर प्रेम और भक्ति का प्रेम पाना है उसे अपना शीशकाम, क्रोध, भय, इच्छा को त्यागना होगा। लालची इंसान अपना शीशकाम, क्रोध, भय, इच्छा तो त्याग नहीं सकता लेकिन प्रेम पाने की उम्मीद रखता है।



राम बुलावा भेजिया, दिया कबीरा रोय |
जो सुख साधू संग में, सो बैकुंठ न होय ||

भावार्थ- जब मृत्यु का समय नजदीक आया और राम के दूतों का बुलावा आया तो कबीर दास जी रो पड़े क्यूंकि जो आनंद संत और सज्जनों की संगति में है उतना आनंद तो स्वर्ग में भी नहीं होगा।



ज्ञान रतन का जतन कर, माटी का संसार |
हाय कबीरा फिर गया, फीका है संसार ||

भावार्थ- कबीर दास जी कहते हैं कि ये संसार तो माटी का है, आपको ज्ञान पाने की कोशिश करनी चाहिए नहीं तो मृत्यु के बाद जीवन और फिर जीवन के बाद मृत्यु यही क्रम चलता रहेगा |



ज्यों नैनन में पुतली, त्यों मालिक घर माँहि |
मूरख लोग न जानिए , बाहर ढूँढत जाहिं ||

भावार्थ- कबीर दास जी कहते हैं कि जैसे आँख के अंदर पुतली है, ठीक वैसे ही ईश्वर हमारे अंदर बसा है। मूर्ख लोग नहीं जानते और बाहर ही ईश्वर को तलाशते रहते हैं।



कबीरा जब हम पैदा हुए, जग हँसे हम रोये |
ऐसी करनी कर चलो, हम हँसे जग रोये ||

भावार्थ- कबीर दास जी कहते हैं कि जब हम पैदा हुए थे उस समय सारी दुनिया खुश थी और हम रो रहे थे। जीवन में कुछ ऐसा काम करके जाओ कि जब हम मरें तो दुनियां रोये और हम हँसे।



कबीर रेख सिन्दूर की, काजल दिया न जाई |
नैनूं रमैया रमि रहा, दूजा कहाँ समाई ||

भावार्थ- कबीर  कहते हैं कि जहां सिन्दूर की रेखा है – वहां काजल नहीं दिया जा सकता। जब नेत्रों में राम विराज रहे हैं तो वहां कोई अन्य कैसे निवास कर सकता है.



कबीर देवल ढहि पड्या, ईंट भई सेंवार |
करी चिजारा सौं प्रीतड़ी, ज्यूं ढहे न दूजी बार ||

भावार्थ- कबीर कहते हैं शरीर रूपी देवालय नष्ट हो गया – उसकी ईंट ईंट – अर्थात शरीर का अंग अंग – शैवाल अर्थात काई में बदल गई। इस देवालय को बनाने वाले प्रभु से प्रेम कर जिससे यह देवालय दूसरी बार नष्ट न हो।



कबीर यह तनु जात है, सकै तो लेहू बहोरि |
नंगे हाथूं ते गए, जिनके लाख करोडि ||

भावार्थ- यह शरीर नष्ट होने वाला है हो सके तो अब भी संभल जाओ – इसे संभाल लो !  जिनके पास लाखों करोड़ों की संपत्ति थी वे भी यहाँ से खाली हाथ ही गए हैं – इसलिए जीते जी धन संपत्ति जोड़ने में ही न लगे रहो – कुछ सार्थक भी कर लो ! जीवन को कोई दिशा दे लो – कुछ भले काम कर लो !



मन जाणे सब बात, जांणत ही औगुन करै |
काहे की कुसलात कर, दीपक कूंवै पड़े ||

भावार्थ- मन सब बातों को जानता है जानता हुआ भी अवगुणों में फंस जाता है जो दीपक हाथ में पकडे हुए भी कुंए में गिर पड़े उसकी कुशल कैसी?



हिरदा भीतर आरसी, मुख देखा नहीं जाई |
मुख तो तौ परि देखिए, जे मन की दुविधा जाई ||

भावार्थ- ह्रदय के अंदर ही दर्पण है परन्तु – वासनाओं की मलिनता के कारण – मुख का स्वरूप दिखाई ही नहीं देता मुख या अपना चेहरा या वास्तविक स्वरूप तो तभी दिखाई पड सकता  जब मन का संशय मिट जाए |



तेरा संगी कोई नहीं, सब स्वारथ बंधी लोइ |
मन परतीति न उपजै, जीव बेसास न होइ ||

भावार्थ- तेरा साथी कोई भी नहीं है। सब मनुष्य स्वार्थ में बंधे हुए हैं, जब तक इस बात की प्रतीति – भरोसा – मन में उत्पन्न नहीं होता तब तक आत्मा के प्रति विशवास जाग्रत नहीं होता। भावार्थात वास्तविकता का ज्ञान न होने से मनुष्य संसार में रमा रहता है जब संसार के सच को जान लेता है – इस स्वार्थमय सृष्टि को समझ लेता है – तब ही अंतरात्मा की ओर उन्मुख होता है – भीतर झांकता है.



हू तन तो सब बन भया, करम भए कुहांडि |
आप आप कूँ काटि है, कहै कबीर बिचारि ||

भावार्थ- यह शरीर तो सब जंगल के समान है – हमारे कर्म ही कुल्हाड़ी के समान हैं। इस प्रकार हम खुद अपने आपको काट रहे हैं – यह बात कबीर सोच विचार कर कहते हैं |



कबीर चन्दन के निडै, नींव भी चन्दन होइ |
बूडा बंस बड़ाइता, यों जिनी बूड़े कोइ ||

भावार्थ- कबीर कहते हैं कि यदि चंदन के वृक्ष के पास नीम  का वृक्ष हो तो वह भी कुछ सुवास ले लेता है – चंदन का कुछ प्रभाव पा लेता है । लेकिन बांस अपनी लम्बाई – बडेपन – बड़प्पन के कारण डूब जाता है। इस तरह तो किसी को भी नहीं डूबना चाहिए। संगति का अच्छा प्रभाव ग्रहण करना चाहिए – आपने गर्व में ही न रहना चाहिए ।



जानि बूझि साँचहि तजै, करै झूठ सूं नेह ।
ताकी संगति रामजी, सुपिनै ही जिनि देहु ||

भावार्थ- जो जानबूझ कर सत्य का साथ छोड़ देते हैं झूठ से प्रेम करते हैं, हे भगवान् ऐसे लोगों की संगति हमें स्वप्न में भी न देना।



तरवर तास बिलम्बिए, बारह मांस फलंत |
सीतल छाया गहर फल, पंछी केलि करंत ||

भावार्थ- कबीर कहते हैं कि ऐसे वृक्ष के नीचे विश्राम करो, जो बारहों महीने फल देता हो ।जिसकी छाया शीतल हो , फल सघन हों और जहां पक्षी क्रीडा करते हों !



जल में कुम्भ, कुम्भ में जल है, बाहर भीतर पानी |
फूटा कुम्भ, जल जलहि समाना, यह तथ कह्यौ गयानी ||

भावार्थ- जब पानी भरने जाएं तो घडा जल में रहता है और भरने पर जल घड़े के अन्दर आ जाता है इस तरह देखें तो – बाहर और भीतर पानी ही रहता है – पानी की ही सत्ता है। जब घडा फूट जाए तो उसका जल जल में ही मिल जाता है – अलगाव नहीं रहता – ज्ञानी जन इस तथ्य को कह गए हैं ! आत्मा-परमात्मा दो नहीं एक हैं – आत्मा परमात्मा में और परमात्मा आत्मा में विराजमान है। अंतत: परमात्मा की ही सत्ता है – जब देह विलीन होती है – वह परमात्मा का ही अंश हो जाती है – उसी में समा जाती है। एकाकार हो जाती है।



काची काया मन अथिर, थिर थिर काम करंत |
ज्यूं ज्यूं नर निधड़क, फिरै त्यूं त्यूं काल हसन्त ||

भावार्थ- शरीर कच्चा अर्थात नश्वर है मन चंचल है परन्तु तुम इन्हें स्थिर मान कर काम  करते हो – इन्हें अनश्वर मानते हो मनुष्य जितना इस संसार में रमकर निडर घूमता है – मगन रहता है – उतना ही काल अर्थात मृत्यु उस पर  हँसता है ! मृत्यु पास है यह जानकर भी इंसान अनजान बना रहता है ! कितनी दुखभरी बात है।



कबीर हमारा कोई नहीं, हम काहू के नाहिं |
पारै पहुंचे नाव ज्यौं, मिलिके बिछुरी जाहिं ||

भावार्थ- इस जगत में न कोई हमारा अपना है और न ही हम किसी के ! जैसे नांव के नदी पार पहुँचने पर उसमें मिलकर बैठे हुए सब यात्री बिछुड़ जाते हैं वैसे ही हम सब मिलकर बिछुड़ने वाले हैं। सब सांसारिक सम्बन्ध यहीं छूट जाने वाले हैं.



मन मैला तन ऊजला, बगुला कपटी अंग |
तासों तो कौआ भला, तन मन एकही रंग ||

भावार्थ- बगुले का शरीर तो उज्जवल है पर मन काला – कपट से भरा है – उससे  तो कौआ भला है जिसका तन मन एक जैसा है और वह किसी को छलता भी नहीं है।



या दुनिया दो रोज की, मत कर यासो हेत |
गुरु चरनन चित लाइये, जो पुराण सुख हेत ||

भावार्थ- इस संसार का झमेला दो दिन का है अतः इससे मोह सम्बन्ध न जोड़ो। सद्गुरु के चरणों में मन लगाओ, जो पूर्ण सुखज देने वाले हैं।



गाँठी होय सो हाथ कर, हाथ होय सो देह |
आगे हाट न बानिया, लेना होय सो लेह ||

भावार्थ- जो गाँठ में बाँध रखा है, उसे हाथ में ला, और जो हाथ में हो उसे परोपकार में लगा। नर-शरीर के पश्चात् इतर खानियों में बाजार-व्यापारी कोई नहीं है, लेना हो सो यही ले-लो।



बहते को मत बहन दो, कर गहि एचहु ठौर |
कह्यो सुन्यो मानै नहीं, शब्द कहो दुइ और ||

भावार्थ- बहते हुए को मत बहने दो, हाथ पकड़ कर उसको मानवता की भूमिका पर निकाल लो। यदि वह कहा-सुना न माने, तो भी निर्णय के दो वचन और सुना दो।



बार-बार तोसों कहा, सुन रे मनुवा नीच |
बनजारे का बैल ज्यों, पैडा माही मीच ||

भावार्थ- हे नीच मनुष्य ! सुन, मैं बारम्बार तेरे से कहता हूं। जैसे व्यापारी का बैल बीच मार्ग में ही मार जाता है। वैसे तू भी अचानक एक दिन मर जाएगा।



बनिजारे के बैल ज्यों, भरमि फिर्यो चहुँदेश |
खाँड़ लादी भुस खात है, बिन सतगुरु उपदेश ||

भावार्थ- सौदागरों के बैल जैसे पीठ पर शक्कर लाद कर भी भूसा खाते हुए चारों और फेरि करते है। इस प्रकार इस प्रकार यथार्थ सद्गुरु के उपदेश बिना ज्ञान कहते हुए भी विषय – प्रपंचो में उलझे हुए मनुष्य नष्ट होते है।



जीवत कोय समुझै नहीं, मुवा न कह संदेश |
तन–मन से परिचय नहीं, ताको क्या उपदेश ||

भावार्थ- शरीर रहते हुए तो कोई यथार्थ ज्ञान की बात समझता नहीं, और मार जाने पर इन्हे कौन उपदेश करने जायगा। जिसे अपने तन मन की की ही सुधि – बूधी नहीं हैं, उसको क्या उपदेश किया?



कुटिल वचन सबतें बुरा, जारि करै सब छार |
साधु वचन जल रूप है, बरसै अमृत धार ||

भावार्थ- बुरे वचन विष के समान होते है और अच्छे वचन अमृत के समान लगते है।



कबीर तहां न जाइए , जहां जो कुल को एक |
साधु गुन जाने नहीं , नाम बाप का लेत ||

भावार्थ- कबीरदास बुरी संगति से बचने के लिए कह रहे हैं। और वहां जाने के लिए मना कर रहे हैं जहां बाप  का आदर मान सम्मान ना हो सके। जिस घर में बेटा , बाप का नाम लेकर पुकारता है। उस घर में जाने से बचना चाहिए। उस घर में मान सम्मान नहीं मिल सकता। जिस घर में माता-पिता का सम्मान नहीं होता है।



कहते को कही जान दे, गुरु की सीख तू लेय |
साकट जन औश्वान को, फेरि जवाब न देय ||

भावार्थ- उल्टी-पल्टी बात बकने वाले को बकते जाने दो, तू गुरु की ही शिक्षा धारण कर। साकट दुष्टोंतथा कुत्तों को उलट कर उत्तर न दो।



कबीर तहाँ न जाइये, जहाँ जो कुल को हेत |
साधुपनो जाने नहीं, नाम बाप को लेत ||

भावार्थ- गुरु कबीर साधुओं से कहते हैं कि वहाँ पर मत जाओ, जहाँ पर पूर्व के कुल-कुटुम्ब का सम्बन्ध हो। क्योंकि वे लोग आपकी साधुता के महत्व को नहीं जानेंगे, केवल शारीरिक पिता का नाम लेंगे ‘अमुक का लड़का आया है’।



गारी मोटा ज्ञान, जो रंचक उर में जरै |
कोटि सँवारे काम, बैरि उलटि पायन परै |
गारी सो क्या हान, हिरदै जो यह ज्ञान धरै ||

भावार्थ- यदि अपने ह्रदय में थोड़ी भी सहन शक्ति हो, ओ मिली हुई गली भारी ज्ञान है। सहन करने से करोड़ों काम संसार में सुधर जाते हैं। और शत्रु आकर पैरों में पड़ता है। यदि ज्ञान ह्रदय में आ जाय, तो मिली हुई गाली से अपनी क्या हानि है ?



कबीर तहाँ न जाइये, जहाँ सिध्द को गाँव |
स्वामी कहै न बैठना, फिर-फिर पूछै नाँव ||

भावार्थ- अपने को सर्वोपरि मानने वाले अभिमानी सिध्दों के स्थान पर भी मत जाओ। क्योंकि स्वामीजी ठीक से बैठने तक की बात नहीं कहेंगे, बारम्बार नाम पूछते रहेंगे।



कबीर संगी साधु का, दल आया भरपूर |
इन्द्रिन को तब बाँधीया, या तन किया धर ||

भावार्थ- सन्तों के साधी विवेक-वैराग्य, दया, क्षमा, समता आदि का दल जब परिपूर्ण रूप से ह्रदय में आया। तब सन्तों ने इद्रियों को रोककर शरीर की व्याधियों को धूल कर दिया। भावार्थात् तन-मन को वश में कर लिया।



बन्दे तू कर बन्दगी, तो पावै दीदार |
औसर मानुष जन्म का, बहुरि न बारम्बार ||

भावार्थ- हे दास ! तू सद्गुरु की सेवा कर, तब स्वरूप-साक्षात्कार हो सकता है। इस मनुष्य जन्म का उत्तम अवसर फिर से बारम्बार न मिलेगा।



बन्दे तू कर बन्दगी, तो पावै दीदार |
औसर मानुष जन्म का, बहुरि न बारम्बार ||

भावार्थ- हे दास ! तू सद्गुरु की सेवा कर, तब स्वरूप-साक्षात्कार हो सकता है। इस मनुष्य जन्म का उत्तम अवसर फिर से बारम्बार न मिलेगा।



मन राजा नायक भया, टाँडा लादा जाय |
है है है है है रही, पूँजी गयी बिलाय ||

भावार्थ- मन-राजा बड़ा भारी व्यापारी बना और विषयों का टांडा बहुत सौदा जाकर लाद लिया। भोगों-एश्वर्यों में लाभ है-लोग कह रहे हैं, परन्तु इसमें पड़कर मानवता की पूँजी भी विनष्ट हो जाती है।



जिही जिवरी से जाग बँधा, तु जनी बँधे कबीर |
जासी आटा लौन ज्यों, सों समान शरीर ||

भावार्थ- जिस भ्रम तथा मोह की रस्सी से जगत के जीव बंधे है। हे कल्याण इच्छुक ! तू उसमें मत बंध। नमक के बिना जैसे आटा फीका हो जाता है। वैसे सोने के समान तुम्हारा उत्तम नर – शरीर भजन बिना व्यर्थ जा रहा हैं।



कबीर कहा गरबियौ, ऊंचे देखि अवास |
काल्हि परयौ भू लेटना ऊपरि जामे घास ||

भावार्थ- कबीर कहते है कि ऊंचे भवनों को देख कर क्या गर्व करते हो ? कल या परसों ये ऊंचाइयां और (आप भी) धरती पर लेट जाएंगे ध्वस्त हो जाएंगे और ऊपर से घास उगने लगेगी ! वीरान सुनसान हो जाएगा जो अभी हंसता खिलखिलाता घर आँगन है ! इसलिए कभी गर्व न करना चाहिए



जांमण मरण बिचारि, करि कूड़े काम निबारि |
जिनि पंथूं तुझ चालणा, सोई पंथ संवारि ||

भावार्थ- जन्म और मरण का विचार करके , बुरे कर्मों को छोड़ दे. जिस मार्ग पर तुझे चलना है उसी मार्ग का स्मरण  कर – उसे ही याद रख – उसे ही संवार सुन्दर बना



कबीर देवल ढहि पड्या, ईंट भई सेंवार |
करी चिजारा सौं प्रीतड़ी, ज्यूं ढहे न दूजी बार ||

भावार्थ- कबीर कहते हैं शरीर रूपी देवालय नष्ट हो गया – उसकी ईंट ईंट – (अर्थात शरीर का अंग अंग )- शैवाल अर्थात काई में बदल गई. इस देवालय को बनाने वाले प्रभु से प्रेम कर जिससे यह देवालय दूसरी बार नष्ट न हो



हू तन तो सब बन भया, करम भए कुहांडि |
आप आप कूँ काटि है, कहै कबीर बिचारि ||

भावार्थ- यह शरीर तो सब जंगल के समान है – हमारे कर्म ही कुल्हाड़ी के समान हैं. इस प्रकार हम खुद अपने आपको काट रहे हैं – यह बात कबीर सोच विचार कर कहते हैं.



मैं मैं मेरी जिनी करै, मेरी सूल बिनास |
मेरी पग का पैषणा मेरी  गल की पास ||

भावार्थ- ममता और अहंकार में मत फंसो और बंधो – यह मेरा है कि रट मत लगाओ – ये विनाश के मूल हैं – जड़ हैं – कारण हैं – ममता पैरों की बेडी है और गले की फांसी है



मन जाणे सब बात जांणत ही औगुन करै |
काहे की कुसलात कर दीपक कूंवै पड़े ||

भावार्थ- मन सब बातों को जानता है जानता हुआ भी अवगुणों में फंस जाता है जो दीपक हाथ में पकडे हुए भी कुंए में गिर पड़े उसकी कुशल कैसी?



कबीर नाव जर्जरी, कूड़े खेवनहार |
हलके हलके तिरि गए, बूड़े तिनि सर भार ||

भावार्थ- कबीर कहते हैं कि जीवन की नौका टूटी फूटी है जर्जर है उसे खेने वाले मूर्ख हैं  जिनके सर पर ( विषय वासनाओं ) का बोझ है वे तो संसार सागर में डूब जाते हैं – संसारी हो कर रह जाते हैं दुनिया के धंधों से उबर नहीं पाते – उसी में उलझ कर रह जाते हैं पर जो इनसे मुक्त हैं – हलके हैं वे तर जाते हैं पार लग जाते हैं भव सागर में डूबने से बच जाते हैं



हिरदा भीतर आरसी, मुख देखा नहीं जाई |
मुख तो तौ परि देखिए, जे मन की दुविधा जाई ||

भावार्थ- ह्रदय के अंदर ही दर्पण है परन्तु – वासनाओं की मलिनता के कारण – मुख का स्वरूप दिखाई ही नहीं देता मुख या अपना चेहरा या वास्तविक स्वरूप तो तभी दिखाई पड सकता  जब मन का संशय मिट जाए !



क्काज्ल केरी कोठारी, मसि के कर्म कपाट |
पांहनि बोई पृथमीं, पंडित पाड़ी बात ||

भावार्थ- यह संसार काजल की कोठरी है, इसके कर्म रूपी कपाट कालिमा के ही बने हुए हैं. पंडितों ने पृथ्वीपर पत्थर की मूर्तियाँ स्थापित करके मार्ग का निर्माण किया है.



कबीर संगति साध की, कड़े न निर्फल होई |
चन्दन होसी बावना, नीब न कहसी कोई ||

भावार्थ- कबीर कहते हैं कि साधु  की संगति कभी निष्फल नहीं होती. चन्दन का वृक्ष यदि छोटा – (वामन – बौना ) भी होगा तो भी उसे कोई नीम का वृक्ष नहीं कहेगा. वह सुवासित ही रहेगा  और अपने परिवेश को सुगंध ही देगा. आपने आस-पास को खुशबू से ही भरेगा



जानि बूझि साँचहि तजै, करै झूठ सूं नेह |
ताकी संगति रामजी, सुपिनै ही जिनि देहु ||

भावार्थ- जो जानबूझ कर सत्य का साथ छोड़ देते हैं झूठ से प्रेम करते हैं हे भगवान् ऐसे लोगों की संगति हमें स्वप्न में भी न देना.



तरवर तास बिलम्बिए, बारह मांस फलंत |
सीतल छाया गहर फल, पंछी केलि करंत ||

भावार्थ- कबीर कहते हैं कि ऐसे वृक्ष के नीचे विश्राम करो, जो बारहों महीने फल देता हो .जिसकी छाया शीतल हो , फल सघन हों और जहां पक्षी क्रीडा करते हों !



काची काया मन अथिर, थिर थिर  काम करंत |
ज्यूं ज्यूं नर निधड़क फिरै, त्यूं त्यूं काल हसन्त ||

भावार्थ- शरीर कच्चा अर्थात नश्वर है मन चंचल है परन्तु तुम इन्हें स्थिर मान कर काम  करते हो – इन्हें अनश्वर मानते हो मनुष्य जितना इस संसार में रमकर निडर घूमता है – मगन रहता है – उतना ही काल (अर्थात मृत्यु )उस पर  हँसता है ! मृत्यु पास है यह जानकर भी इंसान अनजान बना रहता है ! कितनी दुखभरी बात है.



कबीर हमारा कोई नहीं, हम काहू के नाहिं |
पारै पहुंचे नाव ज्यौं, मिलिके बिछुरी जाहिं ||

भावार्थ- इस जगत में न कोई हमारा अपना है और न ही हम किसी के ! जैसे नांव के नदी पार पहुँचने पर उसमें मिलकर बैठे हुए सब यात्री बिछुड़ जाते हैं वैसे ही हम सब मिलकर बिछुड़ने वाले हैं. सब सांसारिक सम्बन्ध यहीं छूट जाने वाले हैं



कामी क्रोधी लालची, इनसे भक्ति ना होए |
भक्ति करे कोई सूरमा, जाती वरण कुल खोय ||

भावार्थ- आप कामुक सुख, क्रोध या लालच के आदमी से किस तरह की भक्ति की उम्मीद कर सकते हैं? वह बहादुर व्यक्ति जो अपने परिवार और जाति को पीछे छोड़ता है, वह सच्चा भक्त हो सकता है।



बैद मुआ रोगी मुआ, मुआ सकल संसार |
एक कबीरा ना मुआ, जेहि के राम आधार ||

भावार्थ- एक चिकित्सक को मरना है, एक रोगी को मरना है। कबीर की मृत्यु नहीं हुई क्योंकि उन्होंने स्वयं को राम को अर्पित कर दिया था जो कि सर्वव्यापी चेतना है।



प्रेम प्याला जो पिए, शीश दक्षिणा दे |
लोभी शीश न दे सके, नाम प्रेम का ले ||

भावार्थ- जो प्रेम का प्याला पीना चाहता है, उसे अपने सिर को चढ़ाकर उसका भुगतान करना चाहिए। एक लालची आदमी अपने सिर की प्रस्तुत नहीं कर सकता है । वह केवल प्यार के बारे में बात करता है।



जब ही नाम हिरदय धर्यो, भयो पाप का नाश |
मानो चिनगी अग्नि की, परी पुरानी घास ||

भावार्थ- एक बार जब आप भगवान को याद करते हैं तो यह सभी पापों का विनाश करता है। यह सूखी घास के ढेर से संपर्क करने वाली आग की चिंगारी की तरह है।



दया भाव ह्रदय नहीं, ज्ञान थके बेहद |
ते नर नरक ही जायेंगे, सुनी सुनी साखी शब्द ||

भावार्थ- उनके दिल में कोई दया नहीं है। ज्ञान प्राप्त करने के श्रम के कारण वे थक गए हैं। वे निश्चित रूप से नरक में जाएंगे क्योंकि वे कुछ और नहीं बल्कि शुष्क शब्दों को जानते हैं।



सुख सागर का शील है, कोई न पावे थाह |
शब्द बिना साधू नहीं, द्रव्य बिना नहीं शाह ||

भावार्थ- विनम्रता आनंद का असीम सागर है। कोई भी राजनीति की गहराई को नहीं जान सकता। जैसा कि बिना पैसे वाला व्यक्ति अमीर नहीं हो सकता, एक व्यक्ति विनम्र हुए बिना अच्छा नहीं हो सकता।



जहा काम तहा नाम नहीं, जहा नाम नहीं वहा काम |
दोनों कभू नहीं मिले, रवि रजनी इक धाम ||

भावार्थ- वह जो भगवान को याद करता है वह कोई कामुक सुख नहीं जानता है। वह जो भगवान को याद नहीं करता है वह कामुक सुखों का आनंद लेता है। भगवान और कामुक सुख एकजुट नहीं हुए क्योंकि सूर्य और रात का कोई मिलन नहीं हो सकता।



ऊँचे पानी ना टिके, नीचे ही ठहराय |
नीचा हो सो भारी पी, ऊँचा प्यासा जाय ||

भावार्थ- पानी नीचे बहता है। और यह हवा में लटका नहीं रहा। जो लोग जमीनी हकीकत जानते हैं वे पानी का आनंद लेते हैं, जो हवा में तैर रहे हैं वे नहीं कर सकते।



कबीरा यह तन जात है, सके तो ठौर लगा |
कई सेवा कर साधू की, कई गोविन्द गुण गा ||

भावार्थ- कबीर कहते हैं कि हमारा यह शरीर मृत्यु के करीब पहुंच रहा है। हमें कुछ सार्थक करना चाहिए। हमें अच्छे लोगों की सेवा करनी चाहिए। हमें भगवान के गुण को याद रखना चाहिए।



हरी सांगत शीतल भय, मिति मोह की ताप |
निशिवासर सुख निधि, लाहा अन्न प्रगत आप्प ||

भावार्थ- जो भगवान को महसूस करते हैं वे शांत हो जाते हैं। उन्होंने अपनी गर्मी को खत्म कर दिया। वे दिन-रात आनंदित होते हैं।



प्रेमभाव एक चाहिए, भेष अनेक बनाय |
चाहे घर में वास कर, चाहे बन को जाए ||

भावार्थ- आप घर पर रह सकते हैं या आप जंगल जा सकते हैं। यदि आप ईश्वर से जुड़े रहना चाहते हैं, तो आपके दिल में प्यार होना चाहिए।



साधू सती और सुरमा, इनकी बात अगाढ़ |
आशा छोड़े देह की, तन की अनथक साध ||

भावार्थ- एक अच्छा व्यक्ति, एक महिला जो अपने पति की चिता पर जलती है और एक बहादुर आदमी – इनकी बात ही और है। वे अपने शरीर के साथ क्या होता है, इससे चिंतित नहीं हैं।



अवगुण कहू शराब का, आपा अहमक होय |
मानुष से पशुआ भय, दाम गाँठ से खोये ||

भावार्थ- शराब लेने पर एक व्यक्ति अपना संतुलन खो देता है। वह जानवर बन जाता है और अपने पैसे खर्च करता है।



उज्जवल पहरे कापड़ा, पान सुपारी खाय |
एक हरी के नाम बिन, बंधा यमपुर जाय ||

भावार्थ- कपड़े बहुत प्रभावशाली हैं, मुंह पान सुपारी से भरा है। लेकिन क्या आप नरक से बचना चाहते हैं तो आपको भगवान को याद करना चाहिए।



कबीरा लोहा एक है, गढ़ने में है फेर |
ताहि का बख्तर बने, ताहि की शमशेर ||

भावार्थ- लौह धातु से तलवार भी बनती है और बख्तर भी। आप एक विध्वंसक भी हो सकते हैं और रक्षक भी, यह आप पर निर्भर है।



कबीरा आप ठागइए, और न ठगिये कोय |
आप ठगे सुख होत है, और ठगे दुःख होय ||

भावार्थ- किसी को भी अपने आप को मूर्ख बनाना चाहिए, दूसरों को नहीं। जो दूसरों को मूर्ख बनाता है वह दुखी हो जाता है। खुद को बेवकूफ बनाने में कोई बुराई नहीं है क्योंकि वह सच्चाई को जल्द या बाद में जान जाएगा।



कबीरा कलह अरु कल्पना, सैट संगती से जाय |
दुःख बासे भगा फिरे, सुख में रही समाय ||

भावार्थ- यदि आप अच्छे लोगों के साथ जुड़ते हैं तो आप संघर्षों और आधारहीन कल्पनाओं का अंत कर सकते हैं। जो आपकी दुर्दशा का अंत करेगा और आपके जीवन को आनंदित करेगा।



जा पल दरसन साधू का, ता पल की बलिहारी |
राम नाम रसना बसे, लीजै जनम सुधारी ||

भावार्थ- क्या शानदार क्षण था। मैं एक अच्छे व्यक्ति से मिला। मैंने राम का जप किया और अपने पूरे जीवन में अच्छा किया।



काह भरोसा देह का, बिनस जात छान मारही |
सांस सांस सुमिरन करो, और यतन कुछ नाही ||

भावार्थ- इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि यह शरीर अगले पल होगा या नहीं। आपको हर पल भगवान को याद करना चाहिए।



कबीरा गरब ना कीजिये, कभू ना हासिये कोय |
अजहू नाव समुद्र में, ना जाने का होए ||

भावार्थ- मत करो, गर्व महसूस मत करो। दूसरों पर हँसो मत। आपका जीवन सागर में एक जहाज है जिसे आप नहीं जानते कि अगले क्षण क्या हो सकता है।



पांच पहर धंधा किया, तीन पहर गया सोय |
एक पहर भी नाम बिन, मुक्ति कैसे होय ||

भावार्थ- मैंने दिन के दौरान अपनी आजीविका कमाने के लिए कुछ किया और रात में सो गया। मैंने 3 घंटे के लिए भी भगवान के नाम का जप नहीं किया, मैं कैसे मोक्ष प्राप्त कर सकता हूं?



जो तू चाहे मुक्ति को, छोड़ दे सबकी आस |
मुक्त ही जैसा हो रहे, सब कुछ तेरे पास ||

भावार्थ- यदि आप मोक्ष चाहते हैं तो आपको सभी इच्छाओं को समाप्त कर देना चाहिए। एक बार जब आप मोक्ष प्राप्त कर लेते हैं तो आप सब कुछ हासिल कर लेते हैं।



पत्ता बोला वृक्ष से, सुनो वृक्ष बनराय |
अब के बिछड़े न मिले, दूर पड़ेंगे जाय ||

भावार्थ- एक पेड़ से एक पत्ता कहता है कि वह हमेशा के लिए दूर जा रहा है और अब कोई पुनर्मिलन नहीं होगा।



ते दिन गए अकार्थी , सांगत भाई न संत |
प्रेम बिना पशु जीवन, भक्ति बिना भगवंत ||

भावार्थ- मैंने उन दिनों को बर्बाद किया जब मैं अच्छे लोगों से नहीं मिला था। बिना प्यार वाला इंसान जानवर होता है। प्रेम के बिना कोई देवत्व नहीं है।



या दुनिया में आ कर, छड़ी डे तू एट |
लेना हो सो लिले, उठी जात है पैठ ||

भावार्थ- यहां किसी को भी नहीं घूमना चाहिए। किसी भी समय को बर्बाद किए बिना सभी सौदे करने चाहिए क्योंकि काम के घंटे जल्द ही खत्म हो जाएंगे।



माया छाया एक सी, बिरला जाने कोय |
भागत के पीछे लगे, सन्मुख भागे सोय ||

भावार्थ- एक छाया और एक भ्रम समान हैं। वे उनका पीछा करते हैं जो दूर भागते हैं और उस नज़र से गायब हो जाते हैं जो उन्हें देखता है।



साहेब तेरी साहिबी, सब घट रही समाय |
ज्यो मेहंदी के पात में, लाली राखी न जाय ||

भावार्थ- मेरे स्वामी, आपकी महारत सभी प्राणियों में है। उसी तरह जैसे मेंहदी में लालिमा होती है।



परबत परबत मै फिरया, नैन गवाए रोई |
सो बूटी पौ नहीं, जताई जीवनी होई ||

भावार्थ- कबीर ने एक पर्वत से दूसरे पर्वत की खोज की, लेकिन वह जीवन को बनाने वाली जड़ी बूटी नहीं पा सके।



तीरथ करी करी जाग मुआ, दूंघे पानी नहाई |
रामही राम जापन्तदा, काल घसीट्या जाई ||

भावार्थ- तीर्थयात्री के रूप में लोग कई स्थानों पर जाते हैं। वे ऐसे स्थानों पर स्नान करते हैं। वे हमेशा ईश्वर के नाम का जाप करते हैं लेकिन फिर भी, उन्हें समय के साथ मौत के घाट उतार दिया जाता है।



कबीर हरी रस यो पिया, बाकी रही ना थाकी |
पाका कलस कुम्भार का, बहुरी ना चढाई चाकी ||

भावार्थ- कबीर ने भक्ति का रस चख लिया है, अब भक्ति के अलावा कोई स्वाद नहीं है। एक बार एक कुम्हार अपना बर्तन बनाता है और उसे पका लेता है, उस बर्तन को फिर से पहिया पर नहीं रखा जा सकता है।



ब्रह्मन गुरू जगत का, साधु का गुरू नाही |
उर्झी-पुरझी करी मरी राह्य, चारिउ बेडा माही ||

भावार्थ- एक ब्राह्मण दुनिया का गुरु हो सकता है लेकिन वह एक अच्छे इंसान का गुरु नहीं है। ब्राह्मण हमेशा वेदों की व्याख्या के साथ शामिल होता है और वह ऐसा करते हुए मर जाता है।



कलि का स्वामी लोभिया, पीतली धरी खटाई |
राज-दुबारा यू फिराई, ज्यू हरिहाई गाई ||

भावार्थ- इस कलयुग में जो खुद को स्वामी कहता है वह लालची हो गया है। वह खट्टी वस्तुओं के साथ पीतल के बर्तन जैसा दिखता है। वह एक गाय की तरह शासक की सुरक्षा चाहता है जो हरे चरागाह को देखकर भागता है।



साधु शब्द समुद्र है, जामे रत्न भराय |
मंद भाग मुट्ठी भरे, कंकर हाथ लगाये ||

भावार्थ- साधु द्वारा कहा गया एक अच्छा शब्द सागर जितना गहरा है। एक मूर्ख सिर्फ मुट्ठी भर रेत हासिल करता है।



जिस मरने यह जग डरे, सो मेरे आनंद |
कब महिहू कब देखिहू, पूरण परमानन्द ||

भावार्थ- पूरी दुनिया मौत से डरती है। मुझे मौत देखकर खुशी हुई। मैं कब मरूंगा और पूर्ण आनंद का एहसास करूंगा?



भगती बिगाड़ी कामिया, इन्द्री करे सवादी |
हीरा खोया हाथ थाई, जनम गवाया बाड़ी ||

भावार्थ- एक वासनाग्रस्त व्यक्ति ने उसकी भक्ति को नुकसान पहुंचाया है और उसके इंद्रिय-अंगों को स्वाद का आनंद मिल रहा है। उसने एक हीरे को खो दिया है और जीवन का सार चूक गया है।



कबीर मंदिर लाख का, जडियां हीरे लालि |
दिवस चारि का पेषणा, बिनस जाएगा कालि ||

भावार्थ- यह शरीर लाख का बना  मंदिर है जिसमें हीरे और लाल जड़े हुए हैं।यह चार दिन का खिलौना है कल ही नष्ट हो जाएगा। शरीर नश्वर है – जतन करके मेहनत  करके उसे सजाते हैं तब उसकी क्षण भंगुरता को भूल जाते हैं किन्तु सत्य तो इतना ही है कि देह किसी कच्चे खिलौने की तरह टूट फूट जाती है – अचानक ऐसे कि हम जान भी नहीं पाते !



मैं मैं मेरी जिनी करै, मेरी सूल बिनास |
मेरी पग का पैषणा मेरी  गल की पास ||

भावार्थ- ममता और अहंकार में मत फंसो और बंधो – यह मेरा है कि रट मत लगाओ – ये विनाश के मूल हैं – जड़ हैं – कारण हैं – ममता पैरों की बेडी है और गले की फांसी है।



कबीर नाव जर्जरी, कूड़े खेवनहार |
हलके हलके तिरि गए, बूड़े तिनि सर भार ||

भावार्थ- कबीर कहते हैं कि जीवन की नौका टूटी फूटी है जर्जर है उसे खेने वाले मूर्ख हैं  जिनके सर पर  विषय वासनाओं  का बोझ है वे तो संसार सागर में डूब जाते हैं – संसारी हो कर रह जाते हैं दुनिया के धंधों से उबर नहीं पाते – उसी में उलझ कर रह जाते हैं पर जो इनसे मुक्त हैं – हलके हैं वे तर जाते हैं पार लग जाते हैं भव सागर में डूबने से बच जाते हैं।



कबीर संगति साध की, कड़े न निर्फल होई |
चन्दन होसी बावना, नीब न कहसी कोई ||

भावार्थ- कबीर कहते हैं कि साधु  की संगति कभी निष्फल नहीं होती। चन्दन का वृक्ष यदि छोटा – वामन – बौना  भी होगा तो भी उसे कोई नीम का वृक्ष नहीं कहेगा। वह सुवासित ही रहेगा  और अपने परिवेश को सुगंध ही देगा। आपने आस-पास को खुशबू से ही भरेगा



कहैं कबीर देय तू, जब लग तेरी देह |
देह खेह होय जायगी, कौन कहेगा देह ||

भावार्थ- जब तक यह देह है तब तक तू कुछ न कुछ देता रह। जब देह धूल में मिल जायगी, तब कौन कहेगा कि ‘दो’।



कलि का स्वामी लोभिया, पीतली धरी खटाई |
राज-दुबारा यू फिराई, ज्यू हरिहाई गाई ||

भावार्थ- इस कलयुग में जो खुद को स्वामी कहता है वह लालची हो गया है। वह खट्टी वस्तुओं के साथ पीतल के बर्तन जैसा दिखता है। वह एक गाय की तरह शासक की सुरक्षा चाहता है जो हरे चरागाह को देखकर भागता है।



कुमति कीच चेला भरा, गुरु ज्ञान जल होय |
जनम जनम का मोर्चा, पल में दारे धोय ||

भावार्थ- एक शिष्य अज्ञानता के कीचड़ से भरा है। गुरु ज्ञान का जल है। जो भी अशुद्धियाँ कई जन्मों में जमा होती हैं, वह एक क्षण में साफ हो जाती है।



कबीर हरी सब को भजे, हरी को भजै न कोई |
जब लग आस सरीर की, तब लग दास न होई ||

भावार्थ- भगवान सबको याद करते हैं। भगवान को कोई याद नहीं करता। जो लोग कामुक सुख के बारे में चिंतित हैं वे भगवान के भक्त नहीं हो सकते।



दया भाव ह्रदय नहीं, ज्ञान थके बेहद |
ते नर नरक ही जायेंगे, सुनी सुनी साखी शब्द ||

भावार्थ- उनके दिल में कोई दया नहीं है। ज्ञान प्राप्त करने के श्रम के कारण वे थक गए हैं। वे निश्चित रूप से नरक में जाएंगे क्योंकि वे कुछ और नहीं बल्कि शुष्क शब्दों को जानते हैं।



ऊँचे पानी ना टिके, नीचे ही ठहराय |
नीचा हो सो भारी पी, ऊँचा प्यासा जाय ||

भावार्थ- पानी नीचे बहता है। और यह हवा में लटका नहीं रहा। जो लोग जमीनी हकीकत जानते हैं वे पानी का आनंद लेते हैं, जो हवा में तैर रहे हैं वे नहीं कर सकते।



अवगुण कहू शराब का, आपा अहमक होय |
मानुष से पशुआ भय, दाम गाँठ से खोये ||

भावार्थ- शराब लेने पर एक व्यक्ति अपना संतुलन खो देता है। वह जानवर बन जाता है और अपने पैसे खर्च करता है।



काह भरोसा देह का, बिनस जात छान मारही |
सांस सांस सुमिरन करो, और यतन कुछ नाही ||

भावार्थ- इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि यह शरीर अगले पल होगा या नहीं। आपको हर पल भगवान को याद करना चाहिए।



उज्जवल पहरे कापड़ा, पान सुपारी खाय |
एक हरी के नाम बिन, बंधा यमपुर जाय ||

भावार्थ- कपड़े बहुत प्रभावशाली हैं, मुंह पान सुपारी से भरा है। लेकिन क्या आप नरक से बचना चाहते हैं तो आपको भगवान को याद करना चाहिए।



कबीरा कलह अरु कल्पना, सैट संगती से जाय |
दुःख बासे भगा फिरे, सुख में रही समाय ||

भावार्थ- यदि आप अच्छे लोगों के साथ जुड़ते हैं तो आप संघर्षों और आधारहीन कल्पनाओं का अंत कर सकते हैं। जो आपकी दुर्दशा का अंत करेगा और आपके जीवन को आनंदित करेगा।



कबीरा लोहा एक है, गढ़ने में है फेर |
ताहि का बख्तर बने, ताहि की शमशेर ||

भावार्थ- लौह धातु से तलवार भी बनती है और बख्तर भी। आप एक विध्वंसक भी हो सकते हैं और रक्षक भी, यह आप पर निर्भर है।



पत्ता बोला वृक्ष से, सुनो वृक्ष बनराय |
अब के बिछड़े न मिले, दूर पड़ेंगे जाय ||

भावार्थ- एक पेड़ से एक पत्ता कहता है कि वह हमेशा के लिए दूर जा रहा है और अब कोई पुनर्मिलन नहीं होगा।



प्रेमभाव एक चाहिए, भेष अनेक बनाय |
चाहे घर में वास कर, चाहे बन को जाए ||

भावार्थ- आप घर पर रह सकते हैं या आप जंगल जा सकते हैं। यदि आप ईश्वर से जुड़े रहना चाहते हैं, तो आपके दिल में प्यार होना चाहिए।



कबीरा यह तन जात है, सके तो ठौर लगा |
कई सेवा कर साधू की, कई गोविन्द गुण गा ||

भावार्थ- कबीर कहते हैं कि हमारा यह शरीर मृत्यु के करीब पहुंच रहा है। हमें कुछ सार्थक करना चाहिए। हमें अच्छे लोगों की सेवा करनी चाहिए। हमें भगवान के गुण को याद रखना चाहिए।



जहा काम तहा नाम नहीं, जहा नाम नहीं वहा काम |
दोनों कभू नहीं मिले, रवि रजनी इक धाम ||

भावार्थ- वह जो भगवान को याद करता है वह कोई कामुक सुख नहीं जानता है। वह जो भगवान को याद नहीं करता है वह कामुक सुखों का आनंद लेता है। भगवान और कामुक सुख एकजुट नहीं हुए क्योंकि सूर्य और रात का कोई मिलन नहीं हो सकता।



सुख सागर का शील है, कोई न पावे थाह |
शब्द बिना साधू नहीं, द्रव्य बिना नहीं शाह ||

भावार्थ- विनम्रता आनंद का असीम सागर है। कोई भी राजनीति की गहराई को नहीं जान सकता। जैसा कि बिना पैसे वाला व्यक्ति अमीर नहीं हो सकता, एक व्यक्ति विनम्र हुए बिना अच्छा नहीं हो सकता।



रिद्धि सिद्धि मांगूं नहीं, माँगू तुम पी यह |
निशिदिन दर्शन साधू को, प्रभु कबीर कहू देह ||

भावार्थ- कबीर भगवान से भौतिक संपदा के लिए नहीं पूछ रहे हैं। वह हमेशा के लिए अपनी दृष्टि में एक अच्छा व्यक्ति होने का पक्ष पूछ रहा है।



गुरू मूर्ती गती चंद्रमा, सेवक नैन चकोर |
आठ पहर निरखता रहे, गुरू मूर्ती की ओर ||

भावार्थ- जैसा कि एक चकोर हमेशा चंद्रमा को देखता है, हमें हमेशा गुरु के कहे अनुसार चलना चाहिए।



गुरू बिन ज्ञान न उपजई, गुरू बिन मलई न मोश |
गुरू बिन लाखाई ना सत्य को, गुरू बिन मिटे ना दोष ||

भावार्थ- बिना गुरु के कोई ज्ञान नहीं हो सकता, गुरु के बिना कोई मोक्ष नहीं हो सकता, गुरु के बिना सत्य की कोई प्राप्ति नहीं हो सकती। और बिना गुरु के दोषों को दूर नहीं किया जा सकता है।



दीथा है तो कस कहू, कह्य ना को पतियाय |
हरी जैसा है तैसा रहो, तू हर्शी-हर्शी गुन गाई ||

भावार्थ- जिन लोगों ने राम का वर्णन करने की कोशिश की है, उन्हें अपने प्रयासों में असफल होने पर पछताना पड़ता है। मुझे उसका वर्णन करने में कोई परेशानी नहीं हुई, मैं खुशी-खुशी उसके गुण गाऊंगा।



स्वामी हूवा सीतका, पैकाकार पचास ।
रामनाम कांठै रह्या, करै सिषां की आस  ||

भावार्थ- स्वामी आज-कल मुफ्त में, या पैसे के पचास मिल जाते हैं। मतलब यह कि सिद्धियाँ और चमत्कार दिखाने और फैलाने वाले स्वामी रामनाम को वे एक किनारे रख देते हैं, और शिष्यों से आशा करते हैं लोभ में डूबकर ।



कबीर हरी रस यो पिया, बाकी रही ना थाकी |
पाका कलस कुम्भार का, बहुरी ना चढाई चाकी ||

भावार्थ- कबीर ने भक्ति का रस चख लिया है, अब भक्ति के अलावा कोई स्वाद नहीं है। एक बार एक कुम्हार अपना बर्तन बनाता है और उसे पका लेता है, उस बर्तन को फिर से पहिया पर नहीं रखा जा सकता है।



जो रोऊ तो बल घटी, हंसो तो राम रिसाई |
मनही माहि बिसूरना, ज्यूँ घुन काठी खाई ||

भावार्थ- अगर मैं रोता हूं, तो मेरा ऊर्जा स्तर नीचे चला जाता है। अगर मुझे हंसी आती है तो राम को ऐसा नहीं लगता। किया करू अब? यह दुविधा मेरे दिल को दिमक की तरह खा जाती है।



राम पियारा छड़ी करी, करे आन का जाप |
बेस्या कर पूत ज्यू, कहै कौन सू बाप ||

भावार्थ- यदि कोई ईश्वर को भूल जाता है और कुछ और याद करता है, तो वह एक वेश्या के बेटे की तरह है जो यह नहीं जानता कि उसका पिता कौन है।



कबीर एक न जन्या, तो बहु जनया क्या होई |
एक तै सब होत है, सब तै एक न होई ||

भावार्थ- कबीर कहते हैं कि आप एक चीज नहीं जानते हैं और आप कई अन्य चीजों को जानते हैं। यह एक बात सभी को पूरा कर सकती है, ये कई चीजें बेकार हैं।



कबीर कलिजुग आई करी, कीये बहुत जो मीत |
जिन दिलबंध्या एक सू, ते सुखु सोवै निचींत ||

भावार्थ- इस कलयुग में, लोग कई दोस्त बनाते हैं। जो लोग अपने मन को भगवान को अर्पित करते हैं वे बिना किसी चिंता के सो सकते हैं।



ग्यानी मूल गवैया, आपन भये करता |
ताते संसारी भला, मन मे रहै डरता ||

भावार्थ- एक व्यक्ति जो सोचता है कि उसने ज्ञान प्राप्त कर लिया है, उसने अपनी जड़ें खो दी हैं। अब वह सोचता है कि वह ईश्वर के समान सर्वशक्तिमान है। गृहस्थ जीवन में लगा व्यक्ति बेहतर है क्योंकि वह कम से कम भगवान से डरता है।



तीरथ करी करी जाग मुआ, दूंघे पानी नहाई |
रामही राम जापन्तदा, काल घसीट्या जाई ||

भावार्थ- तीर्थयात्री के रूप में लोग कई स्थानों पर जाते हैं। वे ऐसे स्थानों पर स्नान करते हैं। वे हमेशा ईश्वर के नाम का जाप करते हैं लेकिन फिर भी, उन्हें समय के साथ मौत के घाट उतार दिया जाता है।



मेरे संगी दोई जरग, एक वैष्णो एक राम |
वो है दाता मुक्ति का, वो सुमिरावै नाम ||

भावार्थ- मेरे केवल दो साथी, भक्त और राम हैं। वोमुझे भगवान को याद करने और मोक्ष प्रदान करने के लिए प्रेरित करते हैं।



जिस मरने यह जग डरे, सो मेरे आनंद |
कब महिहू कब देखिहू, पूरण परमानन्द ||

भावार्थ- पूरी दुनिया मौत से डरती है। मुझे मौत देखकर खुशी हुई। मैं कब मरूंगा और पूर्ण आनंद का एहसास करूंगा?



गुरु सामान दाता नहीं, याचक सीश सामान |
तीन लोक की सम्पदा, सो गुरु दीन्ही दान ||

भावार्थ- गुरु के समान कोई दाता नहीं है और शिष्य के समान कोई साधक नहीं है। गुरु शिष्य को तीनों लोकों का अनुदान देते हैं।



जो तू चाहे मुक्ति को, छोड़ दे सबकी आस |
मुक्त ही जैसा हो रहे, सब कुछ तेरे पास ||

भावार्थ- यदि आप मोक्ष चाहते हैं तो आपको सभी इच्छाओं को समाप्त कर देना चाहिए। एक बार जब आप मोक्ष प्राप्त कर लेते हैं तो आप सब कुछ हासिल कर लेते हैं।



तीर तुपक से जो लादे, सो तो शूर न होय |
माया तजि भक्ति करे, सूर कहावै सोय ||

भावार्थ- धनुष और बाण से लड़ता है, वह वीर नहीं है। असली बहादुर वह है जो भ्रम को दूर भगाता है और भक्त बन जाता है |



संत न बंधे गाठ्दी, पेट समाता तेई |
साईं सू सन्मुख रही, जहा मांगे तह देई ||

भावार्थ- ज्यादा संचय करने की जरूरत नहीं है। किसी एक के व्यवहार में हमेशा ईमानदार रहने की जरूरत है।



गुरू मूर्ति अगे खडी, दुनिया भेद कछू हाही |
उन्ही को पर्नाम करी, सकल तिमिर मिटि जाही ||

भावार्थ- आपका गुरु आपको नेतृत्व करने के लिए है। जीवन को कैसे ध्वस्त करना है, इस बारे में चिंता करने की आवश्यकता नहीं है। यदि आप अपने गुरु के उपदेश का पालन करते हैं तो वहां अंधेरा नहीं होगा।



भारी कहौ तो बहु दरौ, हलका कहु टू झूत |
माई का जानू राम कू, नैनू कभू ना दीथ ||

भावार्थ- अगर मैं कहूं कि राम भारी हैं, तो इससे मन में भय पैदा होता है। अगर मैं कहूं कि वह हल्का है, यह बेतुका है। मैं राम को नहीं जानता क्योंकि मैंने उन्हें देखा नहीं था।



जा कारनी मे ढूँढती, सन्मुख मिलिया आई |
धन मैली पीव ऊजला, लागी ना सकौ पाई ||

भावार्थ- मैं उसे खोज रहा था। मैं उनसे आमने-सामने मिला। वह शुद्ध है और मैं गंदा हूं। मैं उसके चरणों में कैसे झुक सकता हूं?



पहुचेंगे तब कहेंगे, उमडेंगे उस ट्ठाई |
अझू बेरा समंड मे, बोली बिगूचे काई ||

भावार्थ- जब मैं दूसरे किनारे पर पहुंचूंगा तो मैं इसके बारे में बात करूंगा। मैं अभी सागर के बीच में नौकायन कर रहा हूं। मरने का मरने के बाद देखना चाहिए, अभी जीवन जीने पे ध्यान देना चाहिए.



कामी लज्या ना करई, मन माहे अहीलाड़ |
नींद ना मगई संतरा, भूख ना मगई स्वाद ||

भावार्थ- जुनून की चपेट में आए व्यक्ति को शर्म नहीं आती। वह जो बहुत नींद में है, बिस्तर की परवाह नहीं करता है और जो बहुत भूखा है, वह अपने स्वाद के बारे में परेशान नहीं है।



बाहर क्या दिखलाये, अंतर जपिए राम |
कहा काज संसार से, तुझे धानी से काम ||

भावार्थ- किसी दिखावे की कोई जरूरत नहीं है। आपको आंतरिक रूप से राम नाम का जाप करना चाहिए। आपको दुनिया के साथ नहीं बल्कि दुनिया के गुरु के साथ संबंध रखना चाहिए।



चतुराई सूवई पड़ी, सोई पंजर माही |
फिरी प्रमोधाई आन कौ, आपन समझाई नाही ||

भावार्थ- एक तोता दोहराता है जो भी ज्ञान पढ़ाया जाता है, लेकिन वह खुद को अपने पिंजरे से मुक्त करने का तरीका नहीं जानता है। लोगों ने आज बहुत ज्ञान प्राप्त किया है, लेकिन वे खुद को मुक्त करने में विफल हैं।



कबीर इस संसार को, समझौ कई बार |
पूंछ जो पकडई भेड़ की, उत्रय चाहाई पार ||

भावार्थ- कबीर लोगों को यह बताने से तंग आ गए कि उन्हें मूर्खतापूर्ण तरीके से पूजा करने से बचना चाहिए। लोगों को लगता है कि वे एक भेड़ की पूंछ को पकड़कर पारगमन के महासागर को पार करेंगे।



जबलग भागती सकामता, तबलग निर्फल सेव |
कहई कबीर वई क्यो मिलई, निहकामी निज देव ||

भावार्थ- जब तक भक्ति सशर्त होती है तब तक उसे कोई फल नहीं मिलता। लगाव वाले लोगों को कुछ ऐसा कैसे मिल सकता है जो हमेशा अलग हो?



कबीर कलि खोटी भाई, मुनियर मिली न कोय |
लालच लोभी मस्कारा, टिंकू आदर होई ||

भावार्थ- यह कलयुग का युग है। यहाँ एक व्यक्ति जो संयम की भावना रखता है वह दुर्लभ है। लोग लालच, लोभ और त्रासदी से लबरेज हैं।



कबीर माया मोहिन, जैसी मीठी खांड |
सतगुरु की कृपा भई, नहीं तोउ करती भांड ||

भावार्थ- भ्रम या माया बहुत प्यारी है। भगवान का शुक्र है कि मुझे अपने गुरु का आशीर्वाद मिला अन्यथा मैं कोरा होता।



कबीर सतगुर ना मिल्या, रही अधूरी सीख |
स्वांग जाति का पहरी कर, घरी घरी मांगे भीख ||

भावार्थ- जो लोग एक अच्छा गुरु नहीं पाते हैं वे अधूरे ज्ञान प्राप्त करते हैं। वे एक वैरागी के वस्त्र पहनते हैं और घर-घर जाकर भीख मांगते हैं।



जब ही नाम हिरदय धर्यो, भयो पाप का नाश |
मानो चिनगी अग्नि की, परी पुरानी घास ||

भावार्थ- एक बार जब आप भगवान को याद करते हैं तो यह सभी पापों का विनाश करता है। यह सूखी घास के ढेर से संपर्क करने वाली आग की चिंगारी की तरह है।


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