Ash Gourd in Hindi | गुणकारी पेठा, कुष्माण्ड, रखिया, राख लौकी, सफेद कद्दू

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Ash Gourd in Hindi : Ash Gourd यह एक प्रकार का कद्दू है जिसे हिंदी भाषा में पेठा, सफ़ेद पेठा, रखिया, राख लौकी, सफेद कद्दू या हरा कद्दू कहा जाता है |

संस्कृत भाषा में इसे ‘कुष्मांड’ नाम से जाना जाता है | कुष्मांड का अर्थ होता है जिसमें बिलकुल भी गर्मी नहीं है ऐसा फल | 

Ash Gourd में कैलोरीज (Calories) बहुत कम होती है और इसमें लगभग 96 प्रतिशत पाणी की मात्रा होती है | यह फाइबर (fiber-रेशा) सामग्री से समृद्ध होता है और शरीर को पोषण देने वाले विभिन्न पोषक तत्व इसमें मौजूद होते है |

Ash Gourd in Hindi

Ash Gourd in Hindi

Ash Gourd एक हरी-सलेटी रंग की सब्जी होती है, जिस पर धूल की राख जैसा पाउडर होता है | इसीलिए इसे अंग्रेजी में Ash Gourd कहा जाता है | अंग्रेजी में Ash का मतलब होता है राख और Gourd का मतलब होता है लौकी |

अंग्रेजी में Ash Gourd को Winter Melon, White Melon, Wax Gourd या Chinese Watermelon नाम से भी जाना जाता है |

Ash Gourd यह वेल वर्गीय सब्जी है जो कद्दू का ही एक प्रकार है |

इसका वैज्ञानिक नाम (Scientific Name) बेनीनकासा हिसपिडिया (Benincasa Hispidia) है |

Ash Gourd (राख लौकी) बेनीनकासा परिवार में Cucurbitaceae के अंतर्गत आता है |

Ash Gaurd Plant

गुणकारी पेठा (Ash Gourd)

यह बहुत ही गुणकारी कद्दू है जिसे आयुर्वेद में एक औषधी के रूप में भी प्रयोग में लाया जाता है | आहार में इसका समावेश करना सेहत के लिए अच्छा होता है |

Ash Gourd का सेवन करने से होने वाले लाभ :

💡 यह वजन कम करने में सहायक होता है |

💡 विटामिन सी प्रदान करता है |

💡 मानसिक विकार के रोगीयों ने इसका सेवन करना चाहिए, यह चित्त को शांत रखता है |

💡 सूजन दाह को कम करता है |

💡 अल्सर को रोकता है |

💡 इसके सेवन से पाचन शक्ति में सुधार होता है |

आयुर्वेद में पेठा को सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करनेवाला सात्विक फल (सब्जी) कहा गया है | 

आयुर्वेद के अनुसार अगर सुबह इसका रस (Juice) पिया जाये तो यह भारी मात्रा में शरीर को ऊर्जा प्रदान करता है और हमारे चित्त को भी शांत रखता है |

Ash Gourd के सेवन से होनेवाले फायदे 

पेठे (Ash Gourd) से सब्जी बनाते हैं और इसे सलाद के रूप में भी उपयोग करते है | पेठे के टूकड़ों को सांभार (Curry) में भी डाला जाता हैं | गर्मी के दिनों में इसके टूकड़े करके उन्हें धुप में सुखाकर और बाद में सब्जी में खाया जाता है|

सुबह-सुबह पेठे (Ash Gourd) के रस का सेवन भी किया जाता है जो अनेक रोगों में लाभकारी होता है |

 ➡ Ash Gourd के सेवन से होनेवाले फायदे 

💡 पेशाब साफ़ होने में यह फायदेमंद है |

💡 रक्तविकार दूर करने में ये फायदेमंद है |

💡 किडनी में जब पत्थर होता है तब इसका सेवन लाभकारक होता है |

💡 ह्रदय और मस्तिष्क की ताकत बढाने में यह लाभकारी होता है |

💡 तनाव (Stress) को कम करने के लिए ये अच्छा फल है |

💡 इसके सेवन से घबराहट, चिडचिडापण, सम्भ्रम कम हो जाता है |

💡 Depression (निराशा, खिन्नता) में डॉक्टर की मुख्य दवाई के साथ इसका सेवन करना लाभ दायक होता है |

💡 हमारे शरीर के रक्त संचार प्रणाली (blood circulatory system) को ताकत देने का काम ये करता है |

💡 किसी भी बड़ी बीमारी के बाद जब ताकत बढाने की आवश्यकता रहती है तो इसका सेवन काफी फायदेमंद रहता है | 

💡 यदि कैंसर रोगी प्रतिदिन राख लौकी (Ash Gourd) के रस का सेवन करते हैं, तो शरीर में कैंसर की कोशिकाओं की संख्या कम होने में मदद मिलती है |

 💡 इसका सेवन शरीर के नाड़ियों को आराम पहुंचाता है, शरीर को ऊर्जा देता है और बुद्धि को भी तेज करता है |

Ash Gourd रस बनाने और सेवन की विधि 

Ash Gourd की सब्जी बनाई जाती है, इसे सांभार में मिलाया जाता है, इसे सलाद में भी इस्तेमाल किया जाता है | पर इसके सेवन की सबसे लोकप्रिय पद्धती है इसका रस बनाकर पीना | 

आयुर्वेद नुसार इसका रस पीना लाभकारी होता है | इसका रस बनाना काफी आसान है |

➡ इसके बीजों को पूरी तरह से निकाल ले |

➡ इसके छिलके को निकाल ले |

➡ इनके टुकड़े कर ले |

➡ इन टुकड़ों को मिक्सर के blender जार में डालकर इनको blend (मिश्रण) कर ले |

➡ Blend करने के बाद इनको साफ़ कपडे से या छलनी (strainer) से छान (strain) ले |

➡ इस रस में शहद मिला ले और बाद में सेवन कीजिये |

➡ आप इस रस में अपने पसंद अनुसार कली मिर्च पावडर, नमक या नींबू का रस भी डाल सकते है |

💡 बिना मिक्सर के रस बनाने के लिए Ash Gourd को कद्दू कस करके, इसको साफ़ कपड़े से छान कर भी इसका रस निकला जा सकता है |

💡 आयुर्वेदिक चिकित्सक नुसार आमतौर पर वयस्क आदमी 50 मीली और बच्चे 25 मीली मात्रा तक इसका सेवन कर सकते है | सेवन करने से पहले इसमें एक चम्मच शहद मिला लीजिये |

💡 इसके रस का सेवन आयुर्वेदिक चिकित्सक के मार्गदर्शन में किया जाये तो वो ज्यादा लाभकारक रहता है | क्यों की किसी भी चीज़ का अतिरिक्त सेवन सेहत के लिए नुकसानदायक साबित हो सकता है |

Ash Gourd रस के नुकसान

जीन लोगोंको दमे (Asthama-अस्थमा) की बीमारी हैं, जो सर्दी-जुकाम के लिए अतिसंवेदनशील हैं, जिन्हें हरदम कफ की शिकायत रहती है, ऐसे लोग अगर Ash Gourd के रस का सेवन करते हैं, तो उनको तुरंत सर्दी हो सकती है क्योंकि यह शरीर को शीतलता प्रदान करता है | 

ठण्ड के प्रती संवेदनशील लोग अगर Ash Gourd के रस का सेवन करना चाहते है तो इस रस में वह शहद या काली मिर्च डालकर सेवन कर सकते हैं। यह कुछ हद तक शीतलन प्रभाव को बेअसर कर देगा |

Ash Gourd का ज्यादा सेवन करने से :

💡 पेठा (Ash Gourd) में बहुत अधिक फाइबर (fiber-रेशा) होता है | ज्यादा dietary fiber के  सेवन से कब्ज (constipation) हो सकता है |

💡 अस्थमा, सरदी-खांसी के रोगी को Ash Gourd की सब्जी नहीं खानी चाहिए |

💡 ज्यादा मात्रा में सेवन करने पर यह Blood Sugar Level (रक्त शर्करा स्तर) कम करता है। इसलिए इसके अधिकतम सेवन से बचे |

विश्व प्रसिद्ध मिठाई आगरा का पेठा 

💡 Ash Gourd in Hindi 💡 

आगरा का पेठा

आगरा की मिठाई पेठा देश विदेशों में काफी मशहूर है | इसे Ash Gourd मतलब पेठे से ही बनाया जाता है | जो काफी स्वादिष्ट होती है | 

अगर आप इस आगरा के स्वादिष्ट मिठाई पेठा को घर पर बना चाहते है तो निचे दीये गए रेसिपी लिंक पर क्लिक click कीजिए |


  ➡ आगरा की पेठा बनाने की सबसे आसान रेसिपी



Ash Gourd Vitamins and Minerals

राख लौकी (Ash Gourd) को सात्विक तथा गुणकारी फल (सब्जी) कहां जाता है कारण इसमें पाए जाने वाले विटामिन्स और मिनरल (खनिज)|

निचे दिए गए तख्ते से आपको इसमें पाए जाने वाले विटामिन्स और मिनरल (खनिज) का पता चल जायेगा | 

💡 Ash Gourd in Hindi 💡 

Ash Gourd content per 100 gm
Calories: 14 Kcal
Carbohydrates: 3.39 gram
Protein: 0.62 grams
Fat: 0.02 grams
Dietary Fiber: 0.5 grams
Cholesterol: 0.00 gram
List of Vitamins and Minerals
Thiamine
Vita B5
Vita C
Vita B6
Phosphorus
Zinc
Niacin
Iron
Magnesium
Manganese

 

Kabir Das images | देखिये कबीर साहीब की अद्भूत तस्वीरें

Kabir Das images : कबीर दास हिंदी साहित्य के भक्ति काल के एकलौते ऐसे कवि है, जो आजीवन समाज और लोगों के बीच व्याप्त आडम्बरों पर कुठारा घात करते रहे |

कबीरजी इस बात में विश्वास रखते थे की ज्ञान के जरिये ही आप इश्वर को या मोक्ष को प्राप्त कर सकते है |

Kabir Das images

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कबीर दासजी का जन्म विधवा ब्रह्मणी के गर्भ से हुआ था | विधवा ब्रह्माणी ने लोक लाज के डर से इन्हें जन्म के बाद उत्तरप्रदेश के वाराणसी जिल्हे में काशी शहर के अन्दर एक लहर तारा तालाब के सिडीयों पर इन्हें छोड़ गयी थी |

कबीर दास जी का जन्म 1398 ई. में काशी में हुआ |

 

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कबीरजी के गुरु 

स्वामी रामंनद के बारह शिष्य बताये जाते है | जिनमे कबीर दास जी एक थे | कबीर ने एक जगह अपने दोहे में कहा हैं | “काशी में हम प्रकट भये रामानंद चेताये |” 

 


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कबीरजी के दोहे 

कबीर माया मोहिन, जैसी मीठी खांड |
सतगुरु की कृपा भई, नहीं तोउ करती भांड ||

 

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Kabir Ke Dohe (Best 200) | कबीरदास जी के अद्भूत 200 दोहे अर्थ सहित (Part-1)



कबीरजी के दोहे 

जाका गुरु भी अंधला, चेला खरा निरंध |
अंधै अंधा ठेलिया, दून्यूँ कूप पडंत ||

 

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कबीरजी के दोहे 
जब मैं था तब हरि नहीं ,अब हरि हैं मैं नांहि। 
सब अँधियारा मिटी गया , जब दीपक देख्या माँहि।।

Kabir Das images

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कबीरजी के दोहे 

कबीर माया मोहिन, जैसी मीठी खांड |
सतगुरु की कृपा भई, नहीं तोउ करती भांड ||

 


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कबीरजी के दोहे 

कबीर इस संसार को, समझौ कई बार |
पूंछ जो पकडई भेड़ की, उत्रय चाहाई पार ||

 


कबीर समाधि स्थल मगहर

Sant kabir sahib ji samadhi sthal Maghar. कबीरजी को १२० वर्षोंकी लम्बी आयु प्राप्त हुयी थी |

जीवन के अंतिम समय में कबीरजी काशी से मगहर चले गए थे, क्योंकि उस समय लोगों में यह धारणा प्रचलित की जिस व्यक्ती की मृत्यु काशी में होती है उसे स्वर्ग की प्राप्ति होती है और जिसकी मृत्यु मगहर में होती है उसे नरक की प्राप्ति होती है| 

कबीर जी इन बातों को मानते नहीं थे | इन् बातो को झुटलाने के लिए ही कबीर साहब ने माघार में अपने देह त्याग दिया |

 

Sant kabir sahib ji samadhi sthal Maghar

संत कबीर साहब की समाधी स्थली उत्तरप्रदेश के मगहर में है | उनकी मृत्यु 1518 इसवी में महनगर हुई |


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Fingers name in Hindi | उंगलियों का नाम हिंदी और अंग्रेजी में

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Fingers name in Hindi: मनुष्य के हर एक अंग का महत्व होता है, उसकी विशेषताएं और उसका अपना कार्यभी होता है | वैसे तो हमारे शरीर का हर एक अंग कुछ न कुछ काम करता है |

हमारे हाथों पर जूडी उंगलिया हमारे शरीर का एक विशेष अंग है | इन उँगलियों के सहारे ही हम हररोज के जरूरी काम करते है |

हाथ के हर एक उंगली को नाम दिया गया है | आइये जानते है हमारे हाथ के उँगलियोंके क्यां नाम है और इन उनकी क्या विशेषताएं है |

Fingers name in Hindi

हर उंगली का एक नाम है जो इस प्रकार से है |

Fingers name in Hindi

Fingers name in hindi Fingers name in English
अंगूठा, अंगुष्ठ Thumb (थम्ब)
तर्जनी, देशिनी Index Finger
मध्यमा, बीच की उंगली Middle Finger
अनामिका Ring Finger
कनिष्ठा, कानी अंगुली Pinky, little finger

Note: पैरों के उँगलियों को भी यही नाम है | उनके लिए अलग नाम नहीं है |

 

उंगलीयोंके बारेमें कुछ जानकारी 

 ➡ अंगूठा : सारे उँगलियोंमेसे सबसे ताकत वर उंगली है अंगूठा | अंगूठे की मदद से ही हम चीज़ों को पकड़ना, छोड़ना, फेकना आदी क्रियाएं आसानीसे कर पाते है | 

💡 अंगूठे को अंगुष्ठ भी कहा जाता है | 

💡  हिन्दू मान्यताओं नुसार अंगूठा यह उंगली अग्नी तत्त्व का पतिनिधित्व करती है |

➡ तर्जनी: इस उंगली का उपयोग आमतौर पर किसी दिशा को दर्शाने के लिए किया जाता है | किसी निर्जीव या सजीव प्राणी के तरफ अंगुली निर्देश करने के लिए भी किया जाता है | 

💡 तर्जनी उंगली को देशिनी भी कह जाता है |

💡 हिन्दू मान्यताओं नुसार तर्जनी यह उंगली वायु तत्त्व का पतिनिधित्व करती है |

➡ मध्यमा : बीच के उंगली को मध्यमा कहा जाता है |

💡 हिन्दू मान्यताओं नुसार यह उंगली आकाश तत्त्व का प्रतिनिधित्व करती है |

अनामिका : इस उंगली में आमतौर पर अंगूठी पहनी जाती है | इस उंगली में अंगूठी पहनना शुभ माना जाता है | 

💡 हिन्दू मान्यताओं नुसार यह उंगली पृथ्वी तत्त्व का प्रतिनिधित्व करती है |

कनिष्ठा : सारे उँगलियोंमे से लम्बाईमें  सबसे छोटी यह उंगली है | 

💡 इस उंगली को कानी अंगुली भी कहा जाता है |

💡 हिन्दू मान्यताओं नुसार यह उंगली जल तत्त्व का प्रतिनिधित्व करती है |

 

Fingers Name in English

अंग्रेजी भाषा में भी हर एक उंगली का अलग नाम है | निचे दिए गए रेखा चित्र द्वारा आप उँगलियों के अंग्रेजी भाषा के नाम आसानीसे समझ सकते है | 

Fingers name in Hindi

Fingers Name Pronunciation
Thumb थम्ब 
Index Finger इंडेक्स फिंगर 
Middle Finger मिडल फिंगर 
Ring Finger रिंग फिंगर 
Pinky*  पिंकी 

*Note : Pinky finger is also called little finger.

Essay on coronavirus in Marathi | मराठीत कोरोना वायरस वर निबंध

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Essay on Coronavirus in Marathi: साल 2020 मध्ये संपूर्ण जगाचे सर्व व्यवहार थांबले आणि या वर्षाने लोकांना आप-आपल्या घरात कैद होण्यास भाग पाडले याचे कारण कोरोना नावाचा एक संसर्गजन्य आजार. या संसर्गजन्य आजाराने जगातील सर्व देश भयभीत झाले आणि लोकांना त्यांची जीवनशैली बदलण्यास या रोगाने भाग पाडले. जगात असे देश फारच कमी होते जेथे या आजाराचे रूग्ण सापडले नाहीत.

भारतात असलेल्या दाट लोकसंख्येमुळे हा कोरोनाव्हायरस (कोविड-19) संसर्गजन्य रोग वेगाने पसरण्याची भीती होती आणि हा आजार भारता मध्ये एक चिंतेचे वातावरण घेवून आला. या कारणास्तव, 23 मार्च 2020 रोजी पंतप्रधान नरेंद्र मोदीजी यांच्या नेतृत्वातील भारत सरकारने सूरवातीला 21 दिवस देशव्यापी लॉकडाऊन करण्याचे आदेश दिले.

परंतु हा लॉकडाउन वर्ष 2021 मध्येही बऱ्याच प्रमाणात अद्यापही सुरू आहे.

Essay on Coronavirus in Marathi

कोरोनाव्हायरस (कोविड-19) हा जगासाठी एक नवीन आजार होता, ज्यामुळे त्यावर कोणतेही औषध नव्हते आणि कोणालाही त्याची लक्षणे नीट माहित नव्हती. म्हणूनच, संपूर्ण जगाबरोबरच, भारत देशानेही या संसर्गजन्य आजाराला आळा घालण्यासाठी लॉकडाउनचे आदेश दिले.

हा संसर्गजन्य आजार टाळण्यासाठी, देशातील सर्व वाहतूक सेवा बंद करण्यात आल्या. सर्व शासकीय आणि खाजगी कार्यालये, शाळा आणि इतर सार्वजनिक उपक्रम अनिश्चित काळासाठी बंद करण्यात आले. उद्देश हा होता की हा संसर्गजन्य रोग लोकांमध्ये इतका पसरू नये की त्यावर नियंत्रण मीळवणे कठीण जाईल.

सरकारने प्रत्येक व्यक्तीस सार्वजनीक ठिकाणी मास्क घालने बंधनकारक केले. आवश्यक कामा शिवाय कोणीही घराबाहेर पडू नका अशा सूचना देण्यात आल्या. सर्व सरकारी आणि खाजगी रुग्णालये, वैद्यकीय कर्मचारी, डॉक्टर आणि स्वच्छता कर्मचार्‍यांना या संक्रामक रोगाचा सामना करण्यासाठी तयार राहण्याच्या सूचना देण्यात आल्या.

केंद्र सरकारला देशावर येऊ घातलेल्या या कोरोनाव्हायरस (कोविड -19) संसर्गजन्य रोगाचे संकट समजले होते.  इतर देशांमध्ये या संसर्गजन्य कोरोना विषाणूमुळे निर्माण झालेल्या पतिस्थितीचा अंदाज सरकारला आला होता. 

भारतात कोरोना वायरस

Essay on Coronavirus in Marathi  

केंद्र सरकारचे कोरोना आजारा बाबतचे मूल्यांकन योग्य असल्याचे सिद्ध झाले आणि हा कोरोना व्हायरस संसर्गजन्य आजार देशात पसरण्यास सुरुवात झाली. देशात या आजाराची एक कोटीहून अधिक भारतीयांना लागण झाली.  परंतु आपल्या देशातील वैद्यकीय कर्मचारी, डॉक्टर आणि स्वछता कर्मचार्‍यांनी स्वताच्या जीवाची पर्वा न करता या कोरोना रूग्ण व्यक्तिना बरे केले.  

या कोरोना विषाणूमुळे (कोविड-19) आजपर्यंत जगातील 25 लाखाहून अधिक लोकांचा मृत्यू झाला आहे. आतापर्यंत भारतात या आजारामुळे 1.5 लाखापेक्षा जास्त लोक मरण पावले आहेत. याद्वारे आपण समजू शकता की जर या रोगावर वेळेवर उपचार केले गेले नाही तर हा रोग प्राणघातक सिद्ध होऊ शकतो.

वेळेवर उपचार केल्यास हा कोरोना विषाणूचा (कोविड-19) आजार अगदी सहजतेने बरे होतो. या आजारासाठी सरकारने सर्व ठीकाणी कोरोना चिकीस्ता सुविधा केंद्र सुरू केले आहेत.

एखाद्या कोरोना संभाव्य व्यक्तीची तपासणी येथे वेळेत झाली तर तो सहजपणे या संसर्गजन्य आजारावर मात करू शकतो. सरकार या संदर्भात सातत्याने देशातील जनतेला माहिती देउन जागरूक करत असते.

कोरोना वायरस (COVID-19) 2021 मध्ये

Essay on Coronavirus in Marathi  

आज, वर्ष 2021 मध्ये, हा आजार काही अंशी नियंत्रणात असल्याचे दिसून येत आहे, याचे मुख्य कारण म्हणजे आपल्या रूग्णालयाचे डॉक्टर, वैद्यकीय कर्मचारी, तातडीच्या सेवेतील कर्मचारी आणि पोलिस. या संसर्गजन्य आजारापासून देशातील लोकांना वाचविण्यासाठी यांनी रात्रंदिवस प्रयत्न केला आणि या प्रयत्नात ते यशस्वी सुद्धा झालेले आहेत.

देशातील लोकांना कोरोना (कोविड-19) विषाणूंपासून वाचविण्याच्या प्रयत्नात, कोरोना विषाणूच्या संसर्गामुळे बरेच डॉक्टर, वैद्यकीय कर्मचारी, तातडीचे सेवा कर्मचारी आणि पोलिसही मरण पावले आहेत. तरीही या कोरोना योद्ध्यांनी आपले काम करायचे सोडले नाही.

Essay on Coronavirus in Marathi

कोरोना योद्ध्यांचे आपल्या देशाबद्दल आणि देशवासियांच्या प्रती समर्पण भावनेचे कौतुक करण्यासाठी आपल्या देशाचे पंतप्रधान श्री. नरेंद्र मोदीजी आणि सर्व देशवासीयांनी या कोरोना योद्धांना अभिवादन केले आणि त्यांच्या कार्याचे कौतुक केले.

जरी हा कोरोना विषाणू (कोविड-19) वर्ष 2021 मध्ये कमी होताना दिसत आहे, परंतु आपल्याला हे लक्षात ठेवले पाहिजे की हा एक अती संसर्गजन्य रोग आहे आणि तो पुन्हा केव्हाही पसरू शकतो.

डॉक्टरांचे म्हणणे आहे की पुढील 4-5 वर्षे हा रोग मानवांसोबत राहणार आहे, म्हणूनच आपण जागरूक राहण्याची गरज आहे. हा रोग टाळण्यासाठी आपल्याला सरकारने घालून दिलेल्या प्रत्येक नियमाचे काटेकोरपणे पालन करायला हवे.

कोरोनवायरस वायरस काय आहे?

Essay on Coronavirus in Marathi  

कोरोना व्हायरस(कोविड-19) हा संसर्गजन्य रोग आहे जो नव्याने सापडलेल्या कोरोनाव्हायरसमुळे होतो.

कोरोना (कोविड-19) विषाणूमुळे संक्रमित बहुतेक लोकाना श्वास घेण्यास त्रास होतो पण बरेच कोरोना रूग्ण डॉक्टरांच्या औषधांद्वारे सहजपणे बरे होतात, त्यांना विशेष उपचारांची आवश्यकता नसते.

वृद्ध लोक आणि हृदयरोग, मधुमेह, तीव्र श्वसन रोग आणि कर्करोग यासारख्या आजारांनी ग्रस्त लोकांना जर या कोरोनाव्हायरस आजाराची लागण झाली तर हा रोग त्यांच्यामध्ये गंभीर रूप धारण करू शकतो. या कोरोना आजाराने मृत्यु पावलेल्या लोकांमधे जास्त करून वृद्ध आणी व्याधिग्रस्त लोकांचाच समावेश आहे.

कोरोना (कोविड-19) विषाणू प्रामुख्याने एखादा संक्रमित व्यक्ती जेव्हा शिंकतो, खोकतो किंवा बोलतो तेव्हा जे थेंब आजुबाजुला पसरतात किंवा समोरच्या व्यक्ती वर उडतात हा आजार प्रामुख्याने त्यातून पसरतो. म्हणून हे महत्वाचे आहे की प्रत्येकाने खोकताना किंवा शिंकताना तोंडावर रुमाल ठेवला पाहिजे. 

कोरोना (कोविड-19) विषाणूचा संसर्ग टाळण्यासाठी प्रत्येकाने सार्वजनीक ठिकाणी मास्क घातला पाहिजे. आपले हाथ साबणाने वारंवार धुतले पाहिजेत. आपल्या चेहरयाला, नाकाला, डोळ्याला किंवा मास्कला वारंवार स्पर्श करु नये.

जागतिक आरोग्य संघटना (WHO)

Essay on Coronavirus in Marathi  

जागतिक आरोग्य संघटना (World Health Organisation) ही आरोग्य यंत्रणेच्या क्षेत्रात काम करणारी एक आंतरराष्ट्रीय कीर्तीची संघटना आहे. WHO ने या कोरोना (कोविड-19) विषाणूबद्दल काही तथ्य प्रसारित केले आहे ज्याची माहिती प्रत्येकासाठी खूप महत्वाची आहे:-

➡ व्यायाम करताना लोकांनी मास्क घालू नये कारण मास्क आरामात श्वास घेण्याची क्षमता कमी करू शकतो. घाम आल्याने मास्क ओलावू शकतो ज्यामुळे श्वास घेणे कठीण होते. घाम आल्याने मास्कवर सूक्ष्मजीवांच्या वाढीस प्रोत्साहन मिळते.

➡ पाण्यामधे पोहताने पाण्याद्वारे कोरोना विषाणु पसरू शकत नाही.

➡ कोरोनाव्हायरस रोग (कोविड-19) विषाणूमुळे होतो, बॅक्टेरियामुळे नव्हे. कोविड-19 आजाराला कारणीभूत असलेल्या व्हायरसला कोरोनाविरिडे (Coronaviridae) म्हणतात.

➡ कोरोना वायरस (Coronavirus) आजाराने संक्रमीत होणारे बहुतेक लोक या आजारातून पूर्णपणे बरे होतात. जर आपल्याला खोकला, ताप आणि श्वास घेण्यास त्रास होत असेल तर लवकरात लवकर वैद्यकीय उपचार घ्या.

➡ मद्यपान केल्याने कोविड-19 पासून तुमचे रक्षण होणार नाही. उलटपक्षी मद्यपान करणे आरोग्यासाठी घातक असते.

➡ काळी मिरीचा वापर सूप किंवा रोजच्या आहारात केला म्हणून कोरोना आजारास कुठल्याच प्रकारचा प्रतिबंध होत नाही. हा कोरोना आजारावरचा उपाय नाही.

➡ कोरोना व्हायरस (Coronavirus) हा आजार घरातील माश्यांपासून (Fly) पसरत नाही.

➡ डास चावल्यामुळे कोरोना विषाणूचा संसर्ग (कोविड-19) होत नाही.

➡ लसूण खाल्ल्याने कोरोना विषाणूचा धोका थोडासाही कमी होत नाही. 

➡ सर्व वयोगटातील लोकांना कोरोना विषाणूची लागण होऊ शकते. लहान मुलांपासून वृद्धांपर्यंत सर्वाना या आजाराचा त्रास होऊ शकतो.

➡ गरम पाण्याने आंघोळ केल्याने करोना आजाराचा धोका कमी होत नाही.

➡ थंड आणि उष्ण दोन्ही प्रकारच्या हवामानात करोना विषाणू जीवंत राहू शकतो. 

➡ कोरोना विषाणूंपासून स्वत: चे रक्षण करण्याचा उत्तम मार्ग म्हणजे इतरांपासून कमीतकमी 1 मीटरचे शारीरिक अंतर राखणे आणि आपले हात वारंवार स्वच्छ करणे होय. असे केल्याने आपण आपल्या हातातील विषाणूचा नाश करू शकता आणि संसर्गही टाळू शकता.

जर आपण हात न धुता वारंवार आपले डोळे, तोंड आणि नाक किंवा मास्कला स्पर्श केला तर कोरोना विषाणूचा संसर्ग होण्याची शक्यता असते.

भारताची स्वदेशी कोरोना वायरस (COVID-19) वैक्सीन

Essay on Coronavirus in Marathi 

सर्व देशातील डॉक्टर्स व वैज्ञानिक वर्ष 2020 पासून कोरोना विषाणू (कोविड-19) रोगावर लस (vaccine) बनवण्याचा प्रयत्न करीत होते. भारतातील डॉक्टर्स व वैज्ञानिक सुद्धा याच प्रयत्नात होते.

आपल्या देशातील प्रतिभावान शास्त्रज्ञ व डॉक्टरांनी वर्ष 2021 मध्ये देशी (भारतीय) लस तयार करण्यात यश मिळविले आहे, ज्यामुळे कोरोना विषाणू रोगाला प्रतिबन्ध होऊ शकेल.

आपल्या देशाचे पंतप्रधान श्री. नरेंद्र मोदी यानी घोषणा केली आहे ही लस देशातील प्रत्येक दिली जाईल. 

कोरोना लस (vaccine) तयार केली गेली आहे, याचा अर्थ असा नाही की कोरोना व्हायरस हा रोग आता जगातून कायमचा नाहीसा होईल. डॉक्टर म्हणतात की हा रोग पुढील 4-5 वर्षे मानवजाती सोबतच राहील.

आम्हाला सर्व नियमांचे काटेकोर पालन करून या कोरोना विषाणू (कोविड-19) संसर्गजन्य रोगाविरुद्ध लढा द्यावा लागेल. या रोगाला पराभूत करून आपणास आपल्या देशाला एक निरोगी आणि शक्तिशाली राष्ट्र बनवायचे आहे.


😯 Read here about corona virus (Covid19)

 ➡ जागतिक आरोग्य संघटना (World Health Organisation)


 

Essay on Coronavirus in English | Covid-19 Essay For Students

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Essay on Coronavirus in EnglishThe year 2020 stopped the whole world and imprisoned people in their homes. The cause was an infectious disease called coronavirus (COVID-19). This disease frightened all the countries of the world and forced people to change their lifestyles.No country remains untouched by this disease.

Due to the dense population in India, this infectious coronavirus (COVID-19) disease was feared to spread rapidly and the disease became a concern. 

For this reason, on 23 March 2020, the Government of India under Prime Minister Narendra Modi declared a nationwide lockdown for 21 days.

But this lockdown is still in operation in the year 2021.

Essay on Coronavirus in English

Coronavirus (COVID-19) was a new disease for the world in the year 2020, due to which there was no medicine on it and nothing was properly known about its symptoms. Therefore, along with the whole world, India also ordered a lockdown to curb this infectious disease.

To protect people from this contagious disease, the Indian government ordered that all private and public transport companies should stop their services immediately. All government and non-government offices, schools, and other public undertakings were closed indefinitely. The aim was that this infectious disease should not be spread amongst people so much that it will be difficult to control.

The Indian government announced that every person needed to be wearing a mask in public places. No one should be left their house without any necessary work. Information was given to all government and non-government hospitals, medical personnel, doctors, and employees to be prepared to deal with this contagious disease.

The central government had realized this impending crisis and understood the ill effects caused by this coronavirus (COVID-19) disease in other countries.

coronavirus in India

Essay on Coronavirus in English

The Central Government’s assessment proved to be correct and this coronavirus (COVID-19) disease started spreading in the country. This disease afflicted more than one crore of Indians, but our medical staff and doctors cured them with tireless service and hard work without worrying about their own lives.

So far, more than 25 lakh people have died in the countries of the world due to this coronavirus (COVID-19) disease. In India, more than 1.5 lakh people have died due to this disease. By this, you can understand that if this disease is not treated in time, it can prove to be fatal.

If treated on time, this coronavirus (COVID-19) disease can be easily cured like other diseases. The government has especially opened Corona medical Facilitation Centers everywhere for this disease.

If a potential person gets his checkup done here in time, he can easily recover. The government also repeatedly appeals to the country’s people about this.

Coronavirus (COVID-19) in 2021

Essay on Coronavirus in English

Today, in the year 2021, this disease is seen to be somewhat under control, the main reason for this is the doctors of our hospital, the medical staff, urgent service personnel, and the police. They tried their best & work hard day and night to save the people of the country from this infectious disease called ‘corona’. They have been successful in this endeavor.

To save people of the country from coronavirus (COVID-19) disease, many doctors, medical staff, urgent service personnel, and police have also died due to coronavirus infection. But still, they did not leave their work.

Essay on Coronavirus in English

To appreciate these corona warriors’ spirit of dedication towards country and countrymen the Prime Minister of India Shri. Narendra Modiji and all the countrymen express gratitude, greeted these Corona warriors, and appreciated their work.

Even though coronavirus (COVID-19) disease seems to be decreasing in the year 2021, but we have to remember that this is a contagious disease and it can be spread again anytime. It came back in many countries again.

Doctors believe that for the next 4-5 years, this disease is going to stay with humans, so we need to be cautious. To avoid this disease, we have to follow strictly each of the rules declared by the government.

What is coronavirus?

Essay on Coronavirus in English

Coronavirus (COVID-19) is an infectious disease caused by a newly discovered coronavirus.

Most people infected with the coronavirus (COVID-19) experience mild to moderate respiratory illness and they recover it without the need for special medical treatment. This means that many corona patients are easily cured by the medicines of doctors; they do not require any special medical treatment.

Older people and the peoples who suffer from diseases like heart disease, diabetes, chronic respiratory disease, and cancer, if they are infected with this coronavirus (COVID-19) disease, then this disease can take a serious form in them.

The corona (COVID-19) virus is mainly spread through droplets when an infected person coughs or sneezes. Therefore a handkerchief must be placed on the mouth while coughing or sneezing.

Everyone must wear a mask to avoid corona (COVID-19) virus infection. You should wash your hands regularly. Do not touch your face or mask frequently. 

 

(WHO)World Health Organisation

Essay on Coronavirus in English

WHO is an International organization which is working in the world health systems sector, World Health Organization has let a few facts about the Coronavirus (COVID-19) disease. Whose information is very important to everyone:-

➡ People should not wear masks while exercising because masks can reduce the ability to breathe comfortably. Sweating can wet the mask which makes it difficult to breathe and promotes the growth of microorganisms.

➡ The COVID-19 virus does not transmit through the water while swimming. However, the virus spreads between people when someone has close contact with an infected person.

➡ Coronavirus disease (COVID-19) is caused by a virus, not by bacteria. The virus that causes COVID-19 is called Coronaviridae (Coronaviridae). Antibiotics do not work against viruses.

💡 Some people who become ill with COVID-19 can also develop a bacterial infection as a complication. In this case, antibiotics may be recommended by a health care provider.

💡 There is currently no licensed medication to cure COVID-19.

➡ Most people who are infected with Coronavirus disease recover from this disease. Most people have mild or moderate symptoms, which are cured after getting medical help. If you have a cough, fever, and difficulty breathing, seek medical treatment early.

➡ Drinking alcohol does not protect you from COVID-19. On the contrary, drinking alcohol is increases problem for your health.

Hot peppers in your soup or in food, cannot prevent or cure COVID-19. The best way to protect yourself against the new coronavirus is to keep at least 1 meter away from others and to wash your hands frequently and thoroughly.

➡ Coronavirus ( Coronavirus) disease is not spread through houseflies. The virus that causes COVID-19 spreads primarily through droplets generated when an infected person coughs, sneezes, or speaks. You can also become infected by touching a contaminated surface and then touching your eyes, nose, or mouth before washing your hands.

➡ Being able to hold your breath for 10 seconds or more without coughing or feeling discomfort DOES NOT mean you are free from COVID-19.

➡ The COVID-19 virus CANNOT be spread through mosquito bites.

➡ Eating garlic does not prevent coronavirus ( COVID-19) disease.

➡ People of all ages can be infected by the COVID-19 virus. Older people and people with pre-existing medical conditions such as asthma, diabetes, and heart disease appear to be more vulnerable to becoming severely ill with the virus.

➡ Taking a hot bath does not prevent COVID-19.

➡ Exposing yourself to the sun or temperatures higher than 25°C DOES NOT protect you from COVID-19. Cold weather and snow CANNOT kill the COVID-19 virus.
The COVID-19 virus can spread in hot and humid climates.

➡ The best way to protect yourself against the coronavirus ( COVID-19) is to maintain a physical distance of at least 1 meter from others and wash your hands often. By doing this, you can eliminate the virus on your hands and avoid infection. Keep rooms well ventilated, avoiding crowds, and coughing into a bent elbow or tissue.

➡ Masks should be used as part of a comprehensive strategy of measures to suppress transmission and save lives; the use of a mask alone is not sufficient to provide an adequate level of protection against COVID-19.

💡 Here are the basics of how to wear a mask:

➡ Clean your hands before you put your mask on, as well as before and after you take it off.

➡ Make sure it covers both your nose, mouth, and chin.

➡ When you take off a mask, store it in a clean plastic bag, and every day either wash it if it’s a fabric mask or dispose of a medical mask in a trash bin.

➡ Don’t use masks with valves.

➡ If you touch your eyes, mouth, and nose or masks repeatedly without washing your hands, there is a possibility of infection of coronavirus ( COVID-19).

India’s indigenous coronavirus (COVID-19) vaccine

Essay on Coronavirus in English

Scientists and doctors all over the world were trying to prepare a vaccine for coronavirus (COVID-19) disease from the year 2020. Indian doctors and scientists are also busy with the same task.

The talented scientists and doctors of our country have succeeded in making an affordable indigenous vaccine in the year 2021, which can prevent the coronavirus (COVID-19) disease.

The Prime Minister of our country, Shri. Narendra Modi has announced that this vaccine will be given to each person in the country.

The corona vaccine (vaccine) has been created, it does not mean that the coronavirus (COVID-19) disease will now be eliminated from the world. This battle is long, the doctors say that this disease is going to stay with humans for the next 4-5 years.

We have to fight against this coronavirus (COVID-19) contagious disease and defeat it by following all the rules, and make our country a healthy and powerful nation.


😯 Read here about coronavirus (Covid19)

 ➡ (World Health Organisation)


 

Essay on Coronavirus in Hindi | कोरोना वायरस पर निबंध

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Essay on Coronavirus in Hindi: पूरे विश्व को साल 2020 ने जैसे रोक लिया और लोगों को अपने घरों में कैद कर लिया | इसका कारण था कोरोना नामक संक्रामक बीमारी | इस बीमारी ने विश्व के सारे देशों को डरा दिया और लोगों को अपनी जीवन शैली बदलने पे मजबूर कर दिया | इस बीमारी से भारत देश भी अछूता नहीं रहा |

भारत में घनी आबादी होने के कारण यह कोरोनावायरस  (COVID-19) संक्रामक बीमारी तेज़ी से फैलने का डर था और यह बीमारी चिंता का विषय बन गयी थी |

इसी वजहसे देशमें 23 मार्च 2020 को, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदीजी के अधीन भारत सरकार ने 21 दिनों के लिए देशव्यापी (lockdown) तालाबंदी का आदेश दे दिया था |

लेकिन यह देशव्यापी (lockdown) तालाबंदी आज साल 2021 में भी चालू है |

Essay on Coronavirus in Hindi

कोरोनावायरस (COVID-19) यह विश्व के लिए एक नयी बीमारी थी जिसके चलते इस पर कोइ दवाई न थी और नही  इसके लक्षणों के बारे में कुछ ठीक से पता था | इसलिए पुरे विश्व के साथ-साथ भारत देश ने भी इस  संक्रामक बीमारी पर अंकुश लगाने के लिए (lockdown) तालाबंदी के आदेश दे दिये |

इस संक्रामक बीमारी से बचने के लिए देश में हवाई जहाज से लेकर अन्य सारी परिवहन सेवाएँ बंद कर दी गयी | सरकारी और गैर-सरकारी  सारे दफ्तर, विद्यालय और अन्य सार्वजनीक उपक्रम अनिश्चित काल तक बंद कर दिए गये | उद्देश यह था की यह संक्रामक बीमारी लोगों में एक दूसरों द्वारा इतनी न फैले के इसपर काबू पाना मुश्कील हो जाये |)

हर व्यक्ती के लिए मास्क पहनना जरूरी कर दिया | जरूरी कामों के बैगैर किसीको भी घरों से बाहर न निकलने की हिदायते दी गयी | सारे सरकारी और गैर-सरकारी अस्पताल, चिकित्सा सेवक, डॉक्टर और कर्मचारियोंको इस संक्रामक बीमारीसे निपटने के लिए तैयार रहने के लिए सूचनायें दी गयी |

केंद्र सरकार ने इस आने वाले संकट को भांप लिया था और अन्य देशों में इस कोरोना वायरस (COVID-19) बीमारी से उत्पन्न हुए दुष्परिणामो को समझ लिया था |

भारत मे कोरोना वायरस

Essay on Coronavirus in Hindi

केंद्र सरकार का आकलन सही साबित हुआ और इस कोरोना वायरस (COVID-19) बीमारीने देश में फैलना शुरू कर दिया | इस बीमारी ने एक करोड़ से भी ज्यादा भारतियों को ग्रस्त कर दिया पर हमारे चिकित्सा सेवक, डॉक्टर और कर्मचारियोंने अपने अथक सेवा भाव और मेहनत से अपने प्राणों की चिंता न करते हुए इनको ठीक कर दिया |

इस कोरोना वायरस (COVID-19) बीमारीसे पूरे दुनिया के देशो में अब तक 25 लाख से भी ज्यादा लोगों की मृत्यु हो गयी है | भारत देश में अबतक 1.5 (डेढ़) लाख से भी ज्यादा लोगों की मृत्यु इस बीमारी से हो गयी है | इससे आप समझ सकते है अगर समय रहते इस बीमारी का इलाज न किया जाये तो यह जानलेवा साबित हो सकती  है |

अगर समय पर इलाज किया जाये तो यह कोरोना वायरस (COVID-19) बीमारी सर्दी-जुकाम की तरह आसानी से ठीक हो सकती है | सरकार ने विशेष रूप से इस बीमारी के लिए हर जगह चिकिस्ता सुविधा केंद्र खोल रखे है | अगर कोइ संभावित व्यक्ती समय रहते यहाँ पर अपनी जाँच करवा ले तो वो आसानी से ठीक हो सकता है | सरकार बार बार इस बारे में अपनी देश के जनता से अपील भी करती रहती है |

कोरोना वायरस (COVID-19) साल 2021 में

Essay on Coronavirus in Hindi

आज साल 2021 में यह बीमारी कुछ हद तक नियंत्रण में दिख रही है इसका प्रमुख कारण है हमारे अस्पताल के डॉक्टर, चिकिस्ता सेवक, अत्यावश्यक सेवा के कर्मचारी और पुलिस | इन्होने दिन रात अपने जान की परवाह किये बगैर देश के जनता को इस कोरोना नामक संक्रामक बीमारी से बचने का प्रयन्त किया है और अपने इस प्रयास में ओ कामयाब भी रहे है |

देश की जनता को कोरोना वायरस (COVID-19) बीमारी से बचाने के प्रयत्न में बहुत से डॉक्टर, चिकिस्ता सेवक, अत्यावश्यक सेवा के कर्मचारी और पुलिस को कोरोना वायरस का संक्रमण होनेसे उनकी मृत्यु भी हो गयी है | फिर भी उन्होंने अपना कार्य करना नहीं छोडा|

Essay on Coronavirus in Hindi

उनकी देश और देशवासियों के प्रती समर्पण की भावना को सराहने के लिए और कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए देश के प्रधानमंत्री श्री. नरेन्द्र मोदीजी और सारे देशवासियों ने इन कोरोना योद्धाओंको अभिवादन किया और उनके कार्य को सराहा |

भले ही यह कोरोना वायरस (COVID-19) बीमारी आज साल 2021 में हमें कम होते हुए प्रतीत  हो रही है पर हमें यह याद रखना होगा यह इक संक्रामक बीमारी है और यह कभी भी फैल सकती है |

डॉक्टरों का कहना है अगले 4-5 साल तक यह बीमारी मनुष्य के साथ ही रहने वाली है इसीलिए हमें सतर्क रहने की जरूरत है और इस बीमारी से बचने के लिए हर एक नियमों का सक्तिसे पालन करना है |

कोरोनवायरस वायरस क्या है?

Essay on Coronavirus in Hindi

कोरोना वायरस (COVID-19) एक संक्रामक बीमारी है जो एक नए खोजे गए कोरोनावायरस के कारण होती  है|

कोरोना वायरस (COVID-19) से संक्रमित अधिकांश लोग हल्के से मध्यम श्वसन बीमारी का अनुभव करते है और विशेष उपचार की आवश्यकता के बिना ठीक हो जाते है । मतलब डॉक्टरों की दवाईयों से ही बहुत से कोरोना मरीज आसानीसे ठीक हो जाते है इन्हें किसी विशेष उपचार की जरूरत नहीं होती है|

वृद्ध लोगों और हृदय रोग, मधुमेह, पुरानी सांस की बीमारी और कैंसर जैसी व्याधियोंसे पीड़ित लोग अगर इस कोरोनवायरस बीमारीसे संक्रमीत हो जाते है तो इनमे यह बीमारी गंभीर रूप धारण कर सकती है | ऐसे व्याधिग्रस्त लोगों की इस कोरोना वायरस (Coronavirus) बीमारी से मृत्यु होनी की ज्यादा संभावना होती है| 

कोरोना (COVID-19) वायरस मुख्य रूप से लार की बूंदों या नाक से तब फैलता है जब किसी संक्रमित व्यक्ति को खांसी या छींक आती है | इसलिए यह महत्वपूर्ण है की खांसते या छींकते समय मूह पर रूमाल रखना चाहिए|

कोरोना (COVID-19) वायरस संक्रमण से बचने के लिए हर एक व्यक्तीने मास्क (Mask) पहनना जरूरी है | अपने हाथों को बार बार धोना चाहिए | अपने चेहरे को या मास्क को बार बार छुना नहीं चाहिए |

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO)

Essay on Coronavirus in Hindi

पूरी दुनिया के स्वास्थ्य प्रणाली क्षेत्र में काम करने वाली आंतरराष्ट्रीय संस्था  विश्व स्वास्थ्य संगठन (World Health Organisation) ने कोरोना (COVID-19) वायरस के बारे में कुछ तथ्य बताएं है जिनकी जानकारी सबको होना बहुत जरूरी है –

 ➡ व्यायाम करते समय लोगों को मास्क नहीं पहनना चाहिए क्यों की मास्क आराम से सांस लेने की क्षमता को कम कर सकता है | पसीना मास्क को गीला कर सकता है जिससे सांस लेने में मुश्किल होती है और सूक्ष्मजीवों के विकास को बढ़ावा मिलता है।

➡ पाणी COVID-19 वायरस को संचारित नहीं करता है | इसीलीए पाणी से कोरोनावायरस बीमारी होने की कोइ संभावना नहीं है |यह वायरस तैरते समय पानी से नहीं फैलता है |

 ➡ कोरोनावायरस रोग (COVID-19) एक वायरस के कारण होता है, बैक्टीरिया द्वारा नहीं | यह वायरस जो COVID-19 का कारण बनता है, इसे Coronaviridae (कोरोनाविरिडे) कहा जाता है |

 ➡ कोरोना वायरस (Coronavirus) बीमारी से संक्रमीत होने वाले ज्यादातर लोग इस बीमारी से उबर जाते हैं | अधिकांश लोगों में हल्के या मध्यम लक्षण होते हैं जो वैद्यकीय सुविधा पाने के बाद ठीक हो जाते है | यदि आपको खांसी, बुखार और सांस लेने में कठिनाई होती है, तो जल्दी वैद्यकीय चिकित्सा की तलाश करें |

 ➡ शराब पीने से आपको COVID-19 से सुरक्षा नहीं मिलती है | उल्टा शराब पीना सेहत के लिए ख़राब हो होता है |

 ➡ अपने सूप या अन्य भोजन में काली मिर्च का उपयोग करने से आप ना तो कोरोना वायरस (Coronavirus) बीमारी को रोक सकते है, नाही ठीक कर सकते है | सिर्फ वैद्यकीय उपचारों से ही आप ठीक हो सकते है |

 ➡ कोरोना वायरस (Coronavirus) बीमारी घरेलु मक्खियों (Fly) से फैलती नहीं है |

 ➡  मच्छर के काटने से कोरोना वायरस (COVID-19) बीमारी नहीं फैलती | कोरोनावायरस श्वसनतंत्र पर आक्रमण करनेवाला वायरस है जो मुख्य रूप से जब एक संक्रमित व्यक्ति खांसता या छींकता है, तो उसकी बूंदों के माध्यम से यह फैलता है |

 ➡ लहसुन खाने से कोरोना वायरस (COVID-19) बीमारी की रोकथाम नहीं होती है |

➡ सभी उम्र के लोग COVID -19 वायरस से संक्रमित हो सकते हैं | छोटे बच्चों से लेकर वृद्ध आदमी तक इस बीमारी के शिकार हो सकते है | इसीलिये विश्व स्वास्थ्य संगठन (World Health Organisation)  सभी उम्र के लोगों को सलाह देता है कि वे खुद को वायरस से बचाने के लिए हाथ की स्वच्छतासे लेकर मास्क पहनने तक सारे नियमो का पालन करे और रोग प्रतिरोधक शक्ति बढ़ने वाले आहार का सेवन करे | 

 ➡ गर्म पाणीसे स्नान करने से COVID -19 को रोका नहीं जा सकता है |

 ➡ न तो ठंड का मौसम और बर्फ COVID-19 वायरस को मार सकते और नाही अधिक धुप या तापमान| चाहे मौसम कितना भी तेज गर्म हो या ठंडा सारे प्रदेशो में कोरोना वायरस (Coronavirus) बीमारी के मामले सामने आए हैं।

 ➡ कोरोना वायरस (COVID-19) के खिलाफ खुद को बचाने का सबसे अच्छा तरीका दूसरों से कम से कम 1 मीटर की भौतिक दूरी बनाए रखना और अक्सर अपने हाथों की सफाई करना है। ऐसा करने से आप अपने हाथों पर लगे वायरस को खत्म कर सकते हैं और संक्रमण से बच सकते हैं |

अगर आप अपने हाथों को बिना धोये अपनी आंख, मुंह और नाक को या मास्क को बार-बार छूते है तो कोरोना वायरस (COVID-19) का संक्रमण होने की संभावना बनी रहती है |

भारत की स्वदेशी कोरोना वायरस (COVID-19) वैक्सीन

Essay on Coronavirus in Hindi

सारे देशों के वेज्ञानीक कोरोना वायरस (COVID-19) बीमारी को प्रतिबंधित कर सके ऐसी वैक्सीन (टीका) तयार करने के लिए साल 2020 से प्रयत्न कर रहे थे इसमें हमारे देश के डॉक्टर्स भी शामिल है |

हमारे देश के प्रतिभावान वैज्ञानीक और डॉक्टर्स कोरोना वायरस (COVID-19) बीमारी को प्रतिबंधित कर सके ऐसी स्वदेशी वैक्सीन साल 2021 में बनाने में सफल हो गए है | हमारे देश के प्रधानमंत्री श्री. नरेन्द्र मोदीजी ने घोषणा की है यह वैक्सीन (टीका) सारे देश बांधवों को दी जायेगी |

कोरोना वैक्सीन (टीका) का निर्माण हो गया है इसका मतलब यह नहीं है की दुनिया से कोरोना वायरस (COVID-19) बीमारी अब ख़त्म हो जायेगी | यह लडाई लम्बी है, डॉक्टरों का कहना है अगले 4-5 साल तक यह बीमारी मनुष्य के साथ ही रहने वाली है |

हमें सारे नियमोंका पालन करते हुए इस कोरोना वायरस (COVID-19)संक्रामक बीमारी से संघर्ष करना है, इसे हराना है और हमारे देश को एक स्वस्थ और बलशाली देश बनाना है |


😯 Read here about corona virus (Covid19)

 ➡ विश्व स्वास्थ्य संगठन (World Health Organisation)


 

Sarkari Pakshiyon ke Naam | State Birds name in Hindi and English

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sarkari pakshiyon ke naam: हमारा भारत देश राज्यों का एक संघ है | देश में 28 राज्य और 8 केंद्र शासित प्रदेश हैं। हर एक राज्य की अपनी-अपनी भौगोलिक, सामाजिक और सांस्कृतिक विशेषता है |

भारत देश नैसर्गीक विविधता से भरा हूआ है | यहा पर हर एक प्रकार के पशु, पक्षी और पेड़ पौधे है |

हर एक राज्य और केन्द्रशासित प्रदेश ने अपने राज्य के राज्य पशु, राज्य पक्षी, राज्य पेड इत्यादी घोषित किये हूवे है |

इस लेख में राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों ने घोषित किए हूए सारे राज्य पक्षीयों के नाम दिए गए है |

  • मोर (Peacock) भारत का राष्ट्रिय पक्षी है |

Sarkari Pakshiyon ke Naam

राज्य सरकारोने घोषित किये हूवे राज्यपक्षी कुछ इस प्रकार से है |

NOTE: For full visibility keep mobile horizontal. (लेख को अच्छी तरह से पढ़ने के लिए मोबाइलको आड़ा (Horizontal) रखें|)

STATE राज्य STATE BIRD Name राज्य पक्षी (सरकारी)
Andhra Pradesh आंध्र प्रदेश Indian roller नीलकंठ
Karnataka कर्नाटक Indian roller नीलकंठ
Odisha ओडिशा Indian roller नीलकंठ
Telangana तेलंगाना Indian roller नीलकंठ
नीलकंठ (Indian roller) Scientific Name Coracias benghalensis
वैज्ञानिक नाम  कोरेशियस बेन्गालेन्सिस
 

नीलकंठ पक्षी को आंध्र प्रदेश, ओडिशा, कर्नाटक और तेलंगाना के भारतीय राज्यों द्वारा राज्य पक्षी का दर्जा दिया गया है |

नीलकंठ एक सुन्दर पक्षी है जो मध्यम आकार का होता है | यह पक्षी लगभग 26-27 सेमी लंबा होता है |

 


 

STATE राज्य STATE BIRD Name राज्य पक्षी (सरकारी)
Arunachal Pradesh अरूणाचल प्रदेश Great hornbill विशाल धनेश
Kerala केरला Great hornbill विशाल धनेश

विशाल धनेश  (Great hornbill)

Scientific Name Buceros bicornis
वैज्ञानिक नाम  ब्यूसरोस बाइकोर्निस
 

विशाल धनेश को भारत में अनेक नामों से जाना जाता है| जैसे की मलबारी धनेश, गरुड़ धनेश या राज धनेश |

इस भारतीय धनेश का जीवनकाल लघभग 50 वर्ष का होता है | 

 


 

STATE राज्य STATE BIRD Name राज्य पक्षी (सरकारी)
Assam असम White-winged wood duck सफेद पंख वाला बतख
White-winged wood duck (सफेद पंख वाला बतख) Scientific Name Asarcornis scutulata
sarkari pakshiyon ke naam वैज्ञानिक नाम असारकोरनिस स्कूटुलटा
 

आसाम के राज्य पक्षी सफेद पंख वाला बतख को ‘देव हंस’ या ‘स्पिरिट डक’ के नाम से भी जाना जाता है |

यह पक्षी  दुनिया में सबसे लुप्तप्राय पक्षियों में से एक है |

 


 

STATE राज्य STATE BIRD Name राज्य पक्षी (सरकारी)
Bihar बिहार House sparrow घरेलु गौरैया
*Delhi दिल्ली  House sparrow घरेलु गौरैया

* Delhi is a union territory. (दिल्ली एक केंद्र शासित प्रदेश है।)

घरेलु गौरैया (House sparrow)  Scientific Name Passer domesticus
sarkari pakshiyon ke naam वैज्ञानिक नाम  पास्सेर डोमेस्तिकस 
 

घरेलु गौरैया विश्व में पाए जाने वाले सबसे अधिक पक्षियों में से एक है | परन्तु कुछ सालोंसे बड़े शहरों में इनकी संख्या कम हो गयी है|

इनको शहेरों में बचाने के लिए दिल्ली सरकार ने इसे राज्य पक्षी घोषित किया है|

 


 

STATE राज्य STATE BIRD Name राज्य पक्षी (सरकारी)
Chhattisgarh छत्तीसगढ Hill myna पहाड़ी मैना
Meghalaya मेघालय Hill myna पहाड़ी मैना
पहाड़ी मैना (Hill myna)  Scientific Name Gracula religiosa peninsularis
वैज्ञानिक नाम  ग्रेकुला रेलिगीओसा पेनिनसुलारिस 
 

पहाड़ी मैना ज़्यादातर पहाड़ी इलाको में रहना पसंद करते हे।

ये पक्षी लम्बे समय तक जोड़ा बनाकर रहते हे और बच्चो का पालन पोषण दोनों साथ मिलकर करते हे।

 


 

STATE राज्य STATE BIRD Name राज्य पक्षी (सरकारी)
Goa गोवा Flame-throated bulbul बुलबुल
Flame-throated bulbul (बुलबुल) Scientific Name Pycnonotus gularis
sarkari pakshiyon ke naam वैज्ञानिक नाम  पिकनोनोटुस गुलारिस 
बुलबुल पक्षी अपनी सुरीली आवाज के लिए प्रस्सिद्ध है| केवल नर बुलबुल ही गाता है, मादा बुलबुल नहीं गा पाती है।

 


Greater Flamingo (राजहंस)

 ➡ Sarkari Pakshiyon Ke Naam

STATE राज्य STATE BIRD Name राज्य पक्षी (सरकारी)
Gujarat गुजरात Greater flamingo राजहंस
Greater Flamingo (राजहंस) Scientific Name Phoenicopterus roseus
sarkari pakshiyon ke naam वैज्ञानिक नाम  फोनीकोप्टेरस रोसयूस
 

Greater Flamingo को उसकी सुन्दरता के कारण राजहंस कहा जाता है| राजहंस यह फ्लेमिंगो प्रजाती में पाया जाने वाला सबसे बड़े आकार का पक्षी है|

 


 

STATE राज्य STATE BIRD Name राज्य पक्षी (सरकारी)
Haryana हरियाणा Black francolin काला तीतर
Black francolin (काला तीतर) Scientific Name Francolinus francolinus
वैज्ञानिक नाम  फ्रैंकोलिनस फ्रेंकोलिनस
 

Black francolin (काला तीतर) पहले Black Partridge (ब्लैक पार्ट्रिज) के नाम से जाना जाता था।

हरियाणा के इस राज्य पक्षी को स्थानीक लोग काला तीतर नाम से बुलाते है |

 


जुजुराना एक दुर्लभ पक्षी

➡ Sarkari Pakshiyon Ke Naam

STATE राज्य STATE BIRD Name राज्य पक्षी (सरकारी)
Himachal Pradesh हिमाचल प्रदेश Western tragopan जेवर, जुजुराना
Western tragopan (जेवर, जुजुराना) Scientific Name Tragopan melanocephalus
वैज्ञानिक नाम  ट्रगोपैन मेलानोसेफालस
 

जुजुराना यह एक दुर्लभ पक्षी है |

हिमाचल प्रदेश सरकार ने लगभग एक दशक पहले मोनाल पक्षी के बजाय जाजुराना को राज्य पक्षी घोषित किया था ताकि इस दुर्लभ पक्षी का संरक्षण किया जा सके।

 


 

STATE राज्य STATE BIRD Name राज्य पक्षी (सरकारी)
Jharkhand झारखंड  Asian Koel कोयल
*Puducherry *पुदुच्चेरी  Asian Koel कोयल

*पुदुच्चेरी पहले पॉन्डिचेरी नाम से जाना जाता था |

Asian Koel (कोयल) Scientific Name Eudynamys scolopacea
वैज्ञानिक नाम  यूडीनामिस स्कोलोपेसिया
 

एशियाई कोयल यह माध्यम आकार का लम्बी पूँछ वाला पक्षी है| यह सुरीली आवाज का स्वामी होता है | इसकी सुरीली आवाज सबका मन मोह लेती है |

यह पक्षी कभी भी अपना घोसला नहीं बनाता और अपने अंडे अन्य पक्षियों के घोंसले में रख देता है |

 


 

STATE राज्य STATE BIRD Name राज्य पक्षी (सरकारी)
Madhya Pradesh मध्य प्रदेश Indian paradise flycatcher दूधराज
Indian paradise flycatcher दूधराज, सुल्ताना बुलबुल Scientific Name Terpsiphone paradisi
sarkari pakshiyon ke naam वैज्ञानिक नाम  टेरसिपोन परादिसी 
 

दूधराज मध्य प्रदेश का राजपक्षी है। यह सुल्ताना बुलबुल या एशियाई दिव्यलोकी कीटमार के नाम से भी पहचाना जाता है|

यह पक्षी माध्यम आकार का होता है | इसकी रक्षा के लिए मध्य प्रदेश में संरक्षित क्षेत्र बने हुए हैं।

 


 

STATE राज्य STATE BIRD Name राज्य पक्षी (सरकारी)
Maharashtra महाराष्ट्र Yellow-footed green pigeon हरियाल
Yellow-footed green pigeon (हरियाल) Scientific Name Treron phoenicoptera
sarkari pakshiyon ke naam वैज्ञानिक नाम  ट्रेरन फॉनीकॉप्टेरा
 

हरियाल महाराष्ट्र राज्य का राज्यपक्षी है| यह होला (Hola) नाम से भी जाना जाता है|

हरियाल पक्षी के बारे में कहा जाता है कि यह कभी जमीन पर नहीं बैठता|

 


 ➡ Sarkari Pakshiyon Ke Naam

STATE राज्य STATE BIRD Name राज्य पक्षी (सरकारी)
Manipur मणिपुर Mrs. Hume’s pheasant धारीदार पूँछ वाला तीतर
Mizoram मिज़ोरम   Mrs. Hume’s pheasant धारीदार पूँछ वाला तीतर
Mrs. Hume’s pheasant धारीदार पूँछ वाला तीतर Scientific Name Syrmaticus humiae
वैज्ञानिक नाम  सिरमाटीकस हुमिए 
धारीदार पूँछ वाला तीतर भारतीय राज्य मणिपुर और मिज़ोरम का राज्य-पक्षी है |

इस पक्षी को मणिपुरी भाषा में नांगयिन और मिज़ो भाषा में वावु नाम से जाना जाता है।

 


 

STATE राज्य STATE BIRD Name राज्य पक्षी (सरकारी)
Nagaland नागालैंड Blyth’s tragopan हुरहुरिया
Blyth’s tragopan-हुरहुरिया Scientific Name Tragopan blythii
वैज्ञानिक नाम  ट्रैगोपान ब्लिथी 
 

नागालैंड के इस राज्य-पक्षी को हुरहुरिया,सान सुरई, आघा, आओघो इस नाम से जाना जाता है|

इस पक्षी की आबादी निरंतर घटती जा रही है| यह पक्षी तीतर के परिवार से ताल्लुक रखता है। 

 


 

STATE राज्य STATE BIRD Name राज्य पक्षी (सरकारी)
Punjab पंजाब Northern goshawk उत्तरी बाज
Northern goshawk    (उत्तरी बाज, वनबाज) Scientific Name Accipiter gentilis
sarkari pakshiyon ke naam वैज्ञानिक नाम  एक्सीपीटर जेंटिलिस
 

उत्तरी बाज यह एक छोटे आकार का धारीदार बाज़ है |

यह बाज़ घने जंगलों में रहना पसंद करता है| इस बाज़ को वनबाज भी कहते है |

 


Great Indian bustard (सोन चिरैया )

➡ Sarkari Pakshiyon Ke Naam

STATE राज्य STATE BIRD Name राज्य पक्षी (सरकारी)
Rajasthan राजस्थान  Great Indian bustard गोडावण, सोन चिरैया
Great Indian bustard (गोडावण, सोन चिरैया ) Scientific Name Ardeotis nigriceps
sarkari pakshiyon ke naam वैज्ञानिक नाम  अर्डोटिस नाइग्रिसेप्स 
यह सोन चिरैया पक्षी द ग्रेट इंडियन बस्टर्ड, हुकना, गुरायिन, गोडावण या शर्मिला पक्षी इन नाम से जाना जाता है |

यह पक्षी बड़े आकार का होता है | इनकी संख्या भारत में सिर्फ 150 बची है और यह पक्षी अब विलुप्ती के कगार पे खड़ा है| 

 


 

STATE राज्य STATE BIRD Name राज्य पक्षी (सरकारी)
Sikkim सिक्किम Blood pheasant रक्त तितर 
Blood pheasant        (रक्त तितर) Scientific Name Ithaginis cruentus
वैज्ञानिक नाम  इथागिनिस क्रुएंटस
 

इस पक्षी को सिक्किम में समे, सेमो और सूमोंग फो के नामों से जाना जाता है| नेपाली भाषा में चिल्मिआ, चिल्मे, स्क्रीमन तथा सेलमुंग कहा जाता है |

इस पाक्षिका कोइ हिंदी नाम उपलब्ध नहीं है|

 


 

STATE राज्य STATE BIRD Name राज्य पक्षी (सरकारी)
Tamil Nadu तमिलनाडु Emerald dove पन्ना कबूतर
Emerald dove  (पन्ना कबूतर) Scientific Name Chalcophaps indica
sarkari pakshiyon ke naam वैज्ञानिक नाम  चालकोपह्याप्स इंडिका
 

यह कबूतर की प्रजाति का पक्षी है।

यह हरा कबूतर या हरित-पक्ष-कबूतर, हरे पंख वाला कबूतर, कॉमन इमेराल्ड डव, इंडियन इमेराल्ड डव, ग्रे कैप्ड इमेराल्ड डव आदि नामों से जाना जाता है।

इस पक्षि की विशेषता यह है की अपने  कबूतरग्रंथि से चूजों को दूध पिलाता है|

 


 

STATE राज्य STATE BIRD Name राज्य पक्षी (सरकारी)
Tripura त्रिपुरा Green imperial pigeon हरा शाही कबूतर
Green imperial pigeon (हरा शाही कबूतर) Scientific Name Ducula aenea
वैज्ञानिक नाम  डूकुला एनीआ
 

हरा शाही कबूतर यह जंगल में पाया जानेवाला बड़े आकार का कबूतर की प्रजाति का पक्षी है।

दिखने में खूबसूरत यह कबूतर पेड़ पर छोटे लकडियो से यह घरोंदा बनाता है| यह एक अंडा देता है |

 


 

STATE राज्य STATE BIRD Name राज्य पक्षी (सरकारी)
Uttar Pradesh उत्तर प्रदेश Sarus crane सारस, सारस क्रौंच
(सारस, सारस क्रौंच)     Sarus crane Scientific Name Grus antigone
वैज्ञानिक नाम  ग्रस एंटीजन
 

सारस यह उत्तर प्रदेश का राज्य पक्षी ही जिसे क्रौंच नाम से भी जाना जाता है |

यह पक्षी उसके जीवन काल में सिर्फ एक बार ही जोड़ा बनाता है और पूरे जीवन भर साथ रहते है |

उडनेवाले पक्षियों में से यह सबसे बड़ा उड़ने वाला पक्षी है |

 


 

STATE राज्य STATE BIRD Name राज्य पक्षी (सरकारी)
Uttarakhand उत्तराखंड Himalayan monal हिमालयी मोनाल
Himalayan monal  (हिमालयी मोनाल) Scientific Name Lophophorus impejanus
वैज्ञानिक नाम  लोफोफोरुस इमपेजनुस 
हिमालयी मोनाल को डाँफेमुनाल, घुर मुनाल, रतिया कावाँ नाम से भी जाना जाता है |

यह तितर प्रजाती का पक्षी है जो आकार में तितर के मुकाबले थोडासा बड़ा होता है |

यह दिखने में बहुत खबसूरत होता है |

 


 

STATE राज्य STATE BIRD Name राज्य पक्षी (सरकारी)
West Bengal पश्चिम बंगाल White-breasted kingfisher श्वेतकण्ठ कौड़िल्ला
White-breasted kingfisher (श्वेतकण्ठ कौड़िल्ला) Scientific Name Halcyon smyrnensis
sarkari pakshiyon ke naam वैज्ञानिक नाम  हेलसीअन स्माइरेन्सिस
 

पश्चिम बंगाल ने White-breasted kingfisher (श्वेतकण्ठ कौड़िल्ला) को अपने राज्य का राज्यपक्षी घोषित किया है|

यह पक्षी आमतौर पर तालाब के किनारे और पेड़ वाले जगह पे रहना पसंद करता है|

 

Union territories
 केंद्र शासित प्रदेश

 

STATE राज्य STATE BIRD Name राज्य पक्षी (सरकारी)
Andaman and Nicobar Islands अंडमान व नीकोबार द्वीप समूह Andaman wood pigeon अंडमान वुड पिजन
Andaman wood pigeon (अंडमान वुड पिजन) Scientific Name Columba palumboides
वैज्ञानिक नाम  कोलम्बा पलुम्बिड्स
अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के
घने सदाबहार जंगलों में अंडमान वुड पिजन रहता है। इसे आप अंडमान का वन कबूतर भी कह सकते है|इसका आकार घरेलु कबूतर जितना ही होता है परन्तु इसकी पूँछ लम्बी होती है|

 


 

STATE राज्य STATE BIRD Name राज्य पक्षी (सरकारी)
Chandigarh चंडीगढ़ Indian grey hornbill भारतीय धूसर धनेश
Indian grey hornbill (भारतीय धूसर धनेश) Scientific Name Ocyceros birostris
sarkari pakshiyon ke naam वैज्ञानिक नाम  ओसीसेरोस बायरोस्ट्रिस
 

भारत में मिलनेवाले इस धनेश का शरीर धूसर (grey) रंग का होता है इसलिए इसे भारतीय धूसर धनेश कहते है |

यह एक साधारण धनेश है जो भारतीय महाद्वीप में पाया जाता है|

 


 

STATE राज्य STATE BIRD Name राज्य पक्षी (सरकारी)
Jammu and Kashmir जम्मू और कश्मीर Black-necked crane काले गले वाला सारस
काले गले वाला सारस     (Black-necked crane) Scientific Name Grus nigricollis
वैज्ञानिक नाम  ग्रस नाइग्रीकॉलिस
 

जम्मू और कश्मीर ने काले गले वाला सारस को राज्य पक्षी के रूप में घोषित किया है।

यह पक्षी माध्यम आकार का होता है | सर और गले पर काला रंग होने की वजहसे इसे काले गले वाला सारस कहते है |

 


 

STATE राज्य STATE BIRD Name राज्य पक्षी (सरकारी)
Lakshadweep लक्षद्वीप Brown noddy ब्राउन नोडी 
Brown noddy (ब्राउन नोडी) Scientific Name Onychoprion fuscatus
वैज्ञानिक नाम  ओनिकोप्रियन फ्यूस्कैटस
 

Brown noddy यह एक भूरे रंग का पक्षी है जो आमतौर पर समुद्र किनारे पर पाया जाता है |

इसे आप समुद्र पक्षी कह सकते है | 

 

Dadra and Nagar Haveli and Daman and Diu

दादरा और नगर हवेली और दमन और दीव केन्द्रशासित प्रदेशों ने अब तक अपना राज्य पक्षी घोषित नहीं किया है |

All Country Currency Name in Hindi | विश्व के सभी देशों की मुद्राओंके नाम

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All Country Currency Name in Hindi: पुरे विश्व में जितने भी देश है उनकी अपनी अपनी Currency मतलब मुद्राएँ होती है | देश में जो भी आर्थीक लेनदेन होता है वो इन मुद्राओं (currency)  के साथ होती है |

हमारे भारत देश में हम जो मुद्राएँ वस्तुओंको खरीदने बेचने के लिए इस्तेमाल करते है उसे रूपये(रूपी) कहा जाता है | वैसेही हर एक देश की अपनी-अपनी (currency) मुद्रा होती है |

आज दुनिया में 195 देश हैं | इनमेसे 193 देश United Nations के सदस्य (member) है | जो 2 देश United Nations के सदस्य नही है वो है :-

  1. Holy See 
  2. State of Palestine

आइये इस लेख में जानते है विश्व में जितने भी अलग-अलग देश है उनकी मुद्राएँ (currency) कौन -कोनसी है |

All country currency name in Hindi 

   A  

Country (देश) Currency (मुद्रा) संकेत लिपि Code चिह्न Symbol
अफगाणीस्तान  अफगाणी AFN Af
Afghanistan Afghani
अलबानिया लेक ALL L
Albania Lek
अल्जेरिया आल्जेरियन दीनार   DZD DA
Algeria Algerian Dinar
एंडोरा यूरो   EUR
Andorra Euro 
अँगोला क्वान्ज़ा, क्वन्जा    AOA   Kz
Angola Kwanza
अंटीगुआ और बर्बुडा  ईस्ट कॅरीबीयन डॉलर   XCD EC$
Antigua & Barbuda East Caribbean Dollar 
अरजेनटीना  अरजेनटीनी पेसो   ARS $
Argentina Argentine Peso 
अर्मेनिआ अरमेनियन ड्राम      ARS ֏
Armenia Armenian Dram 
ऑस्ट्रिया यूरो EUR
Austria Euro
ऑस्ट्रेलिया  ऑस्ट्रेलियन डॉलर AUD A$
Australia Australian dollar 
अज़रबैजान  अज़रबायजानी मैनट   AZN
Azerbaijan Azerbaijani manat

  B  

Country (देश) Currency (मुद्रा) संकेत-लिपि (Code) चिह्न-प्रतीक Symbol
बहामास   बहामियन डॉलर  BSD B$
Bahamas Bahamian Dollar
बहरीन  बहरीनी दीनार  BHD BD
Bahrain Bahraini dinar
बांग्लादेश  बांग्लादेशी टाका  BDT
Bangladesh Bangladeshi Taka
बारबाडोस  बारबाडोस डॉलर  BBD Bds$
Barbados Barbados Dollar
बेलारूस बेलारस्सियन रूबल   BYR BYN
Belarus Belarussian Ruble
बेलीज़  बेलीज़ डॉलर   BZD BZ$
Belize Belize Dollar 
बेल्जियम   यूरो   EUR
Belgium Euro
बेनिन वेस्ट अफ्रीकन सीफए फ्रैंक  XOF CFAF
Benin West African CFA franc
भुतान नगुलत्रुम  BTN Nu
Bhutan  Ngultrum
बोलीविया बोलिवियानो  BOB Bs
Bolivia Boliviano
बोसनिया-हेरज़ेगोविना  कनवर्टिबल मारका   BAM KM
Bosnia-Herzegovina Convertible Marka
बोट्स्वाना पुला  BWP  P
Botswana Pula
ब्राज़ील  रियल  BRL R$
Brazil Real 
ब्रूनेई दारुस्सलम ब्रूनेई डॉलर (रिन्ग्गिट) BND B$
Brunei Darussalam Brunei dollar (ringgit) 
बुलगारिया बुलगारियन लेव   BGN Lv
Bulgaria Bulgarian lev 
बुरकीना फासो वेस्ट अफ्रीकन सीफए फ्रैंक XOF CFAF
Burkina Faso West African CFA franc
 बुरुंडी  बुरुंडी फ्रैंक   BIF FBu
Burundi Burundi franc 

 C  

Country (देश) Currency (मुद्रा) संकेत-लिपि (Code) चिह्न-प्रतीक Symbol
केप वर्ड    केप वेरडीअन इस्कुडो  CVE C.V.Esc.
Cape Verde Cape Verdean escudo
कम्बोडिया    रीयल  KHR CR
Cambodia Riel
कैमरून सेंट्रल अफ्रीकन सीफए फ्रैंक XAF CFAF
Cameroon Central African CFA franc
कैनाडा   कैनेडियन डॉलर  CAD Can$
Canada Canadian Dollar
सेंट्रल अफ्रीकन रिपब्लिक सेंट्रल अफ्रीकन सीफए फ्रैंक  XAF CFAF
Central African Republic Central African CFA franc
चाड    सेंट्रल अफ्रीकन सीफए फ्रैंक XAF CFAF
Chad Central African CFA franc
चिली    चिलियन पेसो  CLP Ch$
Chile Chilean peso
चाइना रेनमिन्बी, युआन  CNY Y
China Renminbi, Yuan
कोलोम्बिया कोलोम्बियन पेसो COP Co1$
Colombia Colombian Peso
कोमोरोस  कोमोरियन फ्रैंक  KMF CF
Comoros Comorian franc
कोंगो   कांगोलीज  फ्रैंक   CDF FC
Congo Congolese franc
कोस्टा रिका कोस्टा रिकेन कोलन  CRC  C
Costa Rica Costa Rican colón
कोटे दिवोइरे वेस्ट अफ्रीकन सीफए फ्रैंक XOF CFAF
Côte d’Ivoire West African CFA franc
क्रोएशिया  कुना  HRK HRK
Croatia Kuna
क्यूबा  क्यूबा पेसो  CUP Cu$
Cuba Cuban Peso 
सायप्रस यूरो EUR
Cyprus Euro
 जेक रिपब्लिक (चेकिया)   चेक कोरुना  CZK Kc
Czech Republic (Czechia) Czech koruna

 ➡ Renminbi: Renminbi is the official currency of China where it acts as a medium of exchange, the yuan is the unit of account of the country’s economic and financial system

 💡 रेनमिनबी (Renminbi) चीन की आधिकारिक मुद्रा है, यह विनिमय के माध्यम के रूप में कार्य करता है और युआन देश की आर्थिक और वित्तीय प्रणाली के खाते की इकाई है |

 ➡ Czechia- the lands of the Czech republic.

💡 All country currency name in Hindi 💡 

  D  

Country (देश) Currency (मुद्रा) संकेत-लिपि Code चिह्न-प्रतीक Symbol
डेन्मार्क  डेनिश क्रौन DKK Dkr
Denmark Danish krone
 डीबूटी  डीबूटीअन फ्रैंक   DJF DF
Djibouti Djiboutian franc
डॉमिनिका  ईस्टर्न कैरीबीन डॉलर XCD EC$
Dominica Eastern Caribbean dollar
डोमिनिकन रिपब्लिक  डोमिनिकन पेसो DOP RD$
Dominican Republic Dominican peso
डीआर कांगो   कांगोलीज फ्रैंक  CDF FC
DR Congo* Congolese franc

DR Congo =  Democratic Republic of the Congo

  E  

Country (देश) Currency (मुद्रा) संकेत-लिपि Code चिह्न-प्रतीक Symbol
इजीप्त इजीपशीयन पौंड  EGP £E
Egypt Egyptian pound
एल साल्वाडोर यु.एस. डॉलर USD US$
El Salvador U.S. Dollar
इक्वेटोरीअल गिनी  सेंट्रल अफ्रीकन सीफए फ्रैंक  XAF CFAF
Equatorial Guinea Central African CFA franc
इरीट्रीआ  नाकफा  ERN Nfa
Eritrea Nakfa
इस्टोनिया इस्टोनियन क्रून  EEK KR
Estonia Estonian kroon
एस्वाटिनी  स्वाजी लिलानगेनी   SZL L/E 
Eswatini Swazi lilangeni 
इथोपीया इथोपीयन बिर  ETB Br
Ethiopia Ethiopian Birr 
इकुअडोर  यु.एस. डॉलर USD US$
Ecuador United States Dollar

  F  

देश अपनी मुद्राएँ बदल सकते है

बहुत से देश अपनी मुद्राएँ अपनी आर्थीक आवश्यकता के अनुसार बदलते रहते है | ऐसा आमतौर पर कम मात्रा में होता है, पर होता रहता है | 

All country currency name in Hindi

Country (देश) Currency (मुद्रा) संकेत-लिपि (Code) चिह्न-प्रतीक Symbol
फिजी फिजीअन डॉलर   FJD F$
Fiji Fijian dollar
फ़िनलैंड यूरो  EUR
Finland Euro
फ्रान्स  यूरो  EUR
France Euro

 G 

Country (देश) Currency (मुद्रा) संकेत-लिपि Code चिह्न-प्रतीक Symbol
गेबन  सेंट्रल अफ्रीकन सीफए फ्रैंक    XAF CFAF
Gabon Central African CFA franc
 गाम्बिया  डलासी   GMD D
Gambia Dalasi 
 जॉर्जिया  लारी   GEL  
 
Georgia Lari 
 जर्मनी  यूरो  EUR
Germany  Euro 
 घाना  सीड़ी   GHC ₵ 
Ghana  Cedi 
 ग्रीस  यूरो  EUR
Greece Euro 
 ग्रेनेडा  ईस्ट कॅरीबीयन डॉलर   XCD EC$
Grenada East Caribbean Dollar  
 ग्वाटेमाला  क़ुएत्ज़ल   GTQ Q
Guatemala Quetzal 
 गिनी   गिनीयन फ्रैंक GNF GF
Guinea Guinean franc 
 गिनी बिस्सौ  वेस्ट अफ्रीकन सीफए फ्रैंक  XOF CFAF
Guinea-Bissau West African CFA franc
 गयाना   गयाना डॉलर  GYD G$
Guyana
Guyana Dollar

 H 

Country (देश) Currency (मुद्रा) संकेत-लिपि Code चिह्न-प्रतीक Symbol
हैती गोअर्ड    HTG G
Haiti Gourde
होंडारूस  लेम्पीरा   HNL L
Honduras Lempira 
हंगेरी  फ़ोरिंट   HUF Ft
Hungary Forint 

 I 

Country (देश) Currency (मुद्रा) संकेत-लिपि Code चिह्न-प्रतीक Symbol
आइसलैंड   क्रोना   ISK Ikr
Iceland Króna
इंडिया  रूपी   INR
India Rupee 
इंडोनेशिया  रुपिआह   IDR Rp
Indonesia Rupiah 
ईरान  ईरानियन रियाल   IRR Rls
Iran Iranian Rial 
इराक   न्यू इराकी दीनार  NID ID
Iraq New Iraqi Dinar 
आयरलैंड   यूरो   EUR
Ireland Euro 
इजराइल   न्यू इसरायली शेकेल   ILS NIS
Israel New Israeli Shekel 
इटली   यूरो   EUR
Italy Euro 

 J  

Country (देश) Currency (मुद्रा) संकेत-लिपि Code चिह्न-प्रतीक Symbol
जमैका   जमैकन डॉलर    JMD J$
Jamaica Jamaican Dollar
जापान येन   JPY ¥
Japan Yen 
जॉर्डन   जॉरडीनिअन   JOD JD
Jordan Jordanian Dinar 

  K  

Country (देश) Currency (मुद्रा) संकेत-लिपि Code चिह्न-प्रतीक Symbol
कजाखस्तान    टेंगे   KZT n/a
Kazakhstan Tenge
केनिया   केनियन शिलिंग   KES KSh
Kenya Kenyan Shilling 
किरबाटी     ऑस्ट्रलियन डॉलर  AUD  A$ 
Kiribati Australian Dollar 
कुवैत   कुवैती दीनार   KWD KD
Kuwait Kuwaiti Dinar 
कीरगीझस्तान कीरगीझस्तानी सोम   KGS n/a
Kyrgyzstan Kyrgyzstani Som 

  L  

Country (देश) Currency (मुद्रा) संकेत-लिपि Code चिह्न-प्रतीक Symbol
लाओस किप LAK KN
Laos Kip
लाटविया   यूरो EUR
Latvia Euro 
लेबनन  लेबनीज पौंड(लिवरे)  LBP LL. 
Lebanon Lebanese Pound (Livre)
लेसोथो   लोटी   LSL L(sing.) 
M(Plu.) 
Lesotho Loti 
लिबेरिया   लिबेरियन डॉलर   LRD $
Liberia Liberian Dollar 
लीबिया   लिबयन दीनार  LYD LD
Libya Libyan Dinar 
लिकटेंस्टाइन    स्विस फ्रैंक   CHF SwF
Liechtenstein Swiss Franc 
लिथुआनिया   यूरो   EUR
Lithuania Euro 
लक्समबर्ग    यूरो  EUR
Luxembourg Euro 

  M  

Country (देश) Currency (मुद्रा) संकेत-लिपि Code चिह्न-प्रतीक Symbol
मादागास्कार मेलेगसी एरिअरी    MGA Ar
Madagascar Malagasy Ariary
मलावी   क्वाचा    MWK MK
Malawi Kwacha 
मलेशिया   मलेशियन रिन्ग्गिट    MYR  RM 
Malaysia Malaysian Ringgit
मालदीव्स   माल्दिवियन रूफिया   MVR RF or MRF 
Maldives Maldivian Rufiyaa 
माली वेस्ट अफ्रीकन सीफए फ्रैंक XOF CFAF
Mali West African CFA franc
माल्टा   यूरो   EUR
Malta Euro  
मार्शल आइलैंडस   यू. एस. डॉलर   USD  US$
Marshall Islands U. S. Dollar 
मॉरिशस   मौरिटीअन रूपी    MUR Mau Rs 
Mauritius Mauritian Rupee 
मॉरिटानिया   औगुइया   MRO UM
Mauritania Ouguiya 
मेक्सिको   मेक्सिकन पेसो   MXN Mex$
Mexico Mexican peso 
माइक्रोनेशिया   यू. एस. डॉलर  USD  US$
Micronesia U. S. Dollar 
माल्डोवा   मोल्डोवन लेउ  MDL
Moldova Moldovan Leu 
मोनाको   यूरो   EUR
Monaco Euro 
मंगोलिया   तुगरिक   MNT  ₮ 
Mongolia Tugrik
मॉन्टेंगरो   यूरो   EUR
Montenegro Euro 
मोरोक्को   मोरक्कन दिरहम   MAD DH 
Morocco Moroccan Dirham 
मोजांबिक   मेटिकल   MZM Mt
Mozambique Metical 
म्यानमार (बर्मा)  बर्मीज़ क्याट  MMK K
Myanmar (Burma) Burmese Kyat 

  N  

Country (देश) Currency (मुद्रा) संकेत-लिपि Code चिह्न-प्रतीक Symbol
नाम्बिया  नामिबियन डॉलर, साउथ अफ्रीकन रैंड    NAD, ZAR N$, R
Namibia Namibian Dollar, South African Rand
नॉरू   ऑस्ट्रलियन डॉलर   AUD  A$ 
Nauru Australian Dollar 
नेपाल    नेपालीज रूपी  NPR NRs 
Nepal Nepalese Rupee 
नेदरलैंड्स   यूरो  EUR
Netherlands  Euro 
न्यूज़ीलैण्ड   न्यूज़ीलैण्ड डॉलर  NZD NZ$ 
New Zealand New Zealand Dollar 
निकारगुआ   निकारगुअन कोरडोबा   NIO C$
Nicaragua Nicaraguan córdoba 
नायजर वेस्ट अफ्रीकन सीफए फ्रैंक XOF CFAF
Niger West African CFA franc
नायजेरिया   नाइजीरियन नाइरा   NGN
Nigeria Nigerian Naira 
नॉर्थ कोरिया   नार्थ कोरियन वोन   KPW 
North Korea North Korean Won 
नॉर्थ मेसेदोनिया   मेसीडोनियन देनार   MKD  Den
North Macedonia Macedonian Denar 
नॉर्वे   नार्वेजियन क्रौन   NOK NKr
Norway Norwegian Krone 

  O  

Country (देश) Currency (मुद्रा) संकेत-लिपि (Code) चिह्न-प्रतीक Symbol
ओमान  ओमानी  रियाल    OMR RO
Oman Omani Rial

  P  

Country (देश) Currency (मुद्रा) संकेत-लिपि Code चिह्न-प्रतीक Symbol
पाकिस्तान   पाकिस्तानी रूपी  PKR Rs
Pakistan Pakistani Rupee
पलाव   यू. एस. डॉलर   USD US$
Palau U. S. Dollar 
पनामा   बल्बोआ, U. S. Dollar PAB, 
USD 
B, 
US$
Panama Balboa, U. S. Dollar
पापुआ न्यू गिनी   किना   PGK  K
Papua New Guinea Kina 
पेराग्वे   गुअरानी   PYG
Paraguay Guaraní 
पेरू   सोल   PEN S/
Peru Sol 
फिलीपाइंस   फ़िलिपीनी पेसो  PHP
Philippines Philippine Peso 
पोलंड  पोलिश झोल्टी   PLN
Poland Polish złoty 
पोर्तुगाल  यूरो   EUR
Portugal Euro 

  Q  

Country (देश) Currency (मुद्रा) संकेत-लिपि (Code) चिह्न-प्रतीक Symbol
कतार  क़तारी  रियाल    QAR QR
Qatar Qatari Riyal(Rial)

  R  

एक देश की दो मुद्राएँ

किसी किसी देश की दो मुद्राएँ भी होती है | मतलब उस देश में दोनों मुद्राओं द्वारा आर्थीक लेन देन किया जा सकता है |

All country currency name in Hindi

Country (देश) Currency (मुद्रा) संकेत-लिपि Code चिह्न-प्रतीक Symbol
रोमानिया  न्यू लेउ   RON L
Romania New Leu
रशीया   रूबल    RUB R
Russia Ruble 
रवांडा  रवांडन फ्रैंक    RWF RF
Rwanda Rwandan Franc 

  S  

Country (देश) Currency (मुद्रा) संकेत-लिपि Code चिह्न-प्रतीक Symbol
सेंट किटस एंड नेविस  ईस्टर्न कॅरीबीयन डॉलर   XCD EC$
Saint Kitts & Nevis Eastern Caribbean Dollar
सेंट लूसिया   ईस्टर्न कॅरीबीयन डॉलर  XCD EC$
Saint Lucia Eastern Caribbean Dollar 
सामोआ   टाला WST WS$
Samoa Tala
सेन मरीनो  यूरो    EUR
San Marino Euro 
सा टोम एंड प्रिंसिपे  डोबरा   STD Db
Sao Tome & Principe Dobra 
सऊदी अरबिया सऊदी रियाल   SAR SR 
Saudi Arabia Saudi Riyal
सेनेगल  वेस्ट अफ्रीकन सीफए फ्रैंक XOF CFAF
Senegal West African CFA franc
सर्बिआ  सर्बियन दीनार   RSD  din
Serbia Serbian Dinar 
सीयाचेल्स  सीयाचेलोइस   SCR SR
Seychelles Seychellois Rupee 
सिएरा लेओन  लिऑने  SLL Le
Sierra Leone  Leone 
सिंगापुर  सिंगापुर डॉलर  SGD S$
Singapore Singapore Dollar 
स्लोवाकिया   यूरो EUR
Slovakia Euro
स्लोवेनिया  यूरो  EUR
Slovenia Euro 
सोलोमन आइलैंडस सोलोमन आइलैंड डॉलर    SBD SI$
Solomon Islands Solomon Islands Dollar 
सोमालिया  सोमाली शिलिंग   SOS So. Sh.
Somalia Somali Shilling 
साउथ अफ्रीका  रैंड   ZAR R
South Africa Rand 
साउथ कोरिया   साउथ कोरियन वोन   KRW W
South Korea South Korean Won 
साउथ सुदान   साउथ सुदानीस पौण्ड   SSP SS£
South Sudan South Sudanese Pound 
स्पेन  यूरो    EUR
Spain Euro 
श्रीलंका  श्रीलंकन रूपी   LKR SLRs
SriLanka Sri Lankan Rupee 
सैंट विन्सेंट एंड ग्रेनादिनेस  ईस्टर्न केरीबीअन डॉलर  XCD ES$
St. Vincent & Grenadines Eastern Caribbean dollar
स्टेट ऑफ़ पलेस्टाइन  इसरायली शेकेल, जोरडानियन डॉलर   ILS, 
JOD 
NIS, 
JD 
State of Palestine Israeli Shekel, Jordanian Dinar
सुदान  सुदनीज पौंड    SDD  
 
Sudan Sudanese Pound 
सुरिनेम सुरिनेम डॉलर   SRD $Sur
Suriname Suriname Dollar 
स्वीडन  स्वीडिश क्रोना   SEK Sk
Sweden Swedish Krona 
स्विट्ज़रलैंड  स्विस फ्रैंक    CHF SwF
Switzerland Swiss Franc 
सीरिया सीरियन पौन्ड    SYP £S
Syria Syrian Pound 

  T  

Country (देश) Currency (मुद्रा) संकेत-लिपि Code चिह्न-प्रतीक Symbol
तान्जानिया   तंजानियन शिलिंग  TZS TSh
Tanzania Tanzanian shilling
ताजीकिस्तान   सोमोनी  TJS  SM 
Tajikistan Somoni
थाईलैंड   बहत  THB Bht or Bt
Thailand Baht
टीमोर-लेस्ट   यू. एस. डॉलर  USD US$
Timor-Leste U. S. Dollar
टोगो वेस्ट अफ्रीकन सीफए फ्रैंक XOF CFAF
Togo West African CFA franc
टोंगा   पांगा TOP  PT or T$
Tonga Paʻanga
त्रिनिदाद एंड टोबागो   त्रिनिदाद एंड टोबागो डॉलर  TTD TT$
Trinidad and Tobago Trinidad and Tobago dollar
टूनिसिया   तुनिसियन दीनार  TND TD
Tunisia Tunisian Dinar
तुर्की   तुर्किश लिरा  TRY YTL
Turkey Turkish Lira
तुर्कमेनिस्तान   मेंनट  TMM
Turkmenistan  Manat
टुवालु   तुवालुअन डॉलर  TVD $ ($T, TV$)
Tuvalu Tuvaluan Dollar

  U  

दुनिया की ताकतवर मुद्रा 

दुनिया में दो देशों के बीच आर्थीक लेनदेन ज्यादातर यू. एस. डॉलर में होता है जो अमेरिका की मुद्रा है | अमेरिकन मुद्रा दुनिया में सबसे शक्तिशाली मुद्रा मानी जाती है | ज्यादातर दुनिया में देशों के बीच व्यवहार इसी मुद्रा में होता है | यूरोपियन देशों में यूरो भी एक शक्ति शाली मुद्रा मानी जाती है | 

All country currency name in Hindi 

Country (देश) Currency (मुद्रा) संकेत-लिपि Code चिह्न-प्रतीक Symbol
यूगांडा   युगांडन शिलिंग   UGX USh
Uganda Ugandan Shilling
यूक्रेन  रायवनीया   UAH   грн‎ 
Ukraine Hryvnia
यूनाइटेड अरब एमिरेटस  यूएइ दिरहम  AED  Dh
United Arab Emirates UAE Dirham
यूनाइटेड किंगडम  पौन्ड स्टर्लिंग  GBP £
United Kingdom Pound Sterling
यूनाइटेड स्टेट्स  यू. एस. डॉलर  USD  US$
United States U.S. Dollar
उरुग्वे  पेसो उरुगुयो   UYU  $U
Uruguay Peso Uruguayo
उज़ेबिकेस्तान  उज़ेबिकेस्तानी सोम  UZS  лв 
Uzbekistan Uzbekistani Soʻm

  V  

Country (देश) Currency (मुद्रा) संकेत-लिपि Code चिह्न-प्रतीक Symbol
वानुआटू   वाटू   VUV VT
Vanuatu Vatu
वेनेज़ुएला  वेनेज़ुएलन बोलिवर  VEB Bs
Venezuela Venezuelan Bolivar
वियतनाम  न्यू डाँग  VND
Vietnam New Dong

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kabir das biography in Hindi | कबीर दास की अलौकिक जीवनी

कबीर दास (kabir das) जी ज्ञानमार्ग शाखा के बहुत ही प्रसिद्ध कवी माने जाते है | ज्ञान मार्गी शाखा में वो कवी आते है जो इस बात में विश्वास रखते है की ज्ञान के जरिये हे आप इश्वर को या मोक्ष को प्राप्त कर सकते है |

कबीर हिंदी साहित्य के भक्ति काल के एकलौते ऐसे कवि है, जो आजीवन समाज और लोगों के बीच व्याप्त आडम्बरों पर कुठारा घात करते रहे |

इनके कहे गए साखी((काव्य प्रकार)) से उस समय के सामाजिक और धार्मिक जीवन की बहुत सारी रूढ़िवादी परंपराओं का जिक्र होता है और वो इसका भरपूर खंडन करते है |

वे कबीर दास (kabir das), कबीर साहब और संत कबीर नामों से प्रसिद्द थे |


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वैसे देखा जाये तो आज कबीर से जूडी घटनाओंका प्रमाण तो नहीं मिलता लेकिन जन श्रुतियों में वो हमेशा मौजूद रहे है और हमारे बोलचाल में भी |

kabir das
Kabir Das

कबीर दास((kabir das) जी की जन्म कहानी

कबीर दास जी का जन्म 1398 ई. में काशी में हुआ | काशी एक प्रसिद्द तीर्थ स्थल है |

कहा जाता है की संत कबीर दासजी का जन्म विधवा ब्रह्मणी के गर्भ से हुआ था | विधवा ब्रह्माणी ने लोक लाज के डर से इन्हें जन्म के बाद उत्तरप्रदेश के वाराणसी जिल्हे में काशी शहर के अन्दर एक लहर तारा तालाब है, उस तालाब के सिडीयों पर इन्हें छोड़ गयी थी |

एक लोक वन्दता यह भी है की संत कबीर दास इस लहरें तालाब के एक कमल पुष्प पर बालक के रूप में अवतरीत हुए थे |

 ➡  काशी का नीरू नाम का जुलाहा अपनी नई नवेली दुल्हन नीमा का गौना कराकर ससुराल से वापस आ रहा था | मार्ग में तालाब देखकर दोनों कुछ देर तक विश्राम के लिए रुक गये, तभी उन्हें नवजात बालक की किलकारियाँ सुनाई दी |

जब वे आवाज की और गए, तो तो वहां के दृश्य को देखकर आचम्भित हो गए | उन्होंने देखा एक सुकोमल शिशु किलोल कर रहा था | नीमा अपने ह्रदय में उठ रहे स्नेह को रोक न सकी और आगे बढ़कर उसने बालक को उठाकर अपने ह्रदय से लगा लिया |

kabir das
Kabir Das

चारों तरफ कोइ भी नजर नहीं आ रहा था इसिलए उन्होंने बालक को अपने पास रख लिया | जुलाहा दम्पती ने इस बच्चे का नाम ‘कबीर’ रख दिया | जुलाहा दम्पती मुसलमान धर्मीय थे |

 

संत कबीर दास जी की पौराणीक जन्म कथा 

सवंत 1455 जेष्ठ पूर्णिमा दिन सोमवार के मांगलिक ब्रह्म मुहूर्त की बेला थी | लहर तालाब तट पर स्वामी रामानन्द जी के शिष्य अष्टानंदजी ध्यान में बैठे थे | अचानक उनकी आँखे खुल गई | गगन मंडल से एक दिव्य प्रकाश पुंज तालाब में  पूर्ण विकसीत पुष्प कमल पर उतरा |

क्षण मात्र में वह प्रकाश पुंज बालक के रूप में परावर्तीत हो गया | स्वामी अष्टानंदजी इस अलौकीक बात को समझ न सके | इस घटना का अर्थ जानने वे अपने गुरु रामानन्दजी के पास चले गए |

गगन मंडल से उतरे, सद्गुरु सत्य कबीर | जलज माहीं पौढन किये, सब पिरन के पीर ||

लहर तालाब के निकट से गुजरने वाले नीरू और नीमा नाम के जुलाहे दम्पती को कमलपुष्प पे इस बालक के दर्शन हो गए | उन्होंने चारों तरफ देखा बालक के साथ कोइ भी नहीं दिखा | वे सोच में पड गए यह तेजस्वी बालक किसका है | तब बाल स्वरुप सद्गुरु स्वयं बोल उठे :

हम अविगत से चली आये, कोइ भेद भरम ना पाए ; न हम जन्मे गर्भ बसेरा, बालक होय दिखलाये |            काशी शहर जलज बीच डेरा, तहाँ जुलाहा पाये ; अगले जनम हम कौल किये थे, तब नीरू घर आये || 

kabir das
kabir das

वचन सुनकर दोनों बालक को घर ले गये | इन्हें अपनाकर कर पालन पोषण किया | आगे चलकर के वही छोटा बालक भारतवर्ष में  कबीरदास नाम से प्रसिद्ध हुआ |

भले ही कबीर जी का जन्म एक हिन्दू परिवार में हूआ हो  परन्तु इनका पालन पोषण एक मुस्लिम परिवार ने किया | तो इस तरह से वे एक हिन्दू भी थे और मुसलमान भी |

कबीर दास (kabir das) से जूडी तमाम बहस अपने जगह मौजूद है | कहीं कहीं इस बात का जिक्र आता है कबीर जी का जन्मस्थान काशी नहीं बल्की बस्ती जिल्हे का मगहर और कहीं आजमगढ़ जिल्हे का बेलहरा गाव है |

 

परिवार

इनके परिवार के बारे में स्थिती स्पष्ट नहीं है | कोइ नहीं जानता उनका परिवार कहाँ से सम्बन्ध रखता था या उनके असली माता पीता कौन थे ?

कहां जाता है  की संत कबीर जी के पत्नी का नाम लोई था |

इनके पुत्र का नाम कमाल तथा पुत्री का नाम कमाली था | 

कहते है कबीर पेशे से बूनकर थे और वह उपजीविका के लिए कपडा बुनने का काम करते थे |

कहा जाता है कबीरजी ने लम्बी-लम्बी यात्रायें की: आईने अकबरी किताब के अनुसार कबीर देश भर में खूब घूमे | कुछ दिन वो जग्गनाथ पूरी में भी रहे |

कबीर को दिल्ली के सुलतान सिकंदर लोधी के काल का माना जाता है |

 

कबीर के गुरु कौन थे ?

काशी में जिस समय कबीर जी के दोहों ने उथल पुथल मचाई थी उस समय वहां स्वामी रामानंद का बड़ा मान था |

स्वामी रामंनद के बारह शिष्य बताये जाते है | जिनमे कबीर दास जी एक थे | कबीर ने एक जगह अपने दोहे में कहा हैं | काशी में हम प्रकट भये रामानंद चेताये |” 

आमतौर पर स्वामी रामंनद जी को ही कबीर का गुरु माना जाता है |

 ➡  कबीर के गुरु कौन थे इसको लेकर इतिहासकारों में थोडा संदेह है | एक बड़ा तबका है जो स्वामी  रामानन्द को कबीर का गुरु मानता है | 

कई लोग ऐसा मानते है की कबीर ‘निगुरा’ थे मतलब बिना गुरु के | कबीर जी ने एक दोहे में कहा है “आप ही गुरु आप ही चेला ” मतलब आप स्वयंम अपने आपके शिष्य भी हो और गुरु भी हो | 

तो कई लोग ऐसा मानते है की उन्होंने वैष्णव पीताम्बर पीर को अपना गुरु माना था | तो और एक परंपरा के अनुसार शैख़ ताकी को कबीर का गुरु माना गया है |

 

जाती प्रथा के विरोधी संत कबीर दास (कथा) 

कबीर जी धार्मिक भेद-भाव और जातपात के घनघोर विरोधी थे | उनके बारें में एक दंतकथा प्रचलीत है | 

   दक्षिण भारतीय तोताद्री मठ के निमंत्रण पर रामानन्दजी वहां पहुँच गए | कबीर भी एक भैंसे पर झोली आदी लाद अपने सभी वर्णों (भिन्न जाती और धर्मों के लोग) के संत भक्तो के साथ थे |  

तोताद्री मठ में जाती प्रथा थी | मठ के आचार्य चिंता में पड गए की सबको साथ में कैसे बीठाया जाय ? तब निर्णय लिया गया की जो वेद मन्त्रों का सस्वर उच्चारण करेंगे वही संत भक्तो पंडितों के साथ प्रथम पंक्ती में भोजन करने बैठेंगे |

तब कबीर बोले “वेद मन्त्र तो हमारा भैंसा भी पढ लेता है” | उन्होंने भैंसे के पीठ पर जैसे ही हाँथ रखा भैंसा सस्वर अर्थ सहीत वेद मंत्र का उच्चारण करने लगा | 

kabir das
Saint Kabir Das

आचार्य पंडीत अपनी जातिवादी, भेद भाव वाली सोच पे लज्जित हो गए, उन्होंने संत कबीर से क्षमा माँग ली और सभी ने एक साथ मिलकर भोजन किया |

 

सर्व ज्ञानी कबीर 

कबीर दास (kabir das) अनपढ़ थे | वे कभी भी किसी विद्यालय नहीं गए और नाहीं इन्होने कभी किसी गुरुसे कोई शिक्षा ली |

इन्होने अपने आसपास के जीवन से जो कुछ भी सिखा वो साखी(काव्य प्रकार) के रूप में या दोहों के रूप में प्रस्तुत किया जो की उनके शिष्यों द्वारा बाद में लेखांकीत किया गया |

कबीर जी की सारी रचनाएँ कबीर ग्रंथावली में संकलित है | ये क्रांतदर्शी के कवि थे जिनके कविता से गहरी सामाजिक चेतना प्रकट होती है |

यह कीताबी ज्ञान से ज्यादा अनुभव के द्वारा प्राप्त कीये ज्ञान को ज्यादा महत्व देते है | क्यों की कबीर जगह जगह घूमकर प्रत्यक्ष ज्ञान प्राप्त करते थे

साखी यह कबीर द्वारा लिखे गये कविताओंका संग्रह है | साखी का अर्थ है प्रत्यक्ष ज्ञान | इन् दोहों में कई बोलियाँ जैसे राजस्थानी, भोजपुरी, पंजाबी , अवधि, फारसी, अरबी आदी का मिश्रण है | उनकी भाष को सधुकड्डी या पंचमेल खिचडी भी कहा जाता है |

साखी शब्द का अर्थ होता है साक्षी अर्थात गवाह |

कबीर दासजी के हर एक दोहे में एक अद्भुत ज्ञान मिलता है |उनके द्वारा जो कुछ भी कहां गया उन कथनों को, उनकी सारी कविताओंको बीजक नाम के ग्रंथ में लिखा गया जिसके तीन हिस्से है | साखी, सबद और रमैनी |

कबीर दास के साहित्य 

कबीरदास जी की शिक्षा के बारे में इतिहासकारो का यह मत है कि आपने किसी भी विद्यालय से शिक्षा ग्रहण नहीं की थी और आप अनपढ़ थे| कबीर स्वयं अपने दोहे में कहते है ➡ 

“मसि कागद छूऔं नहीं, कलम गहौं नहि हाथ |चारों जुग कै महातम कबिरा मुखहिं जनाई बात ||”

आपने अपनी रचनाओं को स्वयं लिपिबद्ध नहीं किया था | आपकी रचनाओं को ‘धर्मदास’ जी ने संग्रहित किया था और इस संग्रहण को ‘बीजक’ कहा जाता है

कबीर के रचनाओंके संकलन में, ‘बीजक’ इनका एक बहुत ही महत्त्व पूर्ण संकलन है |  

 ➡  बीजक के तीन भाग हैं,जोकि अग्रलिखित हैं-

 ➡ साखी शब्द संस्कृत के शब्द “साक्षी” का रूप है| साखी दोहा छंद में लिखा गया है | साखी एक तरह से कहे तो एक दोहा छंद है | जिनमे तेरह और बारह माँत्राओंके के आधार पर गनणा की जाती है |

 ➡  सबद में कबीर दास जी के गेय पद संग्रहित किए गए हैं | सबद में पूरी संगीतात्मकता विद्यमान है| इन्हें गाया भी जा सकता है |

रमैनी चौपाई एवं दोहा छंद में रचित है, इसमें संत कबीर के रहस्यवादी एवं दार्शनिक विचारों को प्रकट किया गया है|

 

कबीर दास की साहित्यिक विशेषताएं

कबीर दास जी ने अपने काव्य में रहस्यवादी भावना का समावेश किया है | उनके काव्य खंड में बहुत तरह के उस समय के सामाजीक और धार्मिक परंपराओंका रहस्य छीपा हमें नजर आता है | 

कबीर के काव्य का विषय समाज में चली आ रही बुरी रितियों के प्रती लोगों में जागृती करना एवम धार्मिक और सामाजीक बुराईयोंका खंडन करना था | 

इनके जितने भी दोहे और साखियाँ  हम पढ़ते है उनमे उस वक्त समाज में पाए जाने वाले आडम्बरो, जातपात और कुरीतियों पर इनके द्वारा कडा प्रहार किया गया है | 

कबीर किसी भी तरह के जात-पात और भेद-भाव में विश्वास नहीं रखते थे | उनके अनेक दोहों में हमें इसकी साक्ष मिलती है | जैसे  “जाति पाती पूछे नहि कोई, हरिको भजे सो हरि को होई |”

 

लोकप्रिय संत और कवी

सामान्य जन मानस में संत कबीर दास कवी के रूप में काफी लोकप्रिय थे | इसकी वजह थी उनकी भाषा शैली | उनके भाषा शैलीने उस वक्त सामान्य जन को प्रभावित किया था और आज ईतने सालों के बाद भी उनकी काव्य की भाषा शैली लोगों को प्रभावित कर रही है |

कबीर की काव्य भाषा आसपास के माहोल से मिली जुली भाषा है जिसे सामान्य लोग रोज की बोली भाषा में प्रयोग किया करते थे | साहित्यकार इस भाषा को ‘सधुक्कड़ी’ कहते है |

सधुक्कड़ी पंचमेल मतलब लगभग पांच भाषाओंका मिश्रण है | इस भाषा में अवधी, राजस्थानी, पंजाबी, पूर्वी हिंदी और ब्रज आदी भाषाओंका मिश्रण है |

इनकी कवितायेँ लोगोंको जीवन जीने की कला सिखाती है | इन्होने अपनी कविताओं द्वारा धार्मिक अवडम्बरों पर और समाज के कुरीतियों पर चोट की है |

 

kabir das
kabir das
धर्मनिरपेक्ष संत 

कबीर जी हिन्दू मुसलमान का भेद नही मानते थे |

कबिर को बचपन से ही हिन्दू एवं मुस्लिम दोनों सम्प्रदायोंके संस्कार विद्यमान थे इसीके कारण वे दोनों धर्मों के लोगों में लोकप्रिय थे, दोनों धर्मों के लोगों के बीच उनका विशेष स्थान था |

कबीर जाती बंधन को तोड़ने की बात आज से ६०० साल पहले करते थे | न हिन्दू ना मुस्लमान की घोषणा करने वाले कबीर भारत वर्ष के पहले कवी थे जिन्होंने धर्म निरपक्ष  समाज की मांग अपेक्षा की थी |

वैसे कबीर को इस बात से कोइ फर्क नहीं पड़ता की उनके पालन पोषण करने वाले कौन थे, वो मुसलमान थे या हिन्दू, तुर्क थे या सनातनी ये सवाल कबीर के लिए महत्व नहीं रखता था | पर समाज के क्या चल रहा था और क्या चलता आ रहा था इसको लेकर कबीर किसको छोड़ने वाले नहीं थे |

जब कबीर जी का देहांत हुआ तब हिन्दू कहते थे कबीर साहब हमारे है और मुस्लमान कहते रहे वो हमारे है |

पर जबकी असलीयत यह है की कबीर ने जीवन भर दोनों धर्मो के आडम्बरों पर तीखा प्रहार किया था | और उन्होंने अपने दोहे में इस बात का जिक्र भी क्या था |

हिंदु कहूँ तो मैं नहीं मुसलमान भी नाहि |
पंच तत्व का पूतला गैबी खेले माहि ||

मैं न तो हिन्दु हू अथवा नहीं मुसलमान। इस पाच तत्व के शरीर में बसने वाली आत्मा न तो हिन्दु है और न हीं मुसलमान | 

 

कबीर दास की मृत्यु 

कबीर जी को १२० वर्षोंकी लम्बी आयु प्राप्त हुयी | उनकी मृत्यु 1518 इसवी में महनगर हुई |

ऐसा माना जाता है कि जीवन के अंतिम समय में आप काशी से मगहर चले गए थे, क्योंकि उस समय लोगों में यह धारणा प्रचलित की जिस व्यक्ती की मृत्यु काशी में होती है उसे स्वर्ग की प्राप्ति होती है और जिसकी मृत्यु मगहर में होती है उसे नरक की प्राप्ति होती है|

कबीरजी का कहना था अगर आपके कर्म अच्छे हो तो आपकी मृत्यु भले ही मगहर में हो आप को स्वर्ग प्राप्ती जरूर होगी | अगर आपके कर्म बूरे हैं और आप काशी जैसे पवित्र क्षेत्र में मरते हैं तो भी आपको नरक में ही जाना होगा | 

एक मत (वन्दता) यह भी है की काशी के काजी, कोतवाल, पंडित उनसे नाराज थे इसलिए वह उनको परेशान किया करते थे | इसीसे त्रस्त होकर उन्होंने अपने अंतिम समय में काशी छोड़ने का फैसला किया और मगहर चले गए |

जिस प्रकार कबीर के जन्म के संबंध में अनेक मत हैं उसी प्रकार उनके मृत्यु के संबंध में भी अनेक मत प्रचलित हैं, अनंतदास जी के अनुसार आपकी मृत्यु सन 1518 ईस्वी में हुई थी और आपका जीवन काल 120 वर्षों का था|

 

संत कबीर की मजार और समाधी 

उत्तरप्रदेश  के संत कबीर नगर का  ‘मगहर’ एक क़स्बा है जहा कबीर की मजार भी है और समाधी स्थल भी है |

यहाँ हर साल माघ शुक्ल दशमी से माघ पूर्णिमा तक मेला एवम संत समागम समारोह आयोजीत किया जाता है |इसमें देश विदेशसे लाखों की संख्या में श्रद्धालु यहाँ आते है |

कबीर के माता पीता नीरूऔर नीमा की समाधी उत्तरप्रदेश के ‘वाराणसी’ में है |

 

कबीर जयंती

आज 600 साल बाद भी कबीर की विरासत जीवित है और कबीर पंथ (“कबीर का पथ”) के माध्यम से जारी है, एक धार्मिक समुदाय जो उसे अपने संस्थापक के रूप में पहचानता है और संत मत पंथों में से एक है। इसके सदस्यों को ‘कबीर पंथी’ के नाम से जाना जाता है |

ऐसा माना जाता है कि महान कवि संत कबीर दास का जन्म ज्येष्ठ के महीने में पूर्णिमा के दिन में हुआ था |इसीलिए संत कबीर दास जयंती या जन्मदिन हर साल पूर्णिमा में उनके अनुयायि और प्रेमि बड़े उत्साह के साथ मनाते है |

200 Best Kabir Ke Dohe | कबीरदास जी के अद्भूत 200 दोहे अर्थ सहित

KABIR KE DOHE कबीरदास ज्ञानमार्गी शाखा के प्रतिनीधी कवि माने जाते है |  कबीर का जन्म 1399 ई. में काशी में हुआ | कहां जाता है कि इनका जन्म एक विधवा ब्राह्मणी के गर्भ से हुआ था और वह लोक-लाज के डर से कबीर को लहरतारा नामक तालाब के निकट छोड़ आई थी |

कबीर को नीमा और नीरू जुलाहा दम्पंती ने स्वीकारा और इनका पालन पोषण किया | इसीलिए हिन्दू-मुसलमान दोनों के संस्कार इनके जीवन में विद्यमान है |

कहां जाता है इनके पत्नी का नाम लोइ था जिससे उनको कमाल और कमाली दो संताने थी |

कबीरजी के गुरु रामानंद थे | कबीर जी की मृत्यु 1495 ई. में महनगर में हुई |

कबीर अनपढ़ थे | उनके शिष्यों ने उनके दोहों को लिखित स्वरुप में संग्रहीत करके रखा था |


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कबीरदासजी की जानकारी  [ Kabir Das information ]
जन्म १३९८ वाराणसी (काशी)
मृत्यु १५१८ मगहर (उत्तर प्रदेश)
माता पीता  अज्ञात, नीमा तथा नीरू द्वारा पालन-पोषण 
गुरु  रामानंद 
पत्नी लोई 
पुत्र  कमाल 
पुत्री  कमाली 
भाषा सधुक्कड़ी(पंचमेल) अवधी, मगधी, भोजपुरी आदी तरह की भाषओंका मेल  
कार्य (रचनाएँ)  साखी, सबद,रमैनी 

 

Kabir ke dohe
Kabir Das

संत कबीर हिंदी साहित्य काल के इकलौते ऐसे कवी है जिन्होंने जीवन भर समाज में पाए जाने वाले अवडम्बरों के खिलाफ अपनी आवाज उठाई थी और समाज में पाए जाने वाले कुप्रथाओं पर अपने दोहों के माध्यम से कड़ा प्रहार किया था |  

 KABIR KE DOHE 

पहला दोहा

धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय |
माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय ||

[शब्द का अर्थ- माली-बागवान, सींचे-पानी देना ]

भावार्थ-  किसी भी ध्येय को प्राप्त करने के लिए हमे सब्र की जरूरत होती है | हमने किसी चीज़ की कामना की तो वह कभी भी तुरंत प्राप्त नहीं होती है | उसे प्राप्त करने के लिए हमें कड़े मेहनत, धीरज और परिश्रम की जरूरत होती है |

जिस तरह से किसी बाग़ का माली अगर पेड़ को एक साथ सौ घड़ा पानी अर्पण करता है तो भी उस पेड़ को फल ॠतु आने पर ही लगते है | कितने भी घड़े पानी से पेड़ को सींचे, जिस तरह से उसे ॠतु आने से पहले फल नही लग सकते कबीर कहते है उसी तरह से कोइ भी कार्य धीरे धीरे ही सफल होता है |



 

दुसरा दोहा

धर्म किए धन ना घटे, नदी न घटे नीर |
अपनी आंखन देख लो, कह गये दास कबीर || 

[शब्द का अर्थ:- घटे-कम होना, नीर–जल,पाणी, आंखन-आँख]

भावार्थ- कबीर जी कहते है, जो व्यक्ती धर्म के लिए, समाज के परोपकार के लिए अपने धन को खर्च करता है उसका धन, उसकी प्रसिद्धी, लोकप्रियता कभी भी कम नहीं होती, उल्टा उसके धन, उसकी प्रसिद्धी, लोकप्रियता में निरंतर वृद्धी ही होती है | जिस तरह से नदी अपने जल से अगणीत लोगो की प्यास बुझाकर भी उसके जल का भंडार में कमी नहीं होती |  

अर्थात अच्छे कर्म हमेशा मनुष्य के उन्नती में सहायक होते है | अच्छे कर्मोंका फल हमेशा अच्छा ही होता है |



KABIR KE DOHE

तिसरा दोहा

रात गंवाई सोय के, दिवस गंवाया खाय |
हीरा जन्म अमोल सा, कोड़ी बदले जाय ||

[शब्द का अर्थ:- सोय-सोना, नींद, खाय-भोजन करना]

भावार्थ- हमे हिरे जैसा अनमोल जीवन मिला है इसे अगर हम रात भर सोने में और दिनभर सिर्फ खाते हुए गुजार देंगे तो यह जीवन व्यर्थ हो जायेंगा | हमें इस हीरे जैसे अनमोल जीवन का आदर करते हुए इसे सार्थक कर देना चाहिए, प्रभु की भक्ती करनी चाहिए, परोपकार करना चाहिए अन्यथा हमारा जीवन कवडीमोल हो जायेगा |

अर्थात इश्वर द्वारा हमें जो ये जो जीवन दिया गया है, यह सिर्फ आराम करने के लिए नहीं दिया है | परिश्रम करके जींवन को हीरे जैसा अनमोल बनाने के लिए दिया है |



 

चौथा दोहा

माया मरी न मन मरा, मर-मर गए शरीर |
आशा तृष्णा न मरी, कह गए दास कबीर ||

[शब्द का अर्थ- माया-इच्छा, मरी-मृत्यु, तृष्णा-प्यास]      

भावार्थ- कबीर जी कहते है, मनुष्य की भले ही संपती नष्ट हो जाये, ऐश्वर्य नष्ट हो जाये, किर्ती नष्ट हो जाये या उसका अनमोल शरीर भी नष्ट हो जाये परन्तु उसकी भोग भोगने की आसक्ती, मोह, लोभ, आशा कभी भी नहीं मरती है |

मनुष्य भोग भोगने में इतना अधीर होता है, रममान होता है के उसे अपने नष्ट होने का भी डर नहीं लगता है | भोग भोगना ही उसे जीवन का उद्देश रह जाता है जो उसको विनाश की तरफ ले जाता है |



KABIR KE DOHE

पांचवा दोहा

बडा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर |
पंथी को छाया नही, फल लागे अति दूर ||

[शब्द का अर्थ- पंथी-राहगीर, मुसाफीर]

भावार्थ- समाज का प्रतिष्टित, धनवान व्यक्ती अगर लोगोंके सुख दुःख में काम नहीं आता है तो यह व्यक्ती खजूर के उस पेड जैसा ही है जो कद में बड़ा जरूर होता है, पर वह राह चलते मुसाफीर को न तो छाया प्रदान करता है और फल ऊँचाई पर होने के कारण न तो उसकी भूख मिटा सकता है |

ऐसे बड़े कद का कोइ उपयोग नही अगर वह किसीके काम न आ सके |



 

छठा दोहा

दुःख में सुमिरन सब करै, सुख में करै न कोय |
जो सुख में सुमिरन करै, तो दुख काहे होय ||

[शब्द का अर्थ- सुमिरन-याद करना, कोय-कोई, होय-होना ]

भावार्थ- जब मनुष्य के जीवन में सुख होता है, समाधान होता है ऐसे वक्त में वह प्रभु का, इश्वर का नामस्मरण करना भूल जाता है | पर जैसे ही जीवन में दुःख का प्रवेश होता है उसे इश्वर की याद आती है वह उसकी पूजा करने लगता है, नामस्मरण करता है |

र्अथात अगर सुख के दिनों में ही इश्वर का स्मरण किया जाये तो जीवन में दुःख आएगा ही नही |



 

सातवा दोहा

जैसा भोजन खाइये, तैसा ही मन होय |
जैसा पानी पीजिये, तैसी बानी होय ||

[शब्द का अर्थ- बानी-वाणी]

भावार्थ- मनुष्य अपने जीवन में जिस तरह के भोजन, पाणी आदी का समावेश करता है, उसका मन और वाणी उसी तरह की हो जाती है | अगर मनुष्य सात्विक भोजन करता है तो उसका मन और वाणी सात्विक हो जाती है | अगर अपने आहार में वह तामसी भोजन का समावेश करता है तो तामसी प्रवृती का हो जाता है | 

अर्थात जीवन में अगर आप सत्य मार्ग पर चलोगे तो सज्जन कहलाओंगे और बुराई के पथ पर चलोगे तो दुर्जन कहलओंगे |



KABIR KE DOHE

आठवा दोहा

मसि कागद छुयौ नहीं, कलम गही ना हाथ |
चारों जुग कै महातम कबिरा मुखहिं जनाई बात ||

[शब्द का अर्थ-मसी-मैंने, कागद- कागज ]

भावार्थ- कबीरजी स्वयं के बारे में कहते है के में एक फकीर हूँ जिसने औपचारिक तौर पर किसी भी तरह शिक्षा नही ली है और कभी कागज और कलम को छुआ ही नही l पर मुझे जो कुछ भी ज्ञान प्राप्त है वह सब साधू संगती का परिणाम है | मैं चारो युगों के महात्मय की बात मुहजबानी बताता हूँ |

कबीरजी ने स्वयं ग्रन्थ नहीं लिखे उनके मूँह से जो अनमोल वचन निकले उसे उनके शिष्योने लिख लिया |



 

नववा  दोहा

पाहन पूजे हरि मिले, तो मैं पूजूं पहार |
याते चाकी भली जो, पीस खाए संसार ||

[शब्द का अर्थ:- पाहन-पत्थर, हरी-इश्वर, पहार-पहाड़, चाकी-अनाज पिसने वाली चक्की]

भावार्थ- अगर पत्थर पूजने से इश्वर की प्राप्ती होती है तो में बड़े से पहाड़ को ही क्यों न पूजू इससे मुझे जल्दी से इश्वर मिल जायेगा l दरअसल कबीर यह व्यंग में कह रहे है और लोगों के कर्मकांडो पर प्रहार कर रहे है | उनका कहना है की अगर सच में पत्थर पुजके भगवान मिल जाते है तो में उस अनाज पिसने वाले चक्की के पत्थर को पुजूंगा जिससे मिलने वाले अन्न को ग्रहण करके समस्त मानव जाती का कल्याण हो जाता है |



KABIR KE DOHE 

दसवा दोहा

बुरा जो देखन मैं चला, बुरा ना मिलिया कोय |
जो दिल खोजा आपनो, मुझ सा बुरा न कोय ||

[शब्द का अर्थ:- देखन-देखने, आपनो-अपना ]

भावार्थ- में जगत में बुराई ढूँढने निकल पड़ा और मैंने सब प्रकार की बुराइयां देखी | जब मैंने अपने दिल के भीतर झाँका तो मुझे पता चला की मैंने अब तो जो भी बुराइयां देखी उससे ज्यादा बुराइयां तो मेरे अन्दर समाई हुयी है, मतलब मुझसे ज्यादा बुरा तो जगत में दुसरा कोइ नही |

तात्पर्य यह है की अगर हर मनुष्यने सबसे पहले अपने अन्दर की बुराइयां समाप्त की तो यह दुनिया अपने आप ही सुन्दर बन जायेगी |



 

ग्यारहवा दोहा

पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय |
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होयl ||

[शब्द का अर्थ :– पोथी– धार्मिक किताबे, मुआ–मृत्यु, पंडित–विद्वान, भया-हुआ, आखर–अक्षर ]

भावार्थ-  कबीर कहते है बड़ी बड़ी किताबे और ग्रन्थ जीवन में पढ़ते पढ़ते कई लोगों की मृत्यु हो गयी पर वह विद्वान अरथात पंडित बन न सके | पर अगर किसी ने सबसे प्यार करना सिख लिया तो साधारणसा व्यक्ती भी पंडीत कहलाता है |

कहने का तात्पर्य यह है की आप कितनी भी किताबे पढ़ लीजिये अगर आपके मन में प्रेम नहीं है, स्वभाव में विनम्रता नही है तब तक आपके किताबी ज्ञान का कोइ मूल्य नही | प्रेम ही आपके स्वाभाव को विनम्र बनाता है| प्रेम से ही मानव जाती का कल्याण और इश्वर प्राप्ती की जा सकती है |



 

बारहवा दोहा

एकही बार परखिये, ना वा बारम्बार |
बालू तो हू किरकिरी, जो छानै सौ बार ||

[शब्द का अर्थ :– परखिये-जांच करना, छानै- छानना, बालू-रेत ]

भावार्थ- किसी भी व्यक्ती के साथ दोस्ती करनी हो, रिश्ता बढ़ाना हो या किसी भी प्रकार का व्यवहार करना हो तो उस व्यक्ती को पहली मुलाकात में ही अच्छे तरहसे परख लेना चाहिए | उसके गुण, अवगुण, अच्छाई, बुराइयाँ को समझ लेना चाहिए |

जिस प्रकार यदि रेत को अगर सौ बार भी छाना जाए तो भी उसकी किरकिराहट दूर नहीं होती, इसी प्रकार दुर्जन व्यक्ती को बार बार भी परखो तब भी वह हमें दुष्टता से भरा हुआ ही मिलेगा | जबकि सज्जन व्यक्ती की परख एक बार में ही हो जाती है ।



KABIR KE DOHE

तेरहवा दोहा

जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान |
मोल करो तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान ||

[शब्द का अर्थ :– मोल-कीमत, तरवार-तलवार]

भावार्थ- जगत में ज्ञान महत्व रखता है न किसी व्यक्ति की जाति | किसी भी व्यक्ती की जाती से हम उसके ज्ञान का अनुमान नहीं लगा सकते और न ही किसी सज्जन की सज्नता का अनुमान | इसलिए किसी से उसकी जाति पूछना व्यर्थ है उसका ज्ञान और व्यवहार ही अनमोल होता है |

जिस तरह तलवार और म्यान में तलवार का अधिक महत्व है, क्यों की म्यान महज़ उसका उपरी आवरण होता है | उसी तरह से जाति मनुष्य का केवल एक शाब्दिक नाम है उसका ज्ञान और सज्जनता से कोइ लेनादेना नही |



 

चौदहवा दोहा

गारी ही से उपजै, कलह कष्ट औ मीच ।
हारि चले सो सन्त है, लागि मरै सो नीच ।।

[शब्द का अर्थ :– गारी-अपशब्द, गाली, उपजै-उत्पन्न होना, कलह-लड़ाई, झगडा  ]

भावार्थ- लड़ाई झगड़े, दुःख एवम् हत्या के क्रूर विचार व्यक्ति के दिलो-दिमाग में केवल किसी के कहे गए गाली-गलौच और अपशब्द के कारण ही उत्पन्न होते है | जो व्यक्ती इन सबसे हार मानकर अपना मार्ग बदलता है वही सच्चा संत हो जाता है और जो इसी दलदल में रहकर अपना जीवन व्यतित करता है, वह नीच होता है |

अर्थात मनुष्य को अगर अच्छा जीवन जीना है तो उसे लढाई झगड़े का मार्ग छोड़कर प्रभु के शरण में जाना चाहिए |



KABIR KE DOHE

पंधरहवा दोहा

ऊँचे कुल का जनमिया, करनी ऊँची न होय |
सुवर्ण कलश सुरा भरा, साधू निंदा होय ||

[शब्द का अर्थ :– जनमिया–जनम लेना, करनी-कर्म, सुरा- मद्य ]

भावार्थ- सिर्फ ऊँचे कूल में पैदा होने से कोइ ऊँचा नही कहलाता, उसके लिए कर्म भी ऊँचे होने चाहिए | जिस तरह से सुवर्ण कलश में अगर मद्य या जहर भरा होगा तो उस सुवर्ण कलश की चारों ओर निंदा ही होती है | ऐसे ही अगर ऊँचे कूल में जन्मे हुए किसी व्यक्ती के कर्म अगर अच्छे नही होते है तो वह भी समाज में निंदा का पात्र होता है |



 

सोलहवा दोहा

कबीर घास न निंदिए, जो पाऊ तली होई |
उडी पडे जब आँख में , खरी दुहेली होई ||

[शब्द का अर्थ :– निंदिए–किसीकी निंदा करना, पाऊ -पाँव, तली- नीचे, दुहेली-दर्द होना]

भावार्थ- कबीर जी कहते है के उस घास की निंदा कभी भी नहीं करनी चाहिए जो हमारे पाँव में निचे होती है | क्योंकी इसी घास का तिनका जब हवा में उडकर हमारे आँख में चला जाता है तो असहनीय दर्द होता है |

अर्थात कबीरजी का कहना है की हमें छोटी चीजों को महत्त्वहीन नहीं समझना चाहिए| जिस तरह छोटासा घास का टुकड़ा हमें दर्द दे सकता है वैसे ही हमें महत्वहीन लगने वाले लोग हमें बड़ी परेशानी में दाल सकते है |

इस दोहे में माध्यम से कबीरजी समाज में समानता का सन्देश देना चाहते है |



 

सतरहवा दोहा

जग में बैरी कोइ नहीं, जो मन सीतल होय |
या आपा को डारी दे, दया करे सब कोय ||

[शब्द का अर्थ :– मन –दिल, होय–होता है, आपा- अहंकार,घमंड, डारी दे-त्याग देना, डाल देता है, निचे कर देता है, गीरा देता है]

भावार्थ- उस मनुष्य का दुनिया में कोइ भी शत्रु या बैरी नहीं होता है जिसका मन शांत होता है, शीतल होता है | जो अपने अहंकार को त्याग देता है और हो सभी पर दया करता है |

अर्थात वही मनुष्य बिना शत्रु के होता है जिसके मन में अहंकार नही होता है | अहंकार मनुष्य को नष्ट करता है |



KABIR KE DOHE

अठरहवा दोहा

माला तो कर में फिरे, जीभि फिरे मुख माही |
मनुवा तो चहूँ दिसि फिरै, यह तो सुमिरन नाही ||

[शब्द का अर्थ :– माला-जप माला, कर-हाथ, जीभि-जीभ, जुबान, मनुवा-मन, दहूँ-दस, दिसि-दिशा, सुमिरन-स्मरण]

भावार्थ- कबीरजी कहते है की जपमाला हाथ में घूमाई जा रही है और मुख से प्रभु का नाम लिया जा रहां है | पर मन किसी और ही विचारों में डूबा हुआ है यह इश्वर का सच्चा स्मरण नही है | सिर्फ दिखावे के लिए भगवान का स्मरण नही करना चाहिए | इससे कुछ भी लाभ नहीं होता है | 

अर्थात मनुष्य जो भी काम कर रहां है वह उसे मन लगाकर करना चाहिए अन्यथा ऐसा काम का बिगड़ने की बहुत ज्यादा संभावना रहती है |



 

उन्नीसवा दोहा

काल करै सौ आज कर, आज करै सौ अब | 
पल में परलै होयगो, बहुरि करैगो कब ||

[शब्द का अर्थ :– काल-कल, परलै-प्रलय, पल-क्षण, बहुरि-शुरुआत]

भावार्थ- जो काम हमें कल करना है उसकी शुरुआत हम आज से कर सकते है | जो काम हमें आजसे करना है उसकी शुरुआत हम अभी से कर सकते है | कौन जनता है किसी भी क्षण प्रलय हो सकता है, तुम काम के शुरुआत कब करोगे |

अर्थात हमें काम को टालना नहीं चाहिए | जो काम हमें करना है उसकी शुरुआत हमें जल्द से जल्द करनी चाहिए इसीमे हमारी भलाई होती है |



KABIR KE DOHE 

बिसवा दोहा

माटी कहे कुम्हार को, तू क्या रोंदे मोहे |
एक दिन ऐसा आवेगा, मैं रोंदुंगी तोहे ||

[शब्द का अर्थ :– माटी-मिटटी, मोहे-मुझे, आवेगा-आयेगा, तोहे-तुझे]

भावार्थ- कबीरजी ने इस दोहे में जीवन का शाश्वत सत्य बताया है जो हर एक मनुष्य को मालूम होता है पर वह उसे मानने के लिए तैयार नहीं होता है | उन्होंने कुम्हार और माटी का उदाहरन लेके इस बात को समझाया है |

माटी कुम्हार को कहती है तू आज मुझे जरूर रौंद रहा है पर याद रखना इक दीन ऐसा आएगा के में तुझे रौंद दूंगी | अर्थात हे मनुष्य एक दीन तेरी मृत्यु अवश्य होने वाली है और तू मिटटी में मिल जाने वाला है इसीलिए ज्यादा अहंकार मत कर |



 

इक्कीसवा दोहा

आए हैं सो जायेंगे, राजा रंक फकीर |
एक सिंहासन चढ़ चले, एक बंधें जंजीर ||

[शब्द का अर्थ :– रंक-गरीब व्यक्ती]

भावार्थ- इस दुनिया में जो भी व्यक्ती जनम लेता है वो राजा हो, फकीर हो, अमीर हो या गरीब हो हर एक की मृत्यु निश्चित है | मृत्यु के सामने सब समान है, पर मृत्यु के पश्चात वही सिहासन पर सवार हो के जाएगा जिसने अपने जीवन में अच्छे कर्म किये है | जिनके कर्म अच्छे नहीं है उनको जंजीर में बाँध के ले जाया जायेगा|

मृत्य के पश्चात सिर्फ आपके कर्मों का हिसाब होता है आपकी दौलत, शौहरत या रुतबे का नही |



 

बाईसवा दोहा

अति का भला न बोलना, अति की भली न चूप |
अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप ||

[शब्द का अर्थ :– अति-जरूरत से ज्यादा]

भावार्थ- जरूरत से ज्यादा बोलना भी अच्छा नहीं होता और ना ही ज्यादा चुप रहना भी अच्छा होता है |  जिस तरह से ज्यादा बारिश अच्छी नहीं होती उसी तरह से ज्यादा धूप भी अच्छी नहीं होती | जीवन में हर एक क्रिया में संतुलन होना आवश्यक है तभी जीवन सुखमय गुजरता है |



KABIR KE DOHE

तेईसवा दोहा

दुर्लभ मानुष जन्म है, देह न बारम्बार |
तरुवर ज्यों पत्ता झड़े, बहुरि न लागे डार ||

[शब्द का अर्थ :– दुर्लभ-मूल्यवान, असाधारण, मानुष-मनुष्य, तरुवर-पेड़, डार-डाल, बारम्बार-बारबार ]

भावार्थ- मनुष्य का जन्म बहुत मूल्यवान है, असाधारणसा है | यह मनुष्य शरीर किसी भी व्यक्ती को बारबार नही मिलता | जिस तरह किसी वृक्ष से कोइ पत्ता झड जाता है, टूट के गिर जाता है तो वह फिर से उस डाल से जुड़ नहीं सकता | उसी प्रकार से एक बार मनुष्य के शरीर त्याग देने पर उसे मानव शरीर दुबारा नही मिलता है | 

इस संसार में मनुष्य का जन्म मुश्किल से मिलता है । यह मानव शरीर उसी तरह बार-बार नहीं मिलता जैसे वृक्ष से पत्ता  झड़ जाए तो दोबारा डाल पर नहीं लगता |



 

चौबिसवा दोहा

हाड़ जलै ज्यूं लाकड़ी, केस जलै ज्यूं घास |
सब तन जलता देखि करि, भया कबीर उदास ||

[शब्द का अर्थ :हाड़-हड्डी, जलै-जलना, ज्यूं-जैसे, तन-शरीर]

भावार्थ- मनुष्य के मृत्यु के पश्चात जब अन्त्यविधि करके उसके शरीर को जलाया जाता है l तब मनुष्य के नश्वर देह को अग्नी जलाने लगती है | उसकी हड्डियाँ किसी लकड़ी की तरह जल उठती है तो उसके बाल किसी सूखे घास की तरह जलते है | अंत समय में मानव के निचेत पड़े सम्पूर्ण शरीर को इस तरह जलता देख, कबीर का मन उदासी से भर जाता है |

अर्थात मनुष्य देह नश्वर है, इसका कोइ भरोसा नही है, यह आज है कल नहीं है |  



KABIR KE DOHE

पच्चीसवा दोहा

करता था तो क्यूं रहया, जब करि क्यूं पछिताय |
बोये पेड़ बबूल का, अम्ब कहाँ ते खाय ||

[शब्द का अर्थ :– करता-कर्म करने वाला, पछिताय-पछताना, अम्ब-आम ]

भावार्थ- संत कबीर कहते है की मनुष्य किसी काम को करने से पहले नही सोचता है | परन्तु जब वह काम गलत हो जाता है तो बाद में पछताता है | जिस प्रकार से बबुलका पेड  लगाकर आम नहीं खा जाया सकते, वैसे ही किसी काम को करने के बाद पछताना नहीं चाहिए और उसे करने से पहले उसके विषय में गंभीरता से सोच लेना चाहिए |

अर्थात कोइ भी काम करने से पहले उसके परिणामोंका विचार करना चाहिए | 



 

छब्बीसवा दोहा

जिन खोजा तिन पाइया, गहरे पानी पैठ |
मैं बपुरा बूडन डरा, रहा किनारे बैठ ||

[शब्द का अर्थ :– खोजा-ढूढना, पाईया-मिलना, बपुरा-बेचारा]

भावार्थ- जीवन में जो परिश्रम करते है, मेहनत करते है, कर्म करते है वो अनेक कठिनाइओंका सामना करके भी अपने मंजिलोको, लक्ष्यको जरूर प्राप्त कर लेते है | जैसे कोइ गोताखोर गहरे पानी की पर्वा न करते हुए पानी में गोता लगाता है और पाणी में से जरूर कुछ न कुछ लेके आता है | लेकिन कुछ बेचारे लोग ऐसे भी होते है जो पानी में डूबने के भय से किनारे पे ही बैठे रहते है और जीवन में कुछ भी नहीं प्राप्त करते है |

अर्थात जीवन में जो लोग संकटों से बिना डरे अपना कर्म करते है वो जरूर सफल होते है |



 

सत्ताईसवा दोहा

चाह गई, चिंता मिटी, मनवा बेपरवाह |
जिसको कुछ नहीं चाहिए, वह शहनशा ||

[शब्द का अर्थ :– चाह-इच्छा, ख़्वाहिश,  मनवा-मन]

भावार्थ- जिस मनुष्य के मन से, दिल से इच्छा, ख्वाहीशे समाप्त हो जाती है, उस मनुष्य के जीवन से अपने आप ही चिंता मिट जाती है और मन मस्त मौला, आनंदी हो जाता है | क्योंकी इच्छा ही सब दुखों का मूल है और जब वही समाप्त हो जाती है तो कबीर कहते है उस व्यक्ती का जीवन किसी राजा या शेनशाह के सामान होता है |



KABIR KE DOHE

अट्ठाईसवा दोहा

ऐसी बाँणी बोलिये, मन का आपा खोई |
अपना तन सीतल करै, औरन कौ सुख होई ||

[शब्द का अर्थ :– बाँणी- बोली, आपा-अहंकार, खोई-त्याग करना, सीतल-शीतल, औरन कौ-दूसरों को ]

भावार्थ- हमे अपने मन का अहंकार त्याग कर ऐसी भाषा, बोली का प्रयोग करना चाहिए | जिससे हमारा अपना तनमन भी स्वस्थ रहे और दूसरों को भी कोई कष्ट न हो मतलब दूसरों को भी सुख प्राप्त हो | इन्सान को विनम्रता से बोलना चाहिए ताकी सुनने वाले के मन को भी अच्छा लगे और आपका मन भी प्रसन्न हो |



 

उनतीसवा दोहा

कस्तूरी कुंडली बसै, मृग ढूंढे बन माँही |
ऐसे घटी-घटी राम है, दुनिया देखै नाहिं || 

[शब्द का अर्थ :कस्तूरी-एक सुगन्धित पदार्थ, कुंडली-नाभि, मृग-हीरण, घटीघटी-कण-कण, बन-जंगल]

भावार्थ- हीरण कस्तुरी के सुगंध को ढूंढते हुए पुरे जंगले में भटक रहा है | पर वह इस बात से अनजान है की कस्तुरी स्वयम उसके नाभि में ही बसी हुयी है| उसी तरह से दुनिया के जो लोग हे उन्हें राम नही दिख रहे है, इश्वर नहीं दिख रहे है, वो उन्हें मंदिर, तीर्थस्थान, देवालायोंमे ढूंढते है जब की इश्वर दुनिया के हर एक कण-कण में बसा है | इश्वर स्वयंम उनके मन में ही बसा है और वो उसे जगह जगह कस्तुरी मृग की तरह ढूंढते फिर रह है |



KABIR KE DOHE 

तीसवा दोहा

जब मैं था तब हरी नहीं, अब हरी हैं मैं नाहि |
सब अँधियारा मिटी गया, जब दीपक देख्या माहि ||

[शब्द का अर्थ :मैंअहंकार, हरी-इश्वर, अँधियारा-अंधकार ]

भावार्थ- जब तक मुझमे अहंकार था तब तक मुझे भगवान के दर्शन प्राप्त नहीं हो सके| पर जैसे ही मेरा अहंकार समाप्त हो गया मुझे भगवान के सीवाय, उस परम पीता के बगैर कुछ भी दिखाई नही पड़ रहा है| 

कबीर दास कहते है यह ठीक वैसे ही हुआ जिस प्रकार से दीप प्रज्वल्लीत होते ही समस्त अँधियारा समाप्त हो जाता है | ऐसे ही हमारे अंतर्मन में जो अहंकार था वह जैसे ही समाप्त हो गया तो संपूर्ण जगत दृश्यमान हो जाता है इसी तरह से मुझे संपूर्ण दिशाओमें इश्वर के दर्शन हो गए |



 

एकतिसवा दोहा

गुरु गोबिंद दोऊँ खड़े, काके लांगू पाँय |
बलिहारी गुरु आपने, गोविन्द दियो मिलाय ||

[शब्द का अर्थ :गोविन्द-भगवान, इश्वर, दोऊँ-दोनो, काके-किसके, पाँय-पाँव, बलिहारी-धन्य हो ]

भावार्थ- अगर गुरु और इश्वर दोनों एक साथ खड़े है तो पहले किसके चरण स्पर्श करने चाहिए | कबिरदासजी कहते है, में पहले गुरु को ही प्रणाम करूँगा क्यों की गुरु ही है जिन्होंने मुझे इश्वर तक पहुचने का मार्ग बताया है | बिना गुरु के तो मैं कभी भी इश्वर को मील नहीं सकता था | भले ही इश्वर तीनो लोक के स्वामी है, पर उनसे मुझे गुरु ने मिलवाया इसीलिये मैं पहले गुरु के चरण स्पर्श करूंगा |

अर्थात कबीरजी इस दोहे द्वारा कह रहे है की जो शिक्षा और ज्ञान देने वाला गुरू हैं वो इश्वर से भी बड़ा है |



 

बत्तीसवा दोहा

साईं इतना दीजिये, जा में कुटुम समाय |
मैं भी भूखा न रहूँ, साधू भी ना भूखा जाय ||

[शब्द का अर्थ :साई-इश्वर, भगवान, कुटुम-कुटुंब ]

भावार्थ- कबीरदास जी कहते है की हे प्रभू तुम मुझे केवल इतना ही धन धान्य देना जितने में, मैं और मेरे परिवार का गुजारा चल जाए | में खुद भी कभी भूखा ना रहूँ और मेरे घर में जो अतीथी आये उन्हें कभी भी भूखा वापस न जाना पड़े |

कबीरजी कहते है की मानव को कोइ लोभ नहीं करना चाहिए जो कुछ उसके पास है वो सब उस इश्वर का दीया है उसमे ही संतोष करना चाहिए ज्यादा इच्छाएं नहीं बढ़ानी चाहिए | क्यों की इच्छाएं जब बढ़ती है तो मुसीबतें भी बढ़ती है |



KABIR KE DOHE

तेहतीसवा दोहा

निन्दक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय |
बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय ||

[शब्द का अर्थ :निन्दक-निंदा करनेवाला, नियरे- करीब, सुभाय-स्वभाव ]

भावार्थ- कबीरदासजी कहते है, जो व्यक्ती हमारी निंदा करता है, जो हमारा निंदक है ऐसे व्यक्ती को हमेशा अपने करीब ही रखना चाहिए | क्यों की उसके द्वारा हमें हमारे कमियों के बारे में पता चलता रहता है | हमें हमारे शरीर को साफ़ करने के लिए पानी और साबुन की जरूरत होती है | पर अगर हमारी निंदा करने वाला अगर हमारे पड़ोसी होगा तो हमें हमारे कमियों के बारे में पता चलता रहेगा और हम अपने आप में सुधार ला सकेंगे, और बिना पानी साबुन के ही हम हमारे स्वभाव को साफ़ रख सकते है |



 

चौंतीसवा दोहा

पानी कर बुदबुदा, अस मानुष की जात |
एक दीना छीप जायेगा, ज्यों तारा परभात ||

[शब्द का अर्थ :बुदबुदा- बुलबुला, मानुष-मनुष्य, दीना-दिन, परभात-सुबह, प्रभात]

भावार्थ- जिस तरह पानी का बुलबुला कुछ ही क्षण में पाणी के सतह पर आकर समाप्त हो जाता है वैसे ही मनुष्य का देह भी क्षणभंगुर है | इस मनुष्य शरीर की कोइ शाश्वती नहीं है और यह एक दीन समाप्त होने वाला है | जिस तरह से रात को आसमान में दीखने वाले तारे सुबह होते ही छीप जाते है वैसे ही यह शरीर भी एक दीन नष्ट हो जायेगा |



KABIR KE DOHE

पैंतीसवा दोहा

यह तन काचा कुम्भ है, लिया फिरे था साथ |
ढबका लगा फूटीगा, कछु न आया हाथ ||

[शब्द का अर्थ : कुम्भ-मटका, काचा-कच्चा, ढबका-चोट, फूटीगा-टूटना ]

भावार्थ- कबीर कहते है जिस शरीर को तूने जिन्दगी भर सजाया, सवारा जिसकी देखभाल की, जिससे बेहद प्यार किया और जिसे जिन्दगी भर साथ लिए घूमता रहा दरअसल यह एक कच्चा घड़ा है | जरा सी चोट लगने पर यह फूट गया और तेरे हाथ में कुछ भी न आया |

अर्थात मनुष्य जिस देह से अपार प्रेम करता है और जिसे सजाये-सवारे, संभाले फिरता है यह एक नश्वर देह है जो एक दिन त्याग देना है | इसीलिए मनुष्य ने अपने जीवन में अच्छे कर्म करने चाहिए वही उसकी असली पूंजी है|



 

छतीसवा दोहा

यह तन विष की बेलरी, गुरु अमृत की खान |
सीस दिये जो गुरु मिले, तो भी सस्ता जान ||

[शब्द का अर्थ :तन-शरीर, बेलरी-बेल, खान-खजाना, सीस -शीर, मस्तक ]

भावार्थ- कबीरजी कहते है की यह शरीर विष की लता (बेल) है और इसमें विष के फल अर्थात काम, क्रोध, लोभ, मद यही फलेंगे | हमारे जीवन में गुरु किसी अमृत के खजाने समान है जो हमें अच्छाई का मार्ग बतातें है और हमारा उद्धार करते है | अपना शीर चढ़ा देने पर भी अगर ऐसे सद्गुरु से हमारी भेट हो जाये तो हमें यह सस्ता सौदा ही समझना चाहिए |

इस दोहे में कबीरजी ने मनुष्य के जीवन में गुरु के महत्व का वर्णन किया है |



 

सैंतीसवा दोहा

माला फेरत जुग गया, मिटा न मन का फेर |
करका मन का डारि के, मन का मनका फेर ||

[शब्द का अर्थ : माला-जपमाला, फेरत-घूमाते हुए, जुग-युग, मिटा-समाप्त, मन का फेर-मन की अशांतता, करका-हाथ का, डारी के-छोड देना ]

भावार्थ- कोइ व्यक्ती -अगर लम्बे समय तक हाथ में मोती की जप माला लेकर घूमाता है, इश्वर का स्मरण करता है और फिर भी इससे उसके मन का भाव नहीं बदलता और उसके मन की हलचल भी शांत नहीं होती | कबीर ऐसे व्यक्ती को कहते है की हाथैसे माला को फेरने का पाखण्ड छोड़कर अपने मन में शुद्ध विचारों को भरना चाहिए तथा सच्चे मन से सब का भला करना चाहिए |

अर्थात माला फेरते फेरते युग बिता दिए लेकिन अब तक मन शांत नही हुआ| हाथ की माला छोड़ दे और मन की माला फेरना शुरू कर | हमें हाथ की माला का फेरना छोड़कर अच्छे कर्म करने चाहिए जिससे हमसे हमारे भगवान प्रसन्ना हो |



KABIR KE DOHE

अड़तीसवा दोहा

प्रेम न बाडी ऊपजै, प्रेम न हाट बिकाय |
राजा परजा जेही रुचै, सीस देह लेइ जाय ||

[शब्द का अर्थ :-बाडी- खेत, ऊपजै-उपजना, हाट-बाजार, बिकाय-बिकता हैं, परजा-प्रजा, सीस-शीर ]

भावार्थ- प्रेम किसी खेत में नहीं उपजता, और नहीं प्रेम कोइ बाजार में खरीदने बेचने वाली वस्तु है | अगर कोइ प्रेम पाना चाहता हे वह राजा हो या कोइ सामान्य आदमी, प्रेम पाने के लिए उसे त्याग और बलीदान देना ही पड़ता है | त्याग और बलिदान के बिना प्यार को पाया नही जा सकता|

कबीर जी कहते है प्रेम यह एक गहरी भावना है जो खरीदी या बेची नहीं जा सकती |



 

उनतालीसवा दोहा

बृच्छ कबहूँ नहीं फल भखै, नदी न संचै नीर |
परमारथ के कारने, साधून धरा सरीर ||

[शब्द का अर्थ :बृच्छ-वृक्ष, पेड़, भखै-भक्षण करना, नीर-पानी, जल, परमारथ-परमार्थ, सरीर-शरीर ]

भावार्थ- पेड़ कभी अपना फल नहीं खाते ,नदियां कभी अपना पानी स्वयं नहीं पीती, यह तो परहित अर्थात दूसरों के लिए सब कुछ न्योछावर कर देते हैं | उसी प्रकार से साधू-संत का जीवन भी दूसरों के परोपकार और कल्याण के लिए ही होता है | हमें भी अपने जीवन को आदर्शवादी बनाते हुए परोपकारी बनना चाहिए |

इस दोहे में हमें परोपकारी बनने सदाचारी बनने का उपदेश दिया है|



KABIR KE DOHE

चालीसवा दोहा

दुर्बल को न सताइए, जाकी लम्बी हाय |
मुई खाल के स्वांस सों, लोह भसम हैं जाय ||

[शब्द का अर्थ :मुई खाल- मरे हुए पशु का चमडा, हाय-बद्दुवा, लोह-लोहा, भसम-ख़त्म हो जाना ]

भावार्थ- शक्तिशाली व्यक्ती को अपने बल का उपयोग करकर किसी कमजोर व्यक्ती पर अत्याचार नहीं करना चाहिए, क्यों की दुखी व्यक्ती के ह्रदय की बद्दुवा बहुत ही हानिकारक होती है | जैसे मरे हुए पशु के चमड़े से लोहा तक जल के राख हो जाता है वैसे ही दुखी व्यक्ती की बद्दुवाओंसे समस्त कूल का नाश हो जाता है |

अर्थात दुर्बलों पर अन्याय करने से अन्याय करने वाले का सर्वनाश हो जाता है |



 

इकतालिसवा दोहा

जाको राखे साईयाँ, मारि सके ना कोय |
बाल न बाँका करी सकै, जो जग बैरी होय ||

[शब्द का अर्थ :– साईयाँ-इश्वर, बैरी-दुश्मन, मारि-मार देना, कोय-कोई ]

भावार्थ- कबीर जी कहते है जिस मनुष्य पर इश्वर की कृपा होती है उसे कोइ भी नुकसान पहुंचा नहीं सकता | ऐसे मनुष्य का कोइ बाल भी बाका नहीं कर सकता चाहे सारा संसार ही उसका दुश्मन ही क्यों न हो जाये जिसपर इश्वर की कृपा होती है |

अर्थात जो मनुष्य इश्वर की शरण में जाता है, इश्वर उसका सदैव रक्षण करता है |



 

बयालीसवा दोहा

मन के हारे हार है, मन के जिते जीत |
कहे कबीर हरी पाइए, मन ही के परतीत ||

[शब्द का अर्थ :हरी –इश्वर]

भावार्थ- जीवन में जय और पराजय केवल मन ही पर निर्भर करती है | यदी मनुष्य मन से हार गया तो पराजय निश्चीत है और यदी उसने मन को जीत लिया तो जीत निश्चित है | इश्वर को भी आप मन के विश्वास से ही प्राप्त कर सकते है, यदी मन में विश्वास है तो वोह जरूर मिलेगा और मन में विश्वास नहीं है तो कभी नहीं मिलेगा |



KABIR KE DOHE

तैंतालीसवा दोहा

कबीर तन पंछी भया, जहाँ मन तहां उडी जाई |
जो जैसी संगती कर, सो वैसा ही फल पाई ||

[शब्द का अर्थ :- तन-शरीर, पंछी-पक्षी, पाई-मिलना, प्राप्त होना]

भावार्थ- कबीर कहते है के संसार के माहौल में रहने वाले व्यक्ती का शरीर पंछी जैसा बन गया है और जहाँ उसका मन जाता है उसका शरीर भी उड़कर वही पहुँच जाता है | जो जैसे लोगों के साथ रहता है वो वैसे ही बन जाता है और वैसे ही फल पाता है |

अर्थात आपको हमेशा अच्छे लोगों के संगत में ही रहना चाहिए |



 

चौवालीसवा दोहा

गुरु कुम्हार सीष कुंभ है, गढ़ी-गढ़ी काढे खोट |
अंतर हाथ सहार दै, बाहर बाहै चोट ||

[शब्द का अर्थ :- कुंभ-घडा, सीष-शिष्य, गढ़ी-गढ़ी- घड़ी घड़ी, बाहै-करे, सहार-सहारा ]

भावार्थ- गुरु कुम्हार के सामान है और शिष्य घड़े के समान है| गुरु शिष्य के अन्दर जो कमियां होती है उन्हें घड़ी घड़ी निकालता रहता है | कबीर कहते है की गुरु शिष्य को घड़े के सामान गढ़ता है और ठोक–ठोक कर उसके दोषों को दूर करता है | जिस प्रकारसे कुम्हार मिटटी के कच्चे घड़े में हाथ डालकर उसे सहारा देता है और उसे बाहर से चोट मारता है उसी प्रकार गुरु बाहर से तो डांट फटकार करता है पर अन्दर से शिष्य के साथ प्रेममय व्यवहार करता है |

अर्थात गुरु शिष्य को कठोर अनुशासन में रखकर अंतर से प्रेम भावना रखते हुए शिष्य की बुराईयोंको दूर करके संसार में सन्माननीय बनता है |



KABIR KE DOHE

पैंतालीसवा दोहा

सब धरती कागद करूँ, लेखनी सब बनराय |
सात समुंद की मसि करूं, गुरु गून लिखा न जाय ||

[शब्द का अर्थ :- कागद-कागज, बनराय- जंगल, समुंद- समुद्र, समुन्दर, मसि-स्याही, गुन-गुण ]

भावार्थ- कबीर कहते है गुरु के गुणों का बखान करना उनके सामर्थ्य के बाहर है | सारे धरती को मैं कागज बना दूं और जंगले की सारी लकड़ियों को लेखनी कर दूं और सातों समुन्दर के जल को मैं स्याही कर दूं उसके बाद भी हम गुरु के गूण को नहीं लिख सकते अर्थात गुरु के गुण अनंत है |

अर्थात गुरु के गुणों के वर्णन करने के लिए तीनो लोको में कोइ भी समर्थ नहीं है |



 

छियालीसवा दोहा

जब गुण को गाहक मिले, तब गुण लाख बिकाई |
जब गुण को गाहक नहीं, तब कौड़ी बदले जाई ||

[शब्द का अर्थ :गाहक-ग्राहक, खरीदने वाला, बिकाई-बेचना, कौड़ी-बिना मोल के-कीमत के ]

भावार्थ- जब गुण को परखने वाला ग्राहक मिल जाता है तो उस गुण की कीमत बहुत ज्यादा हो जाती है और जब गुण को कोइ ग्राहक नहीं मिलता अर्थात परखने वाला नहीं मिलता है तो गुण कौड़ी के भाव चला जाता है | इसीलिए अपने गुणोकों लोगों को पहचानने दो इनमेसे ऐसा तो कोइ होगा जो आपके गुणों को पहचान के आपको सही राह दिखाएगा और आपकी किस्मत खुल जायेगी |



 

सैंतालीसवा दोहा

कबीर कहा गरबियो, काल गहे कर केस |
ना जाने कहाँ मारिसी, कै घर कै परदेस ||

[शब्द का अर्थ :गरबियो-गर्व, मारिसी- मार देगा, प्राण लेगा ]

भावार्थ- हे मानव तू क्या घमंड करता है काल अपने हाथों में तेरे केश पकडे हुए है | तू चाहे घर में हो या परदेस में तेरा मरना तय है | इसीलिए अपनी किसी भी चीज़ पर कभी भी घमंड नहीं करना चाहिए क्यों की एक न एक दीन सबको मरना है, यहाँ किसीको नहीं रहना हैं तो क्यूँ न सबके दिल में जगह बनाकर जाया जाए |

अर्थात धनवान हो या गरीब, राजा हो या रंक सबकी मृत्यु निश्चित है तो व्यर्थ हा अहंकार क्यों करना |



KABIR KE DOHE

अड़तालीसवा दोहा

दोस पराए देखि करि, चला हसन्त हसन्त |
अपने याद न आवई, जिनका आदि न अंत ||

[शब्द का अर्थ :दोस-दोष, पराए-दूसरों के, हसन्त-हसते हुए ] 

भावार्थ- कबीर जी कहते है की, यह मनुष्य का स्वभाव है के जब उसके सामने किसी की बुराई हो रही होती है तो वह बहुत खुश होकर उसे सून रहां होता है| वह यह भूल जाता हैं की उसके अन्दर भी ऐसी लाखों बुराइयाँ है जिनकी न तो कई शुरुवात दिखाई देती है और न ही उसका कही अंत दिखाई देता है |

अर्थात किसी के दोषों पर और कमियों पर हमें हसना नहीं चाहियें | हमें यह नहीं भुलाना चाहिए की संसार में कोइ भी व्यक्ती बिना दोषों का नही है वह स्वयं भी |



 

उनचासवा दोहा

मौको कहाँ ढूंढे बन्दे, मैं तो तेरे पास में |
न मैं देवल, ना मैं मस्जीद ना काबे कैलाश में ||

[शब्द का अर्थ :मौको-मुझे, देवल-मंदिर, बन्दे-मनुष्य ]

भावार्थ- इन्सान भगवान को ढूंढने के लिए मंदीर, मस्जीद, पहाड़ों और तीर्थक्षेत्र में घूमता है | मन की शांती के लिए माला फेरता है, व्रत करता है | कबीरजी कहते है के इश्वर हमारे मन में वास करता है, यदी हमारा मन अच्छा हैं तो समझ लीजिये इश्वर हमारे साथ है | इश्वर को ढूंढने के लिए हमें ना तो मंदिर, मस्जीद, काबुल और ना तो कैलाश मैं जाने की जरूरत है, इश्वर हमारे साथही होता हैं हमे बस उसे पहचानना होता है |



KABIR KE DOHE 

पचासवा दोहा

प्रेमभाव एक चहिए, भेष अनेक बनाए |
भावी घर में वास करें, भावै वन में जाए ||

[शब्द का अर्थ :- भेष-रूप ]

भावार्थ- ह्रदय में हमेशा इश्वर के प्रती एक प्रेमभाव होना चाहिए | चाहे कौनसा भी रूप धारण करो या कोनसा भी वेष बना लो | चाहे संसारिक बन्धनों में बंधकर गृहस्थ जीवन बिता रहे हो या फिर वन के एकांत वातावरण में वैराग्यपूर्ण जीवन बिता रहे हो | जीवन का कोनसा भी स्वरुप हो वहा प्रेमभाव सदा बना रहना चाहिए | ऐसा प्रेमभाव जो हर स्थिती, हर रूप, हर उम्र में एकसमान बना रहे, वो सिर्फ परम पिता परमात्मा से ही स्थापित हो सकता है |



 

इक्यावनवा दोहा 

जा घट प्रेम न संचरे, सो घट जानू मसान |
जैसे खाल लुहार की, साँस लेतु बिन प्राण ||

[शब्द का अर्थ :- घट-मन, ह्रदय, संचरे-संचार करना, मसान-शमशान, खाल लुहार की- लुहार का आग को हवा देनेवाला अवजार (धौकनी), साँस-श्वास ]   ]

भावार्थ- जिस मनुष्यके ह्रदय में, मन में प्रेमभाव का संचार नहीं होता उसे शमशान के भांती समझना चाहिए | जैसे मृत जानवर के खाल से बनी लोहार की धौकनी भी यूं तो साँस लेती है किन्तु उसमे प्राण नहीं होते | इसी तरह जिस मनुष्य के ह्रदय में इश्वर के प्रती सच्चे प्रेम का भाव नहीं है वह सांस तो ले रहा है पर प्राण विहीन है |

अर्थात जिस मनुष्य के मन में इश्वर के प्रती प्रेम भाव नहीं है उस का जीवन व्यर्थ है |



 

बावनवा दोहा

लूट सके तो लूट ले, राम नाम की लूट |
पाछे फिर पछताओगे, प्राण जाहि जब छूट ||

[शब्द का अर्थ :- पाछे-बाद में, जाहि-जाएंगे ]

भावार्थ- कबीरजी कहते हैं की हमारे जीवन में सुख शांती, समृद्धी और जीवन का उद्धार करने के लिए एक राम का नाम ही काफी है | तो क्यूँ न हम जब तक जीवीत है हर समय राम नाम का जाप करके खुद का उद्धार कर ले |  अन्यथा अपने जीवन के अंतिम क्षण में हम खेद महसूस करेंगे की मैंने जीवन भर राम का नाम नही लिया और मेरा सारा जीवन व्यर्थ गया |

अर्थात वक्त रहते ही हमें प्रभु की भक्ती करनी चाहिए वरना अंतिम समय में पछताने से कुछ लाभ नहीं होगा |



KABIR KE DOHE

तिरेपनवा दोहा 

आठ पहर चौसंठ घड़ी, लगे रहे अनुराग |
ह्रदय पलक ना बिसरे, तब साँचा वैराग ||

[शब्द का अर्थ :- आठ पहर चौसंठ घड़ी-दिन के चौबीस घंटे, अनुराग- भक्ति, निष्ठा, लगन, प्रेम, प्यार ]

भावार्थ- हर पल, हर श्वांस, हर घड़ी जब उस बनाने वाले इश्वर के प्रती ह्रदय में भक्ती बनी रहे तब समझो की हमें उससे सच्चा प्रेम है | हर क्षण ऐसे समर्पण से प्रेम करने वाला ही, सद्गुरु और ह्रदय में बसे इश्वर से असीम प्रेम का पात्र बन सकता है |



 

चौवनवा दोहा 

जो आवे तो जाये नहीं, जाये तो आवे नाही |
अकथ कहानी प्रेम की, समझलेहूँ मन माहि ||

[शब्द का अर्थ :- अकथ-अकथनीय, आवे- आएगा ]

भावार्थ- सच्चे प्रेम की कहानी अकथनीय है | इसलिए परम पिता परमेश्वर का सच्चा अनुग्रह प्राप्त करने वाले प्रेमियों को प्रेम के इस गुण के बारें में अपने मन को भली भांती समझा लेना चाहिए | क्यों की उस बनानेवाले (इश्वर) का सच्चा प्रेम जिसको भी प्राप्त हो जाता है तो सदैव उसपर परमेश्वर की कृपा बनी रहती है | किन्तु जब परमेश्वर द्वारा श्वांस के रूप में मिला हूवा प्रेम प्रसाद चला जाता है तो फिर कभी वापिस नहीं आता | इसीलिए परमेश्वर के इस प्रेम को ह्रदय से स्वीकार करना चाहिए |



KABIR KE DOHE

पचपनवा दोहा 

पिय का मार्ग सुगम है, तेरा चलन अनेड |
नाच न जाने बापुरी, कहे आंगना टेढ़ ||

[शब्द का अर्थ :- सुगम-आसान, चलन-आचरण, अनेड-उचित, टेढ़-टेढ़ा, आंगना-आंगण ]

भावार्थ- इश्वर से मिलन का मार्ग एकदम आसान है जो सच्चे प्रेम और ह्रदय से होकर गुजरता है | जो इसे कठिन बताते है उनका स्वयंम का आचरण ही उचित नहीं है | वो स्वयं ही उल्टा मार्ग चुनते है और कहते है परमेश्वर की प्राप्ती कठिन है | यह तो वही वाली बात हुयी नाच स्वयंम नहीं जानते और आँगन टेढ़ा बताकर अपनी गलती का दोष आँगन को दे देते है |



  

छप्पनवा दोहा 

नाम ना रटा तो क्या हुआ, जो अंतर है हेत |
पतिव्रता पति को भजै, मुखसे नाम ना लेत ||

[शब्द का अर्थ :- रटा-उच्चारण, भजै-पूजा करना ]

भावार्थ- अगर ह्रदय में इश्वर के लिए सच्ची लगन, भक्ती है तो ऐसा मनुष्य मुख से इश्वर का नाम भी ना ले तो उससे क्या फर्क पडता है | यह ठीक वैसे ही जैसे कोइ पतिव्रता स्त्री कभी भी अपने मुख से अपने पती का नाम उच्चारण नहीं करती किन्तु मन ही मन अपने पती का नित्य स्मरण ही करती है | उसी प्रकार से मुख से परमेश्वर का नाम लेने का दिखावा इतना महत्वपूर्ण नहीं है जितना की उस परमेश्वर का ह्रदय से स्मरण करना |



 

सत्तावनवा दोहा 

मेरा मुझमे कुछ नही, जो कुछ है सो तेरा |
तेरा तुझको सौपता, क्या लागे हैं मेरा ||

[शब्द का अर्थ :- सौपता-अर्पण करना, लौटा देना  ]

भावार्थ- कबीर जी कहते है, हे परमेश्वर मेरे पास जो भी है वो सब कुछ तेरा दिया हुआ है, इसपर मेरा कुछ भी अधिकार नहीं है | यहाँतक के मेरी सांसो से लेकर मेरे जीवन पर भी तेरा ही अधिकार है | हे परमेश्वर अगर तूने दिया हुआ सबकुछ मैं तुझको लौटा देता हूँ तो मेरे पास कुछ भी नहीं रहेगा क्यों की यह सब कुछ तेरा है और इसपर तेरा ही अधिकार है मैं तो नाममात्र हूँ |



KABIR KE DOHE

अट्ठावनवा दोहा 

माखी गुड में गाडी रहे, पंख रहे लिपटाये |
हाथ मले और सिर धुले, लालच बुरी बलाय ||

[शब्द का अर्थ :-माखी-मक्खी, गाडी रहे-लिपटे रेहना, बलाय-बला, लालच-लोभ ]

भावार्थ- पहले तो मक्खी गुड में लिपटी रहती है, अपने सारे पंख और सर गुड में चिपका लेती हैं | लेकिन जब उड़ने का प्रयास करती है तो उड़ नहीं पाती है और तब उसे अपने लोभी स्वाभाव पर अफ़सोस होता है | ठीक उसी तरह से इन्सान भी अपने सांसारिक सुखों में सर से पाँव तक लिपटा रहता है और जब अंत समय नजदीक आता है तो उसे अपने आचरण पर अफ़सोस होता है लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होती हैं |



 

उनसठवा दोहा 

नहाये धोये क्या हुआ, जो मन मैल न जाय |
मीन सदा जल में रहे, धोये बास न जाय ||

 [शब्द का अर्थ :- मीन-मछली, बास-दुर्गन्ध, मैल-गंदगी ]

भावार्थ- कबीरजी कहते है आप कीतना भी नहा धो लीजिये, लेकिन अगर आपका मन साफ़ नहीं हुआ तो उस नहाने का क्या फायदा | जैसे मछली हमेशा पानी में रहती है फिर भी वो साफ़ नहीं होती और उससे बदबू आती रहती है |

अर्थात उपरी साफ सफाई से ज्यादा आंतरिक साफ सफाई महत्वपूर्ण है | मन का साफ़ होना, निर्मल होना बहुत जरूरी है बजाय के बाहरी सौन्दर्यता | मनुष्य शरीर की कितनी भी स्वछता करले पर अगर उसका मन कुलशीत है, पापी है तो बाहरी साफ़ सफाई अर्थहीन है| 



KABIR KE DOHE 

साठवा दोहा

कामी, क्रोधी, लालची, इनसे भक्ती ना होय |
भक्ति करै कोई सूरमा, जाति बरन कुल खोय ||

[शब्द का अर्थ :- सूरमा-शूरवीर, खोय-त्याग करना ]

भावार्थ- कबीर कहते है, कामी मनुष्य विषय वासनाओमें लिप्त रहता है, क्रोधी मनुष्य दूसरों का द्वेष करता है और लालची मनुष्य निरंतर संग्रह करने में व्यस्त रहता है, इन लोगोंसे भक्ती नही हो सकती | भक्ती तो कोई शूरवीर और पुरुषार्थी कर सकता है, जो जाती, वर्ण, कूल और अहंकार का त्याग कर सकता है |

अर्थात परमेश्वर की भक्ती गुणवान और त्यागी मनुष्य ही कर सकता है, दुर्जन मनुष्य नही |



 

इकसठवा दोहा

भक्ति जु सीढ़ी मुक्ति की, चढ़े भक्त की हरषाय |
और न कोई चढ़ी सकै, नीज मन समझो आय ||

[शब्द का अर्थ :-  हरषाय-खुशी होना ]

भावार्थ- भक्ति मुक्ति की वह सीढी है, जिसपर चढ़कर भक्त को अपार खुशी मिलती है |  दूसरा कोई भी मनुष्य जो सच्ची भक्ति नहीं कर सकता इस पर नहीं चढ़ सकता है यह समझ लेना चाहिए |

अर्थात भक्ति की सीढी को सच्चा भक्त ही चढ़ सकता है क्योंकि यह मुक्ति का द्वार दिखाने वाली होती है, यह मन में निश्चित कर लो की भक्त के अलावा अन्य कोई यह सीढ़ी नहीं चढ़ सकता है। भक्ति मार्ग पर बढ़ने के लिए अभिमान का त्याग करना पड़ता है इसलिए यह कोई आसान कार्य भी नहीं है।



 

बासठवा दोहा

भक्ति बिन नहिं निस्तरे, लाख करे जो कोय |
शब्द सनेही होय रहे, घर को पहुँचे सोय ||

[शब्द का अर्थ :- बिन-बगैर, कोय-कोई ]

भावार्थ- किसी भी मनुष्य के लिए भक्ति के बिना मुक्ति संभव नही हैं, चाहे वह लाख कोशिश कर ले | पर जो मनुष्य सद्गुरुके वचनों को अर्थात शब्दोको ध्यान से सुनता है और उनके बताये मार्ग पर चलता है, वे ही अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है |



KABIR KE DOHE

तिरेसठवा दोहा 

काह भरोसा देह का, बिनसी जाय छिन मांहि |
सांस, सांस सुमिरन करो, और जतन कछु नाहिं ||

[शब्द का अर्थ :- काह-क्या, देह-शरीर, सुमिरन-स्मरण, सांस-साँस, श्वास ]

भावार्थ- कबीर कहते है, इस शरीर का क्या भरोसा है, किसी भी क्षण यह नश्वर शरीर हमसे छिन सकता है | इसलिए हर साँस में, हर पल में उस परम पीता परमेश्वर को याद करो, वही है जो तुम्हे मुक्ती दिला सकता है | इसके आलावा मुक्ती का कोइ दूसरा मार्ग नहीं है |



 

चौंसठवा दोहा 

हिन्दू कहे मोहि राम पियारा, तुर्क कहे रहमाना |
आपस में दोउ लड़ी लड़ी मुए, मरम न जाना कोए ||

[शब्द का अर्थ :-मोहि-मुझे, पियारा-प्यारा, तुर्क-मुसलमान, रहमाना-अल्ला, दोउ-दोनों, मुए-मर गए, मरम-मर्म]

भावार्थ- कबीरजी कहते है, हिन्दू कहते है की उसे राम प्यारा है और मुसलमान कहता है के उसे रहमान (अल्ला) प्यारा है | इसी विषय पर बहस कर करकर दोनो आपस में लड लड़कर मर जाते है | पर दोनों मे से  सच्चाई कोइ नहीं जान पाता है की इश्वर एक है |

अर्थात इश्वर एक ही है उसकी तुम किसी भी रूप में भक्ती करो |



KABIR KE DOHE

पैंसठवा दोहा 

साधू ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय |
सार-सार को गही रहै, थोथा देई उडाए ||

[शब्द का अर्थ :- सुभाय-स्वभाव, सार-सार्थ,अच्छा, थोथा-कचरा, निरर्थक  ]

भावार्थ- सज्जन व्यक्ती को इस प्रकार होना चाहिए जैसे अनाज साफ करने वाला सूप होता है | वोह सार वस्तु को ग्रहण कर लेता है और थोथा वस्तु अर्थात सारहीन वस्तु को उडा देता है, बाहर कर देता है | इसी प्रकार हमें भी ज्ञानवाली चीज़े, ज्ञानवाले विचार अपने पास रख लेने चाहिए और बेकार की बातों से अपने आपको दूर ही रखना चाहिए |



 

छियासठवा दोहा 

जबही नाम हिरदे धरा, भया पाप का नाश |
मनो चिगीं आग की, पारी पुरानी घास ||

 [शब्द का अर्थ :- हिरदे-ह्रदय, चिगीं-चिंगारी, भया-हो गया ]

भावार्थ- कबीरजी कहते है, जबसे हमने भगवान का नाम ह्रदय में धरा है, भगवान के भक्ती में लीन हो गए है तबसे हमारे सारे पापों का नाश हो गया है| जैसे किसी पुरानी सुखी घास पर आग की चिंगारी पड जाने पर वह जल कर राख हो जाती है, वैसे ही उस परमपिता परमेश्वर का नाम अपने ह्रदय में धरने से मेरे सारे पापों का नाश हो गया है |



 

सड़सठवा दोहा

जहाँ दया तहँ धर्म है, जहाँ लोभ तहँ पाप |
जहाँ क्रोध तहँ काल है, जहाँ छिमा तहँ आप ||

[शब्द का अर्थ :- तहँ-वहां, लोभ-लालच, छिमा-क्षमा ]

भावार्थ- जहाँ लोगों के मन में दया-भाव होता है वहांपर धर्म निवास करता है और जहाँ लोगों के मन में लालच होता है वहां पाप निवास करता है | जिन व्यक्तीयों के मन में हमेशा क्रोध रहता है वह काल के समान होता है, उनका काल हमेशा उनके इर्द-गिर्द घूमता रहता है |और जहाँ क्षमा वास करती है, जहाँ दूसरोंके गलतियोंको क्षमा किया जाता है वहां इश्वर स्वयंम निवास करते है |



KABIR KE DOHE

अड़सठवा दोहा 

हस्ती चढिए ज्ञान कौ, सहज दुलीचा डारी |
स्वान रूप संसार है, भूकन दे झक मारी ||

[शब्द का अर्थ :- हस्ती-हाथी, स्वान-कुत्ता, भूकन दे-भोंकने दो ]

भावार्थ- कबीरजी कहते है, ऐसे उच्च ज्ञान को प्राप्त कीजिये जिससे तुम्हारी अंतरात्मा सहज जो जाए | क्यों की यह संसार तो एक श्वान (कुत्ता) के समान है यह आप ऊँचाई को प्राप्त कर लोंगे तो भी बोलेगा और नहीं प्राप्त कर सके तब भी बोलेगा | इसलिए उन्हें भोकने दो, बोलने दो उसपर अपनी कोइ भी प्रतिक्रिया व्यक्त न करो, आप हमेशा अपनी उन्नती पर ध्यान दो |

अर्थात इस दोहे में कबीरजी कहना चाहते है, साधक मस्ती से ज्ञानरुपी हाथी पर चढ़े हुए जा रहे है और संसार भर के कुत्ते भोंक भोंककर शांत हो रहे है परन्तु वह हाथी का कुछ बिगाड़ नहीं पा रहे हैं | यह दोहा निन्दको पर व्यंग है और साधकोंके लिए प्रेरणा | 



 

उनहत्तरवा दोहा 

प्रेमी ढूँढत मैं फिरों, प्रेमी मिले न कोइ |
प्रेमी को प्रेमी मिले, सब विष अमृत होई ||

[शब्द का अर्थ :- प्रेमी-इश्वर(रूपकात्मक), फिरों-भटकना ]

भावार्थ- मैं परमात्मा का वास्तवीक ज्ञान अर्थात परमात्मा को ढूढंता फिरता रहा पर मुझे उसकी प्राप्ती ही नही हुई | मैंने उसे पाने के लिए पूजा- पाठ,  कर्म- काण्ड सब कुछ किया पर मुझे उसके दर्शन नहीं हुए | पर मुझे वास्तविक इश्वर की प्राप्ती तब हुई जब मेरे लिए सब समान हो गए, मेरे मन में उंच-नीच, छोटा बड़ा ऐसा कोइ  भेद भाव ही नहीं रहा | मेरे लिए विष और अमृत दोनों एक सामान हो गए |

अर्थात कबीर जी इस दोहे में अपने प्रेमी रुपी इश्वर की खोज में हैं जो उन्हें कही मिल नही रहा | वे कहते है अपने प्रेमी अर्थात इश्वर से मिलने पर इस प्रेमी भक्त के मन का सारा दुःख रुपी विष, सुख के अमृत में बदल जायेगा |



KABIR KE DOHE 

सत्तरवा दोहा 

पखापखी के कारने, सब जग रहा भूलान |
निरपख होई के हरि भजै, सोई संत सुजान ||

[शब्द का अर्थ :-पखापखी-पक्ष-विपक्ष, भूलान-भूल गयी है, निरपख-निरपेक्ष, हरि-इश्वर, सोई-वही, सुजान-ज्ञानी] 

भावार्थ- पक्ष-विपक्ष, समर्थन-विरोध, सही-गलत के कारन हम सब जग को, सारे संसार को भुला बैठे है |      पक्ष-विपक्ष के चक्कर में इस दुनिया के लोग आपस में लढ रहे है, वे अपने झगड़े में इश्वर को भूल गए है | ज्यो व्यक्ती बिना किसी भेद भाव के, निरपेक्ष होकर जो इश्वर का भजन करता है, चिंतन करता है तो उसी मनुष्य को अच्छा व्यक्ती, संत व्यक्ती, सज्जन व्यक्ती कहां जाता है | वही मनुष्य मोक्ष को प्राप्त करने वाला होता है |



 

इकहत्तरवा दोहा

मानसरोवर सुभग जल, हंसा केलि कराहि |
मुकताफल मुकता चुगै, अब उड़ी अनत न जाही ||

[शब्द का अर्थ:-सुभग-पूरी तरह भरा हुआ, केलि-क्रीडा, मुकताफल-मोती, चुगै-चूनकर खाना, अनत-कही और]

भावार्थ- कबीरदास जी कहते है की हंस मानसरोवर नामक झील के जल में क्रिडा करते हुए आनंदीत हो कर मोती चुग रहे है और वह इसे छोड़कर कही और जाना नहीं चाहते है | ठीक इसी प्रकारसे मन रूपी सरोवर में जीवात्मा प्रभु भक्ती के आनंद रुपी जल में विहार करती है और वह अन्य किसी स्थान पर जाना नहीं चाहती | 

अर्थात मनुष्य एक बार जब उस परमपिता परमेश्वर के भक्ती में उसका कृपाप्रसाद ग्रहण कर लेता है, तो उसका मन प्रभु के भक्ती के बिना जीवन में कुछ और नहीं चाहता है |



 

बहत्तरवा दोहा 

मन हीं मनोरथ छांडी दे, तेरा किया न होई |
पानी में घिव निकसे, तो रुखा खाए न कोई ||

[शब्द का अर्थ :- मनोरथ-इच्छा, छांडी दे-त्यागना, छोड देना, घिव-घी, निकसे-निकलना, रुखा-सुखा हुआ ]

भावार्थ- मनुष्य मात्र को समझाते हुए कबीर कहते है कि मन की इच्छाएं छोड़ दो, उन्हें तुम अपने बूते पर हासिल नहीं कर सकते | मन की इच्छाओं का कोई अंत नहीं यह कभी भी ख़त्म नही होती है, इनके पीछे भागना बेवकूफी है| यदी पानी से घी निकल आए, तो रुखी रोटी कोई नही खाएगा |

अर्थात मन के इच्छाओं की कोई सीमा नहीं एक पूरी हो गयी तो दुसरी सामने आती है | 



KABIR KE DOHE

तिहत्तरवा दोहा

आधी औ रुखी भली, सारी सोग संताप |
जो चाहेगा चूपड़ी, बहुत करेगा पाप ||

[शब्द का अर्थ :-भली-अच्छी ]

भावार्थ- अपनी मेहनत की कमाई से जो भी कुछ मिले, वह आधी और सुखी रोटी ही बहुत अच्छी है | यदि तू  घी चुपड़ी रोटी चाहेगा तो सम्भव है तुम्हे पाप करना पड़े |

कबीर जी का कहना है कि बुनियादी आवश्यकताओं से परे आवश्यकताओं को बढ़ाना ठीक नहीं है। इससे समाज में विषमता की सृष्टि होती है |



 

चौहत्तरवा दोहा 

कुछ कहि नीच न छेडीये, भलो न वाको संग |
पत्थर डारे कीच में, उछलि बिगाड़े अंग ||

[शब्द का अर्थ :-संग-संगत, डारे-डाले, वाको-उसका, कीच-कीचड़, बिगाड़े-ख़राब करना ]

भावार्थ- किसी दुर्जन या दृष्ट व्यक्ति को कुछ भी कहकर कभी मत छेडीयें वह उसके दृष्ट स्वाभाव के अनुसार हमें हानी पहुंचा सकता है, और उसकी संगती में भी हमारी कोई भलाई नहीं होती है | जिस प्रकारसे कीचड़ में पत्थर डालने से पत्थर फेकने वाले का ही छींटे उछलने से शरीर गन्दा होता है, उसी प्रकार दुर्जन व्यक्ति से व्यवहार रखने पर व्यवहार रखने वाले का ही बुरा होता है।



KABIR KE DOHE

पचहत्तरवा दोहा 

तिनका कबहुँ ना निन्दिये, जो पाँवन तर होय |
कबहुँ उड़ी आँखिन पड़े, तो पीर घनेरी होय ||

[शब्द का अर्थ :-तिनका-सूखे घास का टुकड़ा, कबहुँ-कभी भी, पाँवन तर-पाँव के निचे, आँखिन-आँख, पीर-दर्द, घनेरी-बहुत ज्यादा ]

भावार्थ- कबीर दास जी कहते है कभी भी पैरों के निचे आने वाले छोटे से  तिनके की भी निंदा नहीं करनी चाहिए, उसे छोटा समझने की भूल नहीं करनी चाहिए, क्योंकिं जब वही तिनका आँख में उड़कर चला जाए तो बहुत पीड़ा सहनी पड़ती है | असहनीय पीड़ा सहने के बाद आप कभी भी छोटेसे तिनके को भी कम समझने की भूल नहीं करोंगे |

अर्थात मनुष्य को किसी भी इन्सान को छोटा नहीं समझना चाहिए, बहुत बार इन्ही लोगों के वजहसे उसे संकटों को झेलना पड़ता हैं |



 

छिहत्तरवा दोहा 

साधू भूखा भाव का, धन का भूखा नाहिं |
धन का भूखा जी फिरै, सो तो साधू नाहिं ||

[शब्द का अर्थ :-भाव-प्रेम, करुणा, भक्ती  ]

भावार्थ- कबीर दास जी कहते कि साधू हमेशा करुणा और प्रेम का भूखा होता है, इश्वर के भक्ती का भूखा होता है | उसे किसी भी प्रकार के धन संपती का लालच नहीं होता अर्थात वह कभी भी धन का भूखा नहीं होता | जो धन का भूखा होता है, लालची होता है, जो धन का प्राप्त करने के लिए भटकता फिरता है, ऐसा व्यक्ती कभी भी साधू नहीं हो सकता |



 

सतहत्तरवा दोहा

बाहर क्या दिखलाए, अंतर जपिए राम |
कहा काज संसार से, तुझे धानी से काम ||

[शब्द का अर्थ :- धानी-मालिक, स्वामी ]

भावार्थ-  भगवान के नाम का जाप सिर्फ बाहरी दिखावे के लिए नहीं करना चिहिए, नाम को आंतरीक रूप से, मन ही मन में जपना चाहिए | हमें संसार के लोगों से नहीं, संसार की चिंता छोड़कर संसार के मालिक से सम्बन्ध रखना चाहिए वही हमारा मुक्ति दाता है |



KABIR KE DOHE

अठहत्तरवा दोहा 

फल कारण सेवा करे, करे न मन से काम |
कहे कबीर सेवक नही, चाहे चौगुना दाम ||

[शब्द का अर्थ :- चौगुना-चारगुना,  दाम-पैसा ]

भावार्थ- कबीर जी कहते है, जो व्यक्ती भगवान की सेवा करते हैं पर उसके बदले में अपने मन में इच्छा रखकर उसका फल भी चाहता हैं, ऐसा मनुष्य वास्तव में भगवान का भक्त नहीं है, सेवक नहीं है क्योंकि सेवा के बदले वह कीमत चाहता है। और यह कीमत भी वह चौगुनी चाहता है, मतलब वह मनुष्य भगवान की सेवा नहीं मजदूरी कर रहा हैं |



 

उनासीवा दोहा 

आया था किस काम को, तु सोया चादर तान |
सम्भाल ए गाफिल, अपना आप पहचान ||

[शब्द का अर्थ :- आप-स्वयंम ]

भावार्थ- कबीर जी कहते है, हे मनुष्य तु यहाँ परमात्मा का भजन करने आया है, सत्कर्म करने आया है, पर तुम सब कुछ भुलाकर चादर तान कर सो रहे हो | जागो और वास्तविक सत्य को पहचानो, अपना होश ठीक कर और अपने को पहचान तू किस काम के लिए आया हैं? तू कौन हैं ? स्वयं को पहचान और सत्कर्मों में लग जा |



KABIR KE DOHE  

अस्सीवा दोहा 

जब मैं था तब गुरु नहीं, अब गुरु हैं मैं नाय |
प्रेम गली अति साँकरी, ता में दो न समाय ||

[शब्द का अर्थ :- मैं-अहंकार, साँकरी-छोटी ]

भावार्थ- जब तक अहंकार रूपी मैं मेरे अन्दर समाया हुआ था तब तक मैं गुरुं को अपने अन्दर, ह्रदय में स्थान नहीं दे पाया, पर अब जब मुझे गुरू मिल गये है, उनका प्रेम रस प्राप्त हुआ है और साक्षात् गुरु ही मुझमे समा गये हैं तब मेरा अहंकार समाप्त हो गया है, नष्ट हो गया है  | प्रेम की गली इतनी संकरी है कि इसमें एक साथ दो नहीं समा सकते अर्थात् गुरू के रहते हुए अंहकार नहीं उत्पन्न हो सकता।



 

इक्यासीवा दोहा 

कबीर कुता राम का, मुतिया मेरा नाउं |
गले राम की जेवड़ी, जीत खैंचे तित जाउं ||

[शब्द का अर्थ :-कुता-कुत्ता, मुतिया-मोती, नाउं-नाम, जेवड़ी-रस्सी ]

भावार्थ- कबीर जी कहते हैं मैं तो प्रभु राम का कुत्ता हूँ और मोती मेरा नाम है | मैंने मेरे गले में राम नाम की रस्सी बाँध ली है, और दिन-रात मैं मेरे प्रभु के भक्ती में खोया रहता हूँ | मुझे जहाँ मेरे राम ले जाते हैं मैं वहीं अपने आप खिंचा चला जाता हूँ | कबीर जी यहाँ परमात्मा को शरणागत होकर ये कह रहे है |



 

बयासीवा दोहा

जिनके नौबति बाजती, मैंगल बंधते बारि |
एकै हरि के नाव बिन, गए जनम सब हारि ||

[शब्द का अर्थ :-एकै-एक, हरि-इश्वर, नाव-नाम ]

भावार्थ- जिनके द्वार पर पहर–पहर नौबत बजा करती थी और मस्त हाथी जहाँ बंधे हुए झूमते थे अर्थात जो ऐश्वर्य संपन्न थे | ऐसे कुबेर भी अपना सारा धन, ऐश्वर्य गवां बैठे, अपने जीवन की बाजी भी हार गये | यह सब सिर्फ ईसलिए हुआ की सुख के दिनों में वह अपने परमपीता परमेश्वर को भूल गए, उसका स्मरण नहीं किया, उसको याद नहीं किया | 



KABIR KE DOHE 

तिरासीवा दोहा 

परनारी राता फिरैं, चोरी बिढिता खाहि |
दिवस चारि सरसा रहै, अंती समूला जाहि ||

[शब्द का अर्थ :-परनारी-पराई स्त्री, राता-रात, फिरैं-घूमना, समूला-पुरी तरहसे, सरसा-मस्ती में ]

भावार्थ- कबीर जी कहते है, परनारी से जो प्रीति जोड़ते है, प्यार करते है और कुछ भी मेहनत नही करते हुए जो चोरी करके, चोरी की कमाई खाते है | भले ही ऐसे लोग चार दिन फूले-फूले फिरे, मौज-मस्ती में अपना जीवन व्यतीत करे, किन्तु ऐसे लोग अंत में जडमूल से नष्ट हो जाते हैं |



 

चौरासीवा दोहा 

कागद केरी नाव री, पाणी केरी गंग |
कहैं कबीर कैसे तिरूँ, पंच कुसंगी संग ||

[शब्द का अर्थ :-कागद-कागज, नाव-नौका, गंग-गंगा ]

भावार्थ- कबीर जी कहते है, यह जीवन एक कागज की नाव है | मतलब यह जीवन नश्वर है, यह कभी भी ख़त्म हो सकता है, इसका कोइ भरोसा नहीं है | ऊपर से दुनिया में हर तरफ मनुष्य को विचलित करने के लिये मोह, माया के जाल बिछे हुए है | चंचल इन्द्रियों का स्वामी मनुष्य इसमें आसानीसे फस सकता है | उस प्रभु को पाने के लिए मुझे इन सारी बाधाओंको पर करना पड़ेगा | 

अर्थात–नाव यह कागज की है, और गंगा में पानी-ही-पानी भरा है । फिर साथ पाँच कुसंगियों का है, कैसे पार जा सकूँगा ? [ पाँच कुसंगियों से तात्पर्य है पाँच चंचल इन्द्रियों से ।]



KABIR KE DOHE

पचासीवा दोहा 

काजल केरी कोठडी  तैसा यहु संसार |
बलिहारी ता दास की, पैसिर निकसणहार ||

[शब्द का अर्थ :- दास-भक्त, सेवक, संसार-दुनिया ]

भावार्थ- यह दुनिया तो काजल की कोठरी है , जो ही इसमें पैठा, उसे कुछ न  कुछ कालिख तो लग ही जायेगी | धन्य है उस प्रभु भक्त को, जो इसमें पैठकर बिना कालिख लगे साफ़ निकल आता है |

अर्थात कबीर कहते है, यह दुनिया एक ऐसी कोठरी है जिस में मोह, माया, मद, लोभ, क्रोध आदी विकार भरे पड़े है | कोइ भी मनुष्य इन विकारोंका शिकार हो सकता है | पर धन्य है प्रभु के वह भक्त जो इन विकारोंसे भरे संसार में रहकर भी अपने आप को विकारों से दूर रखकर प्रभु के भक्ती में मगन रहते है |



 

छियासीवा दोहा 

संत ना छाडै संतई, जो कोटिक मिले असंत |
चन्दन भुवंगा बैठिया, तउ सीतलता न तजंत ||

[शब्द का अर्थ :-कोटिक-करोड़ों, असंत-दुर्जन, भुवंगा-साप, सीतलता-शीतलता, तजंत-त्यागना ]

भावार्थ- भले ही करोड़ों दुर्जन, दृष्ट लोग संत-महात्मा के रास्ते में आ जाये या उनसे मिले, फिर भी सन्त अपनी अच्छाइयां, सज्जनता और संतपना नहीं छोड़ता | वैसे ही चन्दन के वृक्ष पर कितने ही साँप आ बैठें, तो भी चन्दन अपनी शीतलता को नही छोडता |

अर्थात जीवन में हमे अच्छाइयों का मार्ग कभी भी छोड़ना नहीं चाहिए |



 

सत्तासीवा दोहा

ज्यों तिल माहि तेल है, ज्यों चकमक में आग |
तेरा साईं तुझ ही में हैं, जाग सके तो जाग ||

[शब्द का अर्थ :-चकमक-आग जलानेवाला पत्थर, साईं-परमेश्वर ]

भावार्थ- जैसे तिल में तेल होता हैं और चकमक पत्थर में आग होती हैं, वैसे ही तेरा साई, तेरा प्रभु, तेरा परमात्मा तुझमे ही है | उसे कही बाहर ढूढने की जरूरत नहीं है | हमारे ईश्वर हमारे अन्दर है और हम सोये हुए है, उसे कही और ढूंढ रहे है | कबीर हमें जागने के लिए कह रहे है | हम जगे तो है पर पांचो इन्द्रियों को सुख पहुचाने के लिए जागे है | हमारे भीतर तो परमात्मा है; उसे जानने के मामले में हम अब तक सोये हुए है | कबीर कहते है जाग सके तो जागो और अपने अन्दर वास कर रहे परमेश्वर को जानो |



KABIR KE DOHE

अट्ठासीवा दोहा

चलती चाकी देख के, दिया कबीरा रोय |
दोउ पाटन के बीच में, साबुत बचा न कोय ||

शब्द का अर्थ :- चाकी-अनाज पिसने वाली चक्की, दोऊ-दोनों, साबुत-अखंड ] 

भावार्थ- संसार की चक्की के दो पत्थर-पाटों के बीच हम सब अनाज के दानों की तरह पिस रहें है, और इस पीसाई के अंत में कोई भी साबुत बचने वाला नहीं है | मनुष्य को संसार में सुख-दुःख, पाप-पुण्य के रूपमे अविरत संघर्ष करना पड़ता है | मनुष्य के इस कष्ट को देख कर कबीर जी व्यथित मन से रो देते है | कबीर जी जानते है जो मनुष्य खुद को पहचानेगा, उस परमपिता के शरण में जायेगा वही इस संसार के दुखो से बच पायेगा |  



 

नवासीवा दोहा 

जिन घर साधू न पुजिये, घर की सेवा नाही |
ते घर मरघट जानिए, भूत बसे तीन माही ||

[ शब्द का अर्थ :- मरघट-शमशान ]

भावार्थ- कबीर जी कहते है जिस घर में साधू, संत-महात्मा, उनके विचार और सत्य की पूजा नही होती उस घर में पाप बसता है| साधू-संतो के विचार, उनका मार्गदर्शन जिस घर को मिल जाता है, जो घर उनके बताये गए सत्य मार्ग पर चलता है वह घर एक पवित्र वास्तु होता है, उस घर की हररोज उन्नति होती है | और जिस घर में साधू-संतो और उनके विचारोंका आदर नहीं होता है उस घर की अधोगती होती है, ऐसा घर तो उस शमशान के समान होता है जहाँ दिन में ही भूत प्रेत बसते है |



KABIR KE DOHE 

नब्बेवा दोहा 

सुखिया सब संसार है, खायै अरु सोवै |
दुखिया दास कबीर है, जागै अरु रोवै ||

[ शब्द का अर्थ :- सुखिया- सुखी, अरु-और, सोवै-सोया हुआ, दुखिया–दु:खी,  रोवै- रो रहे ]

भावार्थ- कबीर जी कहते है कि, ये दुनिया सुखि है क्यों की ये केवल खाने और सोने का काम करती है | इसे किसी प्रकार की चिंता नहीं है | उनके अनुसार सबसे दुखी व्यक्ती वो है , जो प्रभु के वियोग में जागते रहते है | वे ईश्वर के सत्यता को जान चुके है इसलिए वह जागे हुए है और इश्वर के वियोग में रो रहे है | 

अर्थात सांसारीक भोग में  लगे हुए व्यक्ती तो सुखपूर्वक रहते है और जो प्रभु वियोग में व्याकुल रहते है वे जागते रहते है |



 

इक्यानबेवा दोहा 

बिरह भुवंगम तन बसै, मंत्र न लागै कोइ |
राम बियोगी न जिवै, जिवै तो बौरा होई  ||

[ शब्द का अर्थ :- बिरह–बिछडने का गम, भुवंगम-भुजंग, सांप, बौरा-पागल, मंत्र-उपाय, बियोगी-विरह में तडपने वाला, जिवै-जीवित ]

भावार्थ- कबीर जी कहते है जब मनुष्यके मन में अपनों के बिछडने का गम सांप बन कर लोड़ने लगता है तो उस पर नही कोई मन्त्र असर करता है ओर नही कोई दवा काम करती है | उसी तरह राम अर्थात इश्वर के वियोग में मनुष्य जीवित नहीं रह सकता और यदि वह जीवित रहता भी है तो उसकी स्थिती पागलों जैसी हो जाती है |

अर्थात संसार में अपने प्रिय प्रभु से बिछड़ने का गम सबसे ज्यादा होता है |



 

बानबेवा दोहा 

हम घर जाल्या आपणा, लिया मुराडा हाथी |
अब घर जालौं तास का, जे चलै हमारे साथि ||

[ शब्द का अर्थ :- जाल्या-जलाया, आपणा-अपना, मुराडा-जलती हुई लकड़ी (ज्ञान), जालौं-जलाऊं, हाथी-हात में, तास का-उसका]

भावार्थ- कबीरजी कहते है उन्होंने अपने हाथों से अपना घर जला दिया है, अर्थात उन्होंने मोह-माया रूपी घर को जला कर ज्ञान प्राप्त कर लिया है |अब उनके हांथों में जलती हुई मशाल है, यानी ज्ञान है | अब वे उसका घर जलाएंगे जो उनके साथ चलना चाहता है और ज्ञान की प्राप्ती करना चाहता है | अर्थात उसे भी मोह-माया से मुक्त होना होगा जो ज्ञान प्राप्त करना चाहता है |



 

तिरानबेवा दोहा 

आवत गारी एक है, उलटत होई अनेक |
कह ‘कबीर’ नहीं उलटिए, वही एक की एक |

[ शब्द का अर्थ :- गारी- गाली ]

भावार्थ- जब कोइ व्यक्ती किसी को गाली देता हैं तो वह एक ही होती है, पर सामने वाला जब उसका उल्टा जवाब देता है तो वह कई रूप ले लेती हैं | जवाब देने पर गलियों का सिलसिला चल निकलता हैं | कबीरजी का कहना है कि गाली का उलटकर उत्तर नही देना चाहिए, ऐसा करने पर वह एक की एक ही रह जाती है अन्यथा उसका स्वरुप बढ़ता जाता है |



 

चौरानबेवा दोहा 

कबीर लहरि समंद की, मोती बिखरे आई |
बगुला भेद न जानई, हंसा चुनी-चुनी खाई ||

[ शब्द का अर्थ :- समंद-समुंदर, समुद्र, भेद-अंतर, लहरि-लहर ]

भावार्थ- कबीर कहते हैं कि समुद्र की लहर अपने साथ में मोती बहाकर लाती है और उन्हें किनारों पर बिखेर देती है । पर अज्ञानी बगुला मोतियों को पहचान नहीं पाता है , परन्तु ज्ञानी हंस उन्हें चुन-चुन कर खा लेता है, हासिल कर लेता है ।

इसका अर्थ यह है कि गुरु सब शिष्योंको इक सामान ही शिक्षा देते है, पर समझदार शिष्य उसे भली-भांती समझकर अपना लेता है और जीवन में अपनी उन्नती कर लेता है | तात्पर्य किसी भी वस्तु का महत्व जानकार ही जानता है ।



KABIR KE DOHE

पंचानबेवा दोहा 

जो उग्या सो अन्तबै, फूल्या सो कुमलाहीं |
जो चिनिया सो ढही पड़े, जो आया सो जाहीं ||

[शब्द का अर्थ :-उग्या-उत्पन्न होना, अन्तबै-अंत, समाप्ति, कुमलाहीं-मुरझना, चिनिया-निर्माण करना, ढही-गिरना]

भावार्थ- इस संसार का नियम यही है कि जिसका उदय हुआ है, उसका अस्त भी होगा | जो विकसित हुआ है वह मुरझा जाएगा। जिसका निर्माण किया गया है वह एक न एक दिन गिर पड़ेगा | और इस संसार में जिसका जनम हुआ है वह एक न एक दिन मर जायेगा | अर्थात इस संसार में जितनी भी वस्तुए है उनका अंत निश्चित है, सभी नश्वर है |



 

छियानबेवा दोहा 

ऐसा कोई ना मिले, हमको दे उपदेस |
भौ सागर में डूबता, कर गहि काढै केस ||

[ शब्द का अर्थ :-उपदेस-उपदेश, भौ सागर-भव सागर ]

भावार्थ- कबीर संसारी जनों के लिए दुखि होते हुए कहते हैं कि इन्हें कोई ऐसा पथदर्शक नही मिला जो इस संसार रुपी भव सागर को पार करने का मार्ग बताता | संसार सागर में डूबते हुए इन प्राणियों को अपने हाथों से  केश पकड़ कर निकाल लेता और इनको मुक्ति का मार्ग बताकर इनका उद्धार करता |



 

सत्तानबेवा दोहा 

कबीर सुता क्या करे, जागी न जपे मुरारी |
एक दिन तू भी सोवेगा, लम्बे पाँव पसारी ||

[ शब्द का अर्थ :- सुता-सोया हुआ, मुरारी-इश्वर, सोवेगा-मर जायेगा ]

भावार्थ- कबीर कहते हैं, अज्ञान की नींद में सोए क्यों रहते हो? ज्ञान की जागृति को हासिल कर, प्रभु का नाम लो । सजग होकर प्रभु का ध्यान करो । वह दिन दूर नहीं जब तुम्हें गहन निद्रा में सो जाना है, इसीलिए जब तक जाग सकते हो जागते क्यों नहीं? प्रभु का नाम स्मरण क्यों नहीं करते ?



 

अट्ठानबेवा दोहा 

हरिया जांणे रूखड़ा, उस पाणी का नेह |
सूका काठ न जानई, कबहूँ बरसा मेंह ||

[ शब्द का अर्थ :-हरिया-हरा, नेह-स्नेह, सूका-सुखा ]

भावार्थ-  वृक्ष को हरा होने के लिए पाणी की जरूरत होती है, बिना पाणी के वह सुख के लकड़ी बन जायेगा | इसलिए उसे पाणी का महत्व मालूम होता है | पानी के स्नेह को हरा वृक्ष ही जानता है | पर सूखा काठ और सुखी  लकड़ी जिन्हें पाणी की जरूरत नही होती, उन्हें पाणी से स्नेह भी नहीं होता है वह  क्या जाने कि कब पानी बरसा?

अर्थात सहृदय मनुष्य ही प्रेम भाव को समझता है, प्रेम के महत्व को जनता है | निर्मम मन इस भावना को क्या जाने ? क्यों की उन्हें कभी किस से प्रेम करना ही नहीं है |



 

निन्यानबेवा दोहा

लंबा मारग दूरि घर, बिकट पंथ बहु मार |
कहौ संतों क्यूं पाइए, दुर्लभ हरि दीदार ||

[ शब्द का अर्थ :- मारग-मार्ग, दुर्लभ-कठिन, हरि-इश्वर, दीदार-दर्शन ]

भावार्थ-  इश्वर के प्राप्ती का मार्ग न केवल लम्बा है बल्की बड़ा कठिन भी है, और इस मार्ग में बहुतसे लुटेरे अर्थात सांसारिक आकर्षण भी मिलते है| कबीर जी कहते है, हे संतो अब आप ही बताइयें ऐसे स्थिती में उस दुर्लभ भगवान के दर्शन कैसे हो|

इस दोहे में काम, क्रोध, लोभ, मोह और मद इन् पांचो विकारों को साधना के मार्ग का लुटेरा कहां गया है|



KABIR KE DOHE 

एक सौ दोहा

कबीर सीप समंद की, रटे पियास पियास |
समुदहि तिनका करि गिने, स्वाति बूँद की आस ||

[ शब्द का अर्थ :-समंद-समुन्दर, रटे-रटना, पियास-प्यास ] 

भावार्थ- कबीरजी कहते हैं कि समुद्र की सीपी प्यास प्यास रटती रहती है | समुद्र की सीपी को स्वाति नक्षत्रमें गीरने वाली बूंदों का इंतज़ार रहता है | इसी बूंदों से सीपी मोती का निर्माण करती है | इसी स्वाति नक्षत्र की बूँद की आशा लिए हुए समुद्र की अपार जलराशि को भी सीपी तिनके के बराबर समझती है |

अर्थात हमारे मन में जिसे पाने की ललक है, जिसे पाने की लगन है, उसके बिना हमें संसार की बाकी सारी चीज़ें  कम महत्व की लगती है |



 

एक सौ एक

बिन रखवाले बाहिरा, चिड़िये खाया खेत |
आधा परधा ऊबरै, चेती सकै तो चेत ||

[ शब्द का अर्थ :- रखवाले-रक्षक, रखवाल,  बाहिरा-बाहर से, चेती-सावधान ]

भावार्थ- खेत में बोया हुआ अनाज बिना रखवाली के था, यह देख कर चिडियोने खेत में उगे हुए अनाज को बाहर से खाना चालू कर दिया और लगभग आधे खेत का अनाज वह खा चुकी है और कुछ खेत अब भी बचा है | अगर उस बचे हुए खेत को चिड़ियों से बचाना है तो जल्दी से जागो, सावधान हो जाओ और खेत को बचालो|

कबीर कहते है जीवन में असावधानी के कारण  इंसान बहुत कुछ गँवा देता है और उसे खबर भी नहीं लगती के नुकसान हो चुका है | यदि जीवन में हम समय पर सावधानी बरतें तो होने वाले नुकसान से बच सकते हैं |



 

एक सौ दो

करता केरे गुन बहुत, औगुन कोई नाहिं |
जे दिल खोजों आपना, सब औगुन मुझ माहिं ||

[ शब्द का अर्थ :- करता-इश्वर, गुन-गुण, औगुन-अवगुण ] 

भावार्थ-  कबीर जी कहते है, इस दुनिया का जो परमपिता परमेश्वर है, जो इस संसार को चलाता है उसमे तो अगणीत गुण है | मैंने पाया है की उसमे एक भी अवगुण नहीं है | पर जब मैंने खुदके बारे में सोचा और अपने दिलके अन्दर खोजा तब मुझे पता चला के समस्त अवगुण तो मेरे अपने अपने ही भीतर हैं |

अर्थात दूसरों के अवगुन देखने से पहले अपने अवगुण ढूँढने चाहिए |



 

एक सौ तीन

तू कहता कागद की लेखी, मैं कहता आँखिन की देखी |
मैं कहता सुरझावन हारि, तू राख्यौ उरझाई रे ||

[ शब्द का अर्थ :- कागद-कागज, आँखिन-आँख, लेखी-लिखा हुआ, उरझाई-उलझन, सुरझावन-सुलझाना ]

भावार्थ-  तुम किताबोंमे, पोथीयों में और शास्त्रों में जो लिखा है उसे रटते रहते हो, उसे ही सत्यवचन और प्रमाण मानते हो | पर मेरा ऐसा नहीं है, मैं जो आँखों से देखता हूँ, महसूस करता हूँ, समझता हूँ उसे ही मैं सत्य मानता हूँ और वही कहता हूँ | मैं सरलता से हर बात को सुलझाना चाहता हूँ और तुम सीधी बातको भी बेवजह उलझाके रख देते हों |

अर्थात किसी भी बात को, समस्याको सरलता से सुलझाना चाहिए | बेवजह उसे उलझाने से समस्या और कठिन हो जाती है |



 

एक सौ चार 

पढ़ी पढ़ी के पत्थर भया, लिख लिख भया जू ईंट |
कहें कबीरा प्रेम की लगी न एको छींट ||

[ शब्द का अर्थ :-पढ़ी पढ़ी के- पढ-पढ के, भया-बन गया, छींट-दाग ]

भावार्थ-  बहुत पढ़-लिख लिया, ज्ञान हासिल किया | ज्ञानी हो गए तो मन में अहंकार आ गया, दूसरों को तुच्छ समझने लगे | पढ़-लिख लिया तो ज्ञान के अहंकार के वजहसे मन पत्थर और ईट जैसा कठोर हो गया | कबीर कहते है इतना पढ़ लिख लेने के बाद भी, ज्ञानी बनने के बाद भी अगर दूसरों के प्रती ह्रदय में स्नेह और प्रेम की भावना नहीं हो तो ऐसी पढाई लिखाई का क्या फायदा | प्रेम की एक बूँद, एक छींटा भर जड़ता को मिटाकर मनुष्य को सजीव बना देता है.   

अर्थात ज्ञानी होने के साथ साथ दूसरों के प्रती मन में प्रेमभाव भी होना चाहिए |



KABIR KE DOHE

एक सौ पाँच

सोना सज्जन साधू जन, टूट जुड़े सौ बार |
दुर्जन कुम्भ कुम्हार के, एइके ढाका दरार ||

[ शब्द का अर्थ :-कुम्भ-मटका, दरार-टूटना, कुम्हार-मिटटी के बर्तन बनाने वाला ]

भावार्थ-  कबीर कहते है सज्जन मनुष्य और साधू यह कीमती धातु सोने की तरह होते है | जिस प्रकार से सोना लचीला होने के वजह से कितने भी आघात झेल लेता है और टूट भी गया तो फिर से जुड़ने की योग्यता रखता है | उसी प्रकार से सज्जन मनुष्य और साधू जीवन में कितने भी दुःख आए, संकट आए उन्हें झेल के फिरसे उठ खड़े होते है | लेकिन दुर्जन व्यक्ति कुम्हार द्वारा बनाये गये मिट्टी के बर्तन जैसा होता है जो एक बार टूट जाने पर वह हमेशा के लिए टूट जाता है।



 

एक सौ छह

लकड़ी कहे लुहार की, तू मति जारे मोहि |
एक दिन ऐसा होयगा, मई जरौंगी तोही ||

[ शब्द का अर्थ :-  लुहार-लोहार, मति-मत, जारे-जलाना, जरौंगी-जलाऊँगी, मोहि-मुझे, तोहि-तुझे ]

भावार्थ-  लोहार जो लोहे से वस्तुओं को बनाता है, लोहे की वस्तुएं बनाने के लिए उसे आग की जरूरत  होती है, जिसे वह लकड़ियों को जलाकर उत्पन्न करता है | वही लकड़ी एक लोहार से कहती है कि आज अपनी जीविका के लिए तुम मुझे जला रहे हो | लेकिन याद रखना एक दिन ऐसा आएगा, जब तुम्हारी मृत्यु हो जायेगी तब मैं तुम्हें चिता पर जला दूंगी |

अर्थात अपने स्वार्थ के लिए किसीको तकलीफ नही देनी चाहिए, वरना भविष्य में हमें उससे समस्याओंका सामना करना पड सकता है |



 

एक सौ सात

कबीर हमारा कोई नहीं, हम काहू के नाहिं |
पारै पहुंचे नाव ज्यौं मिलिके बिछुरी जाहिं || 

[ शब्द का अर्थ :-काहू के-किसी के, मिलिके-मिलकर, बिछुरी-बिछड़ना ]

भावार्थ-  कबीरजी कहते है इस मोहमायासे भरी दुनियासे हमें कितना भी लगाव हो जाए सच तो यही है की यहा हमारा कोई नहीं है और हम किसीके नही है | जैसे नाव में बैठे यात्री सफ़रमे एक दुसरे के दोस्त हो जाते है पर जैसे ही सफ़र ख़त्म होता है वह एक दुसरेसे बिछड जाते है | ठीक उसी तरह से जैसा ही हमारा इस संसार रूपी नाव का सफ़र ख़त्म हो जायेगा हम सबसे बिछड़ने वाले है, हमारे सब सांसारिक सम्बन्ध यहीं छूट जाने वाले हैं |     

अर्थात मनुष्य देह नश्वर है, मृत्यु के पश्चात वह सबसे बिछड़ने वाला है |    



KABIR KE DOHE 

एक सौ आठ

तन को जोगी सब करें, मन को बिरला कोई |
सब सिद्धि सहजे पाइए, जे मन जोगी होइ ||

[ शब्द का अर्थ :-तन-शरीर, जोगी-साधू, बिरला-ख़ास, निराला ]

भावार्थ-  शरीर को योगी जैसा सजाकर मतलब भगवे वस्त्र, भस्म, रुद्राक्ष माला और जटाए बढाकर लोगों को प्रवचन देकर खुद को योगी स्थापित करना और प्रसीद्ध होना आसान बात है | परन्तु मन का योगी बनना बिरले व्यक्तियों का ही काम है, य़दि मन योगी हो जाए तो सारी सिद्धियाँ सहज ही प्राप्त हो जाती हैं। सच्चे योगी के लक्षण भी यही हैं |                      



 

एक सौ नौ

आछे दिन पाछे गए, हरी से किया न हेत |
अब पछताए होत क्या, चिडिया चुग गई खेत ||

[ शब्द का अर्थ :- आछे-अच्छे, पाछे-पीछे गए, छूट गए, हरी-इश्वर, हेत-प्यार, भक्ती, चुग गई-खा गयी, चिडिया-पंछी, पक्षी ]

भावार्थ-  जब मनुष्य के अच्छे दिन होते है तब वह अपने परिवार के साथ मौज-मस्ती और सुख में रममाण रहता है | सुख के दिनों में उसे उस परमपिता परमेश्वर की याद नहीं आती है, वह उसकी भक्ती नही करता है | पर जैसे ही उसके जिन्दगी में दुःख और संकट आने लगते है उसे ईश्वर की याद आने लगती है |

जब अच्छे दिन थे तब प्रभु से प्यार नहीं किया, उसकी भक्ती नहीं की इसका उसको पछतावा होने लगता है | यह उसी तरह से है जब खेत में अनाज था तब उसकी रखवाली नहीं की और जब चिड़ियों ने सारा अनाज खा लिया तो खुद को कोसने लगा | 

अर्थात समय रहते काम कर लिया जाए तो बाद में पछताना नहीं पड़ता |



KABIR KE DOHE 

एक सौ दस

इक दिन ऐसा होइगा, सब सूं पड़े बिछोह |
राजा राणा छत्रपति, सावधान किन होय ||

[ शब्द का अर्थ :-होइगा-होगा, सब सूं-सबसे, बिछोह-बिछडना, किन-क्यों नही ]

भावार्थ-  इस दुनिया की सारी चीजे नश्वर है, सबका अंत होना है | हे मनुष्य तुझे भी एक दिन अपने परिवार से, दोस्तों से और बड़े कष्ट से अर्जित कीए हुये धन-संपत्ति से भी बिछडना है, सबको यही छोड़ जाना है | इसलिए जो भी राजा है, छत्रपति है, सरदार है, धनवान है तुम अभी से सावधान क्यों नहीं हो जाते |



 

एक सौ ग्यारह

कबीर प्रेम न चक्खिया, चक्खि न लिया साव |
सूने घर का पाहुना, ज्यूं आया त्यूं जाव ||

[ शब्द का अर्थ :-चक्खिया-चाटना, साव-स्वाद,  ज्यूं आया-जैसे आया, त्यूं जाव-वैसेही जायेगा, सूने घर-जिस घर में कोइ नहीं रहता ]

भावार्थ-  कबीर जी कहते है, इस संसार में जनम लेकर अगर प्रेम नहीं चखा, उस इश्वर के भक्ति का रस नहीं पिया, उसके कृपा दृष्टी का स्वाद नहीं लीया तो ऐसे मनुष्य का जीवन अर्थहीन है | उसने जीया जीवन ऐसे ही है जैसे किसी सुने घर का मेहमान | सुने घर में किसी की भी आवभगत नहीं होती | वहा पर आये हुए मेहमान को बिना कुछ प्राप्त किए बगैर, खाली हाथ वहासे जाना पड़ता है |



 

एक सौ बारह

मैं मैं बड़ी बलाय है, सकै तो निकसी भागि | 
कब लग राखौं हे सखी, रूई लपेटी आगि ||

[ शब्द का अर्थ :-मैं-अहंकार, बलाय-संकट, सकै तो-हो सके तो, भागि-भाग जाओ, राखौं-रखना, रूई-कपास, आगि-आग ]

भावार्थ-   मनुष्य के जीवन में अहंकार, अहम् यह उसका एक प्रकार से बहुत बड़ा शत्रु है, जिसके वजहसे उसे जीवन में दुःख और संकटो का सामना करना पड सकता है | इसलिए मनुष्य को अहंकार को त्याग देना चाहिए, उससे दूर भागना चाहिए | अहंकार किसी कपास में लपेटी हुयी आग की तरह है, जिस तरह आग पलभर में कपास को जलाकर राख कर देती है,  वैसे ही अहंकार मनुष्य के जीवन को बरबाद कर सकता है |

अर्थात मनुष्य को जीवन में अहंकार से दूर ही रहना चाहिए |  



 

एक सौ तेरह

इस तन का दीवा करों, बाती मेल्यूं जीव |
लोही सींचौं तेल ज्यूं, कब मुख देखों पीव ||

[ शब्द का अर्थ :-तन-शरीर, दीवा-चिराग, दीपक, जीव-प्राण ]

भावार्थ-  उस परमपिता इश्वर के भक्ति में, मैं अपने देह (शरीर) का दीपक बना लूं, चिराग बना लूं और उसमे अपने प्राणों की, आत्मा की बाती बनाकर ऐसे चिराग में अपने रक्त को तेल की तरह इस्तमाल करू | ऐसे अनोखे चिराग को जलाके, रोशन करके क्या मैं अपने प्रिय भगवान के मुख का दर्शन कर पाऊंगा?

अर्थात प्रभु से भक्ती करना, उससे प्यार करना, उससे मिलने की इच्छा रखना यह बहुत ही कठिन साधना है | कोइ भी मोह-माया में फसा साधारणसा मनुष्य यह नहीं कर सकता | उसके लिए तो कोइ असाधारण, योगी प्रवृती का मनुष्य ही चाहिए |       



 

एक सौ चौदह

हिन्दू मुआ राम कहि, मुसलमान खुदाइ |
कहैं कबीर सो जीवता, दुहूँ के निकट न जाई ||

[ शब्द का अर्थ:-मुआ-मर गया, सो जीवता-वही जीता है, दुहूँ-दोनों ]

भावार्थ हिन्दू राम के नाम पर और मुसलमान खुदा के नामपर आपस में झगड़ा करते करते मर जाते है की  किसका भगवान श्रेष्ट और महान है | कबीरदास कहते है इस संसार में वही मनुष्य जिन्दा रहता है जो इस झगड़े से अपने आपको दूर रखता है और खुद को प्रभु के भक्ती में लीन रखता है | ऐसा ही मनुष्य इस संसार में जिन्दगी जीने के लायक है | 

अर्थात इश्वर एक ही है, जो मनुष्य इसे समझ पाता है वही प्रभु को अपने करीब पाता है |



KABIR KE DOHE

एक सौ पन्द्रह

मलिन आवत देख के, कलियन कहे पुकार |
फूले फूले चुन लिए, कलि हमारी बार ||

[ शब्द का अर्थ :-मलिन-बाग़ का माली, कलियन-कलियाँ, आवत-आते हुए, कलि-कल, हमारी बार-हमारा वक्त]

भावार्थ-  बाग़ के माली को आते देखकर बगीचे की कलियाँ अपने कलि साथियों से कहती है | बाग़ का माली आज बगीचे के फूलों को तोड़ने के लिए आ रहा हैं, वह फूलों को तोड़ेगा पर कलियों को नही | पर याद रखना जब हम कलियाँ, कलियों से खिलकर कल फूल बनेगे तब यह बगीचे का माली हमें भी तोड़ेगा |

अर्थात इस जगत में सारी चीजें नश्वर है, सबका अंत तय है | आज किसकी मृत्यु हो गयी तो शोक करलो, पर याद रखना कल तुम्हरी भी मृत्यु होने वाली है |  काल सबके लिए समान है | 



 

एक सौ सोलह

जल में बसे कमोदनी, चंदा बसे आकाश |
जो है जा को भावना, सो ताहि के पास ||

[ शब्द का अर्थ :-जल-पाणी, कमोदनी-कमल, बसे-निवास करना, चंदा-चन्द्रमा, 

भावार्थ-  प्रेम ह्रदय के पवित्र भावना का नाम है | प्रेम में नजदीकी-दूरी, छोटे-बड़े और उंच-नींच का कोई भेद नहीं होता | कुमुदिनी का फूल जल में खिलता है और चन्द्रमा आकाश में होता है फिर भी दोनों का प्रेम संसार भर में प्रसिद्ध है | जिसकी प्रेम भावना जिसमें होती है वह उसीके ह्रदय में वास करता है | उसीके निकट रहता है | फिर दोनों चाहे एक दुसरे से कितने ही दूर क्यूँ न हो |

वैसे ही जब कोई इंसान ईश्वर से सच्चे दिल से  प्रेम करता है, भक्ति करता है, तो ईश्वर प्रसन्न होकर स्वयं चलकर उसके पास आते हैं।



KABIR KE DOHE 

एक सौ सत्रह

ते दिन गए अकारथ ही, संगत भई न संग |
प्रेम बिना पशु जीवन, भक्ति बिना भगवंत ||

[ शब्द का अर्थ :-अकारथ-व्यर्थ, पशु-जानवर, भगवंत-इश्वर, संगत-साथी ]

भावार्थ- दुनिया में अपना जीवन व्यतीत करते हुए मनुष्य जो समय बिताता है उसे व्यर्थ ही समझना अगर उसने ना कभी सज्जनों की संगति की हो और ना ही कोई अच्छा काम किया हो, न किसीसे प्रेम किया हो और ना ही किसीकी भक्ति की हो  | 

मानव जीवन में प्रेम और भक्ति का बड़ा महत्व है | जिस मनुष्यने अपने जीवन में किसीसे भी प्रेम नहीं किया हो, उस परमपीता परमेश्वर की भक्ती नही की तो उस मनुष्य का जीवन किसी पशु (जानवर) समान समझना चाहिए |  भक्ति करने वाले इंसान के ह्रदय में भगवान का वास होता है |



 

एक सौ अठारह

नहीं शीतल है चंद्रमा, हिम नहीं शीतल होय |
कबीर शीतल संत जन, नाम सनेही होय ||

[ शब्द का अर्थ :-शीतल-मुलायम, कोमल, हिम-बर्फ़, सनेही-स्नेह ]  

भावार्थ-  जिसका मन शांत, शीतल होता है वह सबसे प्रेम करता है, सब उसे प्रेम करते है और वह प्रभु के सबसे करीब भी होता है | कबीरजी कहते है दुनिया में सबसे शीतल ना तो सबसे मुलायम रोशनी बिखरने वाला चन्द्रमा होता है और ना तो सबको ठण्ड से जमा देनेवाला बर्फ होता है | 

दुनिया में सबसे शीतल, ह्रदय से मुलायम और कोमल होते है सज्जन पुरुष |  वह सबसे स्नेह करने वाले होते है और सबका भला सोचने वाले होते है |



 

एक सौ उन्नीस

शीलवंत सबसे बड़ा, सब रतनन की खान |
तीन लोक की सम्पदा, रही शील में आन ||

[ शब्द का अर्थ :-शीलवंत-चारित्र्यवान, रतनन-रत्न, शील-चारित्र्य ]

भावार्थ-  इस संसार में मनुष्यों के बीच सबसे बड़ा स्थान नही धनवान का होता है, नही राजा का होता है और नहीं किसी सम्राट का होता है | सबसे बड़ा स्थान होता है शीलवान पुरुष का | शीलवंत पुरुष सज्जनता, सदाचार, धार्मिकता, विनयशीलता और नम्रता इन गुणों से युक्त होता है | 

कबीरजी कहते है शीलवान पुरुष इस संसार में मिलनेवाले रत्नों में से सबसे मौल्यवान रत्न है | जिसके पास शीलता है उसके पास मानों तीनों लोकों की संपत्ति है |



KABIR KE DOHE 

एक सौ बीस

कुटिल वचन सबसे बुरा, जा से होत न चार |
साधू वचन जल रूप है, बरसे अमृत धार ||

[ शब्द का अर्थ :-कुटिल वचन-कठोर बोल, साधू वचन-सज्जन वाणी, मीठे बोल ]

भावार्थ- इस जगत में सबसे बुरे कठोर वचन (बोल) होते हैं, ऐसे कडवे बोल किसी को नहीं बोलने चाहिए जिससे लोग नाराज हो जाये, कडवे बोल किसी भी चीज या समस्या का समाधान नहीं कर सकते | कड़वे शब्द वाले व्यक्तियों को कोई प्यार नहीं करता है | मनुष्य को हमेशा मधुर वाणी ही बोलनी चाहिए |

सज्जन व्यक्ती की मीठी वाणी जल के समान होती है | जब सज्जन व्यक्ती, साधू व्यक्ती अपनी मीठी वाणी से बोलता है तो ऐसा लगता है मानो अमृत की वर्षा हो रही हो |  

अर्थात कडवे वचन बोलने से हमारा ही नुकसान होता है और मधुर वचन बोलने से फायदा |



 

एक सौ इक्कीस

कागा का को धन हरे, कोयल का को देय |
मीठे वचन सुना के, जग अपना कर लेय ||

[ शब्द का अर्थ :-कागा-कव्वा, हरे-चुरा लेना, देय-देना ]

भावार्थ-  इस जगत में कौआ और कोयल के बिच में कोयल को सबसे ज्यादा पसंद किया जाता है | वैसे देखा जाये तो दोना का रंग-रूप समान है, पर फिर भी लोग सबसे ज्यादा कोयल को ही पसंद करते है | कौआ किसीकी धन-संपत्ति को चुराता नहीं है और नही कोयल किसीको कुछ देती है फिर भी लोग कोयल को पसंद करते है, इसका सबसे प्रमुख कारण है बोली | 

कौआ अपनी कर्कश, कठोरे वाणी से सबको परेशान कर देता है पर कोयल अपनी मीठी बोली से सबको आनंद देती है, सबका मन मोह लेती है | यह फर्क है सिर्फ मीठी बोली का |

अर्थात कठौर वचन बोलने से लोग हमसे घृणा करते है और मधुर वचन बोलने से प्यार |



 

एक सौ बाईस

मांगन मरण समान है, मत मांगो कोई भीख |
मांगन से मरना भला, ये सतगुरु की सीख ||

[ शब्द का अर्थ :-मांगन-माँग के खाना , मरण-मृत्यु, भला-अच्छा ]

भावार्थ- इस संसार में मनुष्य के लिए सबसे बड़ा होता है आत्मसन्मान | आत्मनिर्भरता, आत्मसन्मान ही है जो मनुष्य को संसार में इज्जत और मान-सन्मान दिलाता है |  बिना आत्मसन्मान वाले मनुष्य की संसार में कोइ इज्जत नहीं होती है | इसीलिए कबीर जी कहते हैं कि मनुष्य को अपना पेट भरने के लिए, जीवन जीने के लिए किसीके सामने हाथ नहीं पसारने चाहिए, भिखारी बनकर भीख नहीं मांगनी चाहिए, मांगना तो मृत्यु के समान है |

दुनिया को सद्गुरु, साधू-संत सिखा गए है, उपदेश करके गए है की अपना पेट भरने के लिए किसीसे भीख नही मांगनी चाहिए, मांगने से तो मरण अच्छा है, मृत्यु अच्छी है, इससे आत्मसन्मान तो बना रहेगा |



KABIR KE DOHE 

एक सौ तेईस

कबीरा खड़ा बाज़ार में, मांगे सबकी खैर |
ना काहू से दोस्ती,न काहू से बैर ||

[ शब्द का अर्थ :-खैर-सलामती, काहू-किसीसे, बाज़ार-संसार, बैर-दुश्मनी ]

भावार्थ-  कबीर जी कहते है इस संसार में खड़ा होकर परमपिता परमेश्वर से अच्छे-बुरे, धनवान-गरीब सबके सलामती और अच्छाई के लिए में उस प्रभु से दुआ मांगता हूँ | दुनिया में सबके साथ एक समान व्यवहार रखना चाहिए, नाही किसीसे ज्यादा मित्रता करनी चाहिए और नाही किसीसे दुश्मनी करनी चाहिए | दोस्त है तो इसका भला करूऔर दुश्मन है तो इसका बुरा करू इस व्यर्थ सोच में नही पड़ना चाहिए |  

अर्थात मनुष्य को सबका भला करना चाहिए दोस्ती दुश्मनी के चक्कर में नही पड़ना चाहिए |



 

एक सौ चौबीस

कहत सुनत सब दिन गए, उरझि न सुरझ्या मन |
कही कबीर चेत्या नहीं, अजहूँ सो पहला दिन ||

[ शब्द का अर्थ :-उरझि-उलझा, सुरझ्या-सुलझा, चेत्या-सावधान, अजहूँ-आजभी ]

भावार्थ-  कितने दिन-साल गुजर गए पर यह मन अब तक इस संसार में उलझ कर सुलझ नहीं पाया है | यह मन अभी तक भोग-वासनाओमें ही लिपट कर रहना चाहता है | यह मन अभी तक होश में नहीं आया है और विषय-वासनाओंसे  तृप्त नहीं हुआ है | आज भी इसकी अवस्था पहले दीन जैसी ही है, आज भी यह विषय-वासनाओंमें ही रहना चाहता है | अब हमें इस मन को इश्वर के भक्ति की और प्रेरित करना चाहिए |



KABIR KE DOHE

एक सौ पच्चीस

झूठे सुख को सुख कहे, मानत है मन मोद |
जगत चबैना काल का, कुछ मुंह में कुछ गोद ||

[ शब्द का अर्थ :- मानत-समझना, मोद-प्रसन्न, जगत-संसार, चबैना-ग्रास, निवाला ]

भावार्थ-  कबीर जी कहते है, अरे मनुष्य तू संसार के झूठे सुखों को सुख समझकर मन में प्रसन्ना हो रहा है | यह संसार तो काल का ग्रास है, भोजन है कुछ उसके मुख में है तो कुछ उसके झोली में है |  

अर्थात इस संसार के सभी प्राणी नश्वर है कुछ काल द्वारा नष्ट कर दिए गए है और कुछ काल की झोली में है जिनका भी कुछ समय द्वारा अंत हो जाएगा |



 

एक सौ छब्बीस

कबीर सो धन संचे, जो आगे को होय |
सीस चढ़ाए पोटली, ले जात न देख्यो कोय ||

[ शब्द का अर्थ :-संचे-जमा करो, आगे को-भविष्य के लिए, सीस-शीर, सर, कोय-किसीको ]

भावार्थ- कबीरजी कहते है मनुष्य को अपने जीवन में उतने ही धन का संचय करना चाहिए जो उसके वर्तमान और भविष्य के काम आ सके | लोगों से दुर्व्यवहार करके, दींन-रात मेहनत करके बहुत सारा धन जमा करके क्या फायदा, आपने किसी धनवान, सावकार, राजा या सम्राट को मरने के बाद अपना खजाना सर पे लाद के ले जाते हुए देखा है |

अर्थात जब हमें सब कुछ यही छोड़ कर जाना है तो क्यों न सत्कर्म करके, इश्वर की भक्ती करके इस दुनिया से विदा हो जाए |   



 

एक सौ सत्ताईस

कबीर बादल प्रेम का, हम पर बरसा आई |
अंतरि भीगी आतमा, हरी भई बनराई ||

[ शब्द का अर्थ :-आतमा-आत्मा, हरी-इश्वर, बनराई-जंगल, भई-बन गयी ]

भावार्थ- कबीरजी कहते है, प्रेम में इतनी ताकत है की मनुष्य का जीवन बदल देता है | आपबीती सुनाते हुए कबीर कहते है कही से प्रेमरूपी बादल मेरे ऊपर आ गया और प्रेम की वर्षा कर मेरी अंतर आत्मा तक को भिगो गया | प्रेम की इस वर्षा से चमत्कार हो गया और मेरे आस पास का पूरा परिवेश हरा-भरा हो गया, खुश हाल हो गया | यह प्रेम का अपूर्व प्रभाव है |

अर्थात प्रेम में अपार शक्ती है उसे सिर्फ महसूस करने की जरूरत है |



KABIR KE DOHE 

एक सौ अट्ठाईस

लाली मेरे लाल की, जित देखूं तित लाल |
लाली देखन मै गई, मै भी हो गयी लाल। ||

[ शब्द का अर्थ :-लाली–रंगा हुआ , लाल–प्रभु , जित–जिधर, देखन–देखना ]

भावार्थ-  कबीरदास यहां अपने ईश्वर के ज्ञान प्रकाश का जिक्र करते हैं। वह कहते हैं कि यह सारी भक्ति यह सारा संसार, यह सारा ज्ञान मेरे ईश्वर का ही है | मेरे लाल का ही है जिसकी मैं पूजा करता हूं और जिधर भी देखता हूं उधर मेरे प्रभु ही प्रभु ही नजर आते हैं |

एक छोटे से कण में भी, एक चींटी में भी, एक सूक्ष्म से सूक्ष्म जीवों में भी मेरे लाल का ही वास है। उस ज्ञान, उस प्राण, उस जीव को देखने पर मुझे इश्वर ही इश्वर के दर्शन होते है और नजर आते हैं | स्वयं मुझमें भी मेरे प्रभु का वास नजर आता है |

अर्थात सृष्टि के कण कण में इश्वर का वास है |



 

एक सौ उनतीस

काबा फिरी कासी भया, रामहीं भया रहीम |
मोट चून मैदा भया, बैठि कबीरा जीम ||

[ शब्द का अर्थ :-काबा-मुसलमानों का तीर्थस्थल, कासी-(काशी) हिन्दुओंका तीर्थस्थल,  मोट चून-मोटा आटा, बैठि-बैठकर,  जीम-भोजन करना ]

भावार्थ-  इश्वर एक ही है तथा अलग-अलग धर्मों में उसके नाम भिन्न है और उसकी उपासना करने के तरीके अलग-अलग है | हिन्दू लोगों का पवित्र स्थल काशी है और मुसलमानों का काबा |  कबीर कहते है इश्वर एक ही है इसलिए राम ही रहीम है और रहीम ही राम है |

जिस प्रकार से गेहूं को पीसकर मोटा आटा बनता है, मोटे आटे को पीसकर मैदा बनता है और दोनोंका भोजन किया जा सकता है | उसी प्रकार से मनुष्य एक इश्वर की ही संतान है भले ही उनके नाम अलग-अलग क्यों ना हो |

अर्थात जब मनुष्य को सच्चा ज्ञान प्राप्त होता है तब उसे काबा-काशी, राम-रहीम एक ही लगने लगते है | वह सबको एक ही भाव से देखता है |   



KABIR KE DOHE 

एक सौ तीस

श्रम ही ते सब होत है, जो मन राखे धीर |
श्रम ते खोदत कूप ज्यों, थल में प्रगटै नीर ||

[ शब्द का अर्थ :- कूप-कुंआ, थल-जमीन, नीर-पाणी, जल ]

भावार्थ- जीवन में मेहनत से मुश्किल कामों को भी किया जा सकता है, मनुष्यों को बस धेर्यपूर्वक अपने काम में लगे रहना चाहिए | मेहनत ही है जो उसे सफलता का मार्ग दिखला सकती है | जैसे मेहनत से, धेर्य से कुआं खोदने पर कठोरे धरती से भी कोमल शीतल जल निकल आता है |

अर्थात जो मनुष्य अपने जीवन में मेहनत करता है वह यश पाता है |



 

एक सौ इकतीस

झिरमिर- झिरमिर बरसिया, पाहन ऊपर मेंह |
माटी गलि सैजल भई, पांहन बोही तेह ||

[ शब्द का अर्थ :-पाहन-पत्थर, माटी-मट्टी, मेंह-मेघ ]

भावार्थ- अचानक से आसमान में बादल जमा हो गए और रिमझिम-रिमझिम बरसात होने लगी | इस रिमझिम बरसात में पत्थर और मीट्टी दोनों भीग गए | इस बरसात से मिट्टी तो भीग कर सजल हो गई किन्तु पत्थर वैसा का वैसा बना रहा | पत्थर के कठोरता में कुछ भी फर्क नहीं हुआ |

अर्थात कोमल ह्रदय का मनुष्य ही प्रेम को, इश्वर को महसूस कर सकता है | कठोर ह्रदय मनुष्य पर कितनी भी प्रेम की वर्षा हो जाये उसे कुछ महसूस नहीं होता |



 

एक सौ बत्तीस

जो तोकू कांता बुवाई, ताहि बोय तू फूल | 
तोकू फूल के फूल है, बाको है तिरशूल ||

[ शब्द का अर्थ – कांता–काँटा , बुवाई–बोना , ताहि–उसको, बाको–उसको ]

भावार्थ-  कबीरदास जी  का मानना है कि जो जैसा करता है , उसको वैसा ही फल मिलता है  अगर कोई अच्छा कर्म करता है तो उसे अच्छा ही प्राप्त होता है और बुरा कर्म करने वाले को बुरा ही प्राप्त होता है।

कबीरदास कहते हैं आप संतो की भांति व्यवहार करें , जिस प्रकार संत बुरा किए जाने पर भी सदैव हंसकर मुस्कुरा कर बात करते हैं। इसलिए संत का कभी अमंगल नहीं होता , वही कुत्सित बुद्धि वाले का कभी मंगल नहीं होता।



KABIR KE DOHE 

एक सौ तैंतीस

मान, महातम, प्रेम रस, गरवा तण गुण नेह  |
ए सबही अहला गया, जबहीं कह्या कुछ देह ||

[ शब्द का अर्थ :- गरवा-गौरव, नेह-स्नेह, अहला गया-बह गया ]

भावार्थ-  इस संसार में जब लेने की बारी आती है तो लोग खुशीसे स्वीकारते है पर जब उनसे कुछ देने को कहां जाता है तो उनके सामने मानो संकट खड़ा हो जाता है | इस संसार में मान, महत्त्व, प्रेम रस, गौरव, गुण तथा स्नेह सब बाढ़ में बह जाते हैं जब किसी मनुष्य से कुछ देने के लिए कहा जाता है |



 

एक सौ चौंतीस

जाता है सो जाण दे, तेरी दसा न जाइ |
खेवटिया की नांव ज्यूं, घने मिलेंगे आइ ||

[ शब्द का अर्थ :-दसा-दशा, स्थिती ]

भावार्थ- मनुष्यने अपने जीवन में इस बात से कभी भी परेशांन नहीं होना चाहिए, दुखी नहीं होना चाहिए के उसके जीवन में से कोइ चला गया | जो जाता है उसे जाने दो, तुम अपनी स्थिति को, दशा को न जाने दो | केवट की नाव में जैसे अनेक यात्री कुछ देर के लिए सफ़र करते है और फिर बिछड़ जाते है वैसे ही जीवन में अनेक व्यक्ति आकर तुमसे मिलेंगे | इसीलिए तुम किसी के जाने पर शोक नहीं करना, दुखी नहीं होना |



KABIR KE DOHE

एक सौ पैंतीस

जिहि घट प्रेम न प्रीति रस, पुनि रसना नहीं नाम |
ते नर या संसार में , उपजी भए बेकाम ||

[ शब्द का अर्थ :-घट-मन, ह्रदय, रसना-जिह्वा, जबान, उपजी-उत्पन्न होना ]

भावार्थ- इस संसार में जिस मनुष्य के मन में, ह्रदय में उस परमपिता परमेश्वर के प्रती प्रेम ना हो और नाहीं प्रेम का रस हो | जिस मनुष्य अपने जिव्हा से, मुख से अपने जीवन में कभी भी इश्वर का नाम नही लिया हो, उसकी भक्ती नहीं को हो | कबीरजी कहते ऐसे मनुष्य का जीवन व्यर्थ है, ऐसा मनुष्य इस संसार में जनमकर भी कुछ काम का नही है, वह बेकाम है |

अर्थात प्रेम के बिना और इश्वर के भक्ती के बिना मनुष्य का जीवन व्यर्थ है | 



 

एक सौ छत्तीस

यह घर है प्रेम का, खाला का घर नाही |
शीश उतार भुई धरों, फिर पैठो घर माहि ||

[ शब्द का अर्थ:- खाला–मौसी, शीश–सिर, भुई–भूमि, पैठो–जाओ ]

भावार्थ- कबीरदास कहते हैं की भक्ति प्रेम का मार्ग है, प्रेम का घर है | भक्ति प्रेम से होती है और ईश्वर की प्राप्ति के लिए प्रेम अति आवश्यक है | यह कोई रिश्तेदार का घर नहीं है कि आप आए और आपको भक्ति और प्रेम मिल जाए | इसके लिए कठिन तपस्या और साधना की आवश्यकता होती है | इसके लिए सिर झुकाना पड़ता है अर्थात सांसारिक मोह माया को त्यागना पड़ता है और सबको प्रेम भाव से अपनाना पड़ता है | इस प्रेम से ही ईश्वर की प्राप्ति हो सकती है।



 

एक सौ सैंतीस

नैना अंतर आव तू, ज्यूं हौं नैन झंपेउ |
ना हौं देखूं और को, न तुझ देखन देऊँ ||

[ शब्द का अर्थ :-नैना-आँखें, झंपेउ-बंद करना ]

भावार्थ-  कबीरजी कहते है, हे परम पीता परमेश्वर, हे तिनो लोक के स्वामी तुम्हारे भक्ती में, तुम्हारे प्रेम मे, मैं पुरी तरह से डूब चूका हूँ | अब तुम्हारे बिन एक पल भी रहना मुश्कील है | तुम मेरे इन दो नेत्रों के मार्ग से मेरे भीतर, मेरे ह्रदय के अन्दर आ जाओ और फिर में अपने इन आँखों को बंद कर लूँगा | ऐसा करने से न तो मैं किसी और को देख पाऊँगा और नहीं किसी और को तुम्हे देखने दूंगा |



KABIR KE DOHE 

एक सौ अड़तीस

कबीर रेख सिन्दूर की, काजल दिया न जाई |
नैनूं रमैया रमि रहा, दूजा कहाँ समाई ||

[ शब्द का अर्थ :-नैनूं-आँख, दूजा-दूसरा, समाई-समाना, निवास करना ] 

भावार्थ-  विवाहित स्त्री अपने मांग में (बालों में) सिंदूर भरती है | औरतें काजल आँख में लगाती है | जहाँ सिंदूर भरा जाता है वहापर काजल लगाया नहीं जा सकता और जहाँ आखों में काजल लगाया जाता है वहां सिंदूर लगाया नहीं जा सकता | उनकी जगह बदली नहीं जा सकती | उसी प्रकार से जब भक्त के नेत्रों में तीनो लोक के स्वामी स्वयम श्री राम समाये हो तो उन नेत्रों में कोइ और कैसे समां सकता है | यह असंभव है |



 

एक सौ उनतालीस

सातों सबद जू बाजते, घरि घरि होते राग |
ते मंदिर खाली परे, बैसन लागे काग ||

[ शब्द का अर्थ :-सबद-शब्द , काग-कव्वा ]

भावार्थ- जिन घरों में, महलों में कभी सप्तसुर गूंजते थे, बड़े-बड़े गवय्ये अपने मधुर सुर बरसाते थे | जहाँ हर घड़ी आनंद का, उत्सव का माहोल रहता था | ऐसे धनवानो के महल समय के साथ-साथ बुरे वक्त के चलते रित्क्त पड़े है, खाली पड़े है | जहाँ कभी सप्तसुरों से माहोल सजता था, आज वहा कव्वे निवास करने लगे है और अपने कर्कश आवाज में गा रहे है |

अर्थात संसार मे कुछ भी स्थायीरूप में नहीं होता है, पल पल में सब कुछ बदलता रहता है | जहां पहले खुशियाँ थी वहां गम छा जाता है जहां सुख था वहां दुःख डेरा डाल सकता है, यही संसार का नियम है | 



KABIR KE DOHE 

एक सौ चालीस

कबीर मंदिर लाख का, जडियां हीरे लालि |
दिवस चारि का पेषणा, बिनस जाएगा कालि ||

[ शब्द का अर्थ :-चारि-चार, बिनस जाएगा-टूट जाएगा, कालि-कल ]

भावार्थ-  इस संसार में मानव सबसे ज्यादा अपने देहसे (शरीर) प्यार करता है |हर कष्ट से इसे बचाने की कोशिश करता है | जतन करके मेहनत करके शरीर को सजाता हैं, वह भूल जाता है की यह शरीर लाख का बना  मंदिर है जिसमें हीरे और लाल जड़े हुए हैं | यह चार दिन का खिलौना है कभी भी नष्ट हो सकता है और हम जान भी नहीं पाएंगे |

अर्थात यह देह नश्वर है, क्षणभंगुर है, इसे कितना भी प्यार करो एक दीन इसका अंत हो जायेगा |



 

एक सौ इकतालीस

तेरा संगी कोई नहीं, सब स्वारथ बंधी लोइ |
मन परतीति न उपजै, जीव बेसास न होइ ||

[ शब्द का अर्थ :- संगी -साथी, स्वारथ-स्वार्थ, बेसास-विशवास, उपजै-उत्पन्न होना ]

भावार्थ- इस संसार में मनुष्य अपने परिवार में, दोस्तों में इस तरह से रमा रहता है की वो सच जान ही नहीं पाता है की यह रिश्ते-नाते है सब स्वार्थ में बंधे होते है | इस संसार में कोइ किसीका संगी-साथी नहीं है | जब तक मनुष्य में मन में इस बात के प्रती एहसास उत्पन्न नहीं होता तब तक उसका आत्मा के प्रती विश्वास जागृत नही होता | और जब आत्मा के प्रती मनुष्य का विश्वास जागृत होता है तब वह अपने भीतर झांकता है |

अर्थात जब मनुष्य को जीवन के वास्तविकता का ज्ञान होता है तब उसकी अध्यात्मिक उन्नती शुरू होती है |



 

एक सौ बयालीस

झूठे को झूठा मिले, दूंणा बंधे सनेह |
झूठे को साँचा मिले, तब ही टूटे नेह ||

[ शब्द का अर्थ :- साँचा-सच्चा, सनेह-स्नेह, प्रीती, दूंणा-दुगना ]

भावार्थ- जब एक झूठे बोलने वाले व्यक्ती को, झूठ बोलने वाले व्यक्ती से ही मित्रता होती है तो दोनों का एक दुसरे के प्रती स्नेह, प्रेम दीनोदीन बढ़ता ही जाता है | क्योंकी दोनों की प्रवृती, विचार समान होते है | पर जैसे ही एक झूठ बोलने वाले मनुष्य की, एक सच्चे बोलने वाले व्यक्ती से मित्रता होती है, यह मित्रता ज्यादा समय तक नहीं चल पाती और उनका स्नेह टूट जाता है |

अर्थात विपरीत प्रवृत्ति वाले व्यक्ती एक दुसरे के साथ ज्यादा दीन तक नहीं रह सकते |



KABIR KE DOHE 

एक सौ तैंतालीस

कबीर चन्दन के निडै, नींव भी चन्दन होइ |
बूडा बंस बड़ाइता, यों जिनी बूड़े कोइ  ||

[ शब्द का अर्थ :- निडै-करीब, बड़ाइता-बढ़ाई करना ]

भावार्थ- जिन्दगी में अच्छे लोगों के साथ रहनेसे उनके कुछ अच्छे गुण भी हम ग्रहण कर लेते है | जिस प्रकार से चन्दन के सुवासीक वृक्ष के पास अगर कडवे नीम का पेड़ भी हो तो वह चन्दन का कुछ सुवास तो ले ही लेता है, चन्दन के स्वाभाव के कुछ गुण तो ग्रहण ही कर लेता है | पर बांस का पेड़ जो अपनी ऊँचाई के कारण अहंकार में डूबा हुआ रहता है, अपने बड़प्पन के कारण डूब जाता है | इस तरह तो किसी को भी नहीं डूबना चाहिए |

अर्थात मनुष्य को अपने जीवन में अच्छे संगति के द्वारा, अच्छे गुणों का ग्रहण करना चाहिए | अपने गर्व में ही नही  रहना चाहिए, इससे मनुष्य अधोगती को प्राप्त होती है |



 

एक सौ चौवालीस

मूरख संग न कीजिए ,लोहा जल न तिराई |
कदली सीप भावनग मुख, एक बूँद तिहूँ भाई ||

[ शब्द का अर्थ :-मूरख-मुर्ख, संग-सोबत, तिराई-तैरना ] 

भावार्थ-  मनुष्य के जीवन में संगती का परिणाम जरूर होता है | अच्छे संगती का अच्छा और बुरे संगती का बुरा परिणाम देखने को मिलता है | कबीरदास कहते है मूर्ख का साथ मत करो, मूर्ख लोहे के सामान होता है जो जल में तैर नहीं पाता डूब जाता है | मुर्ख आदमी से दोस्ती करके मनुष्य को पछतावा ही करना पड़ता है |

जीवन में अच्छे संगति का प्रभाव इतना पड़ता है कि आकाश से एक बूँद केले के पत्ते पर गिर कर कपूर, सीप के अन्दर गिर कर मोती और सांप के मुख में पड़कर विष बन जाती है |

अर्थात जीवन में सद्गुणी मनुष्य से दोस्ती हमेशा हितकारक होती है |



KABIR KE DOHE

एक सौ पैंतालीस

मन मरया ममता मुई, जहं गई सब छूटी |
जोगी था सो रमि गया, आसणि रही बिभूति ||

[ शब्द का अर्थ :- मरया-मर गया, मुई-समाप्त होना, जोगी-साधू ]

भावार्थ- इस संसार में हमेशा उसकी ही जय होती है, उसका ही नाम रह जाता है, जिस मनुष्य ने अपने  मन को मार डाला हो, सारी मोह, माया, ममता जिसने त्याग दी हो और अपने अहंकार को समाप्त कर दिया हो |ऐसा योगी मनुष्य जिसने अपने जीवन भर में प्रभु की भक्ती की हो और लोक कल्याण का कार्य किया हो | कबीरदास कहते है ऐसा जो योगी था वह तो यहाँ से चला गया अब आसन पर उसकी भस्म – विभूति पड़ी रह गई अर्थात संसार में केवल उसका यश रह गया, उसने कीए हुए कामोंकी किर्ती रह गयी |

अर्थात मनुष्य इस संसार से चला जाता है और पीछे रह जाते है उसने किये हुए कर्म  |



 

एक सौ छियालीस

जल में कुम्भ कुम्भ में जल है, बाहर भीतर पानी |
फूटा कुम्भ जल जलहि समाना, यह तथ कह्यौ गयानी ||

[ शब्द का अर्थ :- कुम्भ-घड़ा, मटका, जल-पाणी, गयानी-ज्ञानी, तथ-तथ्य, सत्य, समाना-एकत्रित होना ]

भावार्थ- जब कुएं का या नदी का पाणी घड़े में भरा जाता है, तब घड़े के अन्दर पाणी जमा हो जाता है | मतलब अब घड़े के अन्दर भी पाणी है और बाहर भी पाणी है जहांसे इस जल को भरा गया | अगर पाणी भरते वक्त घड़ा फूट जाता है तो घड़े के अन्दर का पाणी, बाहर के पाणी में समां जाता है और दोने फिरसे एकरूप हो जाते है, इनमे कोइ अलगाव नहीं रहता, जिस तरहसे मनुष्य की आत्मा और परमात्मा एक है  | 

ज्ञानी जन इस तथ्य को कह गए हैं की आत्मा-परमात्मा दो नहीं एक हैं | आत्मा परमात्मा में और परमात्मा आत्मा में विराजमान है | जब मनुष्य देह त्यागता है तो उसकी आत्मा परमात्मा में विलीन हो जाती है, समा जाती है |



 

एक सौ सैंतालीस

पढ़े गुनै सीखै सुनै, मिटी न संसै सूल |
कहै कबीर कासों कहूं, ये ही दुःख का मूल ||

[ शब्द का अर्थ :-संसै-संशय, सूल-कांटा, कासों कहूं-किससे कहूं ]

भावार्थ- ज्ञानी बनने की चाह में, मन में उभरे सवालों के जवाब ढूंढने की चाह में आदमी बहुत सारी पुस्तके पढता है, गुनता है, सीखता है और सुनता है | फिर भी उसके मन में गड़ा संशय का काँटा नीकलता नहीं है, उसे अपने सवालों के जवाब मिलते नहीं है |

कबीरदास कहते है, कि किसे समझा कर यह कहूं कि यही तो सब दुखों की जड़ है | ऐसे किताबे पढने से,पठन मनन करने से क्या लाभ जो मन का संशय न मिटा सके और नहीं सवालों के जवाब मिल संके |    



 

एक सौ अड़तालीस

कबीर सोई पीर है, जो जाने पर पीर |
जो पर पीर न जानई, सो काफिर बेपीर ||

[ शब्द का अर्थ :-पीर-अच्छा मनुष्य, पर पीर-दूसरों की पीड़ा, काफिर बेपीर-दुष्ट और जालिम ]

भावार्थ-  कबीरदास कहते है, वही मनुष्य अच्छा मनुष्य है, सच्चा मनुष्य है, संत है जो दूसरों के पीड़ा को, दुःख को, दर्द को अपना जानकर समझता है, उसे महसूस करता है और उनके दुखों में शामिल होता है | और जो मनुष्य दूसरे के दुःख, दर्द, पीड़ा को नहीं जानता है, समझता है वह बेदर्द हैं, निष्ठुर हैं और काफिर हैं |

अर्थात जो दूसरोंकी पीड़ा को जानता है, समझता है वही सच्चा मनुष्य, सच्चा संत होता है |



 

एक सौ उनचास

मन मैला तन ऊजला, बगुला कपटी अंग |
तासों तो कौआ भला, तन मन एकही रंग ||

[ शब्द का अर्थ :-मैला-गन्दा, तन-शरीर, तासों तो-उससे तो, भला-अच्छा ]

भावार्थ- अगर कोइ मनुष्य तन से उजला है, उसने अच्छे वस्त्र पहन के रखे है और वह बहुत अच्छी बातें करता है पर अगर उसका मन कपट से, दृष्टता से भरा है तो उसके अच्छे रहेन सेहन का क्या फायदा | जिस तरह से बगुला तन से उजला होता है पर उसका मन कपट से भरा, मैला होता है तो उसके उजला होने से क्या फायदा ? उससे अच्छा तो कव्वा होता है जिसका तन मन एक जैसा होता है और वह किसी को छलता भी नहीं है | 

अर्थात उज्वल मन मनुष्य मात्र का सच्चा आभूषण है |



KABIR KE DOHE 

एक सौ पचास

देह धरे का दंड है, सब काहू को होय |
ज्ञानी भुगते ज्ञान से, अज्ञानी भुगते रोय ||

[ शब्द का अर्थ :-दंड-सज़ा, धरे का-धारण करने का ]

भावार्थ- जब इस संसार में मनुष्य देह धारण करता है तो उसे सुख और दुःख दोनों का सामना करना पड़ता है | आमिर-गरीब, बलवान-दुर्बल या ज्ञानी-अज्ञानी सबको जीवन में सुख-दुःख का सामना करना पड़ता है | अंतर इतना ही है कि ज्ञानी, समझदार व्यक्ति इस भोग को, दुःख को समझदारी से, धैर्य से भोगता है और जीवन में संतुष्ट रहता है | जबकि अज्ञानी व्यक्ती रोते हुए, दुखी मन से सब कुछ झेलता है और अपना जीवन पीड़ा में व्यतीत करता है |

अर्थात मनुष्य को जीवन के दुखोंका धैर्य से सामना करना चाहिए |



 

एक सौ इक्यावन

हीरा परखै जौहरी, शब्दहि परखै साध |
कबीर परखै साध को, ताका मता अगाध ||

[ शब्द का अर्थ :-परखै-जाँचना, साध-साधू, अगाध-गहन ]

भावार्थ-  इस संसार में अनमोल रत्नों की और हिरोंकी परख जौहरी जानता है, शब्द के सार और असार को परखने वाला विवेकी साधु–सज्जन होता है | इन लोगों के निर्णय से हर कोइ सहमत होता है क्योंकी यह पने कार्य में प्रवीण होते है | 

कबीर कहते हैं कि इन सबसे बड़ा विशेषज्ञ होता है वह साधु, योगी जो असाधु को, दुर्जन को  परख लेता है, उसका मत सबसे अधिक गहन गंभीर है |



 

एक सौ बावन

कबीरा ते नर अँध है, गुरु को कहते और |
हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रूठे नहीं ठौर ||

[ शब्द का अर्थ:-नर-मनुष्य, हरि-इश्वर, रूठे-नाराज होना, ठौर-डोर ]

भावार्थ- कबीर दास जी कहते है की इस संसार में मनुष्य अध्यात्मिक दृष्टी से, प्रभु के भक्ती मार्ग को ढूंढने में  अच्छे गुरु के बिना असमर्थ होता है, अंध होता है | कभी कभी वह सच्चाई के मार्गसे भटक जाता है तो गुरु ही उसे सही मार्ग बताता है |

जब किसी कारण इश्वर आपसे नाराज हो जाते है, संकट आपपे मंडराने लगते है तो गुरु एक डोर हैं जो ईश्वर से आपको मिला देती हैं, आपके सारे कष्ट दूर कर देते है | लेकिन अगर गुरु ही आपसे नाराज हो जाए तो इस संसार में ऐसी कोई डोर नही, ऐसा कोइ मार्गदर्शक नहीं होता जो आपको सहारा दे |



 

एक सौ तिरेपन

बैद मुआ रोगी मुआ, मुआ सकल संसार |
एक कबीरा ना मुआ, जेहि के राम आधार ||

[ शब्द का अर्थ :-बैद–वैद्य, चिकित्सक, मुआ–मर जाना, मृत्यु,  सकल–सभी, आधार–सहारा ]

भावार्थ- कबीर दासजी कहते है, वैद्य मर जाता है, रोगी मर जाता है और यह संसार भी एक दिन खत्म हो जाता है | किंतु जो भक्ति के मार्ग पर निकल जाता है, वह कभी समाप्त नहीं होता | जो श्रारीम के संरक्षण में चले जाते हैं, उसका कभी कोई अमंगल नहीं होता | संकट में भी राम की स्नेह रूपी डोर अपने भक्तों से बंधी रहती है |  ऐसे दयावान राम का आधार पाकर कोई भी अमंगल कैसे हो सकता है |

अर्थात भगवान का भक्त सदा सुखी रहता है |



 

एक सौ चौवन

कबीर कहा गरबियौ, ऊंचे देखि अवास |
काल्हि परयूँ भ्वै लौटणा, ऊपरि जामे घास ||

[ शब्द का अर्थ :-गरबियौ-गर्व, आवास-भवन, काल्हि-कल, भ्वै-पृथ्वी, लौटणा-गिरना ]

भावार्थ-  हे मनुष्य ऊँचे ऊँचे भवनों को देखकर गर्व करने से क्या लाभ, यह गर्व निरर्थक है क्यों की समय के साथ यह भवन पुराने हो जायेगे और धरती पर गिर पड़ेंगे, सुनसान हो जायेंगे और इनपर घास उग आयेगी | 

अर्थात सम्पूर्ण वैभव यह नाशवान है | इसलिए मनुष्य ने गर्व छोड़कर सत्कर्म करने चाहिए, इश्वर की आराधना करनी चाहिए उसमेही भलाई है |



KABIR KE DOHE

एक सौ पचपन

राम रसायन प्रेम रस, पीवत अधिक रसाल |
कबीर पिवन दुर्लभ है, मांगे शीश कलाल ||

[ शब्द का अर्थ:– राम–भगवान, रसायन–अभिक्रिया से उत्त्पन्न वैज्ञानिक रस, रसाल–रसीला, दुर्लभ–जो सरल न हो, कलाल–कटा हुआ ]

भावार्थ- कबीर कहते हैं राम नाम का जो रस है जो रसायन है | वह दुर्लभ है वह सभी को नहीं मिलता है |  राम नाम का रस तो उसी को मिलता है जो राम की खोज करता है| इसके लिए अपने शीश को कटवाना पड़ता है | मगर राम नाम का रस जिसको भी मिलता है उसे किसी और चीज़ की आवश्यकता नहीं होती है।

इसी बात को कबीर फिर कहते हैं कि राम नाम का रस दुर्लभ है जो कबीर को भी नहीं मिल पाया | पिने वाले इस रस को रसीला मानते है, इस में मिठास है |



 

एक सौ छप्पन

कबीर सतगुर ना मिल्या, रही अधूरी सीख | 
स्वांग जाति का पहरी कर, घरी घरी मांगे भीख || 

[ शब्द का अर्थ :–सतगुरु–सच से परिचय करवाने वाला, स्वांग– कुत्ता, पहरी–पहरेदारी, घरी–घर ]

भावार्थ- प्रस्तुत पंक्ति में गुरु के महत्व को स्वीकार किया गया है | बिना गुरु के सच्चा ज्ञान नहीं मिल सकता , उसके बिना मिला हुआ ज्ञान अधूरा ही होता है | वह व्यक्ति कभी भी पूर्ण रूप को नहीं जान पाता, अर्थात पूर्ण सत्य को कभी भी नहीं जान पाता |

जिस प्रकार कुत्ता दर-बदर भोजन के लिए भटकता रहता है | ठीक इसी प्रकार अधूरा ज्ञान प्राप्त किया हुआ व्यक्ति भटकता फिरता है | किंतु उसे पूर्ण ज्ञान की कही प्राप्ति नहीं होती |



 

एक सौ सत्तावन

कबीरा गरब ना कीजिये, कभू ना हासिये कोय |
अजहू नाव समुद्र में, ना जाने का होए। || 

[ शब्द का अर्थ :–गरब–गर्व, कभू–कभी, हासिये–हँसिये, कोय–कोई, अजहू–अभी ]

भावार्थ- कबीरदास का स्पष्ट मानना है कि किसी भी व्यक्ति पर हंसना नहीं चाहिए | उस व्यक्ति का उपहास नहीं करना चाहिए तथा कमियों पर कभी भी मुस्कुराना और सार्वजनिक नहीं करना चाहिए | आप किसी का हित कर सकते हैं तो अवश्य करें। किंतु कभी भी हंसने से बचना चाहिए |

समय का फेर है नाव कब समुद्र में डूब जाए, यह कोई नहीं जानता | ठीक इसी प्रकार जीवन में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं | आज आपका दिन ठीक है, कल कैसा रहेगा यह तो कोई नहीं जानता | इसलिए दूसरे पर हंसी उड़ाने से पहले अपने भविष्य को भी जानना चाहिए | कल आपके साथ कैसी घटना घट जाए या स्वयं आप भी नहीं जान  पाते |



 

एक सौ अट्ठावन

सुख सागर का शील है, कोई न पावे थाह |
शब्द बिना साधू नहीं, द्रव्य बिना नहीं शाह || 

[ शब्द का अर्थ :– शील–स्वभाव, थाह–भेद, द्रव्य–पूंजी, शाह–राजा ]

भावार्थ- कबीर दास का मानना है कि सागर का शांत स्वभाव ही ठीक है, शांत रहते हुए भी कोई इसकी था नहीं ले पाता | साधु के शब्द ही उसे महान बनाते हैं, उसके स्वभाव में कभी उग्रता नहीं देखी जाती | जिस प्रकार सागर शांत रहता है इसीलिए वह विशाल है | ठीक इसी प्रकार बिना पूंजी के अर्थात धन के कोई राजा नहीं बन सकता। यह धन उसके गुण उसके शील स्वभाव ही होते हैं |



 

एक सौ उनसठ

गुरु को सर रखिये, चलिए आज्ञा माहि |
कहै कबीर ता दास को, तीन लोक भय नाही ||

[ शब्द का अर्थ :– सर–शीश, माहि–अनुसार, तीन लोक-त्रिलोक ]

भावार्थ- कबीर दास गुरु का विशेष महत्व देते हैं | उनका मानना है कि जो गुरु के बताए हुए मार्ग पर चलता है , वह कभी भी भटकता नहीं है | वह कभी गलत राह को नहीं अपनाता | तीनो लोक में वह निर्भीक हो जाता है, क्योंकि गुरु कभी गलत रास्ता नहीं बताता |



KABIR KE DOHE 

एक सौ साठ

कबीरा लोहा एक है, गढ़ने में है फेर |
ताहि का बख्तर बने, ताहि की शमशेर ||

[ शब्द का अर्थ :– गढ़ने–बनना, आकार देना, बख्तर–रक्षा ढाल, शमशेर–तलवार ]

भावार्थ- कबीर दास ने लोहे का सहारा लेते हुए व्यक्ति के चरित्र निर्माण पर दृष्टिपात किया है। उन्होंने बताया है लोहा एक ही प्रकार का होता है | उसी लोहे से रक्षा करने वाली ढाल अर्थात बख्तर का निर्माण किया जाता है | वहीं दूसरी ओर जीवन हरने वाली तलवार भी बनाई जाती है | दोनों का अपना महत्व है इसके बनाने वाले पर निर्भर करता है कि वह क्या बनाना चाहता है |

ठीक इसी प्रकार व्यक्ति का चरित्र निर्माण भी संभव है | शिक्षक जिस प्रकार अपने शिष्य को तैयार करेगा वह शिष्य भी उसी प्रकार तैयार होगा | कहने का आशय यह है कि व्यक्ति में जिस प्रकार के गुण डाले जाएंगे उसी प्रकार का गुण व्यक्ति में होगा |



 

एक सौ इकसठ

जाका गुरु भी अंधला, चेला खरा निरंध |
अंधै अंधा ठेलिया, दून्यूँ कूप पडंत ||

[ शब्द का अर्थ:- जाका-जिसका, अंधला-अँधा, चेला-शिष्य, कूप-कूआ, पडंत-पड़ते है, दून्यूँ-दोनों ]

भावार्थ- कबीरदास जी कहते है,  शिष्य को गुरु चयन के वक्त अंत्यंत सावधानी बरतनी चाहिये, गुरु अगर अज्ञानी मिल जाता है, मूढ़ मील जाता है तो ऐसे शिष्य की दुर्गती ही होती है | गुरु और शिष्य दोनों ही मुर्ख होगे तो वो सही मार्ग पर न चलकर कूए में जा गिरेंगे, अर्थात खुद संकट में फस जायेंगे | इसलिए जीवन में ज्ञानी गुरु का होना बहुत महत्वपूर्ण है |



 

एक सौ बासठ

यह तन जारौं मसि करो, लिखौ राम का नाऊँ |
लेखनी करौ करंक की, लिखी लिखी राम पठाऊँ ||

[ शब्द का अर्थ- तन-शरीर, जारौं-जलाकर, मसि-स्याही, नाऊँ-नाम, करंक-हड्डी, पठाऊँ-भेजूंगी ]

भावार्थ- परमात्मा के विरह में व्याकुल जीवात्मा कहती है मैं अपने शरीर को जलाकर उसकी स्याही बनाऊंगी और मैं इस अपने शरीर के हड्डियों की लेखनी बनाकर उस स्याही से राम का नाम लिखकर, अपने उस प्रियतम राम के पास बार बार भेजती रहूँगी | अर्थात जिससे मुझ विरहनी के विरह दशा और पिडा को वो समझ सकेंगे |



 

एक सौ तिरेसठ

सतगुरु की महिमा अनंत, अनंत किया उपकार |
लोचन अनंत उघारिया, अनंत दिखावण हार ||

[ शब्द का अर्थ:- सतगुरु–शिक्षक, अनंत–जिसका कोई अंत न हो, उपकार–कृपा करना, उद्धार करना, लोचन – आँख, उघारिया–खोलना, दिखावण–दिखाना ]

भावार्थ-  कबीरदास कहते हैं कि गुरु के माध्यम से ही हमें वह दिव्य चक्षु अथवा ज्ञान की प्राप्ति होती है जिससे हम निराकार और अब निर्गुण में रूप का दर्शन कर पाते हैं | सतगुरु ही वह माध्यम है जिसके माध्यम से हमारे आंखों पर पड़े पर्दे हट सकते हैं | गुरु ही उस आवरण को हटाता है जिसके कारण हम ज्ञान की प्राप्ति नहीं कर पाते | अर्थात निर्गुण निराकार के दर्शन नहीं कर पाते | सद्गुरु ही हमारे अंदर के चक्षु , आंखों को खोलते हैं उनके माध्यम से ही हमें अनंत, निराकार के दर्शन होते हैं |



 

एक सौ चौंसठ

जांमण मरण बिचारि, करि कूड़े काम निबारि |
जिनि पंथूं तुझ चालणा, सोई पंथ संवारि ||

[ शब्द का अर्थ :-जांमण-जन्म, मरण-मृत्यु, बिचारि-विचार करके, जिनि पंथूं-जिस पंथपर, चालणा-चलना ]

भावार्थ- इस संसार के मनुष्यों को इस बात का हमेशा स्मरण रखना चाहिए की जिसने इस धरती पर जन्म लिया है उसकी मृत्यु भी निश्चित है | जन्म-मरण के फेरे से अब तक कोइ भी बच नहीं पाया है भले ही वह महात्मा ही न क्यों हो | इस बात का ध्यान रखते हुए मनुष्य को बुरे कर्मों को छोड़ देना चाहिए और सदमार्ग अपनाना चाहिए | 

जिस सदमार्ग पर मनुष्य को चलना है उस मार्ग का स्मरण करके, उसे याद रखके, उस मार्ग को सवार के सुन्दर बनाना चाहिए |



KABIR KE DOHE

एक सौ पैंसठ

तीरथ गए से एक फल, संत मिले फल चार |
सतगुरु मिले अनेक फल, कहे कबीर विचार ||

[ शब्द का अर्थ :-तीरथ-तीर्थ क्षेत्र, फल-लाभ ,प्रसाद, प्राप्ती, सतगुरु-सद्गुरु ]

भावार्थ- कबीरदास जी कहते है, जब मनुष्य पवित्र तीर्थ क्षेत्रों पर जाकर भगवान के दर्शन करता है तब उसे  एक फल की प्राप्ती होती है | जब उसे संतो की संगति मिलती है, उनकी सेवा करने का, उनसे ज्ञान प्राप्त करने का अवसर मिलता है तो वह चार फल के प्राप्ती के बराबर होता है | अगर मनुष्य को संतो के संत, सद्गुरु से ज्ञान मिलता है, उनका कृपा प्रसाद मिलता है तो ऐसे संगतीसे उसे अनेको फलों की प्राप्ती होती है |  



 

एक सौ छियासठ

प्रेम पियाला जो पिए, सिस दक्षिणा देय |
लोभी शीश न दे सके, नाम प्रेम का लेय ||

[ शब्द का अर्थ :-पियाला-प्याला, सिस-शीर ]

भावार्थ-  इस संसार में जिस मनुष्य को भी प्रभु की भक्ती करनी है, प्रभू के प्रेम का रस पीना है उसे अपना शीश प्रभु को अर्पण करना होता है अर्थात अपने काम, क्रोध, भय, इच्छा, मोह, अहंकार को त्यागना होता है |

जो लालची इन्सान होता है वह प्रभु का प्रेम, कृपा प्रसाद तो पाना चाहता है पर अपने काम, क्रोध, लोभ, अहंकार और मस्तर को त्यागना नहीं चाहता है | सारे भोगों को भोगते हुए वह प्रभु का प्रेम उसकी कृपा चाहता है | 



 

एक सौ सड़सठ

राम बुलावा भेजिया, दिया कबीरा रोय |
जो सुख साधू संग में, सो बैकुंठ न होय ||

[ शब्द का अर्थ :-राम-प्रभु / इश्वर,  संग-साथी / सोबती ] 

भावार्थ- कबीरदास जी कहते है, मैंने अपना जीवन साधू-संतो के संग स्वर्गीय आनंद में बिताया है | जब मुझे मेरे जीवन के अंतिम समय में उस परमपिता परमेश्वर का बुलावा आया तो मैं दुःख से रो दीया | मैं इसलिए नहीं रोया के में मौत से डर गया | इसका कारण था साधू-संतो के संग मैंने जो ज्ञान पाया, जो अति आंनद पाया उतना आनंद तो साक्षात् प्रभु के वैकुण्ठ (स्वर्ग)में भी नहीं होगा |



 

एक सौ अड़सठ

ज्ञान रतन का जतन कर, माटी का संसार |
हाय कबीरा फिर गया, फीका है संसार ||

[ शब्द का अर्थ :-माटी-मिट्टी, जतन कर-संभल के रख, संसार-दुनिया ] 

भावार्थ- कबीर दास जी कहते हैं कि यह संसार तो माटी का है, नश्वर है | यहा हर एक मनुष्य की मृत्यु निश्चित है | इस संसार में मृत्यु के बाद जीवन और जीवन के बाद मृत्यु इस फेरे में सारे जीवित प्राणी फसे हुए है | इसीलिए यहां जीते जी मनुष्य को हो सके उतना ज्ञान पाने की कोशिश करनी चाहिए नहीं तो मृत्यु के बाद जीवन और फिर जीवन के बाद मृत्यु यही क्रम चलता रहेगा |



 

एक सौ उनहत्तर

ज्यों नैनन में पुतली, त्यों मालिक घर माँहि |
मूरख लोग न जानिए, बाहर ढूँढत जाहिं ||

[ शब्द का अर्थ :-मूरख-मुर्ख, नैनन-आँख, मालिक-स्वामी / प्रभु, माँहि-मेरा ] 

भावार्थ- इस संसार में मनुष्य, इश्वर की तलाश में सारा जहाँ तलाश करता है, दर दर भटकता है, ठोकरे खाता है, पर उसे इश्वर मिलता नही |  जैसे हमारे आँख के अन्दर पुतली होती है, ठीक वैसे ही ईश्वर हमारे अंदर बसा होता  है | मूर्ख लोग इस बात को नहीं जान पाते और बाहर ही ईश्वर को तलाशते रहते हैं |



KABIR KE DOHE 

एक सौ सत्तर

कबीरा जब हम पैदा हुए, जग हँसे हम रोये |
ऐसी करनी कर चलो, हम हँसे जग रोये ||

[ शब्द का अर्थ :-करनी-कर्म ] 

भावार्थ-  कबीर दास जी कहते हैं कि जब हम इस संसार में जनम लेते है, तो हम रोते हुए इस संसार में पैदा होते है | पर हमारे आगमन से, घर परिवार वाले, रिश्तेदार सारे खुशियाँ मनाते है, आनंद से हसते है | संसार में आये है तो हमें जीते जी अपने जीवन में कुछ ऐसा कर्म, अच्छे काम करके जाना चाहिए के हमारे मरने के बाद यह दुनिया दुःख से रोये और हम हँसे।



 

एक सौ इकहत्तर

कबीर देवल ढहि पड्या, ईंट भई सेंवार |
करी चिजारा सौं प्रीतड़ी, ज्यूं ढहे न दूजी बार ||

[ शब्द का अर्थ :-सेंवार-शैवाल, ढहि पड्या-गिर गया/ नष्ट हो गया, दूजी बार-दुसरी बार, देवल-मंदिर, प्रीतड़ी-प्रेम ]

भावार्थ- प्रभु का मंदीर (देवालय) गिर पड़ा है और मंदिर के हर एक ईट पर, पत्थर पर शैवाल (काई) जम गई है | अर्थात कबीर जी यहाँ मनुष्य के शरीर को प्रभु ने बनाये हुए मंदीर की उपमा देते है और कहते है की शरीर रूपी मंदिर ढह गया और शरीर का अंग-अंग शैवाल में बदला गया मतलब नष्ट हो गया | कबीरजी मनुष्य को कहते है इस देवालय को बनाने वाले प्रभु से प्रेम करो जिससे यह देवालय दूसरी बार फिरसे  नष्ट न हो |



 

एक सौ बहत्तर

कबीर यह तनु जात है, सकै तो लेहू बहोरि |
नंगे हाथूं ते गए, जिनके लाख करोडि ||

[ शब्द का अर्थ :-तनु-देह, शरीर, नंगे हाथूं-खाली हाथ ]

भावार्थ- कबीरदास जी कहते हैं कि मानव शरीर नश्वर है, इसे एक न एक दीन नष्ट हों जाना है | इसलिए हे मनुष्य अब भी संभल जाओ और कुछ सत्कर्म कर लो जिससे तुम्हारा जीवन सार्थक हो जाए | इस संसार में अनेकों मनुष्योने लाखो, करोडो धन कमाया और धनवान बन गए जा| उनके पास लाखों करोड़ों की संपत्ति थी पर जब उनकी मृत्यु हो गयी तो वे खाली हाथ ही गए हैं |

इसलिए मनुष्य ने अपना जीवन सिर्फ धन संपत्ति जोड़ने में ही नही लगाना चाहिए | अच्छे कर्म कर्म करके अपने जीवन को सवारना चाहिए |



 

एक सौ तिहत्तर

मन जाणे सब बात, जांणत ही औगुन करै |
काहे की कुसलात, कर दीपक कूंवै पड़े ||

[ शब्द का अर्थ :-औगुन-अवगुण, कुसलात-कुशल, कर-हाथ ]

भावार्थ-  मनुष्य का मन अच्छा-बुरा, गुण-अवगुण इन् सब बातों को जानता हैं | इन सब बातों को जानते हुए भी वह अवगुणों के चक्कर में फस जाता है | अवगुणों को अपनाकर जीवन में संकटों का सामना करना पड़ेगा यह जानते हुए भी वह अवगुणों को त्यागता नही | यह ऐसे ही जैसे अंधेरेमे दीपक हाथ में होते हुए भी कुंए में गीर पड़ना | दीपक हाथ में होते हुए भी कुंए में गीर पड़ने वाले व्यक्ती का क्या कुशल और क्या अकुशल |



 

एक सौ चौहत्तर

हिरदा भीतर आरसी, मुख देखा नहीं जाई |
मुख तो तौ परि देखिए, जे मन की दुविधा जाई ||

[ शब्द का अर्थ :-हिरदा-ह्रदय, मन, दुविधा-संशय, आरसी-आयना ]

भावार्थ- मनुष्य अपने जीवन में जो कुछ अच्छे-बूरें कर्म करता है, यह उसके मन को, ह्रदय को, अंतरात्मा को मालूम होता है | ह्रदय ही उसके कर्मों का दर्पण होता है | परन्तु भोग, विलास, विषय-वासनाओके मलिनता के कारण मनुष्य को अपना वास्तवीक मुख (चेहरा), स्वरुप  दिखाई ही नहीं देता है |

मनुष्य को अपना वास्तविक स्वरूप, चेहरा, मुख अपने ह्रदय के भीतर तभी दिखाई देता है जब उसके मन का संशय मीट जाता है |  



KABIR KE DOHE

एक सौ पचहत्तर

हू तन तो सब बन भया, करम भए कुहांडि |
आप आप कूँ काटि है, कहै कबीर बिचारि ||

[ शब्द का अर्थ :-तन-देह, बन-जंगल, करम-कर्म, कुहांडि-कुल्हाड़ी, काटि-काटना ]

भावार्थ- हमारा यह शरीर हमारे अच्छे-बूरें कामोंसे जंगल की तरह भरा हूआ होता है | हमारे अच्छे-बूरें कर्म ही कुल्हाडी बनकर हमारे जंगल रूपी शरीर को काट रहे है | इस प्रकार हम खुद ही अपने आपको अपने कर्मो के माध्यम से काट रहे हैं, यह बात कबीर सोच विचार कर कहते हैं |



 

एक सौ छिहत्तर

जानि बूझि साँचहि तजै, करै झूठ सूं नेह |
ताकी संगति रामजी, सुपिनै ही जिनि देहु ||

[ शब्द का अर्थ :-जानि बूझि- जानबूझकर, साँचहि-सत्य, तजै-त्याजना, त्यागना, नेह-स्नेह, सुपिनै-सपना ]

भावार्थ- जो मनुष्य जानबूझ कर, सब समझते हुए भी सत्य का साथ, सत्य का मार्ग छोड़ देता है और असत्य का मार्ग अपनाकर झूठ से स्नेह कर लेता है | कबीरदास जी कहते है हे प्रभु, हे इश्वर ऐसे लोगों का साथ, संगती कृपा करके हमें सपने में भी नही देना |



 

एक सौ सतहत्तर

तरवर तास बिलम्बिए, बारह मांस फलंत |
सीतल छाया गहर फल, पंछी केलि करंत ||

[ शब्द का अर्थ :-तरवर-वृक्ष, मांस-महीना, फलंत-फल देता है, सीतल-शीतल, केलि-क्रीडा ]

भावार्थ- कबीरदास जी कहते हैं कि इन्सान ने हमेशा ऐसे वृक्ष के नीचे विश्राम करना चाहिए, जो बारहों महीने फल देता है, क्यों की बारहों महीने फल देने वाला वृक्ष हर समय मनुष्य की भूख मिटा सकता है | जिस वृक्ष की छाया शीतल हो, वह शीतल छाया देनेवाला वृक्ष मनुष्य को धुप से बचाता है | जिस वृक्ष के फल सघन हों और जहां पक्षी क्रीडा करते हों |



 

एक सौ अठहत्तर

काची काया मन अथिर, थिर थिर काम करंत |
ज्यूं ज्यूं नर निधड़क फिरै, त्यूं त्यूं काल हसन्त ||

[ शब्द का अर्थ:- काची-कच्चा, काया-शरीर, अथिर-चंचल, थिर-स्थीर, नर-पुरुष, निधड़क-निडर /बेधड़क, हसन्त-हस रहा ]

भावार्थ-  कबीरदास कहते है, यह शरीर कच्चा है, यह कभी भी नष्ट हो सकता है | यह मन चंचल है, अस्थिर है, यह कभी भी अवगुणों को ग्रहण कर सकता है | पर मनुष्य इस सबसे बेखबर संसार में रमकर, निडर होकर घूमता है और अपने भोग विलास मे मगन रहता है | 

इस दुनिया में मृत्यु पास है यह जानकर भी इंसान अनजान बना रहता है | उसकी इस बेपरवा वृती को देखकर काल (मृत्यु) उसपर हसता है | यह कितनी दुखभरी बात है |



 

एक सौ उनासी

या दुनिया दो रोज की, मत कर यासो हेत |
गुरु चरनन चित लाइये, जो पुराण सुख हेत ||

[ शब्द का अर्थ-दो रोज-दो दिन, यासो-इससे, चरनन-चरण, चित-मन, पुराण-पूर्ण ]

भावार्थ- कबीरदास जी कहते है, यह दुनिया नश्वर है और इस संसार की सारी चीजें, रिश्ते-नाते, भोग-विलास सारे दो दीन के चोचले है | अतः इस दो दिनकी उम्रवाली नश्वर दुनियासे मनुष्यने प्रभावित होकर मोह सम्बन्ध जोड़ने नहीं चाहिए |

इस संसार में पूर्ण सुख देनेवाली कोइ जगह है तो वह है सद्गुरु के चरण | मनुष्य को सद्गुरु के चरणों में अपना मन लगाना चाहिए, उनसे ज्ञान पाकर, सदमार्ग पे चलकर प्रभु की भक्ती करनी चाहिए, इसीमे पूर्ण सुख है |



KABIR KE DOHE 

एक सौ अस्सी

गाँठी होय सो हाथ कर, हाथ होय सो देह |
आगे हाट न बानिया, लेना होय सो लेह ||

[ शब्द का अर्थ:- हाट-बाजार, बानिया-व्यापारी ]

भावार्थ- इस संसार में मनुष्य ने जो भी धन संपती कमाई है, अपने तिजोरियोंमें गाँठ बांधके रखी हैं उसे उसने हाथ में लेना चाहिए और जो हाँथ में धन है उसे परोपकार में लगाना चाहिए | अच्छे काम में धन लगाकर परोपकार करके पुण्य कमाना चाहिए |

मनुष्य को जो भी अच्छे कर्म करने है, परोपकार करना है, यह कार्य उसे जीवित रहते ही करना होगा | मानव शरीर नष्ट होने के बाद मनुष्य पुण्य कर्म नहीं कर सकता क्यों की नर-शरीर के पश्चात् इतर खानियों में बाजार-व्यापारी कोई नहीं है | इसिलए जो भी पुण्य कमाना है, परोपकार करना है, जो लेना देना होगा वह मनुष्य को इससे    

जो गाँठ में बाँध रखा है, उसे हाथ में ला, और जो हाथ में हो उसे परोपकार में लगा। नर-शरीर के पश्चात् इतर खानियों में बाजार-व्यापारी कोई नहीं है, लेना हो सो यही ले-लो।



 

एक सौ इक्यासी

बहते को मत बहन दो, कर गहि एचहु ठौर |
कह्यो सुन्यो मानै नहीं, शब्द कहो दुइ और ||

[ शब्द का अर्थ:- कह्यो सुन्यो-कहा सुना, दुइ-दो ] 

भावार्थ- कबीरदास जी कहते है, अगर इस संसार में कोइ अवगुणों में फसकर, बुराइयों के मार्ग पर बहता चला जा रह हो तो आपका यह कर्तव्य है की उसे बुराई के नदी में मत बहने दो | हाथ पकड़ कर उसको मानवता की दृष्टिकोण से उस गंदगी से बाहर निकाल लो | यदि वह आपके लाख समझाने पर भी आपका कहा-सुना न माने, तो भी निर्णय के दो कठोर वचन और सुना दो पर उसे बुराइयोंमें मत बहने दो | 



 

एक सौ बयासी

बार-बार तोसों कहा, सुन रे मनुवा नीच |
बनजारे का बैल ज्यों, पैडा माही मीच ||

[ शब्द का अर्थ:- तोसों-तुझसे, मनुवा-मनुष्य,  बनजारे-व्यापारी/ सौदागर, नीच-दृष्ट ]

भावार्थ- हे दृष्ट मनुष्य, नीच मनुष्य मैं तुझे बार-बार कह रहां हूँ, तू अपने जीवन में अवगुनोसे, असत्य के मार्ग से दूर रह | भोग विलास, विषय-वासनाओमे रमकर अपने जीवन को बर्बाद मत कर | देह नश्वर है इसका कोइ भरोसा नही | जैसे किसी व्यापारी का बैल बीच मार्ग में ही मर जाता है | वैसे तू भी अचानक एक दिन मर जाएगा | वक्त रहते हे तू अपने आपको संभाल ले |



KABIR KE DOHE 

एक सौ तिरासी

बनिजारे के बैल ज्यों, भरमि फिर्यो चहुँदेश |
खाँड़ लादी भुस खात है, बिन सतगुरु उपदेश ||

[ शब्द का अर्थ:- बनिजारे-व्यापारी/सौदागर, चहुँदेश-चारों दिशा, खाँड़-शक्कर ]

भावार्थ- व्यापारी अपना माल ढोने के लिए बैलों का इस्तेमाल करते है | यह बैल व्यापारियों के साथ चोरों दिशाओंमे भ्रमण करते है | इन बैलों के पीठ पर व्यपारी शक्कर भी लाद देते है तो भी वह भूसा खाते हुयें चारों दिशाओंमे घूमते है | इसी प्रकार से अपने पास ज्ञान होते हुए भी मनुष्य, उचित, योग्य और सच्चे सद्गुरु के उपदेश के आभाव में, मार्गदर्शन के बिना ससार के भोग विलास में, विषय–प्रपंचो में उलझकर मनुष्य अपने आप नष्ट हो जाते है।



 

एक सौ चौरासी

जीवत कोय समुझै नहीं, मुवा न कह संदेश |
तन – मन से परिचय नहीं, ताको क्या उपदेश |

[ शब्द का अर्थ:- जीवत-जिन्दा, कोय-कोई, समुझै-समझता, मुवा-मरा हुआ, ताको क्या-उसको क्या ]

भावार्थ-  इस संसार में मनुष्य जब जीवीत होता है तब उसे अगर कोई यतार्थ ज्ञान की बात समझाता है, सदमार्ग पे चलने की बात समझाता है, तब वह उसे समझना नहीं चाहता और मर जाने पर इनको कौन उपदेश करने जाएगा | जिनको अपने तन-मन का होश नहीं है, सदमार्ग की पहचान नही, उनको क्या उपदेश किया जाये? उनको उपदेश करना व्यर्थ है |  



KABIR KE DOHE

एक सौ पचासी

कबीर तहां न जाइए, जहां जो कुल को हेत |
साधु गुन जाने नहीं, नाम बाप का लेत || 
 

[ शब्द का अर्थ:- तहां-वहां पर, गुन-गुण ]

भावार्थ-   कबीरदासजी कहते है, साधू, योगी, महनीय व्यक्तीयोने हो सके तो वहापर जाना टालना चाहिए जहाँ पर उनके पूर्व के कुल-कुटुम्ब का सम्बन्ध हो | क्योंकि वे लोग आपकी साधुता, कार्यों का महत्व को नहीं जानेंगे, उनके लिए तो आप केवल आपके पीता के पुत्र है | वह सिर्फ आपके शारीरिक पिता का नाम लेंगे ‘अमुक का लड़का आया है |      



 

एक सौ छियासी

कहते को कही जान दे, गुरु की सीख तू लेय |
साकट जन औश्वान को, फेरि जवाब न देय ||

[ शब्द का अर्थ – कही जान दे-बोलते जाने दे, सीख-शिक्षा, साकट-दृष्ट, औश्वान-कुत्ते ]

भावार्थ- इस जगत में ऐसे भी लोग होते है जो सज्जनों को गलत बोलते रहते है | उनका अपमान करते रहते है, उनको नीचा दिखाना की कोशिश करते रहते है | ऐसे वक्त में मनुष्यने गुरु की शिक्षा का पालन करना चाहिए | ऐसे दृष्ट लोगों को तथा भोकने वाले कुत्तों को पलट कर जवाब नहीं देना चाहिए | अपने सत्कर्मों को जारी रखना चाहिए |  



 

एक सौ सत्तासी

कबीर संगति साध की, कड़े न निर्फल होई |
चन्दन होसी बावना, नीब न कहसी कोई ||

[ शब्द का अर्थ:- साध-साधू, कड़े-कभी, बावना-बौना, नीब-नीम का वृक्ष ]

भावार्थ- कबीरदास कहते है की साधू-संतो की संगती, उनका उपदेश, मार्गदर्शन और उन्होंने दिया हुआ ज्ञान कभी भी निष्फल नहीं होता | अगर चन्दन का वृक्ष बौना है तो क्या कोइ उसे नीम का वृक्ष कह सकता है | चन्दन अपनी सुगंधता से आसपास के परिवेश को खुशबू से भर देता है | चन्दन की खुशबू की तरह ही साधू के संगती में रहने वाले मनुष्य का जीवन ज्ञान की और भक्ती के खुशबू से भर जाता है |



 

एक सौ अट्ठासी

गारी मोटा ज्ञान, जो रंचक उर में जरै |
कोटि सँवारे काम, बैरि उलटि पायन परै |
गारी सो क्या हान, हिरदै जो यह ज्ञान धरै |

[ शब्द का अर्थ – गारी-गाली, बैरि-दुश्मन, पायन-पाँव/ पैर, परै-पड़ना, हिरदै-ह्रदय ]

भावार्थ- अगर आप में अपमान सहन करने की शक्ती है | किसीने दी हुयी गालीयाँ आप का ह्रदय सहन करने की शक्ती रखता है, तो आप पाएंगे के मिली हुई गाली में भी भारी ज्ञान होता है | विपरीत परिस्थितियों में भी जो संयम रखता है उसके करोडो काम संवर जाते है | ऐसे आदमी की शत्रु भी प्रशंसा करता है और पैरों में आके गिरते है | दुश्मनों द्वारा दी गयी गालीसे अगर हमारे ह्रदय में ज्ञान आता है, तो ऐसे मीली हुई गाली से हमारी हांनी क्या है ?



 

एक सौ नवासी

कबीर तहाँ न जाइये, जहाँ सिध्द को गाँव |
स्वामी कहै न बैठना, फिर-फिर पूछै नाँव ||

[ शब्द का अर्थ :– नाँव-नाम, तहाँ-वहां पर ]

भावार्थ- कबीरदास कहते है की, मनुष्य ने ऐसे गावं में या ऐसे स्थान पर कभी भी नहीं जाना चाहिए, जहापर अहंकारी, खुदको सबसे श्रेष्ठ समझने वाले अभिमानी सिद्ध रहते हो | जो दूसरों को कम आंकते हो | जिनके यहा जाने पर वहांके स्वामीजी आपसे बैठने तक को ना कहे और आपसे बार बार आपका नाम ही पूंछते रहे | 

अर्थात मनुष्य ने ऐसे स्थान पर कभी भी नही जाना चाहिए जहाँ पर उसको कोइ पूछता नहीं हो, जहा उसको कोई मान नही हो |



KABIR KE DOHE 

एक सौ नब्बे

कबीर संगी साधु का, दल आया भरपूर |
इन्द्रिन को तब बाँधीया, या तन किया धर ||

[ शब्द का अर्थ :– इन्द्रिन-इन्द्रिय, दल-समूह ]

भावार्थ-  कबीरदास कहते है, संतो के साथ रहकर, उनसे ज्ञान पाकर, उनके कृपा प्रसाद से ह्रदय में जब परिपूर्ण रूप से विवेक-वैराग्य, दया, क्षमा, समता आदि का दल आ जाता है | तब शरीर के लोभ, क्रोध, मोह, मद, भोग, विषय वासना इन व्यधियोंको, इन्द्रियों पर विजय प्राप्त कर नष्ट कीया जाता है | 

अर्थात तन मन को जो वश कर लेता है वही सच्चा साधू होता है |



 

एक सौ इक्यानबे

बन्दे तू कर बन्दगी, तो पावै दीदार |
औसर मानुष जन्म का, बहुरि न बारम्बार ||

[ शब्द का अर्थ :– बन्दे-भक्त, बन्दगी-भक्ती, औसर-अवसर, बारम्बार-बार बार, दीदार-दर्शन, पावै-पायेगा ]

भावार्थ-  हे भक्त ! तू उस परमपिता परमेश्वर की भक्ती कर, उसके बताये हुए सत्य के मार्ग पे चल, परोपकार कर, तुझे अपने आप उसके दर्शन हो जायेंगे | इस संसार में मनुष्य के रूप में जनम ने का अवसर सबको बार बार नहीं मिलता है | तू इस अवसर का लाभ उठा और ईश्वर को पाने की कोशिश कर |



 

एक सौ बानबे

मन राजा नायक भया, टाँडा लादा जाय |
है है है है है रही, पूँजी गयी बिलाय ||

[ शब्द का अर्थ :– भया-हो गया, टाँडा-बहुत सौदा,  बिलाय-नष्ट होना ]

भावार्थ- मनुष्य का मन किसी राजा से कम नहीं है, वह जो चाहता है वही मनुष्य से करवा लेता है | जब यह  राजा मन व्यापारी बना तो विषय-वासनाओंका टाँडा इसने लाद लिया |  भोगों-एश्वर्योंमें लाभ है, आनंद है ऐसा दुनिया कहती है यह जानकर वह खुश हुआ | परन्तु भोग विलासोंमे लिप्त रहने से मानवता की पूँजी भी नष्ट हो जाती है | समाज में मनुष्य का मान सन्मान नष्ट हो जाता है |

अर्थात चंचल मन को काबू में रखने में ही मनुष्य की भलाई है | 



 

एक सौ तिरानबे

जिही जिवरी से जाग बँधा, तु जनी बँधे कबीर |
जासी आटा लौन ज्यों, सोन समान शरीर ||

[ शब्द का अर्थ :– जाग-जगत/ दूनिया, जिवरी-बंधन, सोन-सोना (मूल्यवान धातु) ]  

भावार्थ-  जिस मोह-माया के बंधन में इस जगत के लोग बंधे है, जिसके कारन उनका विनाश हो जाता है | हे मनुष्य ! अगर तुझे अपना उद्धार करना है तो तू इस मोह माया के बंधन में खुद को मत बांध लेना | जैसे नमक के बगैर आटा फीका होता है वैसे ही बिना हरी के सुमिरन के तुम्हारा यह जीवन भी फीका पड़ जाता है | यदि तुम हरी का सुमिरण करते हो, सतमार्ग पर चलते हो तो यह तुम्हारे शरीर को ‘स्वर्ण’ के समान ही मूलयवान बना देता है |



 

एक सौ चौरानबे

मैं मैं मेरी जिनी करै, मेरी सूल बिनास |
मेरी पग का पैषणा, मेरी गल की पास ||

[ शब्द का अर्थ:-बिनास-विनाश, पग-पाँव, पैषणा-बेडी, गल की पास-गले का फास ]

भावार्थ-  मनुष्य जिन्दगी भर मैं और मेरा की रट लगाये रहता है | मैं मतलब उसका खुद के बारे में सोचना, उसका अहंकार, खुदको दूसरों से श्रेष्ठ समझना | मेरा मतलब उसका अपना परिवार और उसने जमा की हुयी धन संपती, जिनसे उसका लगाव होता है | 

कबीरदास कहते है, हे मनुष्य ! तू इस संसार में, मेरी और मैं अर्थात ममता और अहंकार में मत फ़सना, नहीं खुद को इसमें बाँध लेना | तू जो इस मोह, माया, ममता और अहंकार के चक्कर में फस गया तो तेरा विनाश पक्का है क्यों की यही विनाश का मूल है, जड़ है | ममता पैरों की बेडी है और गले की फांसी है |



KABIR KE DOHE 

एक सौ पंचानबे

कबीर नाव जर्जरी, कूड़े खेवनहार |
हलके हलके तिरि गए, बूड़े तिनि सर भार ||

[ शब्द का अर्थ:- नाव-नौका, जर्जरी-पुरानी, तिरि-तैरना, तिनि-उनके ]

भावार्थ- कबीरदास कहते हैं की, मनुष्य के जीवन की नौका संकटोंका, दुखोंका, कठिन परिस्थ्तियोंका सामना कर करके टूट फूट गयी है और उसे चलाने वाले मुर्ख है | जिन मनुष्योंके सर पर भोग, विषय वासनाओंका बोझ होता है वे तो संसार सागर में डूब जाते हैं, इसी दुनिया में संसारी बनकर उलझ जाते है | पर जो मनुष्य इन सब उलझनोसे दूर होते है, भोग, विषय वासनाओंका बोझ सर पर नही होने के कारन मुक्त होते है, हलके होते है | जिसकी वजह से वे इस संसार सागर में तर जाते हैं, पार लग जाते हैं और भव सागर में डूबने से बच जाते हैं |



 

एक सौ छियानबे

उज्जवल पहरे कापड़ा, पान सुपारी खाय |
एक हरी के नाम बिन, बंधा यमपुर जाय ||

[ शब्द का अर्थ:-उज्जवल- प्रभावशाली, पहरे-पहनना, हरी-इश्वर, यमपुर-नरक ]

भावार्थ-  जिस मनुष्य की समाज में प्रतिष्ठा है, जो धनवान है, हमेशा वह अच्छे, प्रभावशाली महेंगे कपडे पहनता है और मूह में उसके पान सुपारी भरा है, उसको समाज में आदर तो मिल जाता है | पर अगर वह मुख से कभी भी इश्वर का नाम नही लेता है, इश्वर की भक्ती नही करता है, परोपकार नहीं करता है तो उस मनुष्य का नरक से बचना मुश्किल होता है |



 

एक सौ सत्तानबे

ऊँचे पानी ना टिके, नीचे ही ठहराय |
नीचा हो सो भारी पी, ऊँचा प्यासा जाय ||

[ शब्द का अर्थ:-टिके-ठहरता नहीं ]

भावार्थ- पाणी हमेशा ऊँचे से होकर निचे की तरफ ही बहता है | जिसकी वजह से यह निचे आकर ठहरता है और जमा हो जाता है | इसी कारण से जो निचे जमीन पर होते है वह भरपूर पानी पीकर अपनी प्यास बुझा लेते है  पर जो ऊँचाई पर है, हवा मैं तैर रहे है वो ऐसा नही कर सकते और प्यासे ही रह जाते है | 

अर्थात जो मनुष्य सारे भोग-विलास, अहंकारोंसे दूर है, जो प्रभु के भक्ती में लीन है, जो जमीन पर लोगों के परोपकार में जुडा है उसे प्रभु के कृपा का रस मिल जाता है और वह धन्य हो जाता है | और जो मनुष्य अहंकार में डूबा है, खुदको सबसे ऊँचा समझता है, श्रेष्ट समझता है, अपनी ही मस्ती में रहता है और हवा मैं तैरता है, वह अपने जीवन में कभी भी इश्वर के कृपा का रस पी नहीं सकता और प्यासा ही रह जाता है |



 

एक सौ अट्ठानबे

कबीरा आप ठागइए, और न ठगिये कोय |
आप ठगे सुख होत है, और ठगे दुःख होय ||

[ शब्द का अर्थ:- ठागइए-धोखेबाजी/ फ़साना ]

भावार्थ- कबीरदास कहते है, अगर मनुष्य को किसीको ठगना है, मुर्ख बनाना है तो उसे स्वयंम को ही ठगना चाहिए दूसरों को नही | खुद को बेवकूफ बनाने में कोई बुराई नहीं है क्यों की इससे किसीका नुकसान नही होगा और सच्चाई तो आज या कल तो पता ही चल जायेगी | पर हम अगर किसी दुसरे को ठग लेते है, बेवकूफ बनाते है तो हमें ही दुःख का सामना करना पड़ता है |

अर्थात अपने आपको प्रभु के भक्ती में ठग लेने जैसा दूसरा आनंद नहीं है | 



 

एक सौ निन्यानबे

जहा काम तहा नाम नहीं, जहा नाम नहीं वहा काम |
दोनों कभू नहीं मिले, रवि रजनी इक धाम ||

[ शब्द का अर्थ:- काम-विषय-वासना, तहा-वहाँ, कभू-कभी भी, रवि-सूरज, रजनी-रात, धाम-निवास ] 

भावार्थ- जिस मनुष्य के जीवन में भोग और विषय वासनाओंको स्थान है | जो रात-दीन भोग भोगने के बारे में सोचता रहता है | ऐसे मनुष्य के जीवन में इश्वर कभी भी नहीं आते | जो मनुष्य सदा इश्वर का नाम लेते रहता है और परोपकार करता है ऐसे मनुष्य के जीवन में इश्वर का वास होता है | जैसे सूरज और रात कभी भी एक दुसरे से मिल नहीं सकते, वैसे ही जहा विषय वासनोंओंका वास होता है वहाँ भगववान कभी भी प्रकट नहीं हो सकते |



 

दो सौ

जा पल दरसन साधू का, ता पल की बलिहारी |
राम नाम रसना बस, लीजै जनम सुधारी ||

[ शब्द का अर्थ:- पल-क्षण, दरसन-दर्शन, रसना-जिव्हा ]

भावार्थ-  जीवन में चमत्कार हो गया जब साधू संतो के दर्शन हो गए, उनका सहवास मिला | साधू संतो से ज्ञान मिला, जीवन को उनका उपदेश और मार्गदर्शन मिला और मेरा जीवन पुरी तरह से बदल गया | उस अनमोल क्षण की जय हो जब मैं साधू संतो से मिला | मैंने राम नाम का जप किया, मेरा पूरा जीवन राममय हो गया और मैंने पाया के मेरा सारा जनम सुधर गया |